साहित्य, आध्यात्म और सामाजिक विषयों पर लिखने का मेरा एक प्रयास - दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
9/02/2007
क्रिकेट में कमा कौन नहीं रहा है?
मैं तो यह जानना चाहता हूं कि पैसे कौन नहीं चाह्ता है, यहां त्यागी कौन है।अगर कपिल देव ने अपनी संस्था पैसे कमाने के लिये बनाई है तो उसमें बुराई क्या है? और क्या कपिल देव ही केवल पैसा कमाएंगे? उनके साथ क्या जो लोग होंगे वह पैसे नहीं कमाएंगे? शायद बिंद्रा साह्ब को पता नहीं कि कई प्रतिभाशाली क्रिकेट खिलाडी धनाभाव के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। वह कह रहे हैं कि कपिल देव देश में क्रिकेट के विकास का बहाना कर रहे हैं। वैसे देखा जाये तो देश में क्रिकेट ने जो ऊंचाई प्राप्त की है उसका पूरा श्रेय कपिल देव को ही जाता है। अगर १९८३ में अगर वह विश्व कप जीतने में अपना योगदान नहीं देते तो शायद इस देश में यह खेल लोकप्रिय भी नहीं होता। उसके बाद ही भारत में ऐकदिवसीय लोकप्रिय हुआ और उससे साथ ही जो खिलाडी उसमे ज्यादा सफ़ल बने उनहें हीरो का दर्जा मिला और साथ में मिले ढेर सारे विज्ञापन और पैसा और समाज में फ़िल्मी हीरो जैसा सम्मान। यही कारण है कि उसके बाद जो भी नवयुवक इस खेल की तरफ़ आकर्षित हुए वह इसलिये कि उनहें इसमें अपना चमकदार भविष्य दिखा। ऐक मजेदार बात यह है कि क्रिकेट का आकर्षण जैसे ही बढता गया वैसे ही फ़िल्मों में काम करने के लिये घर से भागने वाले लोगों की संख्या कम होती गयी क्योंकि क्रिकेट में भी उतना गलैमर आ गया जितना फ़िल्मों में था।ऐसा केवल इसमें खिलाडियों को मिलने वाले पैसे के कारण हुआ। अब यह पूरी तरह ऐक व्यवसाय बन चुका है।
अगर कोई कहता है कि हम क्रिकेट के साथ नियमित रूप से सत्संग के कारण ही जुडे हैं तो सरासर झूठ बोल रहा है-चाहे वह खिलाडी हो या किसी संस्था का पदाधिकारी। फ़र्क केवल इतना होता है कि कुछ लोग अपने कमाने के साथ इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि दूसरे को भी कमाने का अवसर दिया जाये और अपने व्यवसाय में नैतिक सिद्धांतों का भी पालन किया जाये और कुछ लोग ऐसे होते हैं कि उनका उद्देश्य केवल अपने लिये माया जुटाना होता है और किसी नैतिक नियम को मानने की बात तो वह सोचते भी नहीं। समाज में ऐसे ही लोगों के संख्या ज्यादा है।जिस तरह पिछ्ले कई वर्षौं से भारतीय क्रिकेट टीम का चयन हुआ है उससे नवयुवक खिलाडियों में यह बात घर कर गयी है कि उसमें उनको आसानी से जगह नहीं मिल सकती।
इंग्लैंड गयी टीम का खेल देखकर तो यह साफ़ लगता है कि कई खिलाडी उसमें अपनी जगह व्यवसायिक कारणौं से बनाये हुये है। मैं हमेशा कहता हूं कि अगर किसी क्रिकेट खिलाडी कि फ़िटनेस देखनी है तो उससे क्षेत्ररक्षण और विकेटों के बीच दौड में देखना चाहिये। जहां तक बोलिंग और बैटिंग का सवाल है तो आपने देखा होगा कि कई जगह बडी उमर के लोग भी शौक और दिखावे के लिये मैचों का आयोजन करते हैं और उसमें बोलिंग और बैटिंग आसानी से कर लेते हैं पर फ़ील्डिंग और रन लेते समय उनकी दौड पर लोग हंसते है। आप मेरी इस बात पर हंसेंगे पर मेरा कहना यह है कि हमारे इस विशाल देश में लाखों युवक क्रिकेट खेल रहे हैं और रणजी ट्राफ़ी तथा अन्य राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेल रहे हैं ऐसा संभव नहीं है कि उनमें कोई प्रतिभा नहीं है पर उनको मौका नहीं दिया जा रहा है। इंग्लैंड गयी टीम क्षेत्ररक्षण और रन लेने में बहुत कमजोर सबित हुई है जो कि १९८३ के विश्व कप में भारत की जीत के सबसे मजबूत पक्ष थे।
