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3/03/2015

अज्ञानी फंसते ज्ञानी हंसते-हिन्दी कविता(agyani fanste gyani hanste-hindi poem)



शब्दों के जाल में

अज्ञानी बहुत जल्दी

फंस जाते हैं।



ज्ञानी जानते सच

गंभीर बात का  भी

इसलिये हंस जाते हैं।



कहें दीपक बापू सहनशक्ति

अब नहीं ज़माने में,

सभी लगे पैसा पद और प्रतिष्ठा

जीजान से कमाने में,

कुछ कहो तो

उतारु हो जाते लड़ने

इसलिये हम मौन रहकर

अपने चिंत्तन गुफा में

धंस जाते हैं।
-----------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh


वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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2/08/2015

सपने पूरे होने की आस-हिन्दी कविता(sapane poore hone ki aas-hindi poem)



जब भी करते हैं
किसी इंसान से
दिल बहलाने की आस
बिखर ही जाती है।

सपने दिखाने का
बाज़ार तो सजता है
साकार करने वाली कोई चीज
वहां नज़र नहीं आती है।

कहें दीपक बापू यादों के झरने में
गुजरा बुरा दौर
कभी भूलते नहीं
अच्छी आस भी मिली
फिर कहीं खो जाती है।
-------------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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1/20/2015

नीयत में खाली खोखा है-हिन्दी कविता(neeyat mein khali khokha hai-hindi poem)



समाज सेवा का

व्यापार एकदम चोखा है।



हल्दी और फिटकरी का

भंडार दान में लेकर

बाज़ार में बेचें

घर का सामान जुटा लो

किसी को नहीं दिखता कोई धोखा है।



कहें दीपक बापू जन कल्याण पर

आकाश में बैठासर्वशक्तिमान

हमेशा लगा रहता है,

अपने दलालों के दावों को

हंसकर सहता है,

चमकदार है उनके चेहर,

लगे हैं उनके चारों और पहरे,

उनके खातों में जमा है सोना,

जनचेतना के लिये करते हैं

नाटक और टोटका टोना,

उनके इरादों पर यकीन न करना

नीयत में केवल खाली खोखा है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश
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1/12/2015

विवेकानंद जयंती और सूर्य नमस्कार पर अभिनंदन-हिन्दी चिंत्तन लेख(vivekanan jayanti aur soorya namaskar par abhinandan-hindi thought article, suryna namasakar lekh)



