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8/05/2018

वह इश्क इश्क करते रहे बताया नहीं उनके क्या किस्से हैं-दीपकबापूवाणी (Vah vah ishq idhq karat rahe-DeepakBapuWani)


सपने साकार होंगे या टूटेंगे,
रिश्ते बढ़ेंगे या रूठेंगे।
कहें दीपकबापू दिल ख्यालों का घर
कुछ बनेंगे कुछ फूटेंगे।
--
वह इश्क इश्क करते रहे
बताया नहीं उनके क्या किस्से हैं।
कहें दीपकबापू कागज रंगे शब्दों से
पता नहीं खुशी गम के कितने हिस्से हैं।
--------

हवा होने का बस आभास है,
सुगंध से लगता कोई पास है।
कहें दीपकबापू दिल ढूंढे वफा
दिमाग में शंकाओं का वास है।
------

अपने अंदर खौफ छिपा
गैरों को वीरता सिखा रहे हैं।
‘दीपकबापू’ कानों से देखते सब
सबको नयी राह दिखा रहे हैं।
--
दिल का चैन बाज़ार मे बिकता है,
दाम जितना बड़ा दिखता है।
कहें दीपकबापू झूठा सौदागर
अपना सच का दावा लिखता है।
---
नयेपन के वादे भुला रहे हैं,
पुराने हादसों में झुला रहे हैं।
कहें दीपकबापू आंगन टेढ़ा है
नर्तक सबके दिल सुला रहे हैं।
---

5/13/2016

दानवीर-हिन्दी कविता(Danveer-Hindi Poem)

आदर्श की बात करते
महल के अदंर
प्रवेश कर जायें।

भलाई का व्यवसाय 
चल निकले जब
निरंतर लाभ पायें।

कहें दीपकबापू दया से
जिनका वास्ता नहीं
विज्ञापन के दम पर
दानवीर कहलायें।
-----------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh


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4/14/2016

संक्रमणकाल में आये कोई अवतार-हिन्दी क्षणिकाऐं (Hindi Short Poem)

हाथ हिलाते नारे लगाते
हाड़मांस के बुत
अब क्रांतिकारी कहलाते।

जहान के दर्द का बयान
करते आकर्षक शब्दों में
दवा के लिये बहलाते।

कहें दीपकबापू जीवन में
संघर्ष पथ पर चलते हुए
बरसों बीत गये
कागजी नायक पर्दे पर
आये गये
अपने दिल देह के घाव
लोग दिखते स्वयं ही सहलाते।
----------
दो हाथ दो पांव
दो आंखें दो कान
सभी इंसान एक जैसे लगते हैं।

अंदर झांककर नहीं देखा
कितने सोते
कितने जगते हैं।

कहें दीपकबापू बहस में
भाग लेते बहुत शख्स
कौन मूर्ख कौन विद्वान
तर्क से सभी ठग्ते हैं।
---------
दूरध्वनि यंत्र पर
आत्मचित्रण की
सुविधा अच्छी लगे।
प्रश्न यह कि
अपने में खोया
इंसान कैसे जगे।

बड़ी धरती पर
छोटी दुनियां बनाकर
आदमी खुद को ठगे।
---------
असुरों पर देवों की 
विजय कथायें सुनकर
बड़े हो गये हैं।

संक्रमणकाल में
आये कोई अवतार
अकर्मण्य हाथ बांधे
प्रतीक्षा खड़े हो गये हैं।
----------------

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2/26/2016

पर्दे के रंग-हिन्दी कविता(Parde ke Rang-Hindi Kavita)

अपना अपना हिस्सा
जुटाने में सभी लगे हैं।

दौलत के मेले में
कमजोर की बारी
जल्दी नहीं आयेगी
सभी अमीर पहले लगे हैं।

कहें दीपकबापू दुनियां में
बदलाव के किस्से
बहुत सुनते रहे
बड़े लोगों के आसरे
सपने बुनते रहे
सफेद पर्दा रंगीन हो गया
महलों का पता नहीं
आम बस्तियों में तो अब भी
मैले पर्दे लगे हैं।
------------

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1/23/2016

प्रतिष्ठा की सवारी कार से चले-दीपकबापू वाणी (pratishtha ki sawar kar se chale-DeepakBapuWani)

