समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
शेर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शेर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

12/05/2010

हम अंधेरे में आंखें डाले हैं-हिन्दी कविता (hum andhere mein aahkhen dale hain-hindi gazal)

कहावत है पर किसने कब आस्तीन में सांप पाले हैं,
पर डसने का भय से बंद सोच, सच के मुंह पर ताले हैं।
शक है कि काले नाग भी इतने ही काले होंगे,
यहां तो आदमी के ख्याल उससे अधिक काले हैं।
जिन्हें ताज़ पहनाया वही विषधर बनकर डसने लगे
सिंहासन पर बैठे, हमारी आशा पर पांव डाले हैं।
मृगों की तरह नृत्य कर दिल जीत लिया जिन्होंने
लूटकर हमारे सपने बने अमीर, अब वह महल वाले हैं।
घर में जलते अकेले ‘दीपक’ की लौ भी चुरा ले गये
रौशन है उनका आंगन, हम अंधेरे में आंखें डाले हैं।
------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
http://dpkraj.wordpress.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

7/18/2010

ऊंचे ओहदेदार-हिन्दी हास्य कविता (oonche ohdedar-haysa kavita in hindi)

फिल्म निर्माता ने कहा
कहानीकार से
‘कोई ऐसी कहानी लिखकर लाओ,
जिसमें पुराने राजाओं जैसे रात को वेश बदलकर
जनता के दुःखदर्द जानने की कोशिश करते हुए
आज के किसी ऊंचे ओहदेदार का पात्र दिखाओ।
अपने ही बेटे को नायक बना रहा हूं
तो भतीजे को गायक के रूप में ला रहा हूं,
घिसी पिटी कहानियों से दर्शक अब नहीं फंसता
अमीरों की कहानियों को देखने से बचता,
अपना बेटा है इसलिये मज़दूर का अभिनय
उससे कराना कठिन है,
आखिर छबि का सवाल है
उसके यह इस धंधे में शुरुआती दिन है,
इसलिये कोई चमकदार पात्र सजाओ।’

सुनकर कहानीकार ने कहा
‘ भारत में और वह भी हिन्दी में यह संभव नहीं है
कोई अंग्रेजी कहानी हो तो आप बताओ।
उसका अनुवाद मैं लिख दूंगा,
पात्र की पृष्ठभूमि अमेरिका या ब्रिटेन में रख लूंगा,
यहां ऐसी कहानी नहीं लिखी जा सकती,
ऊंचे ओहदेदार रात मे क्या दुःखदर्द देखेंगे,
दिन में ही जनता उनके दर्शन नहीं करती,
फिर भेष बदलकर सड़क पर निकलने की बात
यहां जम नहीं पायेगी,
कमांडो तय करते हैं जिनका रास्ता
वह खुद क्या
उनकी पालतू कुतिया भी सड़क पर नहीं आयेगी,
अपने ही पहरेदारों के जो बंधक हैं
वह ऊंचे ओहदेदार
जनती की व्यववस्था के जरूर प्रबंधक हैं,
पर लोगों के भला करने की बात वह
तभी तो सोच पायेंगे
जब अपने घर भरने से फुरसत पायेंगे,
वैसे भी मैं बेमतलब की प्रेम कहानियां
लिखने का अभ्यस्त हूं,
आजकल तो बहुत ज्यादा व्यस्त हूं,
इसलिये या तो कहानी का पात्र बदलो
या कहानीकार ही बदलकर लाओ।’
-----------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

3/25/2010

विकास और कदाचार-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (devlopment and corruption-hindi satire poem)

रबड़ के चार पहियों पर सजी कार
विकास का प्रतीक हो गयी है,
चलते हुए उगलती है धुआं
इंसान बन गया मैंढक
ढूंढता है जैसे अपने रहने के लिये कुआं,
ताजी हवा में सांस लेती जिंदगी
अब अतीत हो गयी है।
----------
उन्होंने पूछा था अपने दोस्त से
खुशियां दिलाने वाली जगह का पता
उसने शराबखाने का रास्ता दिखाया,
चलते रहे मदहोश होकर उसी रास्ते
संभाला तब उन्होने होश
जब अस्पताल जाकर
बीमारों में अपना नाम लिखाया।
----------
हमने उनसे पूछा कदाचार के बारे में
उन्होंने जमाने भर के कसूर बताये,
भरी थी जेब उनकी भी हरे नोटों से
जो उन्होंने ‘ईमादारी की कमाई‘ जताये।
मान ली उनकी बात तब तक के लिये
जब तक उनके ‘चेहरे’
रंगे हाथ कदाचार करते पकड़े नज़र नहीं आये।
------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