देश में युवा बल्लेबाज और गेंदबाजों की कमी नहीं है और क्षेत्ररक्षण और रन लेने की शक्ति और हौंसला युवा खिलाडियों में ही संभव है। अगर साफ़ कहूं तो अच्छी गेंदबाजी और बल्लेबाजी तो कोयी भी युवा क्रिकेट खिलाडी कर लेगा पर तेजी से रन लेना और दूसरे के शाट मारने पर उस गेंद के पीछे दौडना हर किसी के बूते का नहीं है।भारत में प्रतिभाशाली खिलाडियों की कमी नही है पर क्रिकेट के व्यवसाय से जुडे लोग केवल यही चाह्ते हैं कि वह सब उनके घर आकर प्रतिभा दिखायें तभी उन पर कृपा दृष्टि दिखायें।
कपिल देव कमायेंगे इसमें कोयी शक नही है पर मेरी जो इच्छा है कि वह देश के युवाओं में ही नये हीरो ढूंढें। शायद वह यही करने वाले भी हैं। अगर वह इन्हीं पुराने खिलाडियों में अपने लिये नयी टीम का सपना देख रहे हैं तो शायद उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी-क्योंकि अत: यह क्रिकेट ऐक शो बिजिनेस बन चुका है उसमें अब नए चेहरे ही लोगों में अपनी छबि बना सकते हैं।। मेरा तो सीधा कहना है कि कपिल देव न केवल खुद कमायें बल्कि छोटे शहरों और आर्थिक दृष्टि से गरीब परिवारों के प्रतिभाशाली युवा खिलाडियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चमका दें तो वह स्वयं भी सुपर हीरो कहलायेंगे-हीरो तो वह अब भी हैं क्योंकि १९८३ के बाद से भारत ने क्रिकेट में कोई विश्व कप नही जीता है। मैं कोई कपिल देव से कोई धर्मादा खाता खोलने की अपेक्षा नहीं कर रहा हूं क्योंकि क्रिकेट कोई दान पर चलने वाला खेल अब रहा भी नहीं है। विशेष रूप से कंपनियों के विज्ञापनों से होने वाले आय पर चलने वाले खेल में कम से कम इतनी व्यवसायिक भावना तो दिखानी चाहिये के खेलो, जीतो और कमाओ, न कि क्योंकि कमा रहे हो इसलिये खेलते रहो, टीम में बने रहो। यह ऐक गैर व्यवसायिक रवैया है यही कारण है कि दुनियां की किसी भी टीम से ज्यादा कमाने खिलाडी मैदान में फ़िसड्डी साबित हो रहे हैं। दुनियां में किसी भी देश में कोई भी ऐसी टीम खिलाडी बता दीजिये जो ज्यादा कमाते हैं और हारते भी हैं। मतलब साफ है कि क्रिकेट में कहीं भी किसी ने धर्मादा खाता नहीं खोल रखा है और यह संभव भी नहीं है। अत: कपिल देव को ऐसे आरोपों की परवाह भी नहीं करना चाहिऐ।
7/22/2007
यकीन और हिम्मत से डटे रहो
7/16/2007
नारद का मोह न छोड़ें, पर दूसरी चौपालों पर भी जाएँ
7/15/2007
आख़िर चीन ने जनसंख्या नीति बदली!
चीनी रिश्तों के नाम तक भूलने लगे थे
बहुत समय पहले मैं एक पत्रिका में पढा था कि चीन लोग तो अपनी पुरानी पहचान खोते जा रहे हैं और वहां कई लडकिया ऎसी हैं जो भाई का मतलब भी नही जानती तो कई ऐसे लड़के भी हैं जो बहिन का मतलब भी नहीं जानते। ताऊ-ताई, चाचा-चाची,मामा-मामी, फूफा-फूफी और अन्य रिश्तों का नाम तक भूल चुके हैं। दुनिया भर के गरीबों और मजदूरों को अमीर बनाने के नाम पर वहाँ सांस्कृतिक क्रान्ति करने वाले लोगों ने वहाँ की पुरानी संस्कृति को नष्ट कर ही कर डाला-जो कि भारतीय
फिर शुरू हुआ चीन में एक ऐसा दौर कि वहाँ लिखने-पढने की आजादी मांगने वाले को सरेआम मार दिया गया या जेल में सड़ा दिया गया। एक अमेरिकी विशेषज्ञ का कहना है कि चीन एक बंद गुफा की तरह है वहां क्या है कोई नहीं कह सकता-क्योंकि क्षेत्रफल की दृष्टि से अति विशाल चीन में केवल कुछ ही भागों में विदेशियों को जाने के अनुमति है, और सरकार की व्यवस्था ऎसी है कि आप आम आदमी से मिल नहीं पायेंगे और मिलेंगे तो वह इतना सहमा रहता है कि वह अपनी सरकार की भाषा ही बोलता है। इतना ही नहीं बल्कि चीन से बाहर भी आये चीनी अपनी बात कहने से कतराते हैं-क्योंकि उनमें कहीं न कहीं अकेलेपन का बोध होता है जो शायद वहाँ की जनसँख्या नीति का परिणाम भी हो सकता है।
