7/03/2009

प्यार तो बस एक अनुभूति है-आलेख (hindi article on love)

प्यार एक अनुभूति जिसे व्यक्त करने से अधिक उसे हृदय में सृजित करने की आवश्यकता है। अपने मुख से शब्दों में व्यक्त करना या फिर चूमना प्यार के अभिव्यक्त रूप हैं पर करने वाला उससे लाभ कितना ले पाता है इस पर विचार करना चाहिये। कई बार तो उसे हानि भी होती है। मानव मन में विचरने वाले नफरत और घृणा दोनोें भाव बाहर आकर अभिव्यक्त होना चाहते हैं, मगर उससे लाभ और हानि दोनों ही हो सकते हैं।
एक मित्र ब्लाग लेखक ने एक ईमेल भेजा जिसमें उन्होंने अमेरिकी लोगों को सूअर और उनके के बच्चों को चूमते हुए अनेक फोटो थे। उन फोटो में सुअर और उनके बच्चों के मूंह से टपक रही लार साफ दिख रही थी। उस पर लिखा था कि ‘सूअर ज्वर का कारण’। यहां यह स्पष्ट कर देना चाहिये कि स्वाइन फ्लू के भारत में जो मरीज पाये गये हैं वह सभी विदेश से वापस आये हैं। चूंकि यह विदेश से आयातित बीमारी है इसलिये भारत में इसकी चर्चा खूब हो रही है और यहां गर्मी और बरसात में फैलने वाली बीमारियों के समाचार नेपथ्य में चले गये हैं। यहां बस विदेश से जुड़ी कोई बात होना चाहिये वह देशी बातों से अधिक चर्चित हो जाती है। इस देश में स्वाईन फ्लू के मरीज सौ से अधिक नहीं है पर देश के लोगों के सावधानी रखने की सलाह दी जा रही है। स्पष्टतः इसके पीछे बाजार की कोई योजना हो सकती है। मलेरिया, टीवी और पीलिया की दवाईयां तो यह आराम से बिक जाती हैं पर स्वाइल फ्लू की दवाईयों के लिये यहां कोई बाजार नहीं है।
बहरहाल मित्र ब्लाग लेखक द्वारा भेजे गये फोटो का अध्ययन करने पर यह लगा कि लोग भले ही बड़े प्यार से सूअर के मूंह को चूम रहे थे पर वह खतरनाक था। उनके प्यार की अभिव्यक्ति मन को प्रसन्न करने की बजाय हैरान कर रही थी।
इस तरह की बाह्य प्रेम अभिव्यक्ति पश्चिम की देन हैं। चूमना, लिपटना और नाचना प्यार के अभिव्यक्त किये जाने वाले रूप हैं और इसमें कोई बुराई भी नहीं है मगर यही पश्चिम के वैज्ञानिक ही अपने शोधों से इसके दोष गिनाते हैं। अब उनके कुछ शोधों से प्राप्त जानकारी पढ़िये जो समय समय पर उनके द्वारा दी जाती रही है।
1.जिसे चूमा जाता है उसकी उम्र पांच मिनट कम हो जाती है।
2.चूमने वाले के गंदे कीटाणु उसके ही प्रिय आदमी के शरीर में पहुंच जाते हैं।
3.अधिकतर पशुओं में रैबीज होता है। यह रैबीज उनके शरीर में नहीं बल्कि उनके मूंह से लार के रूप में बहने के साथ होठों पर हमेशा रहता है। उस लार पर हाथ या पांव रखना भी ठीक नहीं होता।
4.कुछ पशु तेज स्वांस लेते और छोड़ते हैं और उससे उनके गंदे कीटाणु सांस के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर उसे सांस की बीमारी प्रदान करते हैं।
मित्र द्वारा भेज गये फोटो बच्चे, बड़े, स्त्री पुरुष अपने होंठ बाकायदा शूकर के मूंह से लगा रहे थे। पालतू होने के कारण वह सूअर साफ सुथरे थे पर उनके मूंह की लार से मनुष्यों के होंठ लगते देख मित्र द्वारा लिखा गया यह संदेश दिमाग में बज रहा था ‘सूअर ज्वर का कारण’।
