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7/31/2015

कातिल कहला रहे फरिश्ते-हिन्दी कविता(qatil kahala rahe farishtey-hindi poem)


बेघरों की फिक्र के गीत
लोगों को सुनाते हुए
अपने महल उन्होंने बना लिये।

बेबस और बीमारों के
दर्द का इलाज की बात करते
अपने पेट सीने से आगे तना दिये।

कहें दीपक बापू ताकत से
कातिल कहला रहे फरिश्ते
पनाह मांगते थे जिन पहरेदारों से
दौलत और शोहरत के दम पर
वह गुलाम बना लिये।
------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh


वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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3/26/2015

खेल पैसे का-हिन्दी कविता(khel paise ka-hindi kavaita)



जीतने पर जश्न
मनाते हैं सभी
हारने पर किसी को
नहीं शर्म आती है।

कभी कभी जीतने से
ज्यादा इनाम हारने पर
मिल जाता है
इसलिये पिटने पर भी
जेब गर्म हो जाती है।

कहें दीपक बापू पैसे का खेल
अभी तक होता था
अब खेल भी पैसे का
हो गया है
जीतने पर उछलता है
दिल ऊंचे
हारने पर भी
सोच नर्म हो जाती है।
-------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश
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3/22/2015

कहने की आजादी से ज्यादा मजबूरी-हिन्दी कविता(kahane ki azadi se jayada mazboori-hindi poem)



हम कहें अपनी बात
जमाना मान लेगा
यह भ्रम पाला नहीं हैं।

जानते हैं सभी
सामानों की संगत
संकट लाती है
फिर भी किसी ने टाला नहीं है।

कहें दीपक बापू वाणी की सोच
उंगलियां  अंकित करती हैं
कहने की आजादी से ज्यादा
मजबूरी का शिकार हैं
पता है हमें
रौशनी  के लिये
बेबस चिराग को
कोई आग देने वाला नहीं है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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3/15/2015

शादी का आधुनिक गणित-लघु हिन्दी व्यंग्य(shadi ka adhunik ganit-short hindi satire article)



 

          15 और छह मिलकर 21 ही होंगे। अब अगर कोई कहे कि 17 होते हैं तो कहा जायेगा कि मजाक ही कर रहा है। हालांकि तब यह भी देखा जाना चाहिये कि मजाक कर रहा है या उसका गणित ही कमजोर है।  शादी का विषय मजाक नहीं होता।  एक समाचार यह है कि एक शिक्षित लड़की एक एक अशिक्षित के साथ विवाह के लिये सजाई गयी थी। वह तैयार नहीं थी क्योंकि उसे अपने भावी पति की अल्प बौद्धिक क्षमता के बारे में जानकारी मिल गयी थी। उसने अजमाने के लिये यह प्रश्न कर लिया कि 15 और 6 मिलकर कितने होते हैं तो दूल्हे ने 17 का आंकड़ा दिया।  लड़की ने तत्काल विवाह से इंकार कर दिया। उसने ठीक किया। इस कलियुग को हम दोष चाहे जितने दें पर सच यह है कि युवा नारियों या महिलाओं को लाज शर्म के बंधन से मुक्ति के लिये आधुनिक शिक्षा एक योगदान इसी युग में ही प्राप्त हुई है।
         
