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5/13/2016

दानवीर-हिन्दी कविता(Danveer-Hindi Poem)

आदर्श की बात करते
महल के अदंर
प्रवेश कर जायें।

भलाई का व्यवसाय 
चल निकले जब
निरंतर लाभ पायें।

कहें दीपकबापू दया से
जिनका वास्ता नहीं
विज्ञापन के दम पर
दानवीर कहलायें।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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9/04/2015

एकांतवाटिका-हिन्दी कविता(ekant vatika-hindi poem)


कोई कामयाब हुआ
उस पर प्रशस्ति लिखने वाले
बहुत मिल जाते हैं।

किसी के डूबने पर
रोता हुआ गीत लिखने वाले
बहुत मिल जाते हैं।

कहें दीपक बापू शब्द में
जिंदादिली का अहसास
अपनी रचना से करायें
एकांतवाटिका में ऐसे पुष्प
बहुत कम खिल पाते हैं।
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8/28/2015

दिल का सौदा-हिन्दी कविता(Dil ka Sauda-hindi poem)

चाहने वालों के
दिल को खिलौना समझा
इसलिये तोड़ दिया।

अपना दिल हाथ में
कबाड़ की तरह लिये फिरते लोग
चाहे जिससे नाता जोड़ लिया।

कहैं दीपक बापू दिल का सौदा
कभी किया नहीं दिया जाता
बिना मतलब के लिया नहीं जाता
 जज़्बात से खाली दिमाग ने
जहां देखा फायदा
वहीं दिल को मोड़ दिया।
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8/24/2015

शेयर बाज़ार का ढहना हमारा कहना-हिन्दी व्यंग्य(disaster of sharmarket and sensex,black monday-hindi satire article)

                             
                                   शेयर बाज़ार अतिधनवान लोगों को व्यस्त रखता है। इससे जनमानस के लिये आवश्यक वस्तुओं सहज सुलभ रहती है हालांकि वायदा बाज़ार के माध्यम से धनवान लोग वहां भी अपनी कला दिखाते हैं।  आम इंसान शेयर बाज़ार को एक ऐसे खेल मैदान की तरह देखता है जहां उसका प्रवेश वर्जित है।  धनवान लोग वहां हारते जीतते रहते हैं।  हम जैसे चिंत्तक यह मानते हैं कि धनवान लोगों का  मायावी बाज़ार मे व्यस्त रहना उसी तरह अच्छी बात है जैसे आदतन अपराधी का मादक द्रव्य में व्यस्त रहना।
                                   इधर सुना है कि शेयरों के दाम औंधे मुंह गिरने लगे हैं। सामान्य नागरिकों के लिये यह चिंता का विषय होना ही चाहिये। जिस तरह शराबखाने से निकला कोई मसखरा खतरनाक हो जाता है उसी तरह शेयर नामक शराब से ऊबे धनपति फिर कहीं सोने, जमीन तथा अनाज के व्यापार में कहीं अपना धन लगाने लगे तो मुश्किल खड़ी कर देंगे। मुश्किल यह है कि हमारे देश में कुछ लोगों के पास इतना पैसा है कि वह सोचते हैं कि रखे कहां? दीवारों के छिपाया, फर्श में दबाया, बैंकों मे रखा, और अल्मारी में घुसेड़ा फिर भी इतना बचता है कि वह शेयर बाज़ार में लगा देते हैं।  सोना, जमीन और महंगी कारों को खरीदने पर भी उनका पैसा खत्म नहीं होता।
                                   उनका शेयर बाज़ार में व्यस्थ रहना समाज के स्वास्थ्य के लिये ठीक रहता है। भावों के उतार चढ़ाव देखकर वह अपना दिल बहलाते हैं। कभी खुशी तो कभी गम की उदासीनता का आनंद लेते हैं-भाव गिरने पर उन्हें मूड खराब होने के प्रचार का अवसर मिलता है।
                                   बहरहाल इस व्यंग्य के साथ ही हम अपने चिंत्तन का निष्कर्ष भी बता दें।  इस बार मंदी का दौर चला तो बड़े बड़े औद्योगिक घराने संकट में पड़ सकते हैं। आमइंसान का इतना खून निकाल चुके हैं कि अब कुछ बाकी नहीं।
इस पर लिखे गये ट्विटर
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शेयरबाज़ार ढहने पर सोमवार काला हो जाता है पर आश्चर्य है फसल बर्बाद करने वाले ओलों काला नहीं कहा जाता।
दरअसल शेयरों में धन का विनियोजन करना खायेपीयेअघाये लोगों का काम है। उसके भाव गिरे तो वह दालचीनी में पैसालगाकर मंहगी कर देंगे।
शेयर बाज़ार सूचकांक ढहे या बचे इसकी परवाह किसे है? यहां तो लोग प्याज, दाल, और चीनी के मूल्य सूचकांक से आहत हैं।