प्रतिष्ठा की सवारी कार से चले, दिल की नीयत पैसे से पले।
‘दीपकबापू’ आंखें बंद रखकर, रौशनी लाते हुए घर ही जले।।
.............................
जीभ का स्वाद आम मांगता, कोई मेहनत से दिल नहीं टांगता।
‘दीपकबापू’ वातानुकूलित कक्षवासी, भूख का हिसाब नहंी मांगता।।
------------------
हाथ में किताब दिखाते भक्ति, दिल में बसी धन की आसक्ति।
‘दीपकबापू’ कर रहे भले का धंधा, चंदा लेने में लगाते शक्ति।।
.........................................
सभी भले लगते धन के मोर, पकड़े जायें तभी कहिये चोर।
‘दीपकबापू’ काला काम करें, साफ छवि जताते मचाकर शोर।।
--------------
सर्वशक्तिमान के पास रोज जाते, दरबार में भी नहीं खोज पाते।
‘दीपकबापू’ हृदय रखे हुए खाली, शुष्क संस्कार नहीं ओज पाते।।
-------------------
जब भी मिलें हाल जरूर पूछते, किसी मसले का हल नहीं बूझते।
‘दीपकबापू’ मददगार लगाये भीड़, चंदा लेते पर दान से नहीं जूझते।।
...................
ठगों ने बदला धंधे का चेहरा, महल के बाहर लगाया पहरा।
‘दीपकबापू’ वेशभूषा साफ पहने, पापी नीयत का कुंआ गहरा।।
--------------------
चेहरे पर दिखे नीयत का रंग, काली श्रद्धा से हो यज्ञ में भंग।
‘दीपकबापू’ हाथ में उठाये पत्थर, न जाने फूल चढ़ाने के ढंग।।
-------------
सर्वशक्तिमान का नाम रोज गायें, स्वार्थ की दुकान का काज चलायें।
कातिल कर देते बंदों का कत्ल, ‘दीपकबापू’ आकाश का राज बतायें।
-----------------

इंसानी चेहरों के बहुत रंग हैं, ख्याल से कोई खुले कोई तंग हैं।
‘दीपकबापू’ बहुरंगी दुनियां में, सभी के जीने के अलग ढंग हैं।।
---------------

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1/06/2016

सुधार के प्रवचन-हिन्दी कविता (Sudhar ke Pravachan-Hindi Kavita)

वफा न करें कोई
इसकी परवाह नहीं
गद्दारी का डर सताता है।

साथ छोड़ दे कोई
इसकी परवाह नहीं
हैरानी होती है
जब वह शिकायत जताता है।

कहें दीपकबापू भीड़ में
सुधार के प्रवचन पर
तालियां भले बज जायें
नारों से आगे सोच का
दर्शन कोई नहीं बताता है।
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12/28/2015

योग सीखा होता-हिन्दी कविता(Yoga seekhg hota-Hindi Kavita)

हैरान नहीं होता
अगर वफा निभाना
ज़माने ने सीखा होता।

दिल के दर्द से
नहीं लड़ना पड़ता
दोस्ती निभाना सीखा होता।

कहें दीपकबापू इंसान से
तन मन विचार के
विकार पास नहीं आते
योग करना सीखा होता।
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12/18/2015

अमीरों की महफिल में-हिन्दी शायरी(Amiron ki Mahafil mein-Hindi Shayri)

यकीन करना कठिन है
वफा का वादा कर
कोई गद्दारों में नहीं बिकेगा।

जो अन्याय से लड़ता दिखता
बाज़ार में सिक्कों के आगे
अधिक देर टिकेगा।

कहें दीपकबापू तरक्की पर
चरित्र भाव बदल देता है
मिलती ऊंची बोली
आदमी चाल बदल लेता है
अमीरों की महफिल में
कौन गरीब दिखेगा।
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12/09/2015

बुत नज़र आते हैं-हिन्दी कविता(but nazar aate hain-Hindi Kavita)

सामने टंगे पर्दे पर
नाचते बोलते
बुत नज़र आते हैं।

लगता कहीं से इशारे
कहीं पटकथा के सहारे
तर्क गड़ते आंखे से लड़ते
बुत नज़र आते हैं।

कहें दीपक बापू प्रायोजन पर
चल रहा संसार
मोल लोकप्रियता का आधार
बिक नहीं वही बाहर बैठे
बुत नज़र आते हैं।
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12/01/2015