          हमारा देश ही नहीं वरन् पूरे विश्व में ही नारियों की भूमिका उनके परिवार के पुरुष सदस्यों के साथ ही वरिष्ठ नारी सदस्यों के विचारों के अनुसार तय होती रही है। यहां हम बता दें कि पुरुष ही नारी का शोषक है जैसी बातों पर हम यकीन नहीं करते। अनेक स्थानों  युवा नारियों के प्रति अधेड़ तथा वृद्ध महिलायें भी वैसे ही कड़वा रुख दिखाती है जैसा कि पुरुष-हालांकि बढ़ती शिक्षा के साथ इस तरह के कटु अनुभव कम होते जा रहे हैं।
          आज युवा नारियों के साथ एक नयी समस्या भी आ रही है।  समाज में कपंनी दैत्य के हाथ में पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था चली जा रही है और मध्यम तथा निम्न वर्ग के पुरुष  सदस्य अब गुलामी की जुगाड़ करने में लगे रहते हैं-इसे हम आजकल की नौकरी को पुरानी बंधुआ मजदूर का आधुनिक सभ्य रूप भी कह सकते हैं।  एक तरह से समाज आर्थिक अस्थिरता का ऐसा दौर है जिसमें पुरुषों पर आय अर्जित करने का जिम्मा प्राचीनकाल की तरह बना हुआ है।  लड़की पढ़े लिखे तो उसे अनेक परिवार इसलिये भी अवसर देते हैं कि आगे जाकर ससुराल में जाकर सुखी होगी पर लड़कों के बारे में सरकारी नौकरियों के अभाव के चलते यह धारणा भी बनती जा रही है पढ़ने लिखने से उनका उद्धार नहीं होगा इसलिये उन्हें बालपन समाप्त होते ही उन्हें धंधे या काम में लगा दिया जाता है।  कुछ परिवारों में तो लड़कियों को लड़कों से अधिक शिक्षा का अवसर मिल रहा है।
          यह अच्छा लग सकता है पर लड़कियों के लिये समस्या जस की तस है। अनेक जगह तो ऐसे जोड़े भी बन रहे है जिसमें लड़का आठवी पास निज व्यवसाय में है तो लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त हैं पर वह ग्रहस्थी में रहने वाली हैं।  मतलब यह कि युवा नारियां शिक्षा की सुविधा अधिक होने के बावजूद समझौते के लिये बाध्य होती हैं।  ऐसे में उस लड़की की प्रशंसा ही की जानी चाहिये जिसने समाज ही नहीं नारी कल्याण के लिये कार्यरत पेशेवर बुद्धिमानों को भी आईना दिखाया है।
दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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3/03/2015

अज्ञानी फंसते ज्ञानी हंसते-हिन्दी कविता(agyani fanste gyani hanste-hindi poem)



शब्दों के जाल में

अज्ञानी बहुत जल्दी

फंस जाते हैं।



ज्ञानी जानते सच

गंभीर बात का  भी

इसलिये हंस जाते हैं।



कहें दीपक बापू सहनशक्ति

अब नहीं ज़माने में,

सभी लगे पैसा पद और प्रतिष्ठा

जीजान से कमाने में,

कुछ कहो तो

उतारु हो जाते लड़ने

इसलिये हम मौन रहकर

अपने चिंत्तन गुफा में

धंस जाते हैं।
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2/08/2015

सपने पूरे होने की आस-हिन्दी कविता(sapane poore hone ki aas-hindi poem)



जब भी करते हैं
किसी इंसान से
दिल बहलाने की आस
बिखर ही जाती है।

सपने दिखाने का
बाज़ार तो सजता है
साकार करने वाली कोई चीज
वहां नज़र नहीं आती है।

कहें दीपक बापू यादों के झरने में
गुजरा बुरा दौर
कभी भूलते नहीं
अच्छी आस भी मिली
फिर कहीं खो जाती है।
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1/20/2015

नीयत में खाली खोखा है-हिन्दी कविता(neeyat mein khali khokha hai-hindi poem)



समाज सेवा का

व्यापार एकदम चोखा है।



हल्दी और फिटकरी का

भंडार दान में लेकर

बाज़ार में बेचें

घर का सामान जुटा लो

किसी को नहीं दिखता कोई धोखा है।



कहें दीपक बापू जन कल्याण पर

आकाश में बैठासर्वशक्तिमान

हमेशा लगा रहता है,

अपने दलालों के दावों को

हंसकर सहता है,

चमकदार है उनके चेहर,

लगे हैं उनके चारों और पहरे,

उनके खातों में जमा है सोना,

जनचेतना के लिये करते हैं

नाटक और टोटका टोना,

उनके इरादों पर यकीन न करना

नीयत में केवल खाली खोखा है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
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1/12/2015

विवेकानंद जयंती और सूर्य नमस्कार पर अभिनंदन-हिन्दी चिंत्तन लेख(vivekanan jayanti aur soorya namaskar par abhinandan-hindi thought article, suryna namasakar lekh)