प्याज ऐसा नहीं है जिसे न मिलने पर कोई भूखा रह जाये! इसके दाम बढ़ने पर इतना रुदन जमता नहीं है।

बाबा रामदेव का डीआरडीओ से समन्वय होना अच्छी बात है। आपत्तियां उठाने वालों का जवाब देना जरूरी नहीं।
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8/18/2015

इसलिये सभ्य कहलाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता(isliye sabhya kahlate hain-hindi satire poem)

वह अंग्रेजी में पढ़े
इसलिये सभ्य कहलाते हैं।

एक दूसरे को
अंग्र्रेजी में देते गाली
इसलिये सभ्य कहलाते हैं।

कहें दीपक बापू गनीमत है
अक्लमंदों को अंग्रेजी नहीं आती
वरना वर्तनी दोष निकालते
हिंग्लिश के दीवानों की
पोल नहीं खुलती
इसलिये सभ्य कहलाते हैं।
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8/12/2015

जुबान से हर कोई फिरा है-हिन्दी कविता(juban se har koi fira hai-hindi poem)


उनके ऊंचाई पर पद है
दौलत ने भी डाला
घर में डेरा
फिर भी  मनोबल गिरा हैं।

बनाये अपने लिये
मखमली रास्ते
फिर भी उनका हर कदम
दलदल में घिरा हैं।

कहें दीपक बापू अपनी प्रशंसा से
सभी सीना फुलाते
गैर की तारीफ
करना भुलाते
कानों से सभी सुनना चाहे वादे
जुबान से हर कोई फिरा है।
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8/09/2015

अपने हाथ से कर्म करने पर मिलता ‎सच्चा आनंद-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(apne hath se karma karane pa milta sachcha anand-A Hindu Hindi thought article based on chankya policy)


                विश्व में मनोरंजन के व्यवसायियों की धूम केवल इसलिये मची है क्योंकि सामान्य लोगों में ज्ञान का अभाव है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार यह कहा जाता है कि परमात्मा अपने अंदर ही ढूंढने पर मिलता है। इसके व्यापक अर्थ हैं जबकि लोग इसे केवल भक्ति भाव से जोड़ देते हैं। दरअसल मनुष्य का स्वामी पहले मन है-ज्योतिष के अनुसार तो राशियों के स्वामी ग्रह होते हैं-और उसका खेल समझ लेने वाला ही ज्ञानी है।
                              एक समय था जब भारत में टीवी का ऐसा दौर चला कि रामायण तथा महाभारत धारावाहिकों की वजह से लोग रविवार के दिन घर में घुस जाते थे।  एक एक के बाद टीवी चैनल खुलते गये और लोग घर में ही सिमटने लगे और बाहर मनोरंजन की इच्छा उनमें नहीं रही। फिल्मों के दर्शक एकदम कम हो गये।  मनोरंजन के व्यवसायियों ने अपनी चाल बदली। फिल्मों के साथ ही अन्य वस्तुओं के लिये ग्राहक जुटाने के लिये वातानुकूलि मॉल (बृहद बाज़ार) बनाये गये। इधर युवाओं में कामनायें पैदा करने वाले धारावहिक तथा फिल्में बनी जिससे प्रेरित नये प्रेमी जोड़ों के लिये यह माल भीड़ से बचने का स्थान भी बने।  इस तरह नवधनाढ्य वर्ग के लिये मॉल एक तरह से पर्यटन स्थान बन गये।  मनोरंजन के व्यवसायी मन के व्यापारिक पक्ष को एक ज्ञानी की तरह जानते हैं समूह बनाकर लोगों की भीड़ को इधर से उधर दौड़ाते हैं।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि ----------------------------------
स्वहस्ताग्रथिता माला स्वहस्तधृष्टचन्दनम्।स्वहस्तलिखितं स्तोत्रं शक्रस्यापि श्रियं हरेत्।।                               हिन्दी में भावार्थ-अपने हाथ से गूंथी माल, अपने हाथों से घिसा चंदन और अपने हाथ से लिखा स्तोत्र इंद्र की शोभा भी हर लेता है।
                              योग तथा ज्ञान साधक मन के खेल को जब समझ लेते हैं तब वह अपने जीवन की रूपरेखा स्वयं बनाते हैं।  वह जानते हैं कि बाहर से आया मनोरंजन अधिक देर तक मन को बहला नहीं सकता इसलिये मंत्र जाप और ध्यान से अपने अंदर सहजता का भाव लाते हैं। अनेक लोग ऐसे हैं जो बरसों से सुंदरकांड, हनुमान चालीस तथा अन्य मंत्रों का जाप करते हैं वह कभी भी उसे छोड़ते नहीं है।  अनेक श्रद्धालू प्रातःकाल मंदिर जाते हैं और बरसों तक इस क्रम में चलते हुए बोर नहीं होते। कुछ लोगों को योग साधना करने की ऐसी आदत होती है कि वह अगर कहीं दूसरे शहर जाते हैं तो भी अपना आसन तथा अन्य सामग्री ले जाते हैं। ऐसे लोगो में आत्मविश्वास अधिक होता है और उन्हें बाहर से मन बहलाने के लिये किसी स्तोत्र की आवश्यकता नहीं होती।  अपने प्रयासों से जो आनंद  मिलता है वह  कहीं से भी खरीदा नहीं जा सकता।
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8/04/2015