चीन के आर्थिक विकास पर भी कई लोग उंगली उठाते हैं-उनका कहना है कि वहाँ के जो भी आंकडे हैं वह सरकारी है और उनकी प्रमाणिकता संदिग्ध है। सामजिक विशेषज्ञ भी उसकी इस बात को चुनौती देते हैं कि वहां कोई जातिवाद नहीं बचा है-कुछ का कहना है इस तानाशाही में कुछ खास समुदायों के लोगों को अपना वर्चस्व जमाने का अवसर मिल गया और वहां अब भी कहीं कहीं जातीय तनाव की स्थिति बन जाती है। एक बात पर सभी एकमत है कि एक बच्चे की जनसँख्या की नीति ने वहाँ के समाज को खोखला किया ! वजह साफ है कि व्यक्ति से परिवार, परिवार से रिश्तेदार और और रिश्तेदार से समाज के जो बनने का क्रम है उसमे रिश्तेदार की कडी कमजोर हो गयी थी और एशियाई देशों में सबसे सशक्त समाजों वाला चीन अपनी पहचान खो बैठा।
शायद चीन की नयी पीढ़ी में बगावत के कोई ऐसे तत्व मौजूद हैं जिसे अलग दिशा में मोड़ने के यह कदम उठाया गया या वाकई चीन के लोगों की मनोदशा में अपने समाज के कमजोर पड़ने की कोई असहनीय पीडा है जिसे दूर करने के लिए यह कदम उठाया गया है यह तो अलग से अध्ययन का विषय है जो पूरी जानकारी मिलने पर ही चर्चा योग्य होगा। यकीन मानिए जबरन जनसँख्या रोकने के दुष्परिणाम उससे ज्यादा बुरे हुए होंगे जितना लोग अनुमान करते हैं वरना वहाँ की सरकार जो नागरिकों की स्वतन्त्रता के अधिकार की विरोधी है कभी इतना बड़ा निर्णय नहीं लेती।
7/11/2007
ब्लोग को लिंक करें पर नाम भी तो दें
मैं यहां निज-पत्रकों (ब्लोग )को संबद्ध (लिंक) करने के मामले में कुछ ऎसी मर्यादाओं का पालन करना चाहता हूँ जो कि एक लेखक के लिए होना चाहिए। मैंने देखा है लेखक दुसरे के ब्लोग को लिंक तो कर रहे हैं पर उसका केवल शीर्षक भर ही लेते हैं-ऐसे में अगर पाठक उस शीर्षक पर क्लिक न करे तो उस पता ही न लगे कि वह किस लेखक या ब्लोग से संबद्ध है- ऐसे में लिंक करने वाले को ही कमेन्ट देकर ही वह अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। अगर लिंक करने वाले ब्लोग पर लगे कमेन्ट को देखे और संबद्ध (लिंकित) ब्लोग के वियुज की संख्या देखे तो कहीं तारतम्य नहीं बैठता और कभी तो ब्लोग पर लगे कमेन्ट से ही पता लगता है उस लेखक का भी ब्लोग वहां है। ऐसा भी हुआ है कि मैं उस ब्लोग से एक बार लॉट आया और फिर देखने गया तो पता लगा कि वहां अपना परचम भी फहरा रहा है।
इसे शिकायत नहीं समझना क्योंकि यहां हम सब साथी हैं और कई बातें हमारे मन में आती हैं और कहने के लिए समय नहीं होता और जब कहने का समय होता है तो ध्यान नहीं रहता। मैं पत्रकार जगत में भी रह चूका हूँ और कई बार दूसरी जगह से सामग्री उठाकर प्रकाशित करने का प्रचलन है "साभार" के साथ। क्या ब्लोग को लिंक करने वाले ब्लोग का नाम नहीं डाल सकते-चिट्ठा चर्चा में मैंने ब्लोग के साथ अपने ब्लोग के नाम को भी प्रयोग करते देखा है।पिछले दिनों मेरा माउस खराब था और मैंने अपने नारद पर अपन्जीकृत ब्लोग को पंजीकृत ब्लोग से लिंक कर काम चलाया था-इसमें परेशानी नहीं होना चाहिए।
मुझे लिंक करने वाले मेरे मित्र हैं पर यह एक सामूहिक चर्चा का विषय है-यह निजी विषय होता तो में ईमेल के जरिये भी अपनी बात कह सकता था पर यहाँ तो सब एक दुसरे के मित्र है और हो सकता है किसी के मन में यह बात हो कह नहीं पा रहा हो। फिर सार्वजनिक रुप से चर्चा में मनमुटाव की गुंजाइश नहीं होती।एक बात और हो सकता है कि उस ब्लोग पर कोई ऐसे पाठक भी आते हौं जो किसी ब्लोग को पढना पसन्द करते हैं और शीर्षक को- जो रचना की पहचान होता है,लेखक या ब्लोग की नहीं - और उसे देखकर वापस लॉट जाते हौं। आपके ब्लोग पर लिंकित ब्लोग का लेखक भले भी आपका मित्र हो और वह ऐसा नहीं समझे पर पाठक यह सोच सकता है कि आप एक चालाक रचनाकार है।
नाम की भूख सब में होती है और आप अपने मित्रों को अपने ब्लोग पर प्रदान करें तो क्या हर्ज है? और किसी में न हो मुझमें तो है। साहित्य से मुझे कोई नामा नहीं मिला और जो लिखा है नाम के लिए ही तो लिखा है। रोटी की भूख के इलाज के लिए तो गोली बन गयी है पर नाम की भूख के इलाज के लिए तो कोई गोली ही नहीं बन सकती। और फिर जो लोग लिंकित कर रहे हैं तो उन्हें भी तो इसी तरह की भूख लगती है तभी तो लिंक कर रहे है। खैर यह तो थी मजाक की बात!