नकली जज़्बात-हिन्दी शायरी (Naqli Jazbat-hindi shayri)

आंसुओं के सौदागर
बंद कमरों में
जमकर हंसते हैं।

आंखों में बसी हमदर्दी बेचते
ग्राहक की तरह
पीड़ित फंसते हैं।

कहें दीपकबापू व्यापार में
हास्य और करूण रस
महंगे दाम बिक रहा
शब्दों के सौदागर
नकली जज़्बात लेकर
दिलों में ठंसते हैं।
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11/23/2015

दिल की चाहत से संकट बुलातेदीपकबापू वाणी (Dil ki Chahat se sankat bulate-DeepakBapuWani)


चाणक्य जैसे सब बनना चाहें, पकड़ लेते तख्त की राहें।
दीपकबापू बैरागी का भेष बनायें, भोग में लिप्त भरते आहें।।
---------------
तन की सफाई कर ली, मन की गंदगी हटाना भूल गये।
दीपकबापू धन कमाया खूब, दिल का दर्द घटना भूल गये।।
---------------
किताब में लिखी पांव की चाल, चलने के लिये अक्ल जरूरी है।
दीपकबापू शब्दों में मिलता रस, पीकर चमकें पर शक्ल जरूरी है।।
---------------
दिल की चाहत से संकट बुलाते, आसरा पराये कंधे पर झुलाते।
दीपकबापू पाने खोने मे व्यस्त, लोग जिंदगी का हिसाब भुलाते।।
----------------
विशेष अवसर पर क्षणिक मुलाकात, बीते काल का स्मरण कराती।
दीपकबापू अतिथियों से पाते ताजगी, क्षण भर की स्मृति बन जाती।।
------------------
ध्यानयोग साधना सहज नहीं, सतत करे वही साधक जाने।
दीपकबापू मन के अभ्यास में, तन का मोह बाधक माने।।
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11/15/2015

फिक्र नहीं है- हिन्दीशायरी(Fikra Nahin Hai-HindiShayri)


इतना वक्त नहीं मिलता
भटके लोगों को
रास्ता बतायें।
कहें दीपकबापू फिर भी बेफिक्र हैं
अपनी मंजिल के नाम से
इस तरह अनजान हैं
सोचने की भी ताकत नहीं कि
सवाल लेकर हमें सतायें।।
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11/03/2015

मयखाने से भक्त बनकर बाहर आये-हिन्दी हास्य कविता(Maykhane se Bhakt banakar Bahar aye-Hindi Comedy Poem)

फंदेबाज मिलते ही बोला
दीपकबापू तुम्हें कभी
भूले भटके पुरस्कार मिला हो
वापस कर डालो,
अवसर अच्छा है
मुफ्त में प्रसिद्धि पा लो,
संभव है कभी आगे
कोई पुरस्कार मिल जाये,
शायद इस बहाने
फ्लाप कवि की छाप से
तुम्हारा नाम बाहर आये।

सुनकर चौंके फिर बोले दीपकबापू
साहित्य से तुम्हारा वास्ता नहीं,
शब्द फैंकना तुम्हारा काम
रचना तुम्हारा रास्ता नहीं,
चाटुकारों की फौज बड़ी
 हम उसमें नहीं फिट हो पाते,
आकाओं का मिलता सानिध्य
हम भी हिट हो जाते,
लिखना हमारी साधना है,
कविता आराधना है,
हम तो अंतर्जाल पर
एकांत में छाये,
वापस करने की चिंता नहीं
 सम्मान से अपने कदम दूर पाये,
न बना कोई
लिख लिखकर जग मुआ
दूजा तुलसी कबीर और रहीम
ढेर सारे सम्मानित ओढ़े शाल
खेल रहे राजसी जुआ,
उड़ा रहे कागजी धुंआ
लग रहा जैसे मयखाने से
भक्त बनकर बाहर आये।
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9/04/2015

एकांतवाटिका-हिन्दी कविता(ekant vatika-hindi poem)


कोई कामयाब हुआ
उस पर प्रशस्ति लिखने वाले
बहुत मिल जाते हैं।

किसी के डूबने पर
रोता हुआ गीत लिखने वाले
बहुत मिल जाते हैं।

कहें दीपक बापू शब्द में
जिंदादिली का अहसास
अपनी रचना से करायें
एकांतवाटिका में ऐसे पुष्प
बहुत कम खिल पाते हैं।
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8/28/2015

