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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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8/05/2018

वह इश्क इश्क करते रहे बताया नहीं उनके क्या किस्से हैं-दीपकबापूवाणी (Vah vah ishq idhq karat rahe-DeepakBapuWani)


सपने साकार होंगे या टूटेंगे,
रिश्ते बढ़ेंगे या रूठेंगे।
कहें दीपकबापू दिल ख्यालों का घर
कुछ बनेंगे कुछ फूटेंगे।
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वह इश्क इश्क करते रहे
बताया नहीं उनके क्या किस्से हैं।
कहें दीपकबापू कागज रंगे शब्दों से
पता नहीं खुशी गम के कितने हिस्से हैं।
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हवा होने का बस आभास है,
सुगंध से लगता कोई पास है।
कहें दीपकबापू दिल ढूंढे वफा
दिमाग में शंकाओं का वास है।
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अपने अंदर खौफ छिपा
गैरों को वीरता सिखा रहे हैं।
‘दीपकबापू’ कानों से देखते सब
सबको नयी राह दिखा रहे हैं।
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दिल का चैन बाज़ार मे बिकता है,
दाम जितना बड़ा दिखता है।
कहें दीपकबापू झूठा सौदागर
अपना सच का दावा लिखता है।
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नयेपन के वादे भुला रहे हैं,
पुराने हादसों में झुला रहे हैं।
कहें दीपकबापू आंगन टेढ़ा है
नर्तक सबके दिल सुला रहे हैं।
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6/27/2018

कोई करे इंसानों की सेवा, कोई पूज रहा दिल से देवा-दीपकबापूवाणी (Inasa ki sewa dil mein deva-DeepakBapuWani)


जहां वाद वहीं विवाद है,
बहस में झगड़ा निर्विवाद है।
कहें दीपकबापू उदास दिल में
खुशी से ज्यादा दर्द की याद है।
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कोई करे इंसानों की सेवा,
कोई पूज रहा दिल से देवा।
कहें दीपकबापू कर अपना काम
खुश हो जितना मिले मेवा।
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ख्वाब करते दर्द का इलाज,
हंसी छिपा लेती बेबसी का राज।
कहें दीपकबापू मत रो इंसान
सलामत हाथ पावं पर कर नाज।
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पत्थर के महल भी ढह गये,
स्वर्णमृग बेनामनदी में बह गये।
कहें दीपकबापू दरियादिलों के
किस्से ही यादों में रह गये।
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भय सपना टूटने का है,
विश्वास का घड़ा फूटने का है।
कहें दीपकबापू प्रेम का पाखंड
लोभ तो धोखा लूटने का है।
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दिल की चाहत भटकाती है,
लालच धूप जैसा चटकाती है।
कहें दीपकबापू जब हो मन बेबस
चिंतायें उल्टा लटकाती हैं।
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6/19/2018

भावना व्यापार पर लोकतंत्र टिका-दीपकबापूवाणी(Democracy based on trede of Public Sentimen)



वाणी से ढेर शब्द बरसाते हैं,
अर्थ समझाने से तरसाते हैं।
कहें दीपकबापू खाने के शेर
लड़ने में चूहे जैसे बन जाते हैं।
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आंखों में सपनों के झूले हैं,
हाथ पांव सच से फूले हैं।
कहें दीपकबापू भंवर में जिंदगी
डूबते तैरते भक्ति से भूले हैं।
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सब अपनी जिंदगी जी लेते हैं,
अपने हिस्से सुख दुःख पी लते हैं।
‘दीपकबापू’ क्यों हैं फिक्रमंद
सब अपने फटे दिल सी लते हैं।
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भावना व्यापार पर लोकतंत्र टिका है,
अनमोल मत वादे के मोल बिका है।
कहें दीपकबापू सेवक उपाधि है
ठाठबाट राजाओं जैसा दिखा है।
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बेहिसाब दौलत से हुए न्यारे,
घूम रहे आंकड़ों के गलियारे।
कहें दीपकबापू भ्रमजाल में फंसे
मैं का सुर अलाप रहे बकरे प्यारे।
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राजा जैसी चाल नाम सेवक धरे,
बड़ा खास वह जो करचोरी करे।
‘दीपकबापू’ ठहरे जो आमजन
लाचार राजस्व भंडार भरे।।
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9/06/2017

देह की उष्मा भी मन को जलाती है-दीपकबापूवाणी (Deh ki ushma bhi man ko jalati hai-DeepakBapuWani)