            आज विवेकानंद जयंती पर मध्य प्रदेश के विद्यालयों में सूर्य नमस्कार का आयोजन किया गया है।  यह एक अच्छा प्रयास है। सूर्य नमस्कार योगासनों में पद्मासन, वज्रासन तथा सर्वांगासन की तरह देह, मन तथा विचारों में दृढ़ तत्व स्थापित करता है।  विधि के अनुसार करने पर सूर्य नमस्कार करने वाले साधक को स्वतः ही अपने अंदर तेज के संचालन का अनुभव होता है। हमारा मानना है कि इस तरह का आयोजन प्रतीकात्मक होने के साथ ही नियमित अभ्यास का विषय होना चाहिये। सूर्य नमस्कार से तन, मन और विचारों की व्याधियों से मुक्ति मिलती है।  व्याधियों से मुक्त व्यक्ति ही समाज में सम्मान प्राप्त कर सकता है।
            वैसे तो भारत में योग विद्या के जानकार कम नहीं है पर एक शिक्षक के रूप में अपने छात्र को पारंगत करने की कला सभी को नहीं आती।  अनेक पेशेवर तथा स्वयंसेवी योग शिक्षक हमारे देश में सक्रिय हैं। भारतीय योग संस्थान इस विषय में बिना प्रचार के काम करता है और उससे जुड़े निष्काम योग शिक्षक बिना किसी लाभ के लिये न केवल स्वयं अभ्यास करते हैं वरन् अपने शिविर में अन्य लोगों को अभ्यास कराने का भी आनंद लेते हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है
-------------
युध्येताभृतमत्यर्थ तदात्वे कृतवेतन।
न व्याधितमकर्मण्यं व्याधितं परिभूयते।।
            हिन्दी में भावार्थ-युद्ध के समय वेतन देने से सेना उत्साह से युद्ध करती है।  जिनकी देह में व्याधियां है वह किसी कर्म के योग्य नहीं रहते।  व्याधि वाले मनुष्य का सम्मान भी नहीं होता।
            अनेक लोग शैक्षणिक संस्थानों में योग साधना के विषय का अभ्यास को धार्मिक नज़रिए से देखते हैं।  हमें उनसे बहस में नहीं उलझना वरन् देश में समाज को स्वास्थ्य, नैतिक, वैचारिक तथा ज्ञान की दृष्टि से गिरते स्तर से बचाने का प्रयास करना है। हम मनुष्य का भौतिक स्वरूप भले ही स्थिर देख रहे हैं पर आंतरिक दृढ़ता तथा मानसिक संवेदनाओं के अप्रकट भंडार की कमी बहुत अनुभव होने लगी है।  दैहिक व्याधियों का बढ़ता प्रकोप प्रकट है पर मानसिक कमजोरी नहीं दिख रही।  ऐसे में किसी से अन्य व्यक्ति के सम्मान की आशा करना व्यर्थ है उसे व्यक्ति से नहीं की जा सकती जिसके अंदर आत्मसम्मान का भाव ही नहीं है।  जीवन के प्रति आत्मविश्वास का अभाव सभी में दिख रहा है।
            हम जैसे नियमित योग तथा ज्ञान साधक अपने अनुभव के आधार पर योगाभ्यास को जीवन जीने की ऐसी कला मानते हैं जिसका अन्य कोई विकल्प नहीं है।  इसलिये यह अपेक्षा करते हैं कि मध्यप्रदेश के विद्यालयों मेें सूर्य नमस्कार के बाद भी छात्र घर पर इसका अभ्यास कर अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करेंगे। सभी को विवेकानंद जयंती तथा सूर्य नमस्कार के अभ्यास पर बधाई।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
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12/27/2014

बंधुआ बुद्धिजीवी-हिन्दी व्यंग्य कविता(parde kie peechhe malik-hindi satire poem)



 पत्थर भगवान नहीं होते
पूजे जायें तो
फलदायी हो भी जाते हैं।

चंचल होता मनुष्य मन
मनाना आसान नहीं
भगवान सच हो या भ्रम
डराया जाये तो
उसके उच्छ्रंखल घोड़े
सवारी के हाथ भी हो जाते हैं।

कहें दीपक बापू पर्दे के पीछे
मनोरंजन के चलचित्र बनाने वाले
नहीं समझते आस्था की शक्ति,
जिससे पैसा मिले
उसकी करने लगती भक्ति,
जहां से मिला माल
उसी मालिक के इशारों पर
 बंधुआ बुद्धिजीवी  हो जाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
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12/14/2014

योग साधक जान सकते हैं दूसरे के चित्त का हाल-हिन्दी चिंत्तन लेख(yoga sadhak jaan sakte hin chitta ka hal-yog sadhak jan sakte hain doosre chintta ka hal-hindi thought article based on patanjali yoga sahitya)



            अक्सर हम दूसरे लोगों के मन में चल रहे विचारों का अनुमान नहीं कर पाते।  अनेक लोगों की कथनी और करनी में इतना अंतर रहता है कि हमें पता चला जाता है कि उनसे किसी प्रकार की अपेक्षा करना व्यर्थ है मगर कुछ लोग बहुत चतुर होते हैं वह अपने भविष्य के कर्म का कोई आभास नहीं देते। ऐसे लोगों से हमें अक्सर व्यवहार में निराशा हाथ लगती है इनमें से अनेक ऐसे होते हैं जो हमसे नियमित संपर्क वाले नहीं होते पर किसी कार्य विशेष में सहयोग का आश्वासन देकर मुकर जाते हैं।  अक्सर हम लोगों की यह शिकायत सुनते हैं कि हमारे साथ दूसरे  धोखा करते हैं। अनेक लोग तो पूरे संसार के मनुष्यों पर विश्वास करने से कतराते हैं।
            पतंजलि योग सूत्र के आधार पर योग साधना करने वालों को इस समस्या से मुक्ति मिल सकती है।  इसके लिये यह आवश्यक है कि जब हम किसी दूसरे के मन का हाल जानना चाहते हैं तो पहले अपनी इंद्रियों को अतर्मुखी करें।  अपने मन की स्मृतियों की बजाय दूसरे के मन का स्मरण करें।  अनुभव करें कि आप उसकी जगह हैं।  ऐसे में आपकों उसके मन का ज्ञान हो जायेगा।   हम यह कर सकते हैं कि किसी विशेष काम का आग्रह किसी दूसरे व्यक्ति से करते हैं तो वह करेगा या नहीं इसका निर्णय यूं करें कि हम उसकी जगह होते तो करते या नहीं।  हमारे काम न करने पर उसकी कुछ ऐसी बाध्यतायें हो सकती हैं जिसका हमें उस समय आभास नहीं रहता जब हम अपना आग्रह उसके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। चित्त योग से यह सहजता से जाना जा सकता है कि वह आशा पूर्ण करेगा या निराशा प्रदान करेगा।