दिल रो नहीं पाया-हिन्दी कविता(Dil ro nahin paya-hindi poem)

सपना देखा था
हमने भी कभी
पूरा नहीं हो पाया।
क्या परवाह है
दिल बहलाते रहे
बरसों तक
खुद ही उकता गये
इतना कि टूटा तब भी
हमारा दिल नहीं रो पाया।
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7/27/2015

कोई हमें याद करे-हिन्दी कविता(koyee hamen yad kare-hindi poem)

चले गये वह लोग
फिर भी हमारी
जिंदा यादों में बसे हैं।

क्या याद करें उनको
जो हमें अपने स्वार्थपरस्ती के
विष से हमेशा डसे हैं।

कहें दीपक बापू कोई हमें याद करे
जो नहीं सोचते यह बात
करते कमाल
वरना पुजने की चाहत वाले
 पूरा समाज दहलाते हुए
कई दबंग मुट्ठिया कसे हैं।
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7/23/2015

विज्ञापन के दावे-हिन्दी कविता(vigapan ke dawe-hindi poem)


महल में विराजते
धर्म की रक्षा का
दावा करते हैं।

तलवार रखते म्यान में
चलाई न कभी अनाचार पर
वीरता का दावा करते हैं।

कहें दीपक बापू वैभवशाली
दिल से होते कायर
शब्दों के जाल फैलाने वाले भी
 बन जाते शायर
पाखंडी कहलाते सच्चे सेवक
विज्ञापन में चाहे जैसा भी
दावा करते है
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7/18/2015

मुर्दे बोलते नहीं पर सवाल कर सकते हैं-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन(murde bolte nahin par sawal kar sakte hain-hindi thought article)