3/01/2010

अपना अपना दाव-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (apna apna daav-hindi satire poem)

अंधों की तरह रेवड़ियां बांटने का
चलन अब आंख वालों में भी हो गया है।
कहीं पुजते दौलतमंद
कहीं सजते ऊंचे ओहदे वाले
कहीं जमते बाजुओं में दम वाले
तो कहीं उनके चाटुकार चमकते हैं
लोगों के हैं अपने अपने दाव
उजले नकाब पहनने पर हैं आमदा
क्योंकि चरित्र सभी का खो गया है।
--------
सम्मान बेचने वाले ने
एक कवि से कहा
‘कुछ जेब ढीली करो तो
हमसे सम्मान पाओ।
आजकल सब बिकता है बाजार में
शब्दों से खाली वाह वाह मिलती है,
कविता कागज पर लिखकर
पैसा खर्च करने की बजाय
हमारी जेब में पहुंचाओ।
कुछ अपना कुछ हमारा सम्मान बढ़ाओ।’
कवि ने कहा
‘पैसा होता तो कवितायें क्यों लिखता,
अभाव न होते तो कवि कैसे दिखता,
सम्मान खरीदने की ताकत होती
तो कवितायें भी खरीद कर लाता,
सम्मान के लिये सजाता,
फिर तुम जैसे तुच्छ प्राणी की
शरण क्यों कर लेता,
किसी बड़े आदमी पर चढ़ाता दाम
जो बड़ा ही सम्मान देता।
तुम सम्मान के छोटे सौदागर हो
अपने सम्मान को बड़ा न बताओ।
गली मोहल्ले के कवियों पर
अपना दाव लगाने से अच्छा है
अपना प्रस्ताव कविता के बाजार में
कवियों जैसे दिखने वालों को समझाओ।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

2/04/2010

इश्क की भाषा-हिन्दी व्यंग्य कविता (ishq ki bhasha-hindi comic poem)

आशिक लिखता था अंग्रेजी में प्रेमपत्र

प्रेमिका भी देती थी उसी में जवाब।

इश्क ने दोनों को कर दिया था विनम्र

नहीं झाड़ते थे एक दूसरे पर रुआब।

एक दिन अखबार में पढ़ी

माशुका ने ‘भाषा के झगड़े’ की खबर,

खिंच गया दिमाग ऐसे, जैसे कि रबर,

उसने आशिक के सामने

मातृभाषा का मामला उठाया,

दोनों ने उसे अलग अलग पाया,

वाद विवाद हुआ  जमकर,

दोनों अपनी ही मातृभाषा को

इश्क की भाषा बताने लगे तनकर,

पहले मारे एक दूसरे को ताने,

फिर लगे डराने

बात यहां तक पहुंची कि

दोनों एक दूसरे से इतना चिढ़े गये कि

आशिक के लिये माशुका

और माशुका के लिये आशिक बन गया

बीते समय का एक बुरा ख्वाब।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

1/07/2010

सिक्कों के पहाड़-हिन्दी शायरी (sikkon ke pahad-hindi shayri)

सिक्कों के पहाड़ पर ही

उम्मीदों की बस्ती बसी दिखती है,

पर वह तो धातु से बने हैं

जिनकी ताकत कितनी भी हो

सच पर खरे नहीं उतरते

बैठे हैं वहां तंगदिल लोग

अपने घर बसाकर

जिनकी कलम वहां रखी हर पाई

बस, अपने ही खाते में लिखती है।

----------

नाव के तारणहार खुद नहीं

उस पर चढ़े हैं,

क्योंकि दिल उनके छोटे

नीयत में ख्याल खोटे

पर उनके चरण बड़े हैं।

उड़ने के लिये उन्होंने

विमान जुटा लिये हैं

गरीब की कमाई के सिक्के

अमीर बनाने में लुटा दिये हैं

नदिया में डूब जाये नाव तो

हमदर्दी बेचने के लिये भी वह खड़े हैं

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

12/26/2009

अमीरी का रास्ता-हिन्दी शायरी (amiri ka rasta-hindi shayri)