            आज विवेकानंद जयंती पर मध्य प्रदेश के विद्यालयों में सूर्य नमस्कार का आयोजन किया गया है।  यह एक अच्छा प्रयास है। सूर्य नमस्कार योगासनों में पद्मासन, वज्रासन तथा सर्वांगासन की तरह देह, मन तथा विचारों में दृढ़ तत्व स्थापित करता है।  विधि के अनुसार करने पर सूर्य नमस्कार करने वाले साधक को स्वतः ही अपने अंदर तेज के संचालन का अनुभव होता है। हमारा मानना है कि इस तरह का आयोजन प्रतीकात्मक होने के साथ ही नियमित अभ्यास का विषय होना चाहिये। सूर्य नमस्कार से तन, मन और विचारों की व्याधियों से मुक्ति मिलती है।  व्याधियों से मुक्त व्यक्ति ही समाज में सम्मान प्राप्त कर सकता है।
            वैसे तो भारत में योग विद्या के जानकार कम नहीं है पर एक शिक्षक के रूप में अपने छात्र को पारंगत करने की कला सभी को नहीं आती।  अनेक पेशेवर तथा स्वयंसेवी योग शिक्षक हमारे देश में सक्रिय हैं। भारतीय योग संस्थान इस विषय में बिना प्रचार के काम करता है और उससे जुड़े निष्काम योग शिक्षक बिना किसी लाभ के लिये न केवल स्वयं अभ्यास करते हैं वरन् अपने शिविर में अन्य लोगों को अभ्यास कराने का भी आनंद लेते हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है
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युध्येताभृतमत्यर्थ तदात्वे कृतवेतन।
न व्याधितमकर्मण्यं व्याधितं परिभूयते।।
            हिन्दी में भावार्थ-युद्ध के समय वेतन देने से सेना उत्साह से युद्ध करती है।  जिनकी देह में व्याधियां है वह किसी कर्म के योग्य नहीं रहते।  व्याधि वाले मनुष्य का सम्मान भी नहीं होता।
            अनेक लोग शैक्षणिक संस्थानों में योग साधना के विषय का अभ्यास को धार्मिक नज़रिए से देखते हैं।  हमें उनसे बहस में नहीं उलझना वरन् देश में समाज को स्वास्थ्य, नैतिक, वैचारिक तथा ज्ञान की दृष्टि से गिरते स्तर से बचाने का प्रयास करना है। हम मनुष्य का भौतिक स्वरूप भले ही स्थिर देख रहे हैं पर आंतरिक दृढ़ता तथा मानसिक संवेदनाओं के अप्रकट भंडार की कमी बहुत अनुभव होने लगी है।  दैहिक व्याधियों का बढ़ता प्रकोप प्रकट है पर मानसिक कमजोरी नहीं दिख रही।  ऐसे में किसी से अन्य व्यक्ति के सम्मान की आशा करना व्यर्थ है उसे व्यक्ति से नहीं की जा सकती जिसके अंदर आत्मसम्मान का भाव ही नहीं है।  जीवन के प्रति आत्मविश्वास का अभाव सभी में दिख रहा है।
            हम जैसे नियमित योग तथा ज्ञान साधक अपने अनुभव के आधार पर योगाभ्यास को जीवन जीने की ऐसी कला मानते हैं जिसका अन्य कोई विकल्प नहीं है।  इसलिये यह अपेक्षा करते हैं कि मध्यप्रदेश के विद्यालयों मेें सूर्य नमस्कार के बाद भी छात्र घर पर इसका अभ्यास कर अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करेंगे। सभी को विवेकानंद जयंती तथा सूर्य नमस्कार के अभ्यास पर बधाई।


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1/02/2015

दिल टूटने का तमाशा-हिन्दी कविता(dil tootne ka tamasha-hindi poem)



शायरों ने उर्दू
कवियो ने हिन्दी में
दिल टूट जाने पर
बहुत गीत गाये।

किसी ने प्यार में पाई नाकामी,
 वफा के बाद भी छायी बदनामी,
वह निकालते शब्दों के आंसू
जिन्होंने मीत नहीं पाये।

 कहें दीपक बापू जिस्म की भूख
चाहे वह रोटी की हो या पैसे की
कभी बुझती नहीं है,
एक सामान से मन नहीं भरता,
एक तरह की रोटी पर
तन नहीं मरता,
ख्वाहिशों के लिये करते जंग,
दिल रहता हमेशा तंग,
अपना तमाशा खुद बने
सपने कभी जीत नहीं पाये।
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12/27/2014

बंधुआ बुद्धिजीवी-हिन्दी व्यंग्य कविता(parde kie peechhe malik-hindi satire poem)