वह दिलासा क्यों देंगे जिनके दिल टूटे हैं, क्यों बांटेंगे जो उन्होंने सिक्के लूटे हैं।
‘दीपकबापू’ कान बंद किये आंखें बुझाये बैठे, ईमान के नाम लेकर बेईमान छूटे हैं।।
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अपने काम का फल सभी स्वयं चखते हैं, परायी वफा का हिसाब नहीं रखते हैं।
‘दीपकबापू’ डाल देते अपनी चाहत बट्टे खाते, अल्लहड़ बेहिसाब खुशी रखते हैं।।
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मुंह में राम तो मन में माया बसी है, खाने के खेल में इंसान की काया फंसी है।
‘दीपकबापू’ अक्ल से बात करें तो कैसे, वहमों चिंताओं ने उसकी नकेल कसी है।।
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एकरस में ऊबा मन भ्रमण करना चाहे, हास्य में मर्यादा का अतिक्रमण करना चाहे।
‘दीपकबापू’ एक शहर से दूसरे में चले जाते, चाहत सदा दिमाग में संक्रमण भरना चाहे।।
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देह की उष्मा भी मन को जलाती है, कुपित शीत भी पूरे तन को गलाती है।
‘दीपकबापू’ वर्षा की बूंदों से होते पुलकित, बाढ़ बनकर वह भी दर्द लाती हैं।।
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ज़माने के द्वंद्वों में मनोरंजन के झूले हैं, पराये पर हंसे अपने दर्द भूले हैं।
‘दीपकबापू’ ढूंढते कातिलों में फरिश्ते, भूखा प्यासा इंसान देखकर फूले हैं।।
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अपना आसरा पराये कंधों पर रखते हैं, टूटा स्वयं से यकीन बाहर तकते हैं।
‘दीपकबापू‘ आत्मचिंत्तन से घबड़ाकर भागते, कामयाबी के सपने ही पकते हैं।।
’’’

4/03/2017

सेवक सिंहासन पर विराज स्वामी हो जाते-दीपकबापूवाणी (singhasan par Sewak Swami Ho jate-DeepakBapuWani

अपनी राह चलें यह मति नहीं है, बोलते बहुत पर सोच की तेज गति नहीं है।
दीपकबापू’  बुद्धि खर्च करते निंदा पर, संपदा के सभी पर प्रशंसा पति नहीं है।।
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चंद पल में इंसान अपने भाव बदलते हैं, डरकर विश्वास की नाव बदलते हैं।
दीपकबापूजिंदगी के खिलाड़ी बहुत हैं, सभी पैंच से पैदल दाव बदलते हैं।।
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नाकाम इंसान बहानों का रस पिलाता है, जाति धर्म के सहारे हाथ पांव हिलाता है।
दीपकबापूअपने मतलब में सदा फंसा, ज़माने के दर्द में झूठी हमदर्दी मिलाता है।।
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चाहत के समंदर में बहुत गोते लगाये, जिन्हें हाथ से दिये मोती सभी रोते पाये।
दीपकबापूगौर से देखते खाली हाथ, परायी कामना का खेत मुफ्त जोते आये।
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इंसान की पहचान उसके इरादे हैं, कोई चालाक खिलाड़ी कोई सीदे प्यादे हैं।
दीपकबापूसौदागर करते चतुराई, बेबस मन सूंघता चारे जैसे झूठे वादे हैं।।
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सेवक सिंहासन पर विराज स्वामी हो जाते, कर्तव्य भूल अधिकार में खो जाते।
दीपकबापूजनकल्याण के व्यापार में लगे, बड़ी कीमत पर बड़े सौदे हो जाते।।
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स्वयं करें नहीं दूजे से चाहें अपनी आस, स्वयं खाली दूसरें में ढूंढते देव का वास।
दीपंकबापूप्रचार से खड़े हैं बड़े बरगदकभी फल देते ही छाया जैसे घास।।
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हृदय में भाव नहीं सामने चित्र धरे हैं, मतलबपरस्ती में ही फंसे मित्र परे हैं।
दीपकबापूगंदगी में ढूंढते रहें सुगंध, बंद नासिका मुंह से जो इत्र चरे हैं।।
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अल्पधन होने का दर्द भी कम होता, भीख की तरह मदद देने का गम होता।
दीपकबापूमरे दिल के अमीर बने हैं, राजस्व लूट में भी चक्षु नहीं नम होता।।
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राजकाज की समझ कभी पायें, गद्दी चढ़ने के लिये दिखाते कलायें।
दीपकबापू’  जब से लोग आम हुए हैं, वादे घोलकर चालाक रस बनायें।।
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कौये लूट लेते मोती भले खायें नहीं, सोचते बेबस हंस चले जायें कहीं।
दीपकबापूगिरगिट मित्र बनाने लगे, डरते वफा का रंग भले पायें नहीं।।
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2/09/2017

स्वर्णिम सिद्धांत लगा हाथ=तीन हिन्दी व्यंग्य कवितायें (Golden Formula-HindiSatirePoem)

इतने धोखे खाये हैं
अब बिना वादे लिये
हम साथ निभाते हैं।

स्वर्णिम सिद्धांत लगा हाथ
इसलिये नहीं पछताते हैं।
..........
शव हो गये इंसानों से
अपनी हमदर्दी जतायें।

पत्थर के नीचे दबी
मिट्टी हो गयी देह पर
मत्था टेककर
तरक्की की आशा जगायें।

कहें दीपकबापू श्रद्धा से
जिनका कभी नाता नहीं रहा
श्राद्ध का करें आयोजन
अपनी छवि पाखंड के
प्रचार से चमकायें।
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अपना उधार
उससे महल में जाकर कैसे मांगें
पहरा उन्होंने लगा दिया है।