एक बात यहां स्पष्ट कर दें कि यहां पशुओं के प्रति कोई हिकारत का भाव हमारे मन में नहीं है। सभी जीव सर्वशक्तिमान के बनाये हुए हैं और सभी को यहां समान रूप से जीवन जीने का अधिकार है। पशु पशुओं की अनेक प्रजातियों का लुप्त होना मानव सभ्यता के लिये शर्म की बात है। किसी भी पशु को पालना पुण्य का काम है पर प्यार का वह रूप जो अंततः हमारी देह के लिये दुःख का कारण बने वह कोई बुद्धिमानी नहीं है।
हां, सच है कि पास में मनुष्य रहे या पशु उससे प्रेम हो जाता है। कई बार अपने पास खड़ा वह निरीह पशु जब हमारी तरफ प्रेम से देखता है तो कोई पत्थर दिल ही उसकी अनदेखी करेगा। प्रेम न केवल अपनी बल्कि अपने प्रिय जीव की भी आयु बढ़ाता है और इसलिये उसकी अभिव्यक्ति होना भी आवश्यक है।
प्यार की अभिव्यक्ति का स्पर्श सभी जीवों को प्रसन्नता देता है। इन पशुओं को प्यार करने का सबसे अच्छा तरीका यह बताया गया है कि अपने हाथ से उनकी गर्दन के नीचे हाथ फिराना चाहिये क्योंकि वहीं से वह अच्छी तरह प्यार की अनुभूति कर सकते हैं। अधिकतर पालतू पशुओं के शरीर पर घने बाल होते है इसलिये सिर या पीठ पर हाथ फेरने से उन्हें वह अभिव्यक्ति नहीं मिलती जो गर्दन के नीचे-जहां बाल नहीं होते-फेरने से मिलती है।
वैसे प्यार हृदय में बनने वाला वह भाव है जिसकी अनुभूति का लाभ स्वयं को भी कम नहीं होता पर इसके लिये यह जरूरी है कि अपने प्रिय जीव को देखकर जब प्यार अंदर पैदा होता है तो पहले अपनी देह में उठती तरंगों को ध्यान में रखें। अंदर खून की लहरों में उसकी अनुभूति करना चाहिये। एकदम उतावली में प्रेम की अभिव्यक्ति करने से उसका लाभ समाप्त भी हो जाता है। परिस्थितियों के अनुसार प्यार को व्यक्त करना और छिपाना ं पड़ता है। प्यार खाने या पीने की चीज नहीं है कि उसे मूंह से अंदर ले जायें। वह तो एक ऐसा अदृश्य भाव है जो मन को प्रफुल्लित करता है। यह अनुभूति बाहर के दृश्यों से भले आती है पर उसका उद्गम स्थल तो अंदर ही है। उसका कोई भौतिक स्वरूप नहीं है। स्वार्थ से बने संबंधों में अनेक बार प्यार आता है पर फिर स्वतः ही नष्ट भी हो जाता है।
भारत में सूअर पालने की परंपरा नहीं है पर कुत्ता पाला जाता है। अनेक बार देखा गया है कि घर के बच्चे उन पालतू कुतों के मूंह से मूंह लगा देते हैं। कुछ समय पहले एक रिपोर्ट देखी थी जिसमें बताया गया कि 90 प्रतिशत लोगों को रैबीज पालतू कुतों की वजह से होता है। बहरहाल यह तो सर्वशक्तिमान की बनाई दुनियां हैं। जिसमें रहने वाले हर जीव में घृणा और प्यार के भाव रहते हैं पर इंसान को थोड़ा सतर्कता बरतना चाहिये। सच बात तो यह है कि प्यार तो बस एक अनूभूति जिसे न हाथ से पकड़ा जा सकता है न मूंह से खाया जा सकता हैं।
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6/26/2009