दौलत बनाने निकले बुत

भला क्या ईमान का रास्ता दिखायेंगे।

अमीरी का रास्ता

गरीबों के जज़्बातों के ऊपर से ही

होकर गुजरता है

जो भी राही निकलेगा

उसके पांव तले नीचे कुचले जायेंगे।

-----------

उस रौशनी को देखकर

अंधे होकर शैतानों के गीत मत गाओ।

उसके पीछे अंधेरे में

कई सिसकियां कैद हैं

जिनके आंसुओं से महलों के चिराग रौशन हैं

उनको देखकर रो दोगे तुम भी

बेअक्ली में फंस सकते हो वहां

भले ही अभी मुस्कराओ।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

12/23/2009

तसल्ली के चिराग-हिन्दी शायरी (tasalli ke chirag-hindi shayri)

सर्वशक्तिमान का अवतार बताकर भी

कई राजा अपना राज्य न बचा सके।

सारी दुनियां की दौलत भर ली घर में

फिर भी अमीर उसे न पचा सके।

ढेर सारी कहानियां पढ़कर भी भूलते लोग

कोई नहीं जो उनका रास्ता बदल चला सके।

मालुम है हाथ में जो है वह भी छूट जायेगा

फिर भी कौन है जो केवल पेट की रोटी से

अपने दिला को मना सके।

अपने दर्द को भुलाकर

बने जमाने का हमदर्द

तसल्ली के चिराग जला सके।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

12/18/2009

कोपेनेहेगन में धरती के नये फरिश्तों का मिलन-व्यंग्य कवितायें (naye fariste-hindi vyangya kavita)

अब संभव नहीं है
कोई कर सके
सागर का मंथन
या डाले हवाओं पर बंधन।
इसलिये नये फरिश्ते इस दुनियां के
रोकना चाहते हैं
जहरीली गैसों का उत्सर्जन
जिसे छोड़ते जा रहे हैं खुद
समंदर से अधिक खारे
विष से अधिक विषैले
नीम से अधिक कसैले अपनी
उन फरिश्तों ने महफिल सजाने के लिये
ढूंढ लिया है कोपेनहेगन।।
--------
वह समंदर मंथन कर
अमृत देवताओं को देंगे
ऐसे दैत्य नहीं हैं।
पी जायें विष ऐसे शिव भी नहीं हैं।
कोपेनहेगन में मिले हैं
इस दुनियां के नये फरिश्ते,
गिनती कर रहे हैं
एक दूसरे द्वारा फैलाये विष के पैमाने की,
अमृत न पायेंगे न बांटेंगे,
बस एक दूसरे के दोष छाटेंगे,
धरती की शुद्धि तो बस एक नारा है
उनके हृदय का भाव खारा है,
क्या करें इसके सिवाय वह लोग
सारा अमृत पी गये पुराने फरिश्ते
अब तो विष ही हर कहीं है।।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

11/14/2009

दुनियां का खात्मा और मनोरंजन-हिन्दी व्यंग्य कविता (duniya aur manoranjan-hindi vyangya kavita)

दुनियां की तबाही देखने के लिये
इंसान का दिल क्यों मचलता है
हमारी आंखों के सामने ही सब
खत्म हो जाये
फिर कोई यहां जिंदा न रह पाये
यही सोचकर उसका दिल बहलता है।
हम न होंगे पर यह दुनियां रहेगी
यही सोच उसका दिमाग दहलता है।
इसलिये ही दुनियां के खत्म होने की
खबर पर पूरा जमाना
मनोरंजन की राह पर टहलता है।

----------------
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

11/08/2009

ज़माने सुधारने का वहम-व्यंग्य कविता (zamane ko sudharne ka vaham-vyangya kavita)