                              उस लड़की ने दो मनचलों के खिलाफ छेड़छाड़ के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।  दोनों को जेल भी जाना पड़ा। जमानत पर छूटे तो अततः भीड़ के बीच उस लड़की की हत्या कर दी।  अब प्रचार माध्यम सरकार और पुलिस से सवाल पूछ रहे हैं। तय बात है कि यह प्रचार माध्यम उस भीड़ में अपनी छवि जनता के प्रति सहानुभूति दिखाना चाहते हैं जिसने यह तमाशा देखा-एक फिल्म के दृश्य की तरह।  फिल्म और टीवी सीरियलों में कभी भीड़ कों किसी लड़की के बचाते हुए नहीं देखा जाता वरन् वह केवल दृश्य देखती है।  फिल्मी या टीवी के दृश्य में संकट में पड़ी लड़की को बचाने के लिये कोई नायक आता है-कभी नहीं भी आता है। भीड़ कभी नायक की तरह उसे बचाती नहीं दिखाई देती इसलिये वास्तविक भीड़ कभी ऐसी कोशिश नहंी करती।  हमारे यहां फिल्में मार्गदर्शक बन गयी हैं। उसके काम करने वाले नायक अपने अभिनय से भगवान बन जाते हैं।  जनमानस में वह इस तरह बसे हैं कि वह जिस साबुन का स्वयं जीवन उपयोग नहंी करते पर उसके विज्ञापन में काम कर भारी मात्रा में बिकवा देते हैं।
                              भीड़ कभी नायक नहंी बनती दिखी इसलिये वह किसी लड़की पर मनचलों के हमले या किसी आदमी पर लुटेरों के हमले भी उसी तरह देखती है जैसे कि फिल्म या टीवी धारावाहिक देखती है। उसे प्रेरणा देने वाले टीवी और फिल्म निर्माता भी उसे इसी रूप में चेतनाहीन देखना चाहते हैं। जो देखे सोचे बिल्कुल नहीं। सोचे तो कुछ करने का विचार भी न करे। वह सवाल कर सकती है पर उसके जवाब देना जरूरी नहीं है।
                              यह भीड़ मनोरंजन व्यवसायियों के लिये काम की है। मनचलों की लड़की हत्या का दृश्य देख रही भीड़ टीवी समाचारों में दिखाई जाती है तो फिल्मी दृश्य जीवंत होता दिखता है न! समाचार प्रसारण करने वाले भी तो यही चाहते हैं। अब इस भीड़ में शमिल एक कह रहा है या कह रही है‘-वह लोग भयानक लग रहे थे। इसलिये हम डर गये थे।’
                              वह मनचले इंसान थे। नशा आदि से चेहरा भयानक बना लिया हो अलग बात है। कोई वीर योद्धा नहीं थे। भीड़ से दो चार लोग पत्थर या ईंट उठाकर फैंक देते तो देखते क्या होता? योग साधक जानते हैं कि अपराधियों की प्राण शक्ति अधिक नहीं होती।  वह तो चेतनाहीन मनुष्य समुदाय पर उसी तरह शासन करते हैं जैसे कि अंधों में काना राज करता है।  मुश्किल यह है कि मुर्दे बोलते नहीं पर सवाल करते हैं।  सरकार से और पुलिस से सवाल सभी कर रहे हैं पर उस भीड़ से कोई सवाल नहीं कर रहा।  शायद मान लिया गया है कि सामान्य मनुष्य को अपने जैसे सामान्य मनुष्य की रक्षा का न कर्तव्य है न अधिकार!
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7/12/2015

नाकाम परिंदा-हिन्दी कविता(nakam parinda-hindi poem)

दशानन तीर की नोक से
सदियों पहले मर गया
पर दंशतंत्र अभी जिंदा है।

सपनों का हरण हुआ
कड़वे सत्य की चादर लिये
बैठी है सभी जगह कमीशन बुआ
नहीं कोई फरिश्ता शर्मिदा है।

कहें दीपक बापू ऊंचाई से
नीचे झांकती गगनचुंबी इमारतें
बेबस इंसानों की आह से
हिलती जरूर पर गिरती नहीं
जैसे पत्थर में चौंच मारता
नाकाम परिंदा हो।
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7/06/2015

मतलबपरस्तों की भीड़-हिन्दी कविता(mtalabparston ki bheed-hindi poem)

अपनी आंखों को
चेहरे पर लगे दाग
कभी नहीं दिखते हैं।

ताकतवर हो तो
कोई आईना भी नहीं लाता
लोग मुंह बंद किये दिखते हैं।

कहें दीपक बापू सज्जनता से
जीने की आदत हो गयी जिनको
नहीं देखते किसी का दोष,
जानते हैं आ जायेगा व्यर्थ रोष,
भले ही मतलबपरस्तों की भीड़ में
अकेले दिखते हैं।
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7/02/2015

डिजिटल इंडिया सप्ताह-स्वदेशी अंतर्जालीय मस्तक न होना भारतीय पूंजपतियों में प्रबंध कौशल के अभाव का प्रमाण(digital india week-swadeshi internet sarvar n hona bhartiya poonjipatiyon ke parbandh kaushal ke abhav ka praman)