पतंजलि योग सूत्र में कहा गया है कि
-----------
चित्तान्तरदृश्ते बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च।।
            हिन्दी में भावार्थ-एक चित्त को दूसरे चित्त का दृश्य मान लेने पर वह चित्त फिर दूसरे चित्त का दृश्य होगा। इस प्रकार अनावस्था प्राप्त होगी। स्मृति का भी भी मिश्रण हो जायेगा।
            योग साधना कोई सीमित विषय नहीं है वरन् संपूर्ण जीवन में इसकी अनेक अवसरों पर आवश्यकता होती है।  खासतौर से जब सांसरिक विषयों में जितनी विविधता होती है उनमें सभी में प्रवीणता प्राप्त करना संभव नहीं है।  सभी सांसरिक विषयों का विस्तार मनुष्यों के पराक्रम से ही होता है जिसकी प्रकृत्तियां एक समान होती हैं। योग साधक जब विषय, कार्य और  कर्ता की प्रकृत्ति का ज्ञान प्राप्त कर लेता है तब वह अपने संपर्क केवल उन्हीं लोगों से करता है जिनकी प्रकृत्ति सात्विक और सहज होती है। 
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12/07/2014

कन्या भ्रुण हत्या और उदारीकरण से बढ़े नारी जाति पर अपराध-हिन्दी चिंत्तन लेख(kanya bhrun hatya aur udarikaran se badhe nari jati par apradh-hindi thought article)