मैं यह लेखक की तरह नहीं बल्कि एक पाठक की तरह कह रहा हूँ मुझे पता नहीं क्यों ऐसे ब्लोग बिना कोट के हैंगर की तरह लटके लगते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि किसी ऐसे दरजी की दुकान में पहुंच गये हैं जिसके यहाँ खाली हैंगर लटके पडे हैं और इसके पास कोई काम ही नहीं है। मैंने पत्रकार के रुप में कई जगह से सामग्री ली थी नाम और धन्यवाद सहित।
मैंने अपनी बात कह दीं - इस बात को अन्यथा न ले। अकेले मेरे ब्लोग लिंक नहीं होते , हाँ मेरे मन में विचार आया तो कह दिया। फिर लोग कहते हैं कि लिंक करने से लोगों में सदभाव बढेगा पर रचना के शीर्षक आपके मित्र की पहचान नहीं हो सकते जबकि उसके ब्लोग या उसका नाम ही उसके व्यक्तित्व का प्रतीक होता है। मेरा विचार पसंद नहीं हो तो भी आप लोग मेरे ब्लोग मेरे नाम के बिना भी लिंक कर सकते हैं। इस विषय पर मेरा आग्रह बस इतना है कि चर्चा चाहे कर लें पर विवाद नहीं खड़ा करना-अगर पसन्द आये तो कुछ तारीफ तो कर ही देना ताकि हमें भी लगे कि हम भी अच्छा सोच लेते हैं।
एक प्रयोग में यहाँ कर लेता हूँ
आईने में बदहवास दीपक बापू
(दीपक बापू कहिन् से साभार )
कहें दीपक बापू हम फ्लॉप रहने के लिए भी तैयार
(दीपक बापू कहिन् से साभार )
नए और फ्लॉप लेखक हिट्स से विचलित न हौं
(दीपक बापू कहिन् से साभार )
7/08/2007
लेखक की रचना का समाज से सरोकार होना चाहिऐ
ऐसे में नये लेखकों के लिए जगह तभी बच पाती है कि जब वह नये संदर्भों को बेहतर ढंग से उपयोग करे। शायद यही कारण है कि कुछ लेखक विदेशी लेखको और रचनाकारों को देश में स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि लोग उनसे अपने पुराने ग्रंधों की चर्चा न करें। जॉर्ज बर्नाड शा, शेक्सपियर, कार्ल मार्क्स, लेनिन और चर्चिल के बयां यहां सुनाये जाते हैं जबकि हमारे देश के धर्म ग्रंथों में जीवन की जो सच्चाईयां वर्णित हैं वह ज्यादा प्रमाणिक हैं कम से कम इस देश की भौगोलिक, मौसम और सामाजिक परिवेश को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है । मैंने टालस्ताय, चेखोव , जार्ज बर्नाड शा और शेक्सपियर को पढा है और उनकी रचनाएं अच्छी भी हैं पर मैं उन्हें अपने देश के संदर्भ नहीं देख पाता हूँ क्योंकि कितना भी कह लें हमारा भारतीय समाज की हालत और मूल स्वभाव बाहर के देशों से अलग है।
भारत को विश्व का आध्यात्मिक गुरू केवल कहने के लिए नहीं कहा जाता है बल्कि यह एक प्रामाणिक सच्चाई है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथ और उसके बाद के रचनाकार भी जीवन और प्रकृति के सत्य के निकट लिखते रहे न कि उनमे कोई कल्पना गडी। हिंदी भाषा के स्वर्णिम काल-जिसे भक्ति काल भी कहा जाता-में जो रचनाएं हुईं वह उन्हीं प्राचीनतम रहस्यों को नवीन रुप देतीं है जिन्हें संस्कृत भाषा की क्लिष्टता के कारण लोग भूलते जा रहे थे। इस काल -खण्ड के रचनाकारों ने हमारे प्राचीनतम ज्ञान को नवीन संदर्भों में प्रस्तुत कर देश को एक नयी दिशा दीं, जिस पर देश अभी तक तक चल रहा है - आज तक वह रचनाये लोगों के दिलो-दिमाग में इस तरह छायी हुईं हैं जैसे कि कल ही लिखीं या रची गयी हौं।
सीधा आशय यह है लेखक वही है जो सामाजिक सरोकारों से जुड़कर लिखे। ऐसा करने पर ही लेखक कहला सकता है। लिखने को तो आजकल हर कोई कुछ-न-कुछ लिखता है पर सभी लेखक तो नहीं हो जाते। आजकल देश में शिक्षित लोगों की संख्या प्राचीन समय के मुकाबले ज्यादा है और कागज पर सभी को कहीं न कहीं लिखना ही पड़ता है। लोग अपने रिश्तेदारों को पत्र लिखते हैं , छात्र अपने अध्ययन के लिए नोट्स बनाते हैं और निजी तथा शासकीय कामकाज में अनेक लोगों को पत्र लिखने पड़ते हैं। कुछ लोग तो पत्र लिखने में इतना महारथ हासिल कर लेते हैं कि लोग उनसे ही पत्र लिखवाने के लिए आते हैं पर उन्हें लेखक नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके लेखन का सरोकार निजी आधार हैं न कि सामाजिक।
जो लेखक विचारधारा से प्रभावित होकर लिखते हैं उनकी रचनाएं दायरों में क़ैद होकर रह जाती हैं। वह केवल उन्हीं लोगों को प्रभावित कर सकती हैं जिन्हें उस विचारधारा से सरोकार है। पत्रकारिता के मेरे गुरू ने मुझे पत्रकारों की तीन प्रकार बताये थे और कहा था कि चूंकि तुम लेखक भी हो तो उन्हीं भी इन तीन प्रकारों
में विभक्त कर सकते हो। उन्होने जो तीन प्रकार बताये थे वह इस प्रकार हैं।
- खबर फरोश-जो किसी अख़बार में इसीलिये काम करने के लिए आते हैं जिन्हें केवल ख़बरों की दुनिया से जुडे रहना हैं, और उन्हें इससे कोई मतलब नहीं रहता कि अखबार के संगठन का क्या रुप है?