नारियों के प्रति बढ़ते अपराध कन्या भ्रुण हत्याओं का परिणाम-आलेख

देश में प्रतिदिन ही महिलाओं के प्रति किये गये अपराध समाचारों की सुर्खियां बन रहे हैं। हालत यह हो गयी है कि एक दिन में पांच पांच समाचार आते हैं और जब अपराधी पकड़े जाते हैं तो यह याद रखना कठिन हो जाता है कि आखिर वह किस घटना के लिये पकड़े गये हैं। इस पर तमाम तरह के आलेख और रिपोर्ताज पढ़ने और सुनने के बाद यह नहीं लगता कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग इसे कन्या भ्रुण हत्याओं से जोड़कर देख पा रहा हो।
जो नियमित रूप से समाचार पत्र पत्रिकायें पढ़ते हैं उनको अच्छी तरह याद होगा जब आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व कन्याओं की भ्रुण हत्या का दौर शुरु हुआ था तब सामाजिक विशेषज्ञों ने स्पष्टतः आज के दृश्य की कल्पना कर बता दी थी। एक लंबे समय तक यह दौर चला फिर इसके लिये कानून भी बना पर सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि कन्याओं की भ्रुण हत्याओं का दौर बंद हुआ। हालत यह है कि एक समय तक पहली संतान के रूप में कन्या होना भी ठीक मानने वाले इस समाज में अब ऐसे भी लोग हैं जो पहली संतान के रूप में भी बेटा चाहते हैं और जरूरत पड़े तो कन्या भ्रुण हत्या करा देते हैं। ऐसी जानकारियां समाचार पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर आती रहती हैं।

महिलाओं पर तेजाब फैंकने या उनके साथ जोर जबरदस्ती की घटनाओं पर विश्लेषण करने वाले अल्पज्ञानी बुद्धिजीवी हर घटना में अपराधी और पीड़िता की स्थितियों के आंकलन में लग जाते हैं। कुछ इसे गिरती कानूनी व्यवस्था ं तो कुछ इसे पहनावे और लड़कियों की आजादी को मानते हैं। इधर इंटरनेट पर ऐसी बहसें देखने को मिलती हैं जिससे लगता है कि वाद और नारों की राह पर चले लेखक और बुद्धिजीवी अपने चिंतन से कम अपने गुरुओं की सोच पर अधिक चलते हैं।
एक कहता है कि
1.लड़कियां उकसावे वाले कपड़े पहनती हैं।
2.वह एक नहीं अनेक लड़के मित्र बनाती हैं जिससे आपस में कभी न कभी तनाव बनता है।
3.माता पिता अपनी व्यस्तताओं के चलते लड़कियों की निगाहबानी नहीं कर पाते जिससे वह अपने युवावस्था के कारण ऐसी गलतियां कर बैठती हैं जो अततः उनके लिये घातक होती है।

दूसरा कहता है कि
1.समाज अभी भी असभ्य है उसका लड़की के प्रति नजरिया नहीं बदला।
2.जैसे जैसे धन की प्रचुरता बढ़ रही है लड़कियों के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं।
3. कानून व्यवस्था की स्थिति खराब है और अपराधियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही नहीं हो रही। पुरुष समुदाय इसके लिये पूरी तरह से जिम्मेदार है।