किताबों में लिखे शब्द
कभी दुनियां नहीं चलाते।
इंसानी आदतें चलती
अपने जज़्बातों के साथ
कभी रोना कभी हंसना
कभी उसमें बहना
कोई फरिश्ते आकर नहीं बताते।

ओ किताब हाथ में थमाकर
लोगों को बहलाने वालों!
शब्द दुनियां को सजाते हैं
पर खुद कुछ नहीं बनाते
कभी खुशी और कभी गम
कभी हंसी तो कभी गुस्सा आता
यह कोई करना नहीं सिखाता
मत फैलाओं अपनी किताबों में
लिखे शब्दों से जमाना सुधारने का वहम
किताबों की कीमत से मतलब हैं तुम्हें
उनके अर्थ जानते हो तुम भी कम
शब्द समर्थ हैं खुद
ढूंढ लेते हैं अपने पढ़ने वालों को
गूंगे, बहरे और लाचारा नहीं है
जो तुम उनका बोझा उठाकर
अपने फरिश्ते होने का अहसास जताते।।
--------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

10/22/2009

गुलाम राज-त्रिपदम (gulam raj-tripadam)

गुलाम राज
कर रहे हैं यहां
गुलाम पर।

कोई छोटा है
कोई उससे बड़ा
यूं नाम भर।

हुक्म चले
नहीं पहुंचता है
मुकाम पर।

कागजी नाव
तैरती दिखती है
यूं काम पर।

बड़ा इलाज
महंगा मिलता है
जुकाम पर।

खोई जिंदगी
ढूंढ रहे हैं
लोग दुकान पर।

दर्द पराया
सस्ता बतलाते
जुबान पर।

शिक्षा के नाम
पट्टा बंध रहा है
गुलाम पर।

जड़ शब्द
कैसे तीर बनेंगे
कमान पर।

आजादी नारा
मूर्ति जैसे टांगे हैं
गुलाम घर।

जो खुद बंधे
आशा कैसे टिकायें
गुलाम पर।
---------------------------

कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर
http://dpkraj.blogspot.com
----------------------------

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

10/18/2009

तांडव नृत्य-व्यंग्य कविता (tandav dance-vyangya kavita)

तैश में आकर तांडव नृत्य मत करना
चक्षु होते हुए भी दृष्टिहीन
जीभ होते हुए भी गूंगे
कान होते हुए भी बहरे
यह लोग
इशारे से तुम्हें उकसा रहे रहे हैं।
जब तुम खो बैठोगे अपने होश,
तब यह वातानुकूलित कमरों में बैठकर
तमाशाबीन बन जायेंगे
तुम्हें एक पुतले की तरह
अपने जाल में फंसा रहे हैं।

------------------------
कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर
http://dpkraj.blogspot.com
----------------------------

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

8/10/2009

बन्दूक और बारूद के सौदागरों के घर भरते-व्यंग्य कविता (saudagron ke ghar bharte-vyangya kavita)

बंदूक और बारूद के सौदागर
कभी बाजार की मंदी पर आहें नहीं भरते
जंग के लिये रोज लिखने वाले
मुफ्त में उनका विज्ञापन करते।

अमीर के अनाचार पर गरीब को
बंदूक उठाने का सिखाते फर्ज
गोली और बंदूक ऐसे बांटते जैसे कर्ज
शोषितों के उद्धार के लिये जंग का ऐलान
दबे कुचले के लिये छेड़ते खूनी अभियान
जहां शांति दिखे वहीं बारूद भरते।