दिल का सौदा-हिन्दी कविता(Dil ka Sauda-hindi poem)

चाहने वालों के
दिल को खिलौना समझा
इसलिये तोड़ दिया।

अपना दिल हाथ में
कबाड़ की तरह लिये फिरते लोग
चाहे जिससे नाता जोड़ लिया।

कहैं दीपक बापू दिल का सौदा
कभी किया नहीं दिया जाता
बिना मतलब के लिया नहीं जाता
 जज़्बात से खाली दिमाग ने
जहां देखा फायदा
वहीं दिल को मोड़ दिया।
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8/24/2015

शेयर बाज़ार का ढहना हमारा कहना-हिन्दी व्यंग्य(disaster of sharmarket and sensex,black monday-hindi satire article)

                             
                                   शेयर बाज़ार अतिधनवान लोगों को व्यस्त रखता है। इससे जनमानस के लिये आवश्यक वस्तुओं सहज सुलभ रहती है हालांकि वायदा बाज़ार के माध्यम से धनवान लोग वहां भी अपनी कला दिखाते हैं।  आम इंसान शेयर बाज़ार को एक ऐसे खेल मैदान की तरह देखता है जहां उसका प्रवेश वर्जित है।  धनवान लोग वहां हारते जीतते रहते हैं।  हम जैसे चिंत्तक यह मानते हैं कि धनवान लोगों का  मायावी बाज़ार मे व्यस्त रहना उसी तरह अच्छी बात है जैसे आदतन अपराधी का मादक द्रव्य में व्यस्त रहना।
                                   इधर सुना है कि शेयरों के दाम औंधे मुंह गिरने लगे हैं। सामान्य नागरिकों के लिये यह चिंता का विषय होना ही चाहिये। जिस तरह शराबखाने से निकला कोई मसखरा खतरनाक हो जाता है उसी तरह शेयर नामक शराब से ऊबे धनपति फिर कहीं सोने, जमीन तथा अनाज के व्यापार में कहीं अपना धन लगाने लगे तो मुश्किल खड़ी कर देंगे। मुश्किल यह है कि हमारे देश में कुछ लोगों के पास इतना पैसा है कि वह सोचते हैं कि रखे कहां? दीवारों के छिपाया, फर्श में दबाया, बैंकों मे रखा, और अल्मारी में घुसेड़ा फिर भी इतना बचता है कि वह शेयर बाज़ार में लगा देते हैं।  सोना, जमीन और महंगी कारों को खरीदने पर भी उनका पैसा खत्म नहीं होता।
                                   उनका शेयर बाज़ार में व्यस्थ रहना समाज के स्वास्थ्य के लिये ठीक रहता है। भावों के उतार चढ़ाव देखकर वह अपना दिल बहलाते हैं। कभी खुशी तो कभी गम की उदासीनता का आनंद लेते हैं-भाव गिरने पर उन्हें मूड खराब होने के प्रचार का अवसर मिलता है।
                                   बहरहाल इस व्यंग्य के साथ ही हम अपने चिंत्तन का निष्कर्ष भी बता दें।  इस बार मंदी का दौर चला तो बड़े बड़े औद्योगिक घराने संकट में पड़ सकते हैं। आमइंसान का इतना खून निकाल चुके हैं कि अब कुछ बाकी नहीं।
इस पर लिखे गये ट्विटर
--------------------------------
शेयरबाज़ार ढहने पर सोमवार काला हो जाता है पर आश्चर्य है फसल बर्बाद करने वाले ओलों काला नहीं कहा जाता।
दरअसल शेयरों में धन का विनियोजन करना खायेपीयेअघाये लोगों का काम है। उसके भाव गिरे तो वह दालचीनी में पैसालगाकर मंहगी कर देंगे।
शेयर बाज़ार सूचकांक ढहे या बचे इसकी परवाह किसे है? यहां तो लोग प्याज, दाल, और चीनी के मूल्य सूचकांक से आहत हैं।

प्याज ऐसा नहीं है जिसे न मिलने पर कोई भूखा रह जाये! इसके दाम बढ़ने पर इतना रुदन जमता नहीं है।

बाबा रामदेव का डीआरडीओ से समन्वय होना अच्छी बात है। आपत्तियां उठाने वालों का जवाब देना जरूरी नहीं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh


वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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