सभी कर्णो पर
बज रहा उनके जयजयकार का नारा
कौन सुनेगा यह आवाज कि
हमें उसने दगा दिया है।
‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘

11/16/2016

तन्हाई में सबसे बड़ा साथी अपना ही हमसाया है--हिन्दी व्यंग्य कविताऐ (Sathi Apna Saya hai-HindiPoem;s)

 पीछे पेड़ की परछाई सिर पर धूप की छाया है।
तन्हाई में सबसे बड़ा साथी अपना ही हमसाया है।
सहारे की तलाश में कई घरों के दर पर दी दस्तक
ढूंढा तो अपने आंगन में खुशियों का खजाना पाया है।
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बर्फ पिघलानी थी
आग जलाई
अपने हाथ भी जला लिये।

सोना ढूंढ रहे थे
नहीं मिला तो
पीतल के बर्तन ही गला दिये।

कहें दीपकबापू नाचना
हमें आता नहीं था
आंगन टेढ़ा दिखे
इसलिये अंधेरे चला दिये।
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सर्वशक्तिमान से
मत करना कोई याचना
जिदंगी का सब सामान
उसने संसार में भर दिया है।

हाथ पांव और बुद्धि का
देकर भंडार उसने किया कृतार्थ
कोई नहीं कर भी लिया है।
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सर्वशक्तिमान से
शक्ति की याचना क्यों करते हैं।
पांव दिये चलने को
साष्टांग होते उसके सामने
हाथ दिये काम करने को
फैलते उसके आगे
फिर इंसान होने का दंभ क्यों भरते हैं।
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9/25/2016

जमीन पर अन्न बिछा सोने जैसा फिर भी आदमी चाहे आकाश का तारा-दीपकबापूवाणी (Zamin par anna bicha sone jaisa aadmi chahe akash ka tara-DeepakBapuWani)

बेदर्दी तो हमने अपने साथ की थी जो उनका साथ निभाया।
बेदर्दोंमें अपना दिल हमेशा जज़्बातों से खाली ही दिखाया।।
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सहायकों का जमघट लगा है, फिर भी कमजोर ही ठगा है।
फुर्सत के दोस्त बहुत बन जाते पर नहीं कोई उनमें सगा है।।
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उत्साह से भरें प्रातः की शीतल हवा, मन ढले रात के अंधेरे में।
जोगी आनंद ले साधना से, रोगी भटके दर दर दवा के फेरे में।
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प्रेम के रिश्ते तोड़ने में कभी नुस्खे आजमाये नहीं जाते।
दिल में तड़प की गुंजायश होती, भाव जमाये नहीं जाते।।
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मौजूद नहीं धरती पर उस जन्नत के ख्वाब सभी देख रहे हैं।
पीर दरबार में देते हाजिरी कातिल खंजर पर मत्था टेके रहे हैं।।
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पत्थरों पर नाम खुदवाकर अमर होने की ख्वाहिश बढ़ जाती है।
पैसे से कमअक्लों पर अक्लमंद दिखनें की ख्वाहिश बढ़ जाती है।
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जमीन पर अन्न बिछा सोने जैसा फिर भी आदमी चाहे आकाश का तारा।
रोटी से पेट भरकर नहीं संतोष, दिल हीरे जवाहरात की चाहत का मारा।।
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अपना मन बहलाने के लिये दर दर भटक रहे हैं।
दाम खर्च करते हुए भी बोरियत में अटक रहे हैं।
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अपने सपनों का बोझ पराये कंधे पर हमेशा टिकाते हैं।
नाकामी पर रोयें कामयाबी पर अपनी ताकत दिखाते हैं।
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हर जगह लगते भलाई के मेले, फिर भी परेशान लोग रहें अकेले।
‘दीपकबापू’ जज़्बात बन गये सौदा, दाम चुकाकर चाहे जितना खेले।।
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7/07/2016

अनुभूतियों के जंगल-हिन्दी व्यंग्य कविता(Anubhutiyon ke Jungle-Hindi Poem)


गणित के खेल में
शब्द कहां टिकते हैं।

मधुर वाणी का
सम्मान नहीं हो सकता
जहां शोर के स्वर बिकते हैं।

कहें दीपकबापू रौशनी में
 चुंधिया गयी आंखें
राख हो चुकी संवदेनाओं में
अनुभूतियों के जंगल
वीरान दिखते हैं।
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6/21/2016

खास यार भी बदल जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता (Khas Yaar bhi badal jate hain-HindiSatirePoem)


बदलते मौसम जैसे
इंसान भी हमेशा
बदल जाते हैं।

दिल के जज्बात
हालातों के हिसाब से
बदल जाते हैं।

कहें दीपकबापू भरोसे से
नाता हमेशा निभाना
कठिन लगता है
मुश्किल में खास यार भी
बदल जाते हैं।
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