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1/31/2008

अपने आपसे दूर हो जाता आदमी-साहित्य कविता

जीवन के उतार चढाव के साथ
चलता हुआ आदमी
कभी बेबस तो कभी दबंग हो जाता
सब कुछ जानने का भ्रम
उसमें जब जा जाता तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

दुख पहाड़ लगते
सुख लगता सिंहासन
खुली आँखों से देखता जीवन
मन की उथल-पुथल के साथ
उठता-बैठता
पर जीवन का सच समझ नहीं पाता
जब अपने से हटा लेता अपनी नजर तब
अपने आप से दूर हो जाता आदमी

मेलों में तलाशता अमन
सर्वशक्तिमान के द्वार पर
ढूँढता दिल के लिए अमन
दौलत के ढेर पर
सवारी करता शौहरत के शेर पर
अपने इर्द-गिर्द ढूँढता वफादार
अपने विश्वास का महल खडा करता
उन लोगों के सहारे
जिनका कोई नहीं होता आधार तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

जमीन से ऊपर अपने को देखता
अपनी असलियत से मुहँ फेरता
लाचार के लिए जिसके मन में दर्द नहीं
किसी को धोखा देने में कोई हर्ज नहीं
अपने काम के लिए किसी भी
राह पर चलने को तैयार होता है तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

12/31/2007

खजाना उसका दिल में है

जब भी अपनों से मन ऊब जाता
गैरों में अपनत्व ढूँढने आदमी चला जाता
अपनी ख्वाहिशों का बोझ उठाये है सभी
कोई आकर उतारे यही सोच चलता जाता
सच्चा प्यार ढूँढने सब निकलते
पर मतलब किसी के समझ में नहीं आता
आसामान से टपकती हैं उम्मीद
यही सोच ऊपर देखता चला जाता
जिन्दगी में खुशियों के लिए ढूँढता बहाने
ग़मों को बुलावा देकर आता
बाहर ढूंढें जिसको खजाना उसका दिल में है
इसे कोई-कोई शख्स ही जान पाता

12/21/2007

उसके नाम पर

उसके नाम पर चल रहा है
पूरी दुनिया का राज्य
पर उसे खबर नहीं
अरबों रुपये की मदद आती है
पर उसे मिलती नहीं
अस्पतालों में ढेर चिकित्सक
इलाज में जुटे हैं
दवाओं के नाम पर
लाखों के ढेर लुटे हैं
पर फिर भी
स्वास्थ्य उसे नसीब नहीं
अनेक लेखकों ने बेचा उसका दर्द
पढ़ने वाले बने हमदर्द
पर उसे किसी का साथ मिलता नहीं
गरीब अभी भी जूझता है
अपनी जिन्दगी से
भले ही उसके अहसास पर लगी
प्रदर्शनी में उसका फोटो
देखकर वाह-वाही होती है
पर उसके शख्सियत के दर्शन से
किसी को भी खुशी मिलती नहीं
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11/13/2007

तब तक जलती रहेगी यह आग

पेट भरते ही भले लोग
सिगडी की बुझा देते आग
पर जिनके मन में है
दौलत और शौहरत की आग
वह कभी नहीं बुझती
वह कभी शहर तो कभी ग्राम में
गली और मुहल्ले में भड़काते हैं आग

हर गरीब को खिलाते ख्याली पुलाव
ऐसे रास्ते का पता देते
जिसकी मंजिल कहीं नहीं
बस है इधर से उधर घुमाव
दिन में गाली देते अमीर को
रात को करते हैं जुडाव
चारों और से रंगे हैं
पर उजियाले में नहीं दिखता दाग

अनपढ़ को देते सपनों की किताब
कंगाल को समझाते अमीरी का हिसाब
अपनी ताकत के नशे में झूमते
किसी से नहीं मिलता मिजाज
बाद में बुझाने के लिए जूझते नजर आते
पहले लगाते आग
यह कभी यहाँ जलेगी
कभी वहाँ लगेगी
जब तक आम आदमी में नही जागेगी
चेतना और जागरूकता की आग
तब तक जलती रहेगी यह नफरत की आग

10/30/2007

रास्ता

अपने घर से बाजार
बाजार से अपने घर
रास्ता चलता हूँ दिन भर
कभी सोचता हूँ इधर जाऊं
कभी सोचता हूँ उधर जाऊं
सोच नहीं पाटा जाऊं किधर
रास्ते पर जाते हुए चौपाये
और आकाश में उड़ते पंछी
कितनी बिफिक्री से तय करते हैं
अपनी-अपनी मंजिल
मैं अपनी फिक्र छिपाऊँ तो कहाँ और किधर
रास्ते में पढ़ने वाले मंदिर में
जब जाकर सर्वशक्तिमान की
मूर्ति पर शीश नवाता हूँ
तब कुछ देर चैन पाता हूँ
लगता है कोई साथ है मेरे
क्यों जाऊं किधर

10/29/2007

तिजोरी भरी दिल है खाली-व्यंग्य कविता

बंद तिजोरियों को सोने और रुपयों की
चमक तो मिलती जा रही है
पर धरती की हरियाली
मिटती जा रही है
अंधेरी तिजोरी को चमकाते हुए
इंसान को अंधा बना दिया है
प्यार को व्यापार
और यारी को बेगार बना दिया है
हर रिश्ते की कीमत
पैसे में आंकी जा रही है
अंधे होकर पकडा है पत्थर
उसे हाथी बता रहे हैं
गरीब को बदनसीब और
और छोटे को अजीब बता रहे हैं
दौलत से ऐसी दोस्ती कर ली है की
इस बात की परवाह नहीं कि
इंसान के बीच दुश्मनी बढ़ती जा रही है

10/24/2007

दूसरों के अँधेरे ढूंढते लोग

कहीं खुश दिखने की
तो कहीं अपना मुहँ बनाकर
अपने को दुखी दिखाने की कोशिश करते लोग
अपने जीवन में हर पल
अभिनय करने का है सबको रोग
अपने पात्र का स्वयं ही सृजन करते
और उसकी राह पर चलते
सोचते हैं'जैसा में अपने को दिख रहा हूँ
वैसे ही देख रहे हैं मुझे लोग'

अपना दिल खुद ही बहलाते
अपने को धोखा देते लोग
कभी नहीं सोचते
'क्या जैसे दूसरे जैसे दिखना चाहते
वैसे ही हम उन्हें देखते हैं
वह जो हमसे छिपाते
हमारी नजर में नहीं आ जाता
फिर कैसे हमारा छिपाया हुआ
उनकी नजरों से बच पाता'
इस तरह खुद रौशनी से बचते
दूसरों के अँधेरे ढूंढते लोग
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10/23/2007

जहरीला शिकारी

सांप के पास जहर है
पर डसने किसी को खुद नहीं जाता
कुता काट सकता है
पर अकारण नहीं काटने आता
निरीह गाय नुकीले सींग होते
हुए भी खामोश सहती हैं अनाचार
किसी को अनजाने में लग जाये अलग बात
पर उसके मन में किसी को मरने का
विचार में नहीं आता
भूखा न हो तो शेर भी
कभी शिकार पर नहीं जाता
हर इंसान एक दूसरे को
सिखाता हैं इंसानियत का पाठ
भूल जाता हां जब खुद का वक्त आता
एक पल की रोटी अभी पेट मह होती है
दूसरी की जुगाड़ में लग जाता
पीछे से वार करते हुए इंसान
जहरीले शिकारी के भेष में होता है जब
किसी और जीव का नाम
उसके साथ शोभा नहीं पाता
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