- ख़्याल फरोश- ऐसे लोग जो अपने ख़्याल की वजह से किसी अखबार में काम करते हैं जहाँ उन्हें उसके अनुसार करने का अवसर मिलता है।
- खाना फरोश- कुछ लोग इसीलिये अखबार में काम करते हैं ताकि उनका रोजगार चलता रहे। उनके अनुसार अब ऐसे ही लोगों की संख्या ज्यादा है।
लेखक में उन्होने खबर फरोश की जगह कलम या लफ्ज़ फरोश रखने को कहा बाकी दो वैसे के वैसे ही बताये। उन्होने बताया था कि पहले वह ख़बर फरोश थे और अब खाना फरोश हो गये हैं। उन्होने मुझे यह साफ बता दिया था कि अखबार में मुझे अधिक समय तक काम नहीं मिल पायेगा और लेखन भी मुझे अपने बूते करना होगा। उन्होने कहा था-"तुम्हारा लिखना बहुत अच्छा है पर बाजार में बिकने लायक नहीं"
उन्होने कहा था कि तुम तो कलम फरोश हो वही रहोगे-साथ ही उन्होने कहा था कि खबर फरोश और कलम फरोश लोगों के पास नये प्रयोग की गुंजाईश हमेशा ज्यादा होती है । वह बहुत अच्छे ढंग से खबर लिखते थे पर अपने को लेखक मानने से इनकार करते थे उनका यही कहना था कि मेरे लिखने का समाज से कोई सरोकार नहीं है जबकि लेखक की रचना का किसी न किसी तरह से समाज से सरोकार होना चाहिऐ। (क्रमश:)
7/07/2007
लेखक को अपने रचनाकर्म से ही प्रतिबद्ध होना चाहिऐ
मैं जब कोई रचना लिखता हूँ तो पूरी तरह उसमें डूबने का प्रयास ही नहीं करता क्योंकि मुझे लिखना है यह भाव इस कद्र मेरे अन्दर आ जाता है कि मुझे इसके लिए कोई अधिक विचार नहीं करना पड़ता। अपने विचारों के क्रम को बग़ैर देखे आगे जाने देता हूँ जहाँ मैं उसे जुड़ने का प्रयास करता हूँ रचना गड़बड़ा जाती है। लिखने के लिए ही प्रतिबद्धता के चलते ही मुझे कभी कोई ठिकाना नहीं मिला, क्योंकि जब एक लेखक के रुप में अपने लिए कोई समूह या वर्ग ढूँढेंगे तो वह आप पर अपने हिसाब से अपनी शर्तों पर लिखने के लिए दबाव डालेगा- और तब अपना मौलिक चिन्तन और मनन खो बैठेंगे। आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी'निराला', जय शंकर प्रसाद और रामधारी सिंह दिनकर के बात यदि कोई लब्ध प्रतिष्ठत लेखक नहीं हुआ तो उसका कारण यही है कि बाद के काल में लेखक की लेखन से कम उससे होने वाली उपलब्धि पर ज्यादा दृष्टि अधिक रही है। श्रीलाल शुक्ल, हरिशंकर परसाईं, और शरद जोशी जैसे चन्द लेखक ही हैं जो बाद के काल में अपनी छबि बना सके।
लेखक का काम है लिखना! अपनी रचना को साहित्यक ढंग से पाठको के समक्ष प्रस्तुत करना न कि एक समाचार के रुप में प्रस्तुत करना। गरीब की वेदना, अमीर का तनाव और मध्य वर्ग के भावनात्मक संघर्ष पर उसका दृष्टिकोण एक समान रहना चाहिऐ, उसे इस बात से कोई मतलब नहीं रखना चाहिए कि उसके लिखने की किस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। उसे केवल इस बात पर ध्यान देना चाहिऐ कि उसका पाठक कोई भी हो सकता है और किसी भी वर्ग का। महिला भी हो सकते है और पुरुष भी , बच्चा भी हो सकता है और बूढा भी , अधिक शिक्षित भी हो सकता है और कब भी। पिछले कई सालों में प्रतिबद्ध लेखन के वजह से लेखकों के कई वर्ग बने जिसने सुरुचिपूर्ण और सार्थक लेखन के प्रवाह को अवरुद्ध किया और पाठक अच्छी रचनाओं को तरस गये और इसी कारण लोग आज भी अच्छी रचनाओं को ढूँढ रहे हैं। प्रतिबद्ध लेखन से कभी भी अच्छी रचनाओं की उम्मीद नहीं की जाना चाहिए। कुछ लोग केवल गरीबी के बारे में लिखकर अपनी छबि चमकते रहे तो कुछ लोग अमीरों के छत्रछाया में विकास के बारे में लिखकर पाने लिए सुविधाये जुटाते रहे, अपनी रचनाओं में जज्बातों को भरने में उनकी नाकामी ने पाठकों को अच्छी रचनाओं से महरूम कर दिया।
प्रसिद्ध लेखक तो बहुत हैं पर उनकी रचनाएँ कितनी प्रसिद्ध हैं यह सभी जानते हैं। लिखा बहुत जा रहा है पर पढने लायक कितना है और कितना सामयिक है और कितना है और कितना दीर्घ प्रभावी यह हम सभी जानते हैं। पत्रकार और लेखक में अन्तर ही नहीं समझते। पत्रकार अपने समाचारों में जबरन जज्बात भरने का प्रयास करते हैं तो लेखक अपनी रचनाओं को समाचार के रुप में प्रस्तुत करते हैं । सभी लोग कहते हैं कि हिंदी में अच्छे लेखकों की कमी है पर यह कोई नहीं कहता कि वास्तव में लेखकों को संरक्षण देने वालों की कमी है। जिनमे उन्हें संरक्षण देने की क्षमता है वह उनका उपयोग एक मुनीम की रुप में करना चाहते हैं। समाचारपत्र-पत्रिकाएँ आजकल पुराने रचनाकारों को छापकर वाह -वाही लूट रहे क्योंकि उन्हें कुछ रकम देना नहीं पड़ती। केवल यही बात नहीं है बल्कि वह यह भी नहीं चाहते कि कोई नया लेखक उनके वजह से प्रतिष्ठित हो जाये, इसीलिये प्रतिष्ठित लोगों को ही लेखक पेश कर रहे हैं। मैं स्वयं अच्छी रचनाओं के लिए तरसता हूँ क्योंकि अगर आप अच्छा लिखना चाहते हैं तो अच्छा पढ़ें भी-ऎसी मेरी मान्यता है । जब मुझे अच्छा पढने को नहीं मिलता तो मैं अपनी ही धर्म ग्रंथों को पढना शुरू कर देता हूँ तो मुझे लगता है कि उनकी विषय सामग्री आज भी सामयिक है। उनमें मुझे एक बात साफ लगती है कि उनके रचनाकार केवल अपनी रचनाओं के लिए ही प्रतिबद्ध थे। (क्रमश:)
