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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

8/22/2016

खरेखोटे सिक्के-हिन्दी कविता (KhareKhote Sikke-Hindi Kavita)


गर्मी में पानी के प्यासे
स्वर्ण की तलाश में
जूझ रहे हैं।

वातानुकूलित कक्षों में
पर्दे पर आंखें लगाये बुद्धिमान
खेल की पहेली बूझ रहे हैं।

कहें दीपकबापू चिंत्तन में
अल्पबुद्धि करते समय खराब
खोटे सिक्के चलें बाज़ार में
खरे तिजोरियों में
अकेलेपन से जूझ रहे हैं।
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8/01/2016

पत्थर प्रतिष्ठा के साथ बसे हैं-हिन्दी कविता (Patthar Pratishtha ke saath base hain-Hindi Poem)

शहर की इमारतों में
चमकदार पत्थर
प्रतिष्ठा के साथ बसे हैं।

चाहे जितने पेड़
लगा लो घर के आंगन में
लाभ नहीं जब दिल कसे हैं।

कहें दीपकबापू भावना से
कर्तव्य का संबंध नहीं रहा
इंसानों के दिमाग में
स्वार्थ के विचार बसे हैं।
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7/17/2016

धर्म प्रचार पर चल रहा संग्राम-दीपकबापू वाणी (Dhama Pracha par chal rah sangram-DeepakBapu Wani)

प्रतिदिन लग रहा आतंक का दाग, प्रचारक भी पाते विज्ञापन में भाग।
‘दीपकबापू’ बहलने का ढूंढते बहाना, लोग मांगें श्रृंगार या रक्त राग।।
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भ्रष्टाचार से जमकर जंग जारी है, शिष्टाचार से भी भागीदारी है।
‘दीपकबापू’ भरमाने में माहिर, नज़र से बचने की कवायद सारी है।
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उपाधियों का यहां बाज़ार लगा है, अयोग्यता ने प्रतिष्ठा को ठगा है।
‘दीपकबापू’ अशिक्षित रहे ईमानदार, शिक्षितों के शब्दकोष में दगा है।।
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धर्म प्रचार पर चल रहा संग्राम, एक सर्वशक्तिमान रखे अनेक नाम।
‘दीपकबापू’ उपदेशों का करें धंधा, शब्द बेचकर भरते जेब में दाम।।
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मनुष्यों के होते भिन्न स्वभाव, प्यासे को दे पानी कोई  करे घाव।
‘दीपकबापू’ कभी रंग कभी बेरंग, संसार मे दिखे दृष्टि जैसा भाव।।
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मौके का सभी फायदा उठाते, न मिले तो विरोध में कायदा जुटाते।
‘दीपकबापू’ काम की नीयत नहीं, प्रतिष्ठा के लिये सभी वादा लुटाते।।
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