हो सकता है कि ये सभी लेखक और बुद्धिजीवी सही हों पर वह इन घटनाओं के दृश्यव्य रूप पर ही अपना ध्यान केंद्रित करने से समस्या का हल नहीं हो सकता।
25 वर्ष पूर्व ही सामाजिक विशेषज्ञों ने कहा था कि जिस दहेज समस्या से पीड़ित होकर समाज कन्या भ्रुण हत्याओं के दौर को स्वीकार कर रहा है वह तो हल नहीं होगी बल्कि इससे उनके प्रति जो अपराध होंगे वह अधिक भयानक होंगे।
उनका कहना था कि
1.अभी लड़कियां पर्याप्त मात्रा में हैं इसलिये लड़के इधर उधर नजरें मारकर काम चलाते हैं। एक नहीं तो दूसरी नहंीं तो तीसरी। कहने का तात्पर्य यह है कि उनके संपर्क में अधिक लड़कियां आती हैं और वह उनको देखते हैं इसलिये उनमें आक्रामकता नहीं आती। जब यह संख्या कम हो जायेगी तक एक लड़की पर अनेक लड़कों की नजर होगी। इससे आकर्षण में तीव्रता आयेगी और ऐसे में अगर लड़की की तरफ से उनको निराशा हाथ लगती है तो वह उस पर आक्रमण करेंगे।
2.रास्ते पर अनेक लड़कियों को होने से भी लड़के व्यस्त रहते हैं पर जब उनकी संख्या सीमित होगी तो वह चलते फिरते आक्रमण करेंगे।
3.दहेज प्रथा बिल्कुल हल नहीं होगी। उल्टे लड़कियां कम होने से उनके माता पिता अधिक अच्छा वर चाहेंगे। भारत में धन के असमान वितरण से वैसे ही समस्यायें बढ़ रही है। इधर जो अच्छे वर और घर होंगे वह अधिक दहेज की मांग करेंगे। इससे उल्टे इससे बेमेल विवाहों को प्रोत्साहन मिलेगा क्योंकि जिसके पास अधिक धन होगा वह अधिक धन और सुंदर लड़की की मांग करेगा इससे लड़कों की आयु बढ़ेगी और ऐसे में उनको छोटी आयु की लड़कियां भी ब्याह करने को मिल जायेंगी।