6/26/2007
अपनों से बढती दूरी का दर्द
हम अपने देश की संस्कृति और संस्कारों पर गर्व करते हैं वह उन्हीं पारिवारिक और सामाजिक संबंधों पर करते हैं जो अब एक तरह से अपना आभा मंडल खो चुके हैं या खोते जा रहे हैं । कोई अपनी तकलीफों को बयान नहीं कर पाता पर अपनों से बदती भावनात्मक दूरी का दर्द सभी को है। जब फोन जैसी सुविधाएं नहीं थी तब लोग बरसों तक एक दुसरे से बातचीत नहीं कर पाते थे तब लोगों में भावनात्मक लगाव और विश्वास अधिक हुआ करता था पर जब संबंध रखने और बातचीत करने के नए और तीव्रतर साधन उपलब्ध हो गये हैं तो लोगों में आपसी लगाव और विश्वास इस क़दर कम हो गया है कि रोज मोबाइल पर बातचीत करने वाले लोग भी एक- दुसरे पर विश्वास करते हैं -ऎसी आशा नहीं की जा सकती। परिवहन के साधन जब धीमे और उबाऊ थे तब लोग एक-दुसरे के पास बड़ी श्रध्दा, प्रेम और मन में उमंगता का भाव लेकर जाते थे और आज जब अति तीव्रगामी साधन उपलब्ध हो गये हैं लोगों का एक-दुसरे का यहाँ जाना मात्र ओपचारिकता भर रह गयी है-शादी विवाह के अवसर पर लोग बहुत उत्साह से शामिल होते थे पर बदलते समय ने इसे एक मजबूरी बना दिया है , आख़िर ऐसा क्या हुआ कि यह सब बदल गया और समाज जो कभी अपने श्रेष्ठता का दंभ भरता था आज एकदम खोखला हो गया - यहाँ हम इस बात को नहीं भूल सकते कि हम भी किसी न किसी के अपने है और जब हम अपनों पर कोई आक्षेप करते हैं तो वह हम स्वयं पर भी कर रहे हैं ।
हम यहां किसी पर आक्षेप नहीं करना चाहते बल्कि ईमानदारी से उन परिस्थतियों का अवलोकन करना चाहते हैं कि अपना आख़िर अपने से दूर क्यों हो गया और अब उसे कैसे पास रख कर विश्वसनीय बनाया जा सकता है ।
जब आधुनिक साधन और व्यवस्था नहीं थी तब व्यक्ति की व्यक्ति पर निर्भरता अधिक थी इसीलिये संपर्क बनाए रखना न एक बाध्यता बल्कि एक सामाजिक जरूरत भी थी । पहले घर में होने वाले कार्यक्रमों के लिए कामकाज के लिए लोगों की जरूरत होती थी और उस समय नाते-रिश्तेदार और आस-पड़ोस के लोग ख़ूब सहयोग करते थे और अब नवीनतम सुख-सुविधाओं और सेवाओं की बाजार में उपलब्धता ने आदमी को आत्मनिर्भर बना दिया और अब वह पैसा खर्च कर अपने काम करा लेता है। शादी के अवसर पर रिश्तेदार पन्द्रह-पन्द्रह दिन पहले पहुंचते थे ताकि काम में सहयोग किया जा सके। लडकी की शादी में रिश्तेदार बारात के स्वागत के लिए जीजान लगा देते थे। अब इस काम के लिए हलवाई बरात के स्वागत का भी ठेका लेने लगे हैं और जिनके पास पैसा है वह होटलों की सेवाएं लेते हैं जहाँ वेटर स्वागत का काम करते हैं।
अब तो शादी ब्याह में यह पता ही नहीं लगता कि लडकी के रिश्तेदार कौन हैं और लड़के के कौन? कुल मिलाकर आदमी का आदमी में स्वार्थ अब कम हो गया है । यहां किसी प्रकार के अध्यात्म की बात करना ठीक नहीं होगी। कुछ लोग कहेंगे कि ऐसे संबंधो का क्या मतलब जिसमें स्वार्थ हौं , तो पहले यह समझना होगा कि दैहिक स्वार्थ ही दो देहों के संबंध मजबूत रखते हैं -और हम इस तथ्य को तर्क की कसौटी पर नही कसेंगे तो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचेंगे और बात अधूरी रह जायेगी ।कुल मिलाकर बात यह कि घरेलू कर्यकर्मों में अपने लोगों की भागेदारी अब नाम मात्र की रह गयी है और इस कारण लोगों में आत्मीयता के भाव में कमी आ गयी है और रिश्ते निभाये नहीं बल्कि घसीटे जा रहे हैं अब भाई में भात्रत्व , मित्र में मैत्री, और सहयोगी में सहकारिता का भाव ढूँढना बेमानी लगता है। कहीं कहीं विपरीत स्थति भी है कि लोग अपनों से ही हानि की आशंका से भी त्रस्त हैं। इस घोर अविश्वास और हानि कि भावना ने आदमी को बौद्धिक रुप से खोखला कर दिया जहां निराशा, मानसिक तनाव और अकेलेपन की भयानक अनुभूति के साथ जीता है ।
हमारा किसी में काम नही पडेगा यह बात जहाँ आत्मविश्वास देती है वहीं हममें किसी का काम नहीं पडेगा यह उसे बुरी तरह तोड़ती भी है । अकेले होने पर इतना भय नहीं होता जितना परिवार और रिश्तेदारों के होते अकेलेपन का होता है ।हम किसी दुसरे व्यक्ति या समाज को सुधारने की बात करें उससे कुछ होने वाला नहीं है बल्कि हमें अपनी मानसिकता सुधारने की बात करना चाहिऐ , भले ही कम छोटा क्यां न हो हमें अपनों से उसके लिए कहना चाहिए क्योंकि हम जरा अपने अन्दर झाँकें कोई हमेंकिसी खास अवसर पर कोई काम कहता है तो हम खुश होते हैं या नहीं। मतलब यह कि दूसरों के स्वार्थ भी सिध्द करो और अपने भी स्वार्थ उसमे जानबूझकर फसाओ ताकि रिश्तो की निरन्तरता बनी रहे ।