अन्याय के खिलाफ् एकजुट होने का आव्हान
हर जगह दिखाना है संघर्ष का निशान
खाली अक्ल और
दिमागी सोच से परे
वह लोग नहीं जानते
अपने अंदर ही जो भाव नहीं
उसे दूसरे में जगाना संभव नहीं
यह बात नहीं मानते।
खून भरा है ख्यालों में
उन्हें सभी जगह घाव दिखाई देते हैं
बस लड़ते जाओ बढ़ते जाओ के
नारे सभी जगह लिखाई देते हैं
भूखा आदमी लड़ने की ताकत नहीं रखता
गरीब कभी गोली का स्वाद नहीं चखता
इसलिये किराये पर
गरीब और भूखे जुटा रहे हैं
बारूदों और बंदूकों उन पर लुटा रहे हैं
कौन जानता है कि
सौदागरों के पास से कमीशन उठा रहे हैं
अच्छा लगता है जंग की बात करना
पर गरीब और भूखे लड़ते हैं
अपनी जिंदगी से स्वयं
उनके लिये संभव नहीं
इतनी आसानी से मुफ्त में मरना
फिर भी जंग के ऐलान करने वाले
हर तरह बारूद और बंदूकों के
सौदागरों का घर भरते।
....................

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

8/08/2009

मन अब नहीं होता-हिंदी शायरी (man ab nahin hota-hindi shayri)

इंसान को पंख नहीं
इसलिये आकाश में
उड़ नहीं पाता।
पर ख्याल तो बिना पंख ही
उड़ते हैं आवारा
जमीन पर पांव के बल
उनको चलना नहीं आता।
ख्यालों में खून नहीं बहता
इसलिये गिरकर घायल होने का
डर उनको नहीं होता
जख्म तो शरीर के हिस्सों पर ही आता।
..............................
रोज सुबह घर के बाहर पड़े
कागज के उस पुलिंदे को
हाथ में पकड़कर
उस पर छपे अक्षर पढ़ने का
मन अब नहीं होता।

घर के अंदर चल रहे
उस बुद्ध बक्से के दृश्य देखने
और आवाज के शोर सुनने का
मन अब नहीं होता।

ऐसा लगता है कि
मेरे मन के भावों को
हथियार बनाकर उपयोग किया है
उन सौदागरों ने जो
सजा रहे है नारे और वाद बाजार में
देशभक्ति और जनकल्याण का दिया वास्ता
पर कभी खुद नहीं चले वह रास्ता
थकावट लगती है
अब तो अपना लक्ष्य ढूंढने की चाहत है
उनके दिखाये धोखे पर चलने का
मन अब नहीं होता।
............................

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

8/03/2009

अंतर्मन-हिंदी कविता (anatarman-nindi sahitya kavita)


आँखों से देखे का अहसास
कौन कराता है.
कानों से सुने का
अर्थ कौन समझाता है.
हाथों से छुए का स्पर्श कौन दिखाता है.
मुहँ के पकवान का
स्वाद कौन उठाता है.
अरे, उस अंतर्मन को तुम नहीं जानते
इसलिए भटकते हुए
जिंदगी की राह चले जा रहे हो
अपनी अंहकार की अग्नि में जले जा रहे हो
बोलता नहीं है वह
पर होकर मौन तुम्हें रास्ता दिखाता है.

--------------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

9/20/2008

उनको नाचते देखना-व्यंग्य कविता

बिकने के लिए तैयार है तो
फिर सौदे जैसा लिख और दिख

बाज़ार के कायदे हैं अपने
जहां मत देख ईमानदार बने रहने के सपने
दाम तेरी पसंद का होगा
काम खरीददार के मन जैसा होगा
भाव होगा वैसा ही होगा जैसा दाम
शब्द होंगे तेरे, पर नाम कीमत देने वाले होगा
अपने नाम को आसमान में
चमकता देने की चाहत छोड़ देना होगा
वहां तो उसको ही शौहरत मिलेगी
जिसका घर भी उड़ता होगा
तू जमीन में रेंगना सीख ले
इशारों को समझ कर लिख
जैसा वह चाहें वैसा दिख