सामाजिक विशेषज्ञों की चेतावनी के लिये शब्द कुछ भी रहे हों पर उनका आशय यही था कि कम लड़कियां होने से एक ऐसा संकट आयेगा जिससे बचना कोई आसान काम नहीं होगा। हम यहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को ध्यान में रखते हुए एक बार अपने को दृष्टा और अपनी देह को पंच तत्वों से बनी एक वस्तु मान लें। अर्थात हम मान लें कि स्त्री पुरुष देह भी एक वस्तु हैं-नारीवादी लेखक इस बात तो ध्यान दें यहां यह बात आत्मा को दृष्टा मानकर कही जा रही है-तो भी मांग पूर्ति का नियम लागू होता है। पुरुष अधिक होंगे तो उनकी कम और स्त्री संख्या में कम है तो उसकी मांग अधिक होगी। आप अपने देश में जलस्त्रोतों पर पानी के लिये और सड़कों पर वाहन टकराने पर होने वाले हिंसक संघषों पर ध्यान दें तो पानी कम नहीं है बल्कि मांग बढ़ गयी है पर आपूर्ति उस ढंग से नहीं हो पाती। उसी तरह सड़कों पर वाहन अधिक हो गये हैं पर वह चौडी नहीं हुई उसी तरह आपको लगेगा कि स्त्री पुरुषों की संख्या में अनुपातिक अंतर ही इस संकट के लिये जिम्मेदार हैं। परिवार नियोजन रखना अच्छी बात है पर बच्चे की भ्रुण हत्या एक ऐसा अपराध है जिसका परिणाम तत्काल नहीं पता लगता पर आज समाज जिन हालतों में गुजर रहा है उससे हम समझ सकते हैं कि आखिर वह इस हालत में क्यों आया?
जब हर मनुष्य के दृष्टा होने की बात की है तो एक घटना याद आ रही है-नारीवादियों को शायद यह बुरी लगे पर वह इस लेखक के साथ वैचारिक धरातल पर खड़े हों तो सहमत होंगे। खासतौर से नारीवादी लेखिकाओं से अपेक्षा तो है कि वह इस घटना में आयु और उसकी प्रासंगिकता पर विचार करेंगी।
उस दिन एक सड़क पर यह लेखक अपने रात को नौ बजे स्कूटर पर आ रहा था कि एक जगह गड्ढा आ गया। वह बड़ा था और उससे दूर हटकर निकलने के लिये लेखक को रुकना पड़ा। सड़क पर कोई खास भीड़ नहीं थी। एक आदमी उसी गडढे के पास से गुजर रहा था। उसने इस लेखक से कहा-‘अच्छा हुआ यह गडढ़ा आपको दिख गया वरना इसमें कई गिर चुके हैं।’
यह लेखक जवाब में केवल हंस पड़ा। उसी समय दो लड़कियां वहां से गाड़ी पर निकली। तब वह सज्जन फिर बोले-‘पता नहीं आजकल माता पिता कैसे हैं। आप बताईये क्या इस तरह रात को लड़कियों को बाहर जाने की इजाजत दी जानी चाहिये? अरे, करोड़ो रुपये आदमी संभाल कर रखता है पर देखिये उससे कही अधिक कीमती इस तरह बिटियायें बाहर घूमने के लिये छोड़ देता है।’
लेखक ने पूछा-‘आप उनको जानते हैं?’
उन सज्जन ने कहा-‘नहीं! जिस तरह आजकल की घटनायें हो रही हैं उनको देखते हुए यह बात कह रहा हूं। अरे भई, आप ही बताईये जवान लड़कियों की रक्षा का उपाय उनके घरवालों को नहीं करना चाहिये?’
यह सही है कि युवा विवाहिताओं के प्रति भी अपराध होते हैं पर अविवाहित युवतियों के प्रति अपराध हमेशा ही भारी संकट का कारण बनता है।
आप अगर लेखक हैं तो सड़क पर खड़े होकर बहस नहीं कर सकते। कन्या भ्रुण हत्याओं के बारे में विशेषज्ञों की चेतावनी को अनदेखा करते हुए यह समाज जिस तरह आगे बढ़ता गया यह घटनायें उनका परिणाम है। इन घटनाओं की कोई भी वजह हो सकती है पर यह उसका नहीं बल्कि बरसों पहले चले इस रिवाज-हां, समाज में एक तरह से कन्या भ्रुण हत्या रिवाज ही बन गया है-का ही परिणाम है।
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6/21/2009

ऐसे पर नहीं दे सकता-लघुकथा

उसकी पुकार पर सर्वशक्तिमान प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो वह बोला
‘सर्वशक्तिमान आप तो सब जानते है। आप हमारी मनोकामना पूरी करो इसलिये आपको मानते हैं। मैं ऊंचा उठना चाहता हूं । जमीन पर कीड़ों की तरह बरसों से रैंगते हुए बोर हो गया हूं। मुझे दायें बायें ऊपर नीचे बंगला, गाड़ी, दौलत और शौहरत के पर लगा दो ताकि आकाश में उड़ सकूं। यह जीना भी क्या जीना है?’
सर्वशक्तिमान ने मुस्कराते हुए कहा-‘मैंने तो इस तरह के पर बनाये ही नहीं जिनका नाम बंगला,गाड़ी,दौलत और शौहरत हो। लगता है कि तुम इंसानों ने ही बनाये हैं इसलिये ऐसे पंख तो तुम इस धरती पर ही ढूंढो। जहां तक मेरी जानकारी है ऐसे पर नहीं बल्कि बोझ है जिनके पास होते हैं वह इंसान उनके बचाने की सोचकर और जिनके पास नहीं होते वह उसके ख्वाबों का बोझ ढोता हुआ जमीन पर वैसे ही रैंगता है जैसे कीड़े। जो जीव आकाश में उड़ते हैं वह कभी ऐसी कामना भी नहीं करते। उड़ने के लिये आजादी जरूरी है पर तुम तो बोझ मांग रहे हो और वह मैं तुम्हें नहीं दे सकता।’
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