कविवर रहीम कहते हैं -
विपत्ति के समय अपने घनिष्ठ बंधुओं का स्नेह काम आता है । जैसे पेड सा पराने होने पर उसकी लकड़ी के गट्ठे की मोटी रस्सी पेड को थाम लेती है और पेड की डालियों से निकलने वाली शाखाएं जमीन में जा बड़ा पकड लेती हैं।हमें अपनों में अपना स्नेह और प्रेम बनाए रखना चाहिए क्योंकि इससे हमारा ही आत्मविश्वास बढता है । वह लोग क्या सोचते और करते हैं यह उनका काम है।
कविवर रहीम यह भी कहते हैं कि
रहीम ने आज से कई बरस पहले भी ऎसी हालतों का सामना किया तभी अपने लोगों की उपेक्षा का भाव झेलने का दर्द वह व्यक्त कर पाए। अपने लोगों की सहायता के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए पर उनसे कोई आशा नहीं करना चाहिऐ तभी स्वयं बेचारगी के भाव से मुक्त हो पायेंगे जो अपनों से दूर होने केकारण हमारे अन्दर उत्पन्न होता है।
5/30/2007
मोबाइल है पर टाक टाईम नहीं
मित्रों, रिश्तेदारों और सहयोगियों के कहने पर हमने मोबाइल जरूर खरीद लिया, पर अब हमें लगता है कि लोगों ने हमें नया छात्र समझकर ख़ूब रैगिंग ले ली। ९९९ में लाईफ टाईम इन कमिंग और २५० के टाक टाईम की सिम हमने डलवायी और अब हमारा टाक टाईम केवल २१ रुपये का रह गया। इसमें आश्चर्य की क्या बात? आप सवाल उठाएँगे ?
जवाब यह कि हमने उसका उपयोग किसी खास काम के लिए नहीं किया क्योंकि लोगों के मिस काल फेस करते-करते ही पूरा टाक टाईम खत्म हो गया।हुआ यह कि हमने अपना नंबर उन सबको दे दिया जिनको हमारी और जिन्हें हमारी आवश्यकता होती थी पर सबने मिलकर ऐसा खेल खेला कि अब हम यह सोच रहे हैं कि नया टाक टाइम् अब लायें ही नहीं । लोग अपने काम तक की बात के लिए भी मिस काल देते हैं और उन्हें संकोच नहीं होता यह कहते हुए कि हमारे इसमें टाक टाईम नहीं है।
जिसे देखो वही मिस कल दे रहा है और हम फोन करके पूछते तो जवाब मिलता है हमने तो यों ही मिस काल दीं थी कि अगर बात करनी हो तो काल लगा लो । या कहेंगे कि हमारे इसमें टाक टाइम् ज्यादा नहीं है तो सोचा तुम्हें मिस काल दे दें तो तुम्हीं बात कर लोगे । घर पर रिश्तेदारों के बच्चे आये और उन्हें अपने माता-पिता से बात करनी थी तो हमसे फोन लेकर लगाने लगे ।
हमने कहा-"मिस काल लगा दो , तुम्हारे माँ-पिता स्वयं ही बात कर लेंगे "।
बच्चे बोले -" हमारे मोबाइल में टाक टाईम नहीं है ।"
हमने कहा-"पापा से कहों कि टाक टाईम डलवा लें । भाई ऐसा मोबाइल किस काम का जिसमें तक टाईम नहीं हो ।"
बच्चे बोले -"पापा कहते हैं कि अब मैं नहीं टाक टाईम नहीं डलवाऊंगा क्योंकि तुम लोग फ़ालतू बात ज्यादा करते हो।"
हमने उनको बात करने कि इजाजत दे दीं और हमारा बीस रूपये का टाक टाईम खत्म हो गया। हमारे घर से कई ऐसे रिश्तेदारों ने फोन किये जो हमें केवल मिस काल करते थे। हम उनसे कहते कि भई तुम अपने घर मिस काल ही लगाओ तो बस एक ही जवाब है कि उसमें टाक टाईम नहीं है । उस दिन तो हद हो गयी हमारे एक ऐसे अजीज रिश्तेदार ने फोन किया जिसे हम यह कह ही नहीं सकते कि तुमने मिस काल क्यों दीं, सीधे काल क्यों नहीं की ।
उनके मिस कल हमने उन्हें फोन किया तो वह बोले-"हम तो हैं गरीब आदमी , मोबाइल में केवल इतना ही टाक टाईम डलवाया है कि लोगों को मिस काल कर सकूं। "
वह सरासर झूठ बोल रहे थे पर रिश्ता ऐसा था कि हम कह नहीं सकते थे कि भाई बिना टाक टाईम का यह कैसा मोबाईल चला रहे हो , और फिर तुम्हारा काम था हम क्यों पैसा खर्च करे।
हालांकि हमने अब मिस कालों का जवाब देना ही बंद कर दिया है। अगर कोई घंटी चलकर बंद हो जाती है तो फिर हम नंबर भी नही पढ़ते कि किसने किया था सीधे डीलिट कर देते हैं । ऐसे मोबाइल वालों से क्या बात करना जिनके पास टाक टाईम नहीं है ।
5/06/2007
मीडिया की सजगता से भक्तों में चेतना आयेगी
4/30/2007
महायोगी की आलोचना से आत्मविश्लेषण करैं
पहले यह मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने आज से चार वर्ष पूर्व जब योग साधना प्रारंभ की थी तब बाबा रामदेव का नाम भी नही सुना था। भारतीय योग संस्थान के निशुल्क शिविर में योग करते हुए लगभग डेढ़ वर्ष बाद मैंने उनका नाम सूना था। आज जब मुझसे कोई पूछता है "क्या तुम बाबा रामदेव वाला योग करते हो?
