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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

11/02/2017

वह इलाज की दुकान खोले हैं-दीपकबापूवाणी (Vah ilaz ki dukan khole hain-Deepakbapuwani)

हमदर्दी अब मुखविलास जैसी
रुखेपन की शिकायत मत करिये।
‘दीपकबापू’ हर हाल पर रहना सीखो
दिल में सोच ज्यादा न भरिये।।
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अहो! कल तुम याद आ रहे हो
क्योंकि आज तुम जैसा नहीं है
अहो! कल तुम जब आओ
तो लगे आज जैसा नहीं है।
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लोग मजा तभी तो लूटें
जब जज़्बात जिंदा रखें हों।
प्यार का स्वाद तभी तो समझें
जब दिल का रस चखें हों।
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वह इलाज की दुकान खोले हैं,
बीमारी फैलते देख उनके मन डोले हैं।
‘दीपकबापू’ टूटे मन की दवा नहीं
शरीर चाहे ठंडा अंदर जलते शोले है।
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उजड़े शहर जीत जश्न मना रहे हैं,
टूटी इमारतों की तस्वीर बना रहे हैं।
‘दीपकबापू’ अपना भलमानस चेहरा
हथियारों के सौदागर बना रहे हैं।
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10/16/2017

जोगी जिंदगी में महल लगें कैदखाने-दीपकबापूवाणी (Jogi Zindagi mein mahal lage QaidKhane-DeepakbapuWani)

. तख्त चाहा था अब खोने से डरे हैं, खजाने के प्रहरी अपनी चिंता से भरे हैं।
‘दीपकबापू’ सामान्य से विशिष्ट बन गये, दाग छिप जाते क्योंकि भीड़ से परे हैं।।
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जोगी जिंदगी में महल लगें कैदखाने, असिद्ध जाते अंदर सिद्धि का सौदा लगाने।
‘दीपकबापू’ मायाजाल में फंसाया उन्मुक्त भाव, चले बाज़ार त्यागी छवि चमकाने।।
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स्वर्ग की सोचकर जीवन नर्क बनाते, धर्म  के बदले धन देने का तर्क बनाते।
‘दीपकबापू’ अपने सत्य से बौरा जाते, लोग अपने घर का बेड़ा गर्क बनाते।।
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अपने ठंडे दिमाग से दूसरों में जोश जगाते, जज़्बात लूट लें इसलिये होश भगाते।
‘दीपकबापू’  धोखे और गद्दारी के महारथी, कुकृत्यों पर मुहर सफेदपोश लगाते।।
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सड़क पर महंगाई का रोना सभी रोते, महल में बसते ही सस्ते आंकड़ों पर सोते।
‘दीपकबापू’ थलचरों पर ही करते भरोसा, नभचर बिचारे सदा गिरने का डर ढोते।।
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भोली बात से ज़माने को ठगते हैं, अपनी लालच से लड़ते हमेशा जगते हैं।
‘दीपकबापू’ पैसे पद प्रतिष्ठा के भूखे हैं, मगर परोपकारी छवि ओढ़े लगते हैं।।
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9/24/2017

देशभक्ति का भूत महंगाई से उतर जाता है-दीपकबापूवाणी (Deshbhakati Ka Bhoot mahnagai se utar jata hai-DeepakBapuWani)

 पर्दे के पीछे फर्जी मुद्दे तय करते हैं, चौराहे पर चर्चा में बेकार तर्क भरते हैं।
‘दीपकबापू’ बेअक्ल बुतों का गुण गाते, बिके अक्लमंद सच कहने से डरते हैं।।
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देशभक्ति का भूत महंगाई से उतर जाता है, सारे भाव महंगा तेज हज़म कर जाता है।
‘दीपकबापू’ राष्ट्रवाद के नशे में डूबे रहते, धीरे धीरे जेब का ख्याल भी भर जाता है।।
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फायदे के लिये प्रेम तो कभी घृणा व्यापार करें, मतलब के खंजर की तेज धार करें।
‘दीपकबापू’ श्रृंगार कर सजते पर्दे पर चेहरे, पीछे जाकर पैसे का मोटा लिफाफा पर करें।।
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न सुनने वाले सभी कान बहरे नहीं होते, सोचने वाले सभी दिमाग गहरे नहीं होते।
‘दीपकबापू’ झूठ बेचकर महल बना लिये, ईमानदारों के निवास पर पहरे नहीं होते।।
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राजपद का नशा सभी पर चढ़ जाता है, भलाचंगा भी घमंड की तरफ बढ़ जाता है।
‘दीपकबापू’ राजमार्ग पर चलते संभलकर, राजवाहन का शिकार तस्वीर में मढ़ जाता है।।
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