 पत्थर भगवान नहीं होते
पूजे जायें तो
फलदायी हो भी जाते हैं।

चंचल होता मनुष्य मन
मनाना आसान नहीं
भगवान सच हो या भ्रम
डराया जाये तो
उसके उच्छ्रंखल घोड़े
सवारी के हाथ भी हो जाते हैं।

कहें दीपक बापू पर्दे के पीछे
मनोरंजन के चलचित्र बनाने वाले
नहीं समझते आस्था की शक्ति,
जिससे पैसा मिले
उसकी करने लगती भक्ति,
जहां से मिला माल
उसी मालिक के इशारों पर
 बंधुआ बुद्धिजीवी  हो जाते हैं।
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12/14/2014

योग साधक जान सकते हैं दूसरे के चित्त का हाल-हिन्दी चिंत्तन लेख(yoga sadhak jaan sakte hin chitta ka hal-yog sadhak jan sakte hain doosre chintta ka hal-hindi thought article based on patanjali yoga sahitya)



            अक्सर हम दूसरे लोगों के मन में चल रहे विचारों का अनुमान नहीं कर पाते।  अनेक लोगों की कथनी और करनी में इतना अंतर रहता है कि हमें पता चला जाता है कि उनसे किसी प्रकार की अपेक्षा करना व्यर्थ है मगर कुछ लोग बहुत चतुर होते हैं वह अपने भविष्य के कर्म का कोई आभास नहीं देते। ऐसे लोगों से हमें अक्सर व्यवहार में निराशा हाथ लगती है इनमें से अनेक ऐसे होते हैं जो हमसे नियमित संपर्क वाले नहीं होते पर किसी कार्य विशेष में सहयोग का आश्वासन देकर मुकर जाते हैं।  अक्सर हम लोगों की यह शिकायत सुनते हैं कि हमारे साथ दूसरे  धोखा करते हैं। अनेक लोग तो पूरे संसार के मनुष्यों पर विश्वास करने से कतराते हैं।
            पतंजलि योग सूत्र के आधार पर योग साधना करने वालों को इस समस्या से मुक्ति मिल सकती है।  इसके लिये यह आवश्यक है कि जब हम किसी दूसरे के मन का हाल जानना चाहते हैं तो पहले अपनी इंद्रियों को अतर्मुखी करें।  अपने मन की स्मृतियों की बजाय दूसरे के मन का स्मरण करें।  अनुभव करें कि आप उसकी जगह हैं।  ऐसे में आपकों उसके मन का ज्ञान हो जायेगा।   हम यह कर सकते हैं कि किसी विशेष काम का आग्रह किसी दूसरे व्यक्ति से करते हैं तो वह करेगा या नहीं इसका निर्णय यूं करें कि हम उसकी जगह होते तो करते या नहीं।  हमारे काम न करने पर उसकी कुछ ऐसी बाध्यतायें हो सकती हैं जिसका हमें उस समय आभास नहीं रहता जब हम अपना आग्रह उसके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। चित्त योग से यह सहजता से जाना जा सकता है कि वह आशा पूर्ण करेगा या निराशा प्रदान करेगा।

पतंजलि योग सूत्र में कहा गया है कि
-----------
चित्तान्तरदृश्ते बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च।।
            हिन्दी में भावार्थ-एक चित्त को दूसरे चित्त का दृश्य मान लेने पर वह चित्त फिर दूसरे चित्त का दृश्य होगा। इस प्रकार अनावस्था प्राप्त होगी। स्मृति का भी भी मिश्रण हो जायेगा।
            योग साधना कोई सीमित विषय नहीं है वरन् संपूर्ण जीवन में इसकी अनेक अवसरों पर आवश्यकता होती है।  खासतौर से जब सांसरिक विषयों में जितनी विविधता होती है उनमें सभी में प्रवीणता प्राप्त करना संभव नहीं है।  सभी सांसरिक विषयों का विस्तार मनुष्यों के पराक्रम से ही होता है जिसकी प्रकृत्तियां एक समान होती हैं। योग साधक जब विषय, कार्य और  कर्ता की प्रकृत्ति का ज्ञान प्राप्त कर लेता है तब वह अपने संपर्क केवल उन्हीं लोगों से करता है जिनकी प्रकृत्ति सात्विक और सहज होती है। 
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