मैं उनसे कहता हूँ -"हाँ, तुम भी किया करो ।
कहने का तात्पर्य यह है इस समय योग का मतलब ही बाबा रामदेव के योग से हो गया है। मुझे इस पर कोई आपत्ति भी नहीं है क्योंकि मैं ह्रदय से चाहता हूँ कि योग का प्रचार और प्रसार बढ़े । मैं बाबा रामदेव का भक्त या शिष्य भी नहीं हूँ फिर भी लोगों को यह सलाह देने में मुझे कोई झिझक नहीं होती कि वह उनके कार्यक्रमों को देखकर योग सीखें और उसका लाभ उठाएं । इसमें मेरा कोई निजी फायदा नहीं है पर मुझे यह संतुष्टि होती है कि मैं जिन लोगों से योग सीखा हूँ वह गुरू जैसे दिखने वाले लोग नहीं है पर उन्होने गुरूद्क्षिना में इसके प्रचार के लिए काम करने को कहा था। बाबा रामदेव का समर्थन करने के पीछे केवल योग के प्रति मेरी निष्ठा ही नहीं है बल्कि यह सोच भी है कि योग सिखाना भी कोई आसान काम नहीं -योग शिक्षा वैसे ही भारत में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाई है और इसे विषय के रुप में स्कूलों में शामिल करने का बहुत विरोध हो रहा है ऐसे में लार्ड मैकाले की शिक्षा से स्वयं को विद्धान की पदवी से अलंकृत कर स्वयंभू तो योग के नाम से बौखला जाते हैं, और उनके उलुलजुलुल बयानों को मीडिया में स्थान भी मिलता है। कुछ दिन पहले बाबा रामदेव के शिविर में एक बीमार व्यक्ति की मौत हो गयी थी तो मीडिया ने इस तरह प्रचारित करने का प्रयास किया जैसे वह योग्साध्ना से मरा हो, जबकि उसकी बिमारी उसे इस हाल में लाई थी। उस समय एक सवाल उठा था कि अंगरेजी पध्दति से सुसज्जित अस्पतालों में जब कई मरीज आपरेशन टेबल पर ही मर जाते हैं तो क्या इतनी चीख पुकार मचती है और कोई उन्हें बंद करने की बात करता है। ट्रकों, कारों, और मोटर सायाकिलों की टक्कर में सैंकड़ों लोग मर जाते हैं तो कोई यह कहता है इन्हें बंद कर दो? और इन वाहनों से निकलने वाले धुएँ ने हमारे पर्यावरण को इस क़दर प्रदूषित किया है जिससे लोगों में सांस की बीमारियाँ बढ गयी है तो क्या कोई यह कहने वाला है कि विदेशों से पैट्रोल का आयत बंद कर दो?
बाबा रामदेव ने हिंदूं धर्म से जुडी इस विधा को पुन: शिखर पर पहुंचाया है इसके लिए उन्हें साधुवाद देने की बजाय उनके कृत्य में छिद्र ढूँढने का प्रयास करने वाले लोग उनकी योग शिक्षा की बजाय उनके वक्तव्यों को तोड़ मरोड़ कर उसे इस तरह पेश करते हैं कि उसकी आलोचना के जा सके। जहाँ तक योग साधना से होने वाले लाभों का सवाल है तो उसे वही समझ सकता है जिसने योगासन, प्राणायाम , ध्यान और मत्रोच्चार किया हो। शरीर की बीमारी तो पता चलती है पर मानसिक और वैचारिक बीमारी का व्यक्ति को स्वयं ही पता नहीं रहता और योग उन्हें भी ठीक कर देता है। जहां तक उनकी फार्मेसी में निर्मित दवाओं पर सवाल उठाने का मामला है बाबा रामदेव कई बार कह चुके हैं वह बीमारियों के इलाज में दवा को द्वितीय वरीयता देते हैं, और जहाँ तक हो सके रोग को योग साधना से दूर कराने का प्रयास करते हैं। फिर भी कोई न कोई उनकी दवाए उठाकर लाता है और लगता है अपनी विद्वता दिखाने। आज तक कोई किसी अंगरेजी दवा का सैम्पल उठाकर नहीं लाया कि उसमे कितने साईट इफेक्ट होते हैं। इस देश में कितने लोग अंगरेजी बिमारिओं से मरे यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की।
अब रहा उनके द्वारा हिंदू धर्म के प्रचार का सवाल तो यह केवल उनसे ही क्यों पूछा जा रहा है? क्या अन्य धर्म के लोग अपने धर्म का प्रचार नहीं कर रहे हैं। मैं केवल बाबा रामदेव ही नहीं अन्य हिंदू संतों की भी बात करता हूँ । जो लोग उन पर सवाल उठाते हैं वह पहले अपना आत्म विश्लेषण करें तो उन्हें अपने अन्दर ढ़ेर सारे दोष दिखाई देंगे। दो या तीन घंटे तक अपने सामने बैठे भक्तो और श्रोताओं को-वह भी बीस से तीस हज़ार की संख्या में -प्रभावित करना कोई आसान काम नहीं है। यह बिना योग साधना, श्री मद्भागवत का अध्ययन और इश्वर भक्ती के साथ कडी तपस्या और परिश्रम के बिना संभव नहीं है । उनकी आलोचना केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो उन जैसा हो। इसके अलावा उनसे यह भी निवेदन है कि आलोचना से पहले कुछ दिन तक योग साधना भी करके देख लें ।
4/28/2007
आकाश में धरती:फिर स्वर्ग और नरक कहॉ है?
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