            दिल्ली में हुई एक बलात्कार की घटना पर टीवी चैनलों पर बहस हो रही है। ऐसी बहस दो वर्ष पूर्व भी हो चुकी है। बलात्कार दिल्ली में हुआ बहस पूरे देश के लिये हो रही है। प्रचार माध्यमों के लिये सनसनीखेज समाचार और उन पर आयोजित बहसें विज्ञापन का समय पास करने का अवसर प्रदान करती हैं। हमें इस पर आपत्ति भी नहीं है पर इन बहसों में जिन कथित प्रतिष्ठित विद्वानों को बुलाया जाता है उससे तो यह लगता है कि वह अपनी उपस्थिति के लिये जरूर शुल्क लेते होंगे इसलिये ही चैनल से निर्धारित  विद्वत सीमासे आगे वह जाते नहीं है या जाना नहीं चाहते। यह चैनल वाले इतना पैसा कमाते हैं पर उनके दिल्ली और मुंबई के बाहर विद्वान मिलते ही नहीं है-शायद उनको बुलाने पर अधिक व्यय की आशंका रहती होगी।
            बहरहाल बलात्कार की घटनायें रोकने पर तमाम तरह के जो बेकार तर्क दिये जाते हैं उन पर हैरानी ही हो सकती है। वह इस प्रकार हैं।
            लड़कियां कम कपड़े पहनती हैं, नशा करती हैं, लड़कों के साथ घूमती हैं इसलिये उनके साथ ऐसी घटनायें होती हैं।
            देश के पुरुषों की मानसिकता खराब है। आज भी स्त्री को दोयम दर्जे की माना जाता है। आदि आदि।
            मूल तत्व की तलाश कोई  नहीं कर रहा है।  हम बताते हैं कि इस तरह की घटनाओं के पीछे समाज की अस्थिरता और अन्मयस्कता इसका कारण है जो कथित उदारीकरण तथा पाश्चात्य सांस्कारिक प्रेम के कारण फैली है।  उदारीकरण की वजह से कंपनी दैत्य ने विराट रूप ले लिया है जिसमें मानवीय तत्वों का अभाव होता है। पचास हजार रुपये महीने कमाने वाले  छोटे व्यवसायी से अधिक सम्मान चालीस हजार रुपये कमाने वाले नौकरीशुदा को मिलता है।  पहले तो सरकारी नौकरियां अधिक थी अब तो निजीकरण ने वह खत्म कर दी हैं।  निजी क्षेत्र में पुरुष और नारी दोनों का शोषण होता है। अनाचार का सामना भी दोनों करते हैं।  नारियों के शोषण में असामाजिकता का तत्व भी शामिल होने की संभावना रहती है। हमने अमेरिकी पद्धति के  आधार पर निजीकरण को खुली छूटी दी पर कंपनी दैत्य पर नियंत्रण करने के नियम नहीं बनाये।  निर्माता की पूंजी पर मर मिटने की ऐसी मानसिकता कि उपभोक्ता की रक्षा का कोई संकल्प नहीं लिया।  एक लड़की के साथ विदेशी टैक्सी कंपनी का चालक बलात्कार कर  भाग जाता है पर उसका पता कहीं नहीं मिलता।  यही कंपनी अमेरिका में ऐसा नहीं कर सकती कि चालक का पता ही नहीं रखे।  अमेरिका में ठगी, धोखाधड़ी और व्यवसायिक वायदा खिलाफी पर सजा होती है पर भारत में काम करने वाली विदेश कंपनी तो दैवीय शक्ति से संपन्न हो गयी लगती हैं।
            आखिरी बात कन्या भ्रुण हत्या के परिणाम इसी तरह सामने आने हैं।  हमने इस बारे में अंतर्जाल पर अनेक लेख लिखे हैं और यह नारी के प्रति अपराधों की आशंका अनेक सामाजिक विशेषज्ञों ने आज से दस वर्ष पहले ही जता दी थी।  हमारा तो यह मानना है कि आज भी कन्या भ्रुण हत्या शूंन्य हो जाये तो भी अगले दस वर्ष तक पुराने पापों का परिणाम नारियों के प्रति अनाचार के भयावह दृश्य सामने आते देखने ही होंगे। इस देश में पिछले तीस सालों से कन्या भ्रुण हत्या का जो क्रम चला तो वह अभी थमा नहीं है। मध्यवर्गीय समाज आज लिंगानुपात के असंतुलन का सामना जिस तरह कर रहा है उसका आंकलन किसी ने नहीं किया। कन्या भ्रुण हत्या को सामान्य तथा  उदारीकरण के चलते कंपनी दैत्य को देवता मानने का ही यह नतीजा है कि ऐसी घटनायें हो रही हैं।  हमें तो इस बात की चिंता है कि आगे स्थितियां अधिक बिगड़ सकती हैं। हमारे यहां एक बार फिर कानून बनाने की बात भी चल रही है पर हमारा मानना है कि समस्या यह है कि व्यवस्था में किन्हीं कारणों से भी पहले से ही निर्धारित सजा नहीं हो पाती  या देर से होती है जिससे अपराधियों में भय समाप्त हो गया है।


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11/30/2014

गरीब के लिये घास का प्रसाद-हिन्दी कविता(garib ke liye ghas ka prasad-hindi poem)



गरीबों का देश

भारत को जरूर कहते

फिर भी अमीरों का

स्वर्ग यहीं पाया जाता है।



कोयले के भंडार

जमीन में बसे हैं

फिर भी उसका सौदागर

सोने में नहाया जाता है।



सड़कें एक माह में

दम तोड़ देती है

फिर भी उनका पालनहार

अपने कदम दौलत के पहाड़ पर

बढ़ाया जाता है।



कहें दीपक बापू सोने की चिड़िया

करती है अब भी हर डाल पर बसेरा,

दूध की नदी आती होते ही सवेरा,

यह अलग बात है

शिकारियों ने कर लिया

पूरे जंगल पर नियंत्रण

फल के जुटा लेते भंडार

उनके हाथ से कभी कभी

गरीब  देवता पर घास का

प्रसाद चढ़ाया जाता है।
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11/11/2014

