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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

2/09/2017

स्वर्णिम सिद्धांत लगा हाथ=तीन हिन्दी व्यंग्य कवितायें (Golden Formula-HindiSatirePoem)

इतने धोखे खाये हैं
अब बिना वादे लिये
हम साथ निभाते हैं।

स्वर्णिम सिद्धांत लगा हाथ
इसलिये नहीं पछताते हैं।
..........
शव हो गये इंसानों से
अपनी हमदर्दी जतायें।

पत्थर के नीचे दबी
मिट्टी हो गयी देह पर
मत्था टेककर
तरक्की की आशा जगायें।

कहें दीपकबापू श्रद्धा से
जिनका कभी नाता नहीं रहा
श्राद्ध का करें आयोजन
अपनी छवि पाखंड के
प्रचार से चमकायें।
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अपना उधार
उससे महल में जाकर कैसे मांगें
पहरा उन्होंने लगा दिया है।

सभी कर्णो पर
बज रहा उनके जयजयकार का नारा
कौन सुनेगा यह आवाज कि
हमें उसने दगा दिया है।
‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘

1/18/2017

सिंहासन के लिये होता दंगल, घावों से रिसते खून में दिखाते मंगल-दीपकबापूवाणी (Sinhasan ke liye hota Dangal-DeepakBapuWani)

सिंहासन के लिये होता दंगल, घावों से रिसते खून में दिखाते मंगल।
‘दीपकबापू’ भावनाहीन हो गये, शहर भी डराते अब जैसे सूने जंगल।।
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कभी बल कभी छल से राज चलते हैं, निर्वासित हंसों के घर में बाज़ पलते हैं।
‘दीपकबापू’ शोर में अक्ल मर गयी, लोहे के सिक्के सोने के मोल आज ढलते हैं।
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चांदी की थाली में भोजन पायें, यजमान को त्याग का ज्ञान बतायें।
‘दीपकबापू’ किताबें पढ़ बने ज्ञानी, शब्द वाचन से ही अर्थसिद्ध पायें।।
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सिंहासन के लिये अपना ईमान लुटाते, पद के लिये पादुका भी उठाते।
‘दीपकबापू’ स्वाभिमान मारकर बैठे, लोभ के अंधे त्यागी की छवि जुटाते।।
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जिनका एकमेव भगवान भी धन है, उजाले में भी अंधेरे से जूझता मन है।
‘दीपकबापू’ ज्ञान के गीत गाते झुमकर, वाणी उनकी अर्थरहित शब्दवन है।।
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12/21/2016

विमुद्रीकरण के सामाजिक तथा मानसिक परिणामों की प्रतीक्षा तो रहेगी-हिन्दी लेख (DeMonetisation for social and mental Efect for society-HindiArticle)

                           लगता नहीं है कि अनेक लोगों को विमुद्रीकरण ा अर्थ मालुम है। आधुनिक समय में राजकीय मुद्रा उसके स्वरूप का प्रतीक होती है। विमुद्रीकरण का अर्थ है एक राष्ट्र का ढहकर फिर पुननिर्माण की तरफ अग्रसर होना। आज हम समाज में जो उथलपुथल देख रहे हैं वह एक स्वाभाविक रूप है। अनेक लोग अन्मयस्क भाव से इसे देख रहे हैं।
             हमने अनेक लोगों से बात की तो सभी स्वयं को तो अप्रभावित बताते हैं पर गरीबों, किसानों, मजदूरों तथा कमजोर वर्गों की परेशानी का जिक्र करते हैं।  हमें आश्चर्य हुआ कि सामान्य लोग भी निम्न वर्ग की चिंता करते हैं-कहना चाहिये कि वह विमुद्रीकरण का विरोध करने के लिये नेताओं की तरह ही अपना हथियार प्रयोग कर रहे हैं। एक बात तो यह वह छिपाते हैं जो हम पढ़ लेते हैं वह यह कि सब कुछ पहले जैसा नहीं रहने वाला।  अनेक लोगों ने धन शक्ति के बल पर अपना आभामंडल प्रकाशित कर रखा था। विमुद्रहकरण से मुद्रा की कमी ने एक अध्यात्मिक दर्शन को जन्म दिया कि ‘जो मनुष्य इतराते हैं उन्हें पता होना चाहिये कि उनके कथित सम्मान और प्रतिष्ठा की वजह मुद्रा है।’
               यही दर्शन राजसी पुरुषों के लिये चिंता का विषय है।  उन्हें लग रहा है कि उनकी औकात या ताकत आम आदमी ने देखी है। मुद्रा के बिना कथित प्रभावशाली लोग क्या हैं? यह कमजोर लोगों ने देख लिया। विमुद्रीकरण के तत्काल बाद हमारी प्रतिक्रिया यही थी कि हम देश में सामाजिक तथा मानसिक बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं।
              अब हम अनेक ऐसे लोगों को भी देख रहे हैं जो नोटबंदी को लेकर निराश हो रहे हैं जबकि पहले खुश थे।  दरअसल शिखर पर बैठे इन लोगों को यह लग रहा है कि उनके इर्दगिर्द जो सामान्य लोगों का जमावड़ा था वह शायद अब उस तरह न रहे। अगर रहे तो उस तरह का सम्मान न दे जैसा देता था। लोग कह रहे थे कि सरकार के पास काली मुद्रा भी सफेद होकर पहुंच गयी है। यह बात सही हो पर यह भी देखना चाहिये कि सरकार नयी मुद्रा नियंत्रण के साथ जारी कर रही है। यह नियंत्रण अपेक्षित था। कहने वाले कहते हैं कि सरकार तथा आरबीआई रोज नये नियम बना रही है पर यह भूल रहे हैं कि विमुद्रीकरण का निर्णय एक शब्द था जबकि आगे का विस्तार राज्यप्रबंध से जुड़ा है जो नयी नयी स्थितियों के अनुसार नियम बना रहा है।  विमुद्रीकरण एक युद्ध का शंखनाद था। युद्ध में समय के अनुसार रणनीति और योद्धा बदले जाते हैं। अतः इस तरह का नये निर्णय या उनमें बदलाव रणनीति के अनुसार करने ही हैं।
हम देख रहे हैं कि लोगों में जो धन का मद था वह अब उतार पर है।  अब यह कहने का कोई साहस नहीं कर रहा कि वह धनवान है अतः बेपरवाह है। सरकार भी जिस तरह वापस आयी मुद्रा जितनी पुनः जारी करने की मनस्थिति में नहीं दिखती।  खेल तो यही से शुरु हुआ है। जिन लोगों को कोई परिणाम नहीं दिख रहा दरअसल वह अपनी वर्तमान स्थिति को लेकर चिंतित है चाहे वह बड़े पद, प्रतिष्ठिा कि शिखर तथा अधिक पैसे का सहयोग उनके पास है। 


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