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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

6/27/2018

कोई करे इंसानों की सेवा, कोई पूज रहा दिल से देवा-दीपकबापूवाणी (Inasa ki sewa dil mein deva-DeepakBapuWani)


जहां वाद वहीं विवाद है,
बहस में झगड़ा निर्विवाद है।
कहें दीपकबापू उदास दिल में
खुशी से ज्यादा दर्द की याद है।
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कोई करे इंसानों की सेवा,
कोई पूज रहा दिल से देवा।
कहें दीपकबापू कर अपना काम
खुश हो जितना मिले मेवा।
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ख्वाब करते दर्द का इलाज,
हंसी छिपा लेती बेबसी का राज।
कहें दीपकबापू मत रो इंसान
सलामत हाथ पावं पर कर नाज।
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पत्थर के महल भी ढह गये,
स्वर्णमृग बेनामनदी में बह गये।
कहें दीपकबापू दरियादिलों के
किस्से ही यादों में रह गये।
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भय सपना टूटने का है,
विश्वास का घड़ा फूटने का है।
कहें दीपकबापू प्रेम का पाखंड
लोभ तो धोखा लूटने का है।
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दिल की चाहत भटकाती है,
लालच धूप जैसा चटकाती है।
कहें दीपकबापू जब हो मन बेबस
चिंतायें उल्टा लटकाती हैं।
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6/19/2018

भावना व्यापार पर लोकतंत्र टिका-दीपकबापूवाणी(Democracy based on trede of Public Sentimen)



वाणी से ढेर शब्द बरसाते हैं,
अर्थ समझाने से तरसाते हैं।
कहें दीपकबापू खाने के शेर
लड़ने में चूहे जैसे बन जाते हैं।
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आंखों में सपनों के झूले हैं,
हाथ पांव सच से फूले हैं।
कहें दीपकबापू भंवर में जिंदगी
डूबते तैरते भक्ति से भूले हैं।
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सब अपनी जिंदगी जी लेते हैं,
अपने हिस्से सुख दुःख पी लते हैं।
‘दीपकबापू’ क्यों हैं फिक्रमंद
सब अपने फटे दिल सी लते हैं।
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भावना व्यापार पर लोकतंत्र टिका है,
अनमोल मत वादे के मोल बिका है।
कहें दीपकबापू सेवक उपाधि है
ठाठबाट राजाओं जैसा दिखा है।
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बेहिसाब दौलत से हुए न्यारे,
घूम रहे आंकड़ों के गलियारे।
कहें दीपकबापू भ्रमजाल में फंसे
मैं का सुर अलाप रहे बकरे प्यारे।
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राजा जैसी चाल नाम सेवक धरे,
बड़ा खास वह जो करचोरी करे।
‘दीपकबापू’ ठहरे जो आमजन
लाचार राजस्व भंडार भरे।।
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4/01/2018

अनुभवी मरीज मर्ज की दवा का प्रचार करते-दीपकबापूवाणी (expirenced pection add for medicine-DeepakBapuwni)

रसायन से चमके उनके चेहरे यूं ही चांद हो जाते, पर्दे पर शेर बनते फिर मांद में खो जाते।
‘दीपकबापू’ सफेद शब्द की लगी नामपट्टिका, नीयत के काले अपना घर भी फांद जो जाते।।
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जनधन पर पहरेदार ही गिद्धो जैसे झपटते, गरीबों घर जाते रोटी के हिस्से ढेर कटते।
‘दीपकबापू’ बरसों से करें जनकल्याण का व्यापार, मित्र भी बिना दिये बिना नहीं पटते।।
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बड़े लोग जो गिरगिट जैसे रंग बदलते, आम आदमी कछूऐ जैसे अपनी छाया में पलते।
‘दीपकबापू’ चेहरे पर होते कभी न फिदा, देखें कौन अपने स्वार्थ से चरित्र चाल चलते।।
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अनुभवी मरीज मर्ज की दवा का प्रचार करते, सब जगह हकीम होने का दंभ भरते।
‘दीपकबापू’ रुग्ण समाज ले रहा कृत्रिम सांस, हवा के झौंके से सबके कदम डरते।।
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राजपद पाने वह दर्द बहुत उठाते, फिर मुफ्त की हमदर्दी जनमानस में लुटाते।
‘दीपकबापू’ प्रसिद्धि से पंचर हुआ दिमाग, काम न करने के ढेर बहाने जुटाते।।
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नदिया की धारा देखने के काम में लगे, वेतन से खुश नहीं बेबस नाविकों को ठगे।
‘दीपकबापू’ ऊपर से नीचे सीढ़े से आये, मिले नहीं भ्रष्टाचारी कभी किसी के सगे।।
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खानपान रहनसहन ऊंचा हुआ उन्हें बड़ा जान, गुलामी के नुस्खे समझें बड़ा ज्ञान।
‘दीपकबापू’ खोपड़ी कर ली सोच से खाली, निरर्थक बात से बढ़ा रहे अपनी शान।।
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