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9/14/2009

हिंदी दिवस पर इसलिये जगाते-हास्य कविता (hindi divas par jagate-hasya kavita

पोते ने कहा दादा से
‘पापा ने उस कार्यक्रम में
साथ ले जाने से मना कर दिया
जिसमें हर वर्ष
हिंदी दिवस पर भाषण करने जाते।
आप ही समझाओ
मैं तो पढ़ रहा हूं अंग्रेजी माध्यम स्कूल में
हिंदी के बारे में सुनना है मुझे भी
मैं भी पढ़ूंगा
बहुत से माता पिता अपने बच्चों को पढ़ाते।’

सुनकर दादाजी हंसे और बोले
‘बेटा, जो माता पिता गरीब हैं
वही अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाते।
जिनके पास पैसा है बहुत
वह तो अंग्रेजी सभ्यता बच्चों को सिखाते,
अच्छा भविष्य तो होता अपने कर्म के हाथ
पर वह अपने को ऐसे सभ्य दिखाते
इस देश में अच्छे भविष्य और विकास का नारा
इस तरह लगता रहा है कि लोग
एक दूसरे को उसमें बहा रहे हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि हिंदी गरीबों की भाषा
सच ही लगता है क्योंकि
असली संस्कृति तो गरीब ही बचा रहे हैं।
उनमें फिर भी है माता पिता का सम्मान
वरना तो अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ा चुके पालक
अब उनकी उपेक्षाओं का गाथा गाते।
कुछ लोग वृद्धाश्रम में बस जाते।
संस्कृति और संस्कार तो बचाना चाहते हैं
ताकि रीतियों के नाम पर
स्वयं को लाभ मिलता रहे
भाषा ही इसका आधार है
सच उनसे कौन कहे
वेतन की गुलामी आसानी से मिल जायेगी
इस भ्रम में अंग्रेजी को लोग अपनी मान लेते
हिंदी से दूरी रखकर गौरव लाने की ठान लेते
तुम्हारे बाप को डर है कि
कहीं गरीबों की भाषा के चक्कर में
तुम भी गरीब न रह जाओ
इसलिये तुम्हें हिंदी से दूर भगाते
पर जमाना गुलाम रहे हमारा
इसलिये उसे जगाते।

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9/12/2009

सेवा करने वाले स्वामी बन गये-हास्य व्यंग्य कविताएँ (servent and owner-hasya vyangya kavitaen

वह गिरे हुए लोगों को
उठाने का अभियान चलाते हैं
उनक करतब जोरदार लगे
इसलिये पहले से गिरे को और नीचे गिराते हैं।
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चमन में खूबसूरत फूल खिलाने
का वादा वह करते रहे।
जैसे ही माली बने
उजाड़ दिया पूरा चमन,
जहां पक्षी चहचहाते थे
वहां ला दिया खौफनाक अमन,
जब वादे की याद दिलाओ तो
कहते हैं कि
‘कुछ बनाने के लिये
पहले उजाड़ना जरूरी है
अभी तो हमारे पास समय बहुत है
इंतजार करो
कुछ दिन तक झेलो उदासी
हम पूरे करेंगे अपने शब्द
जो मालिक बनने से पहले कहे।’’
माली से खुद ही मालिक बन गये,
सेवा करने का दावा करने वाले
स्वामी होकर तन गये,
आसरा टिका दिया है उन पर
शायद पूरा हो जाये
यह सोचकर कोई क्या कहे।

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8/08/2009

मन अब नहीं होता-हिंदी शायरी (man ab nahin hota-hindi shayri)

इंसान को पंख नहीं
इसलिये आकाश में
उड़ नहीं पाता।
पर ख्याल तो बिना पंख ही
उड़ते हैं आवारा
जमीन पर पांव के बल
उनको चलना नहीं आता।
ख्यालों में खून नहीं बहता
इसलिये गिरकर घायल होने का
डर उनको नहीं होता
जख्म तो शरीर के हिस्सों पर ही आता।
..............................
रोज सुबह घर के बाहर पड़े
कागज के उस पुलिंदे को
हाथ में पकड़कर
उस पर छपे अक्षर पढ़ने का
मन अब नहीं होता।

घर के अंदर चल रहे
उस बुद्ध बक्से के दृश्य देखने
और आवाज के शोर सुनने का
मन अब नहीं होता।

ऐसा लगता है कि
मेरे मन के भावों को
हथियार बनाकर उपयोग किया है
उन सौदागरों ने जो
सजा रहे है नारे और वाद बाजार में
देशभक्ति और जनकल्याण का दिया वास्ता
पर कभी खुद नहीं चले वह रास्ता
थकावट लगती है
अब तो अपना लक्ष्य ढूंढने की चाहत है
उनके दिखाये धोखे पर चलने का
मन अब नहीं होता।
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1/31/2008

अपने आपसे दूर हो जाता आदमी-साहित्य कविता

जीवन के उतार चढाव के साथ
चलता हुआ आदमी
कभी बेबस तो कभी दबंग हो जाता
सब कुछ जानने का भ्रम
उसमें जब जा जाता तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

दुख पहाड़ लगते
सुख लगता सिंहासन
खुली आँखों से देखता जीवन
मन की उथल-पुथल के साथ
उठता-बैठता
पर जीवन का सच समझ नहीं पाता
जब अपने से हटा लेता अपनी नजर तब
अपने आप से दूर हो जाता आदमी

मेलों में तलाशता अमन
सर्वशक्तिमान के द्वार पर
ढूँढता दिल के लिए अमन
दौलत के ढेर पर
सवारी करता शौहरत के शेर पर
अपने इर्द-गिर्द ढूँढता वफादार
अपने विश्वास का महल खडा करता
उन लोगों के सहारे
जिनका कोई नहीं होता आधार तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

जमीन से ऊपर अपने को देखता
अपनी असलियत से मुहँ फेरता
लाचार के लिए जिसके मन में दर्द नहीं
किसी को धोखा देने में कोई हर्ज नहीं
अपने काम के लिए किसी भी
राह पर चलने को तैयार होता है तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

11/18/2007

अपनी जरूरतें दायरों में ही रखें

अपने लिए कहीं आसरा
ढूढने से अच्छा है
हम ही लोगों के सहारा बन जाएं
किसी से प्यार मांगे
इससे अच्छा है कि
हम लोगों को अपना प्यार लुटाएं
किसी से कुछ पाने की ख्वाहिश
पालने से अच्छा है कि
हम लोगों के हमदर्द बन जाएं
जिन्दगी में सभी हसरतें पूरी नहीं होती
कुछ अपने ही हिस्से का सुख काम करते जाएं
आकाश की लंबाई से अधिक है
चाहतों के आकाश का पैमाना
सोचें दायरों से बाहर हमेशा
पर अपनी जरूरतें
दायरों में ही रखते जाएं
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10/30/2007

रास्ता

अपने घर से बाजार
बाजार से अपने घर
रास्ता चलता हूँ दिन भर
कभी सोचता हूँ इधर जाऊं
कभी सोचता हूँ उधर जाऊं
सोच नहीं पाटा जाऊं किधर
रास्ते पर जाते हुए चौपाये
और आकाश में उड़ते पंछी
कितनी बिफिक्री से तय करते हैं
अपनी-अपनी मंजिल
मैं अपनी फिक्र छिपाऊँ तो कहाँ और किधर
रास्ते में पढ़ने वाले मंदिर में
जब जाकर सर्वशक्तिमान की
मूर्ति पर शीश नवाता हूँ
तब कुछ देर चैन पाता हूँ
लगता है कोई साथ है मेरे
क्यों जाऊं किधर

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