      हमारे देश में सरकार ने डिजिटल इंडिया सप्ताह का प्रारंभ किया है। डिजिटल इंडिया की सफलता के लिये बहुत सारा पैसा खर्च करने की बात चल रही है। अपना स्वदेशी अंतर्जालीय मस्तक यानि सर्वर बनाया जाना चाहिये। इतनी सारी टेलीफोन कंपनियां हैं पर आज तक एक भी स्वदेशी सर्वर नहीं बन पाया-इस पर अनेक विशेषज्ञों को हैरानी है।
     इतने उद्योगपति भारत में हैं। साफ्टवेयर में भारतीय इंजीनियर दुनियां में झंडा फहरा रहे हैं। फिर भी भारत में एक भी स्वदेशी सर्वर नहीं बन सका जो केवल अपने ही देश का अंतर्जालीय बोझ उठा सके और हम कह सकें कि यह है हमारा भारतीय अंतर्जालीय मस्तक। हैरानी की बात यह है कि यह अभी भी एक सपना लगता है
                              व्यापार सभी करते हैं पर प्रबंध कौशल किसी किसी में ही होता है।  हमारे देश में आबादी सदैव अधिक रही है। प्रकृत्ति की कृपा भी अन्य देशों की अपेक्षा यहां अधिक है।  मानव श्रम और उपभोक्ता  अधिक होने से यहां वणिकों के लिये सदैव एक बाज़ार रहा है पर उन्हें दैनिक उपभोग क्रय विक्रय करने में हमेशा सुविधा उठाने की योग्यता ही रखते हैं।  इसलिये उन्हें प्रबंध कौशल की आवश्यकता नहीं रहती। व्यापार में प्रबंध कौशल का पता सामने उपस्थित वस्तु के विक्रय से नहीं वरन् विक्रय योग्य नयी वस्तु के निर्माण तथा उसके लिये बाज़ार बनाने से ही पता लगता  है। इस मामले में पश्चिमी जगत अपने हमसे आगे है। विदेशी सर्वरों के चलते भारतीय संचार व्यवसायियों ने देश के उपभोक्ताओं का जमकर दोहन किया। वह भी तब जब भारतीय संचार निगम का प्रदर्शन गिराता गया। अपना पैसा देश में रखा या बाहर ले गये यह तो पता नहीं पर उन्होंने यहां संचार के क्षेत्र में किसी नये निर्माण को प्रोत्साहित नहीं किया। स्वदेशी अंतर्जाल मस्तक यानि सर्वर का न होने भारत के कथित पूंजीपतियों के प्रबंध कौशल तथा देश से प्रतिबद्धता रखने के अभाव को पूरे विश्व में दर्शाता है।
      बताया तो यहां तक जाता है कि अमेरिका अंतर्जालीय उपलब्धियों में हमसे आगे है पर ईरान और चीन भी कम नहीं है। एक बात हम यहां स्पष्ट कर दें कि हमारी दृष्टि से भारतीय साफ्टवेयर इंजीनियरों की वैश्विक योग्यता को देखते  उनकी यह अग्रता हो ही नहीं सकती।  चीन तो यह बात स्पष्ट रूप से मान ही चुका है कि भारत की बौद्धिक क्षमता उससे आगे हैं।  ऐसे में यह सवाल उठता ही है कि आखिर हमारे देश के कथित सेठ क्यों नहीं ऐसा कर पाये? क्या यह उनकी इस मानसिकता का प्रमाण नहीं है कि वह अपने समाज या देश के किसी व्यक्ति को  इतना प्रसिद्ध या सफल होते नहीं देखना चाहते जो उनकी सामने खड़े होकर आंखें मिला सके? एक स्वदेश अंतर्जालीय मस्तक या सर्वर का न होना तो यही दर्शाता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh


कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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6/26/2015

पहचान हुई लापता-हिन्दी कविता(pahachan huee lapata-hindi poem)

नये युग का यह बाज़ार
प्रसिद्ध नामों के सहारे
सामान ही बिकते हैं।

चमकदार पर्दे पर
सौंदर्य प्रसाधन से सजे
चेहरे ही टिकते हैं।

कहें दीपक बापू ज़माने से
असली रंग रूप गंध और स्वर की
पहचान हुई लापता
करते लोग स्पर्श उसी चीज का
जिसे प्रचार प्रबंधक
अच्छा लिखते हैं।
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6/20/2015

विज्ञापन करना जरूरी है-हिन्दी कविता(vigyapan karana jaroori hai-hindi poem)

अपनी ईमानदारी पर
चाहे जितना शक हो
पर दिखने  के लिये
विज्ञापन करना जरूरी है।

नहीं संभलता अपना घर
कुशल प्रबंधक की योग्यता
सभी को दिखाने के लिये
 विज्ञापन करना जरूरी है।

कहें दीपक बापू हाथी पकड़कर
अंधे चाहे जैसे करें अंगों का बयान
अक्लमंद जमाना मान लेगा
विज्ञापन करना जरूरी है।
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