समाज में एकता पर शोर-हिन्दी व्यंग्य कविता(samaj mein ekta par shor-hindi vyangya kavita)



रोटी कपड़े और मकान की
ढेर सारी सुविधाओं के भोग से
बहुत लोग ऊबे हैं।

मन बहलाने के लिये
पिछड़े  समाज के सुधार की
चिंता में शिखर पुरुष डूबे हैं।

कहें दीपक बापू एकता की बात
कहते हुए शोर मचाते हैं
मगर अपनी ज़मीन
बचाने के लिये
जाति भाषा और धर्म के नाम पर
उनके पास अपने अपने सूबे हैं।
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10/15/2014

अमृतसर यात्रा से सुखानुभूति से वापसी-हिन्दी चिंत्तन लेख(return from amritsir-hindi thought article)



    
            आज हमारी अमृतसर से वापसी हुई।  अभी तक हमने जो भी पर्यटन, धर्म तथा अन्य भाव से यात्रायें की उनमें सबसे सुखानुभूति देने वाली थी।  इसका मुख्य कारण यह है कि बचपन से ही धर्म भीरु होने के कारण कहीं न कहीं हमारे अंदर एक ऐसा अध्यात्मिक भाव था जिसे ऐसी यात्रा में जाना ही था।  इस पर भगवान विष्णु की उपासना तथा गुरुनानक देव के प्रति आस्था का संयुक्त भाव ऐसा रहा कि कभी उसमें विरोधाभास नहीं था।  कभी ऐसा भी नहीं लगा कि दो अलग छवियां हमारा आदर्श हैं। जिंदगी के हर दौर में यह लगा कि कोई ऐसी शक्ति है जो हमें सहारा दे रही है।  कालांतर में योग तथा गीता में रुचि होने के बावजूद भी अपने बचपन के भाव कभी विलोपित नहीं हुए।  एक लेखक से चिंत्तक या दार्शनिक बन जाने पर निरंतर अभ्यास और अनुभव से यह निष्कर्ष निकाला कि अगर धर्म या अध्यात्म के प्रति बचपन से रुचि जाग्रत नहीं हुई तो बड़ी उम्र हो जाने पर भक्ति तथा ज्ञान दोनों से ही संपर्क रखना संभव नहीं है। दूसरी बात यह कि कुछ लोग भक्ति आदि में रुचि नहीं लेते यह कहते हुए कि हम तो व्यवहार में ही शुद्धता बरतते हैं इसलिये उसकी कोई जरूरत नहीं है पर सच यह है कि सांसरिक विषयों में निरंतरता से वह उकता ही जाते हैं। भगवान के प्रति भक्ति भाव न हो तो उन्हें अध्यात्मिक ज्ञान तो होना ही चाहिये। हां, यह भी सच है कि धर्म के अनुसार व्यवहार करना और अध्यात्मिक का ज्ञान होना तो अलग अलग विषय हैं।  एक मुश्किल जरूर है कि भक्ति के बिना तत्वज्ञान के प्रति झुकाव हो ही नहीं सकता। इसके लिये कोई दैहिक गुरु या होना चाहिये या फिर पवित्र गं्रथों को ही गुरु मान लेना चाहिये।
            बहरहाल अमृतसर का मंदिर बचपन से हमारे दिल में बसा था।  गुरुनानक देव जी के प्रति हमारे मन में आत्मिक श्रद्धा है पर अभी जाना अभी तक भाग्य में नहीं बंधा था।  बुलावा आया तो चल दिये। स्वर्णमंदिर में इतने सारे लोगों की श्रद्धामय उपस्थिति के बीच भजन और गुरुवाणी का स्वर हृदय में ऐसा भाव पैदा करता है जिसका वर्णन करना संभव ही नहीं है।  मस्तिष्क में आये शब्द स्वर  किसी भी गति से बाहर आ सकते हैं पर हृदय के भाव अंदर से अंदर ही जाकर ऐसा आंनद देते हैं जिसको शब्द रूप देना सहज नहीं होता।  इस पर यात्रा पर आगे भी लिखेंगे। सत् श्री अकाल! वाहि गुरु की फतह! जय श्री कृष्ण जय श्री राम!
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