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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

3/08/2017

जिंदगी के मजे हर कोई लेता राजा हो या बंजारा-हिन्दी कवितायें (Zindag ke maze har koyee leta-HindiPoem)


जिंदगी के मजे
हर कोई लेता
राजा हो या बंजारा।
कहें दीपकबापू
रंगे पत्थर से अच्छा लगे
खेत का नज़ारा।।
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हिन्दी क्षणिका
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असली नायकों का त्याग
अभिनय के बाज़ार में
बिकता है।
नाटकीयता के भाव से
दिल का जज़्बात
सौदे में टिकता है।
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कोई इतना बता देता
दिल से दिल कहां मिलते हैं
हम भी चले जाते।
सभी को प्रेम से
अपने गले लगाते।

रोने वाले किराये पर भी
जब मिल जाते हैं।
दर्द के सौदागरों के 
चेहरे खिल जाते हैं।
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अक्लमंद कहलाये
जब सुविधाओं ने
दबंग बनाया।
छिन गयी अब
डर के स्वांग से
स्वयं को अपंग बनाया।


अभिव्यक्ति पर बंधन का
वह शोर मचाते हैं।
कहें दीपक बापू 
डंडे झंडे हाथ में
खुद ही पांव से बांधकर रस्सी
आजादी का जोर लगाते हैं।
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महल की रोशनी
बस्ती के अंधेरे पर
सवाल करना मना है।
बेबस पर दबंग का
मुक्का तना है।
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हाथ उसने
मांगने के लिये नहीं दिये हैं।
चलता रह जिंदगी में
पांव उसने घर में
टांगने के लिये नहीं दिये हैं।
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मन में लालचों की
लड़ती हुई फौज है।
कहें दीपकबापू खाली हाथों में
खेलती मौज है।
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मन ने पंख लगा लिये
आजादी से उड़ जाता है।
कहें दीपकबापू रीतियों के बोझ में
कौन खुशी से जुड़ पाता है।
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वह लोग हमें भूल गये
फिर भी हमारी याद में बसे हैं।
दीपकबापू न जाने सोच के दायरे
बहुत बड़े कहें या कसे हैं।

2/09/2017

स्वर्णिम सिद्धांत लगा हाथ=तीन हिन्दी व्यंग्य कवितायें (Golden Formula-HindiSatirePoem)

इतने धोखे खाये हैं
अब बिना वादे लिये
हम साथ निभाते हैं।

स्वर्णिम सिद्धांत लगा हाथ
इसलिये नहीं पछताते हैं।
..........
शव हो गये इंसानों से
अपनी हमदर्दी जतायें।

पत्थर के नीचे दबी
मिट्टी हो गयी देह पर
मत्था टेककर
तरक्की की आशा जगायें।

कहें दीपकबापू श्रद्धा से
जिनका कभी नाता नहीं रहा
श्राद्ध का करें आयोजन
अपनी छवि पाखंड के
प्रचार से चमकायें।
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अपना उधार
उससे महल में जाकर कैसे मांगें
पहरा उन्होंने लगा दिया है।

सभी कर्णो पर
बज रहा उनके जयजयकार का नारा
कौन सुनेगा यह आवाज कि
हमें उसने दगा दिया है।
‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘

1/18/2017

सिंहासन के लिये होता दंगल, घावों से रिसते खून में दिखाते मंगल-दीपकबापूवाणी (Sinhasan ke liye hota Dangal-DeepakBapuWani)

सिंहासन के लिये होता दंगल, घावों से रिसते खून में दिखाते मंगल।
‘दीपकबापू’ भावनाहीन हो गये, शहर भी डराते अब जैसे सूने जंगल।।
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कभी बल कभी छल से राज चलते हैं, निर्वासित हंसों के घर में बाज़ पलते हैं।
‘दीपकबापू’ शोर में अक्ल मर गयी, लोहे के सिक्के सोने के मोल आज ढलते हैं।
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चांदी की थाली में भोजन पायें, यजमान को त्याग का ज्ञान बतायें।
‘दीपकबापू’ किताबें पढ़ बने ज्ञानी, शब्द वाचन से ही अर्थसिद्ध पायें।।
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सिंहासन के लिये अपना ईमान लुटाते, पद के लिये पादुका भी उठाते।
‘दीपकबापू’ स्वाभिमान मारकर बैठे, लोभ के अंधे त्यागी की छवि जुटाते।।
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जिनका एकमेव भगवान भी धन है, उजाले में भी अंधेरे से जूझता मन है।
‘दीपकबापू’ ज्ञान के गीत गाते झुमकर, वाणी उनकी अर्थरहित शब्दवन है।।
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