मत कर भरोसा शब्दों की जंग लड़ने वालों पर
अपनी जिन्दगी में तरसे हैं
वह कौडियों के लिए
उनका लिखा बेशकीमती हो गया
उनके मरने के बाद
अमीरों पर उनके नाम से रूपये बरसे हैं
पेट में भूख हो तो कलम तलवार नहीं हो सकती
करेगी प्रशस्ति गान किसी का
तभी तेरी रोटी पक सकती
कब तक लिखेगा लड़ते हुए
स्याही भी कोई मुफ्त नहीं मिल सकती
शब्दों को सजाये कई लोग घूम रहे हैं
पर खरीददार नहीं मिलता
मिल जाए तो बिक जाना
या फिर छोड़ दे ख्वाहिश
शब्दों से पेट भरने का
किसी से लड़ने का
दिल को तसल्ली दे वाही लिख
जैस मन चाहे वैसा दिख
फेर ले शब्दों के सौदागरों से मुहँ
वह तुझे देखते रहे
तू भी नज़रें घुमा कर देखता रहना
उनका पुतले और पुतलियों की तरह
दूसरों के इशारों नाचना भी
तेरी कई रचनाओं को जन्म देगा
पर ऐसा करता बिलकुल मत दिख
बस अपना लिख

------------------------------------

यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

12/26/2007

जब उतरा है शराब का नशा

शराब के नशे में वादे
कर वह सुबह भूल जाते हैं
पूरे करने की बात कहो तो
याद करने के लिए बोतल
मांगने लग जाते हैं
---------------------
आदमी पीता है शराब
या आदमी को शराब
यह एक यक्ष प्रश्न है
जिसका नहीं ढूंढ पाया
कोई भी जवाब
----------------
सिर पर चढ़ती शराब
आदमी को शेर बना देती है
दौड़ता है इधर उधर बेलगाम
काबू में नहीं रहती जुबान
उतरती चूहा बना देती है
घबडा जाता है आदमी
ढूंढता है छिपने की जगह
अपने ही हाथ में नहीं रहती
अपने दिमाग की कमान
----------------------------------

शराब में डूबकर अगर जिन्दगी के
सफर में पार हो जाते
तो फिर फिर झूठी क़समें और
वादों को इस दुनिया में कहाँ देख पाते

12/25/2007

उधार की रौशनी

धीरे अस्ताचल को जाता सूरज
अपनी रोशनी समेत लेता है
जहाँ भी धरती को अंधरे में
छोड़ता है उदासी से उसका
तेज मद्धिम होता चला जाता
'कितना अँधेरा होगा इस धरती पर
यह सोचकर आँखें बंद कर लेता है'
फिर खोलकर देखता है
नीचे टिमटिमाते हुए छोटा दीपक
जो लहराते हुए अपनी रौशनी
जैसे कह रहा हों
''सुबह तक तुम्हारा कुछ काम
मेरा कंधा भी संभाल लेता है'
मुस्कराता हुआ सूरज सोचता है
'चंद्रमा से तो यह दीपक भला
जो मेरा काम संभालने के लिए
मुझसे ही रोशनी उधार लेता है
छोटा दीपक होकर भी
जमीन पर अँधेरे से बखूबी लड़ लेता है .
--------------------------------------------

उधार लेकर
आंखों को चकाचौंध करने वाले
बल्बों से रोशन करना अपने घर
अब नहीं सुहाता
इससे तो अन्धेरे भले
जिनमें चैन तो आता
कुछ पल चिराग जलाकर
तसल्ली कर लो
सुबह सूरज सभी नकली
रौशनी को फीका कर जाता
-------------------------------------

12/19/2007

शाम-ढलते ढलते

शांति से अपने तेज को समेटता सूरज
दिन को विराम देता
रात्रि को आमंत्रण भेजता
कोई आवाज नहीं
दिन भर प्रकाश बिखेरा पर
अहंकार का भाव नहीं
आकाश में चंद्रमा की आने की आहट
अपना स्थान उसे देने में
कभी नही दिखाता घबराहट
चला जा रहा है अस्ताचल में कहीं

रोज उगते और डूबते उसे
देख कर भी
क्यों नहीं सीखता कि
उगना और डूबना इस सृष्टि की नियति है
इसे क्या घबडाना
बचने का क्यों ढूंढते बहाना
अपनी विरासत दूसरे के हाथ में
जाते देख शुरू करते हैं शोर मचाना
सदियों पुराना सच जानते हैं
पर भूलने का ढूंढते बहाना
कभी सोचा हैं कि
झूठ के पाँव होते नहीं
और यह बदल सकता नहीं

लोकप्रिय पत्रिकायें

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर