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1/07/2012

बिग बॉस तो शालीन और भद्र कार्यक्रम है-हिन्दी हास्य कविता (big boss is a gentle program-hindi hasya kavita or comedy poem)

फंदेबाज ने कहा
‘‘दीपक बापू
यह बिग बॉस धारावाहिक
अश्लीलता फैला रहा है
आप इस पर कोई लिखो हास्य कविता,
जल जाये जैसे इसकी चिता,
वैसे भी आप इंटरनेट पर फ्लाप चल रहे हो,
बेमतलब के कवि हिट हो गये
यही सोच जल रहे हो,
शायद बिग बॉस पर कुछ जोरदार लिखने से
आपका नाम चल जाये,
कोई सफल रचना आपका नाम लेकर छाये।’’

दीपक बापू मुस्कराये
‘‘लगता है हमसे लिखवाना कहीं
फिक्स कर आये हो,
शालीनता का संदेश फैलाने के नाम पर
बिग बॉस को सफल बनाने की
शायद सुपारी लाये हो,
समाचार चैनलों में बिग बॉस का नाम छाया है,
ऐसा कोई दिन नहीं जब उसका नाम न आया है,
मगर पब्लिक में नहीं है उसका प्रचार,
चाहे डाले जा रहे अश्लील विचार,
लोगों को शालीनता से ज्यादा
अश्लीलता पसंद आती है,
पर्दे पर साड़ी पहने औरत से अधिक
बिकनी पहनी अभिनेत्री पसंद आती है,
समाचार चैनल तो
उस पर अश्लीलता और अभद्रता का
आरोप लगाकर
लोगों को वह देखने के लिये उकसाते हैं,
भले ही खुद को संस्कृति का रक्षक जताते हैं,
लगता है हमसे अश्लीलता का आरोप लगवाकर
उसे बौद्धिक वर्ग का प्रचार
दिलवाना चाहते हो,
इसलिये हमसे हास्य कविता लिखवाना चाहते हो,
मगर हम तो यही कहेंगे
बिग बॉस अत्यंत शालीनता और
भद्र व्यवहार करना सिखा रहा है,
नयी पीढ़ी को नया मार्ग दिखा रहा है,
मु्फ्त में उसे असंस्कृत कह कर
उसका प्रचार नहीं करेंगे,
हम तो उसे संस्कृत और ज्ञानबर्द्धक कहकर
लोगों में अरुचि का भाव भरेंगे,
वैसे यह कार्यक्रम अब हिट नहीं रहा,
बदतमीजी करने में ज्यादा फिट भी किसी ने नहीं कहा,
गाली गलौच करने वाला कोई
महान कलाकर शायद इसमें नहीं आया,
कपड़े उतारकर शानदार अभिनय करे
ऐसा भी कोई घरवाला नहीं छाया,
बदनाम नहीं हुआ
इसलिये तुम भी शायद नही देखते हो,
इसलिये हमसे इंटरनेट पर
हास्य कविता लिखवाने की बात
हमारी तरफ ही फैंकते हो,
जहां तक हमारे फ्लाप होने सवाल है
तुम्हारी सफलता के नुस्खे
हमें दे जाते हैं हास्य कविता का विषय
भले ही वह कभी हमने नहीं आजमाये।’’
------------
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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2/10/2011

समाचार और विज्ञापन-हिन्दी हास्य कविता (samachar aur vigyapan-hindi hasya kavita)

समाजसेवक जी ने
प्रचारक से कहा,
‘‘यार, रोज तुम घोटालों का
पर्दाफाश करते हो
क्या हमें मरवाओगे,
अभी तक हमारे चेले फंस रहे हैं
धीरे धीरे हमारे हाथ में हथकड़ी
पड़ जाने की नौबत तुम लाओगे,
मगर याद रखना
हमारे घोटालों में तुम भी भागीदार हो
इसलिये बच नहीं पाओगे।’’

सुनकर प्रचारक महोदय बोले
‘‘यार,
तुम भी निरे मूर्ख हो
घोटालों से हमारे समाचार सनसनीखेज बनते हैं,
विज्ञापनों में अपने जलवे इसलिये छनते हैं,
फिर तुम्हारे चेलों के भी चाटुकार इसमें फंस रहे हैं,
आम लोग बिना सोचे समझे हंस रहे हैं,
फिर हम एक घोटाले पर चलाते हैं
कुछ दिन चर्चा,
कार्यक्रम बनाने में भी नहीं आता खर्चा,
जैसे एक मामला थम जाता है,
फिर कोई नया मामला सामने आता है,
लोग पिछला भूल जाते हैं,
नये को तूल देने में फिर मजे आते हैं,
चिंता मत करो,
बस, भ्रष्टाचार पर
जनता के सामने आहें भरो,
तुम्हारा काम चलता रहेगा जीवन भर,
नहीं है तुम्हें फंसने का डर,
अपनी समाज सेवा की यात्रा
तुम स्वच्छ छवि के साथ तय कर जाओगे।’’
-------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
http://dpkraj.wordpress.com

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7/07/2010

रुपयों से लिया जा रहा है हंटर का काम-हास्य कविताएँ (rupya aur hunter-hasya kavitaen)

जैसे जैसी बढ़ी महंगाई
नैतिकता की कीमत नीचे आई,
अपनी भूख से बढ़कर
इंसान की कोई जरूरत नहीं है
यह बात किसी अर्थविज्ञानी के समझ नहीं आई।
-----------
बेकाबू हो रहा बाज़ार
सौदागर हो गये बेलगाम,
दौलतमंद के घरों पर
बिक रही है ज़माने को
काबू करने की ताकत
रुपयों से लिया जा रहा हंटर का काम।
---------
जिनके पेट भरे हैं
भुखमरी पर सबसे अधिक वही रोते हैं,
अपने जज़्बात के दाम वसूल कर
फिर घोड़े बेचकर सोते हैं।
-----------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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5/08/2010

फिर गिर सकती है क्रिकेट की लोकप्रियता-हिन्दी आलेख (t-twenty world cricket cup-hindi article)

तय किया था कि हम बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता में भारत आस्ट्रेलिया का मैच देखेंगे, मगर नहीं देख पाये। क्रिकेट दर्शन से हमने तौबा कर ली थी पर कहते हैं कि न आदमी अपनी आदत से बाज़ नहीं आता। क्रिकेट मैच चला देते हैं और इधर इंटरनेट पर भी बैठ जाते हैं-अपने आपको तसल्ली देते हैं कि हम क्रिकेट मैच नहीं देख रहे। अलबत्ता यह तय बात है कि अब देखते भी हैं तो देशों के बीच के मैच देखते हैं-यह क्लब स्तरीय प्रतियोगिताऐं हमारी नज़र में दोयम दर्जे की है। एक तरह से सस्ते बज़ट की फिल्मों की तरह-प्रमाण यह है कि सुनने में आया है कि अब इन पर वैसे ही मनोरंजन कर लगाने की तैयारी हो रही हैं जैसा फिल्मों पर लगता है।
बहुत समय बाद किसी मैच को देखने का ख्याल आया पर बिज़ली ने वह भी छीन लिया। पूरे आठ घंटे कालोनी की बिजली गायब रहीं-इसमें बीस ओवर क्या पचास ओवर का मैच भी निपट जाता है। हमने भी भुला दिया और रात को कालोनी के पार्क में घूमने चले गये। मगर कहते हैं न कि सब कुछ आपके हिसाब से नहंी चलता। क्रिकेट मैच हमने देखना छोड़ा और जब देखने का विचार किया तो वह दिखाई नहीं दिया। फिर उसका ख्याल छोड़ा तो फिर वह भी लौट कर आया। हमारे जैसे परेशान चार पांच युवक उस पार्क में भी आये। उनमें से एक मोबाईल पर स्कोर किसी से पूछ रहा था-‘ मैच का क्या चल रहा है।’
वहां से जवाब आया तो वह अपने साथियों को बता रहा था‘सोलह ओवर में 160 रन!
हमने सोचा कि शायद बीसीसीआई की टीम का होगा। खुश हुए, चलो आज जीत तो दूसरे मैच में भी मजा आयेगा। तब देखेंगें।
इसी बीच दूसरा बोल पड़ा-‘लगता है कहीं आज तो इंडिया की टीम हार न जाये।’
उसने भारत शब्द उपयोग नहीं किया यह सुनकर अच्छा लगा क्योंकि तब यह सदमे जैसा लगता।
मतलब यह स्कोर आस्ट्रेलिया का था। हमारा मन फक हो गया। फिर पार्क के चक्कर काटने लगे।
घर आये तब भी अंधेरा था। न कंप्यूटर खोल सकते थे और न ही टीवी देख सकते थे। ऐसे में अपना ट्रांजिस्टर निकाला और उस पर दिल्ली दूरदर्शन का स्टेशन लगाया। बीसीसीआई का स्कोर था चार विकेट पर 24 रन! फिर शायद पांचवें खिलाड़ी के आउट होने की आवाज सुनाई दी। बीसीसीआई की टीम हार की तरफ बढ़ रही थी ट्रांजिस्टर बंद कर दिया। बाद में एक दो बार खोला तो उद्घोषकों की चर्चा में बीसीसीआई के बुरे प्रदर्शन की बात सुनाई दी।
बीसीसीआई की टीम हारी। सच बात तो यह है कि इस टीम के अगले दौर में पहुंचने की संभावनायें अब बहुत कम है। दो साल पहले बीसीसीआई की टीम ने बीस ओवरीय प्रतियोगता का विश्व कप जीता था तब भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता लगभग खत्म होने के कगार पर थी पर उसे जीवनदान मिल गया जिससे क्लब स्तरीय प्रतियोगिताओं का जन्म हुआ और वह कमाई का धंधा बना। भारत देश इस क्रिकेट का कितना बड़ा सहारा है यह इनाम वितरण के समय दिखने वाले कंपनियों के बोर्ड देखकर समझा जा सकता है जिनमें से अधिकतर भारत के व्यापार जगत में सक्रिय हैं। अनेक लोग क्लब स्तरीय प्रतियोगता के आयोजन पर होने वाली धाधलियों से बहुत नाराज हैं पर देश की नयी पीढ़ी का इससे जुड़ाव जिस ढंग से हुआ है वह आश्चर्यजनक है। इसके बावजूद यह सच है कि यह देश विजय को सलाम करता है। अगर इस विश्व कप में बीसीसीआई की टीम हारती है तो एक बार फिर क्रिकेट की लोकप्रियता गिर सकती है।
कुछ लोग बीसीसीआई की टीम को समग्र भारत का प्रतिनिधि नहंी मानते। इसका कारण यह है कि उस पर कुछ खास क्षेत्रों के लोगों का प्रभाव अधिक है। दूसरा यह भी कि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता आयोजित करने वाली जो समिति है वह बीसीसीआई की है पर उसे अलग दिखाया गयां जो कि एक मजाक था। इस समिति ने भारत में अनुमति न मिलने पर पर दक्षिण अफ्रीका में प्रतियोगिता की। इसका सीधा मतलब यह है कि बीसीसीआई और उसकी समितियां कंपनियों की तरह है जो केवल व्यापार में रुचि रखती हैं। अब किसी कंपनी में सभी कर्मचारी भारतीय हों पर वह संपूर्ण देश की प्रतिनिधि तो नहीं हो जाते। अलबत्ता क्रिकेट अब फिल्म की तरह मनोरंजन हो गया है इसलिये इसमें उसी तरह उतार चढ़ाव आयेंगे। इसलिये यह वेस्टइंडीज में होने वाली बीस ओवरी प्रतियोगिता भले ही मनोरंजन न हो पर भारत में उसका आधार तो यही है। टीम विश्व जीतेगी तो ही लोग अगली फिल्म देखने को तैयार होंगे। बहरहाल पूरी शिद्दत के साथ क्रिकेट मैच देखने का अब हमारा इरादा नहीं रहा और इसका कारण आस्ट्रेलिया से इस तरह हार जाना है। अगर बीसीसीआई की टीम खाली हाथ लौटती है तो यकीनन फिर क्रिकेट की लोकप्रियता गिरेगी इसमें संदेह नहीं है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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8/30/2009

रिश्ता और सच का सामना-हास्य कविता (rishta aur sach ka samana-hasya kavita)

लड़के की मां ने
रिश्ते कराने वाले मध्यस्थ से कहा
‘‘लड़की और परिवार के साथ
दहेज का मामला भी समझ में आयेगा।
बस एक बात रह गयी है कहना कि
अब तो चल गया है सच के सामना करने का फैशन
इसलिये लड़की को उस मशीन पर भी बिठायेंगे
चाहें उसके मां बाप तो
अपने लड़के को भी उस पर दिखायेंगे
इस तरह रिश्ता तय हो जायेगा।’

सुनकर लड़का चौंका
और इशारा कर मां को बाहर बुलाया
और बोला-
‘यह क्या कर रही हो माताश्री
उस तरह तो मेरा कभी भी विवाह
संपन्न नहीं हो पायेगा।
तेरा और मेरा रिश्ता तो इसी जन्म का है
जो व्यर्थ जायेगा।
यह टीवी देखकर मत चलो
ऐसा न हो कि फिर इस रिश्ते से हाथ मलो
सच की मशीन है इस तरह कि
जो मेरे बारे में तुम भी नहीं जानती
सभी को पता चल जायेगा।
चुपचाप हामी भर दो
वरना तुम्हारे सास बनने का
और मेरा घर बसने का सपना
सच का सामना करते ही टूट जायेगा।’’

..................................
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

7/27/2008

‘चक दे इंडिया’ नहीं ‘सच देख इंडिया’-व्यंग्य

बहुत दिनों से सुनते आ रहे हैं ‘चक दे इंडिया’। जब देखों कोई थोड़ी बहुत अच्छी खबर होती है गूंजने लगता है टीवी चैनलों पर ‘चक दे इंडिया’‘। एक काल्पनिक कहानी पर फिल्म बनी जिसमें भारतीय महिला हाकी टीम को विश्वविजेता बता कर पूरे देश को भरमाने की कोशिश की गयी। सच तो यह है कि पिछले 25 वर्षों में भारत किसी भी खेल में विश्व कप जीता नहीं था पर एक फिल्म में काल्पनिक रूप से मिली जीत को भी एक सच की तरह भुनाया गया। भ्रम पैदा कर लोगों की भावनाओं से जुड़े व्यवसाय में किस तरह कमाई हो सकती है ऐसा उदाहरण अन्य कहीं नहीं मिल सकता।

अनेक विज्ञापन वाले अपने माडल कों किसी काल्पनिक प्रतियोगिता में जितवाकर अपने द्वारा विज्ञापित वस्तु दिखाते हुए उससे गंवाने लगते हैं ‘चक दे इंडिया’। कोई ‘रीयल्टी शो’ होता है तो उसमें कई बार प्रतियोगी गाने लगते हैं तो कई बार उस शो की समप्ति पर विजेता के सम्मान में भी गाया जाता है ‘चक दे इंडिया’। धीरे धीरे लोग इसे भूलने लगे थे पर क्रिकेट के बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता जीतने पर तो जैसे प्रचार माध्यमों की उचट कर लग गयी। जिसे देखो वही बजाये जा रहा था। यहीं से उनको अवसर मिला। क्रिकेट में उसके बाद कोई भी छोटी मोटी जीत मिली तो यही गाना चैनलों पर सुनाई देता है। जब हार जाती है तो उसके लिये कोई मातमी धुन बजना चाहिए पर एसा कोई भी नहीं करता जबकि फिल्मों ने कई ऐसे मातमी गीत और संगीत के कार्यक्रम बना रखे हैं। जब टीम पिट जाती है उस समय अपने खिलाडि़यों को थोड़ा बहुत कोसकर अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं।

काल्पनिक कहानियों से कुछ नहीं होता। फिल्म और उसके गीत क्षणिक रूप से आनंद प्रदान करते है, पर जीवन के लिये वह निरर्थक हैं। पहले लोग फिल्म देखकर भूल जाते थे और जो गाने जीवन के लिये थोड़ा बहुत अर्थ रखते थे तो उसे गुनागनाने लगते थे पर आज के प्रचार माध्यम तो उन गानों को भुनाने के लालायित रहते हैं। कई बार तो समाचार पत्र पत्रिकाएं अपने किसी सकारात्मक लेख या समाचार को प्रभावी बनाने के लिये लिख देते है ‘चक दे इंडिया’ ।

वैसे देखा जाये तो बजाय ‘चक दे इंडिया की जगह होना चाहिए ‘सच देख इंडिया‘। सच तो यह है कि इस लेखक को गीत नहीं लिखना आता वरना लिख देता ‘सच देख इंडिया’। अगर प्रयास भी किया तो तुक मिलाने के चक्कर में शब्द गड़बड़ा जायेंगे और अगर उनको ठीक रखने का प्रयास किया तो तुक नहीं बनेगी। चलिये इस पर एक गीतनुमा एक हास्य कविता लिखने का प्रयास करके देखते हैं।

सच देख इंडिया, सच देख इंडिया
ख्वाब देखा तो सच से मूंह फेर लिया
सच देख इंडिया
परदे पर देखा होगा, अपने लिये विश्व कप
पर कीर्तिमानों में देश को जीरो ने घेर लिया
सच देख इंडिया
हाकी में नहीं जा रही इंडिया की टीम
सच में कभी नहीं जमती, देश के जीत की थीम
सच देख इंडिया
दुनियां भर के खिलाड़ी दिखायेंगे बीजिंग में अपने जौहर
इंडिया में बैठकर देखेंगे, परायों को बीबी और शौहर
सच देख इंडिया
सास-बहु सीरियल में सुनकर धमाके दिल बहालाआगे
शहर में होने वाले असली धमाकों से कान नहीं बचा पाओगे
काल्पनिक कहानियां कितना भी डरायें
सच भयानक दृश्यों से ज्यादा डरावनी नहीं होती
उनमें कितना भी खूबसूरत अहसास हो
जिंदगी इतनी खुशनुमा भी नहीं होती
सच देख इंडिया
.......................................

हां, यह सच है कि यह गीत की तरह नहीं लिखा पर जब कड़वे सच हों तो शब्दों को बाहर आने देने से रोकना भी अच्छा नहीं लगता नहीं तो वह रुके हुए पानी की तरह अंदर ही अंदर गंदा होकर हृदय को खोखला कर देते हैं। कभी ‘ये है मेरा इंडिया’ तो कभी ‘मेड इन इंडिया’ तो कभी ‘चक दे इंडिया’ जैसे फिल्मी वाक्यों को जीवन में दोहराते रहने से सच नहीं बदल जायेगा। एक अजीब माहौल है। यहां दर्द है, संवेदना है और अभिव्यक्ति के साधन है पर फिर भी वह सब कुछ हो रहा है जिसे नहीं होना चाहिए। पहले कथा कहानियां सुनाकर इस देश को भ्रमित किया गया और फिल्म की काल्पनिक कहानियों से कुछ वाक्यांश लेकर उसमें देश के लोगों का दिल और दिमाग भटकाना एक व्यापार हो सकता है पर इससे पूरी कौम मानसिक रूप से कितनी कमजोर हो गयी है जो इंतजार करती है किसी घटना का ताकि उस संवेदना व्यक्त की जा सकें। आम आदमी का समझ में तो आ सकता है पर जिन लोगों खेल और समाज के संबंध में कुछ करने का दायित्व है उनकी नाकामी एक चिंता का विषय है। लोग अपनी तकलीफों के साथ जी रहे हैं उसे भुलाने के लिये वह इन काल्पनिक कहानियों में मन बहला रहे हैं पर समाज और राष्ट्र को आगे ले जाने वाला चिंतन और अध्ययन का भाव उनमें लुप्त होता जा रहा है। फिल्मी वाक्यांशों से इस देश की वास्तविकता नहीं बदल सकती। इसके लिये पहले ‘चक दे इंडिया’ की जगह कहना पड़ेगा ‘सच देख इंडिया’
.....................................................

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लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

2/03/2008

वही प्यार पाने के लिए तरसे-कविता

कोई दौलत को तो कोई आदमी प्यार को तरसे
कोई तरसता है तो कोई बैचेन होता अपने घर से
ऊहापोह हैं जिन्दगी निकल जाती, पकड़ नहीं पाते
घंटों सोच में बिताते, पर नहीं निभाते पल भर से
दौलत के ढेर पर बैठकर, बदहाल नीचे खडे लोग देखते
नीचे खडे होते, तब ऊपर से रोटी गिरने के लिए तरसे
अपने लिए ढूंढते हैं सभी खुशियों की सौगात
पर अपने दुख दूसरों से बांटने के लिए तरसे
अपने होने का अस्तित्व का अहसास सबको है
नहीं रखते वास्ता रखते, दूसरे के जिगर से
जो जान पाते जिन्दगी का रंग-बिरंगा रूप
तो देख पाते सबके तमाशे अपनी नजर से
अपनी खुशी के आकाश को ऊंचा उठते तो देखा
पर साथ लेते उनको भी, जो उड़ने के लिए तरसे
तभी जाने पाते जिन्दगी जिन्दादिली का नाम
अपने लिए जो जिए, वही प्यार पाने को तरसे
-----------------------------------------------

1/19/2008

ऐसी जोरदार कविता लिखो-कविता साहित्य

तुम्हारे अंतर्मन में पल रहे दर्द
तुम्हारे मस्तिष्क चल रहे द्वंद से
बन रहे काव्यात्मक शब्द
चौराहे पर जब सुने जाएं
तो लोग स्तब्ध रह जाएं
ऐसी जोरदार कविता लिखो

फल सब्जी की तरह शब्दों की
दलाली करने वालों के तंबू
तुम्हारे तेज से उखाड़ने लगें
असल माल की जगह
नक़ल माल बेचने की तरह
अपने शब्द बेचने वालों को
तुमसे होने लगे ईर्ष्या
ऐसी जोरदार कविता लिखो

दिखते हैं बाहर से ताक़तवर
अन्दर से हैं एकदम खोखले
लोग उनकी छबि से व्यर्थ डरते है
इसलिए उधार के लिए शब्दों लेकर
कुछ लोग उन पर राज्य करते हैं
तुम अपने पसीन से नहाए
जो तुम्हारे दिल में गायें
छद्म रूप धरने वालों को डरा सकें
ऐसी जोरदार कविता लिखो

जजबातों का व्यापार करते हैं
उनके दिल होते हैं खाली
लिखने-पढ़ने के लिए
शब्दों को ऐसे बिछाएं जैसे भोजन की थाली
तुम्हारे शब्दों के प्रहार से
विचलित हो जाएं
जहाँ से निकलें तुहरे शब्द निकलें
उस रास्ते को वह छोड़ दें
ऐसी जोरदार कविता लिखो

1/04/2008

देशी गुरु और अंग्रेजी शिष्य

एक अंग्रेज ने हिन्दी भाषा और संस्कार सीखने के अपना एक गुरु बनाया जब वह हिन्दी सीख चुका तो गुरु ने उससे कहा की अब तुम जाकर व्यवहारिक अनुभव प्राप्त करो। भारत के टीवी चैनल पर सामाजिक कार्यक्रमों को देखो और इससे तुम्हारी हिन्दी और संस्कार दोनों में ही बहुत अनुभव प्राप्त होगा।

अंग्रेज शिष्य चला गया और फिर कुछ दिन बाद लौट आया और बोला-''गुरुजी, मैने भारत के सारे हिन्दी चैनल देखे पर उसमें जो सामाजिक सीरियल हैं वह तो हारर शो अधिक लगते हैं और उनमें हिन्दी कम और अंग्रेजी अधिक होती है। वहाँ तो ऐसा लगता है की हम अंग्रेजों को दिखाने के लिए सीरियल बनाते हैं। उनको देखकर जितनी हिन्दी और वहाँ के संस्कार जितना सीखा हूँ वह और भूल जाऊंगा।''
गुरूजी ने कहा-''अच्छा कुछ हिन्दी फिल्मों को देखो, उससे तुम्हें लाभ होगा।
शिष्य उनसे आज्ञा लेकर चला गया और फिर कुछ दिन बाद लौटा और बोला-''गुरूजी, उसमें तो हमारी फिल्मों की कहानी की नक़ल होती है और हिन्दी भी वैसी नहीं है जैसी आपने सिखाई है।गांधी के सन्देश को गांधीगिरी कहते है और मुझे मजाक लगता है।''

गुरूजी ने कहा-"अच्छा तुम वहाँ के अखबार और पत्रिकाएँ पढा करो। उसमें तुम्हें कुछ ज्ञान और अनुभव जरूर प्राप्त होगा।

शिष्य वहाँ से चला गया-''उनमें तो केवल मारपीट की खबरें और जो वहाँ से हमारे देश में आकर जो व्यापार करते हैं उन लोगों की तारीफों की खबरें ही छपतीं हैं। उससे क्या सीख पाऊंगा? ''
गुरूजी ने कहा-''तुम नये ज़माने के हो और कंप्यूटर भी जानते हो, इसलिए अंतर्जाल पर हिन्दी के ब्लोगरों को पढो।''

इस बार तो शिष्य उसी दिन लौट आया और बोला-''एक तो यह उन्होने कई वर्ग बना रखे हैं समझ में नहीं आ रहा किसको पढूं, और एक जगह तो मैंने शीर्षक में ही गाली देखी तो में लौट आया।''
गुरूजी ने अपना माथा पीट लिया और कहा-''मेरे ख्याल से तो हिन्दी तो तुम्हारी अब वैसे ही बहुत अच्छी हो गयी है क्योंकि तुम्हें पता लग गया है कि हिन्दी में भारत के ही लोग कहाँ गलती कर रहे हैं और संस्कार भी तुम्हारे अन्दर वैसे ही अच्छे है क्योंकि तुम्हें वह लोग पसंद नहीं आ रहे जो तुम्हारे समाज के पदचिन्हों पर चल रहे हैं। इसलिए अब तुम्हें अब और कुछ सीखने की जरूरत नहीं है।''

शिष्य चला गया तो गुरूजी आकाश की तरफ देखकर बोले-''अच्छा ही हुआ, यह बहुत कुछ मुझे सीखा गया वरना में अपने देश के लोगों के बारे में ग़लतफ़हमी पालकर अपने शिष्यों को भटकाता रहता।

नोट-यह एक काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है.

1/03/2008

आस्ट्रेलिया की तरफ से अंपायर भी खेल रहे हैं?

आस्ट्रेलिया में चल रही पांच दिवसीय क्रिकेट मैच में जिस तरह पहली पारी ढहने से अंपायर स्टीव बकनर ने जिस तरह कंगारुओं की जिस तरह बचाया उसे देखते हुए बहुत पहले पाकिस्तान की अंपायरिंग की याद आते है तब कहा जाता था की पाकिस्तान में तेरह खिलाडी खेलते हैं। जब से तीसरे देश के अंपायर रखने की परंपरा शुरू हुई है तब से उसके बारे में ऐसी चर्चा बंद हो गई पर अब किसी को विलेन तो रहना है वरना क्रिकेट में हीरो की कद्र कौन करेगा? किसी को विलेन बनाकर ही हीरो को लोगों के सम्मुख प्रस्तुत कर उनके जजबातों का फायदा उठाया जा सकता है।

क्रिकेट में आजकल स्टीव बकनर इस तरह का रोल निभाने के लिए तैयार हो रहे हैं। भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ी उनके पक्षपात का शिकार रहे हैं। बस एक अंतर है वह यह की पाकिस्तान के खिलाड़ी मुखर होकर आरोप लगाते है और भारतीय खिलाड़ी अपनी व्यावसायिक मजबूरियों के कारण चुप रह जाते हैं। जबकि जानते हैं कि यह खेल ही भारत की आर्थिक शक्ति के दम पर चल रहा है। स्टीव बकनर ने कल तो हद ही कर दी पता नहीं क्यों इतना खौफ था कि एंड्रू साइमंस को दो बार आऊट नहीं दिया। लगता है कि अब खिलाड़ी जो रोल नहीं निभा पा रहे या उसका जिम्मा अंपायरों पर डाला जाने वाला है, कोई खिलाडी जो आऊट होना चाहता है पर अंपायर दे नहीं रहा और कोई अच्छा खेल रहा है तो उसे गलत आउट दे दो।

कल के किस्से पर एक और किस्सा याद आया। कोलंबो में एक प्रतियोगिता में आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान दोनों ही मैच हारना चाहते थे। अखबारों में उस समय प्रकाशित चर्चा के अनुसार उस मैच में दोनों की रूचि मैच जीतने पर मिलने वाली राशि से अधिक हारने पर दो नंबर में मिलने वाली राशि में अधिक थी-इस आरोप पर अखबारों पर में खूब चर्चा हुई थी। मैंने इसे पढा तो हंसी आयी। कल और आज जो स्टीव बकनर और सायमंड को देखकर उसी की याद आयी।

सायमंड ने तय कर लिया होगा कि-'' यार इंडिया के खिलाफ बहुत बार अच्छा खेल लिया और खराब खेल कर सबको चौंका दो। फिर कभी भारत जाना है, कहीं ऐसा न हो कुंबले एंड कंपनी डर के मारे क्रिकेट खेलना छोड़ दें तो आगे कमाई कैसी होगी आखिर क्रिकेट चल तो भारत की वजह से रहा है। इस बार मौका दो ताकि आगे भी खेलते रहें।''

बकनर सोच रहा होगा-''ऐसे कैसे? आज मैं भी अपनी ताकत दिखा दूं। ऐसा तो नहीं यह कहीं अपना आऊट होना फिक्स कर आया हो। अगर कर आया होगा तो भारी कमीशन मिला होगा। कुछ कमीशन दे दो में इसे जाने देता हूँ।

ऐसा भी हो सकता है कि क्रिकेट के लिए कोई विलेन की जुगाड़ करना हो और उसके लिए बकनर तैयार हुए हों क्योंकि अगर उनके इस तरह के फैसले होते रहे तो लोग चिढ जायेंगे, और कहीं इसके बावजूद भारत की टीम जीती तो बस आ गया मजा। क्रिकेट को लोगों के बीच फिर एक लाइफ लाइन मिल जायेगी-जैसे ट्वेन्टी-ट्वेन्टी में भारत के जीतने पर मिली। उसके बाद फिर भारत में क्रिकेट का खेल भारत में जनचर्चा का विषय बना था पर अब फिर लोग निराश हो गए हैं क्योंकि पुराने खिलाड़ी फिर उनके सामने आ गए हैं।

अब यह पता नहीं लग रहा है कि भारत के खिलाड़ी इस पर क्या करेंगे? कभी कहते हैं कि इसकी शिकायत करेंगे तो कभी कहते हैं नहीं करेगे? एक सवाल जो उठता है कि स्टीव बकनर का शिकार भारत के खिलाड़ी ही क्यों हो रहे हैं आस्ट्रेलिया के क्यों नहीं? इससे एक बात साफ जाहिर होती है कि वह समझता है कि विश्व की असली ताकत अभी गोरों के पास है और एशिया के देश कितने भी आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली हो जाएं पर नियंत्रण तो गोरों का ही चलेगा। इसलिए उनकी बजाते रहो ताकि काले लोगन को मौका मिलते रहें। उसके खिलाफ अधिक शिकायत करने वाले देश एशिया के हैं क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता। शायद भारत के खिलाड़ी भी कुछ कहने में डरते होंगे क्योंकि इंग्लेंड में अंपायर का विरोध करने पर अपने पडोसी देश पाकिस्तान के कप्तान इंजमाम उल हक़ का जो हश्र हुआ सबने देखा है। बहरहाल इतना तो कहा जा सकता है कि पहले पाकिस्तान के बारे में कहा जाता अब आस्ट्रेलिया के बारे में भी यही कहा जा सकता है कि वह १३ खिलाडियों के साथ खेल रहा है।

11/11/2007

ब्लोगर ने ऐसे मनाई दीपावली

ब्लोगर के रूप में उसकी यह पहली दीपावली थी और उसके दिमाग में ब्लोगरी स्टाइल में मनाने का विचार था। पत्नी बहुत देर से बाजार से पूजा सामग्री और मिठाई लाने की कह रही थी और वह कंप्यूटर के पास रखी कुर्सी पर बैठा टीवी पर समाचार देख रहा था-कंप्यूटर खुला हुआ था पर उसका ध्यान टीवी की तरह ही था। आखिर जब उसे टीवी पर भी लिखने का आइडिया नहीं मिला तो वह घर से निकलने लगा तो पत्नी ने कहा-''पूजा सामग्री और मिठाई लेना जा रहे हो न? जल्दी ले आओ। देखो कालोनी में सबने पूजा कर ली है और सब पटाखे जला रहे हैं। हमने ही देर कर दी है।"

ब्लोगर ने कहा-हाँ, जल्दी आऊँगा पर पहले कालोनी में सबको दीपावली की कमेन्ट दे आऊँ।''

वह चला गया और पीछे से कहती रह गई-''किसी को दीपावली की कमेन्ट नहीं बधाई देना।''

उसने सुना ही नहीं और चल पडा लोगों को दीपावली की कमेन्ट देने. उसने देखा बच्चे पटाखे जला रहे हैं तो लग गया अपनी कमेन्ट लगाने. बच्चे एक पटाखा जलाते तो वह तालियाँ बजाता और फिर उनसे कहता कि-''लाओ यार एक पटाखा मुझे दे दो तो मैं जलाकर तुम्हें दीपावली की कमेन्ट दे दूं।''

बच्चे पटाखा देते और कहते-'' अंकल, एक ही देंगे, हमारे पास अधिक नहीं है।"
ब्लोगर कहता'-अरे कमेन्ट तो एक ही दूंगा, मुझे और लोगों के पास भी जाना है। मुझे और जगह भी तो दीपावली की कमेन्ट देनी है।

बच्चे अवाक होकर सोचते कि यह कमेन्ट क्या बला है? कुछ बच्चों ने इसलिए नहीं पूछा कि उनके समझ में नहीं आया तो कुछ अपना अज्ञान न प्रकट हो इसलिए नहीं पूछा। जिन बडे बच्चों को मालुम था तो वह उनके सम्मान करने की वजह से यह समझे कि मजाक कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह थी कि ब्लोगर इतने वर्षों से कालोनी में रह रहा था पर उसका यह मिलनसार रूप पहली बार सामने आया था। एक बच्चे के पास पटाखे काम थे उसने कहा-''अंकल, अपने ताली बजाकर कमेन्ट दे तो दी, अब पटाखा चलाने से क्या फायदा?"
ब्लोगर ने कहा-''अरे, उसका मतलब तो यह है कि कमेंट का कालम खोला। इतने बच्चे जला रहे हैं पर ताली तो मैंने तुम्हारे लिए ही बजाई थी।"
ऐसे ही वह चलता रहा और किसी जानपहचान वाले के घर के बाहर खडा होकर देखता लोग बुलाते--आईये, भाईसाहब। मुहँ मीठा कर जाइये।''

ब्लोगर अन्दर घुस जाता और दीपावली की कमेन्ट देता और मिठाई खाकर चला आता। उधर दूर से उनकी श्रीमती सब देख रहीं थीं और जब देखा कि वह सब चीजें आनी ही नहीं है तो वह खुद ही कालोनी की दुकानों से सब सामान खरीद लाई। उधर ब्लोगर अपना कमेन्ट कार्यक्रम समाप्त कर घर लौटा तो पत्नी की आंखों में गुस्सा देखकर डर गया और उल्टे पाँव घर से बाहर जाने को उद्यत होते हुए बोला-''अरे! मैं अपना सामान लाना तो भूल गया। अभी लाता हूँ।"
"क्या जरूरत है?"पत्नी ने कहा-''सबके घर तुम कमेन्ट दे आये अब अपने घर कौन आयेगा?'

''कोई आया तो?" ब्लोगर ने कहा।

पत्नी ने व्यंग्यात्मक रूप से कहा-''कह देना। मैंने दीपावली पर कोई पोस्ट बनायी नहीं तो कमेन्ट कहाँ से दोगे? कहाँ से मुहँ मीठा कराऊँ।तुम सबको कमेंट दे कर पटाखे जलाते और मिठाई खाते रहे, यह सोचा कि कोई तुम्हारे घर दीपावली की कमेन्ट देने भी आ सकता है। क्या जरूरत है सोचने की। "

ब्लोगर सोच में पड़ गया और बोला-''नहीं, इससे तो अपना नाम फ्लॉप हो जायेगा।"

पत्नी ने दोनों हाथ नचाते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में कहा-''तो अभी कौनसा हिट चल रहा है?"
ब्लोगर फिर सोच में पड़ गया। फिर बोला-''नहीं, पर हमें अपनी पोस्ट तो तैयार रखनी चाहिए हो सकता है की कोई कमेन्ट देने आ आजाये। मैं जा रहा हूँ।'' पत्नी ने कहा-''मत जाओ। जब तुम लोगों को केम्न्त देने में लगे थे तब मैं ले आई, आओ पहले पूजा करते हैं। फिर पोस्ट और कमेन्ट के मामले पर भी चर्चा करते हैं।

दोनों ने शांति से पूजा की। पूजा करने के बाद पत्नी फिर व्यंग्यात्मक लहजे में बोली-''अब लोगों को यह मिठाई अपनी पोस्ट मत बताना। मैं खुद ले आयी हूँ और कोई कमेन्ट देने आये मैं ही संभाल लूंगी तुम अपने कंप्यूटर रूम में ही रहना, बैठक में मत आना।''

ब्लोगर चुप हो गया और मन में यह सोचने लगा-''पोस्ट किसकी भी हो ब्लोग तो मेरा ही है। किसको पता चलेगा कि पोस्ट किसकी है। सब कमेन्ट तो मेरे नाम पर ही जायेंगे। अरे, अपने ब्लोग पर मैं कितने बडे लोगों के नाम की पोस्ट रखता हूँ पर कमेन्ट तो मुझे ही मिलते हैं। '' उसने कंधे उचकाए और लिखने बैठ गया।
नोट-यह काल्पनिक हास्य रचना है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी इससे मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा।

7/17/2007

सवाल आपके, जवाब दीपक बापू के

(यह एक काल्पनिक व्यंग्य रचना है किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है)

प्रश्न- बापू, यह वियुज क्या होता है?

उत्तर -यह अंग्रेजी का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है दृष्टि। वैसे इसको व्यूज कर लिखा जाता है पर अगर हिंदी के लेखक हो तो इस बात की फिक्र मत करो कि किस अंग्रेजी शब्द की टांग टूट रही है बस हिंदी शब्द की टांग नहीं तोड़ना , अलबत्ता अगर यूनीकोड में लिख रहे हो तो गलती चल सकती है, पर उसमें इतना ध्यान रखना कि कुछ शब्द बहुत अनर्थ कर देते हैं। जैसे किसी पुरुष के लिए लिखना है कि वह किस्मत वाला और और उसके लिख गये किस्मत वाली तो बुरा लगेगा। इतना जरूर ख़्याल रखा करें।
प्रश्न -बापू, अच्छी कमेन्ट लिखे कि अच्छा कमेन्ट?

उत्तर- यह तो किसी अंग्रेजी वाले से कभी हमने पूछा नहीं और हमारे हिंदी वाले गुरुजी ने कभी बताया नहीं! वैसे कोई अंग्रेजी वाला ही बता सकता है कि यह स्त्रीलिंग है या पुर्लिंग क्योंकि हमने कमेन्ट के साथ उन्हें इट का ही प्रयोग करते देखा है ही या शी नहीं। हिंदी में इसका आशय प्रतिक्रिया से है सो हम अच्छा कमेन्ट भी लिख सकते हैं पर हम जब लिखते हैं कि कमेन्ट तो भाव हमारा हिंदी जैसा ही हो जाता है और लिखते हैं अच्छी कमेन्ट। चल जाएगा!
प्रश्न-यह हिट और फ्लॉप क्या अन्तर होता है?

उत्तर -हिट से लोगों को कभी हेट* भी हो जाती है पर फ्लॉप से हमेशा सिम्पथी रहती है।
हेट*-चिढ
सिम्पथी*-सहानुभूति
शेष प्रश्नों का उत्तर अगले अंक में ।

7/16/2007

नारद का मोह न छोड़ें, पर दूसरी चौपालों पर भी जाएँ

पिछले तीन दिनों से नारद की फीड में गड़बड़ चल रही है पर इसके बावजूद लोग एक दुसरे को पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी दे रहे हैं, यह एक अच्छा संकेत है। कुछ लोगों ने परेशानी अनुभव की जिनमें मैं स्वयं भी शामिल हूँ पर कुछ नये एग्रीगेटरों के आने से अब नारद पर निर्भरता कम होगी और लिखने पढने वाले अब अपना काम चला सकते हैं।
नारद पर लिखे एक लेख में मैंने लिखा था कि ऐसे मंच और भी बनेंगे पर इतनी जल्दी यह सब होगा इसकी आशा मुझे नही थी। इसके बावजूद मुझे लग रहा है कि कुछ लोगों का या जानकारी नहीं है या फिर नारद के प्रति मोह है कि वह किसी और के बारे में नहीं सोच रहे है। नारद के प्रति मोह खत्म नहीं हो सकता यह बात मैं जानता हूँ क्योंकि में अपने सब मित्रों को दूसरी चौपालों पर देख रहा था और बीच-बीच में नारद पर भी जाता था कि कहीं चालू तो नहीं हो गया। कुछ लोगों ने तो निराशा में अपनी पोस्ट भी डाली और वह भी दूसरी चौपालों पर दिख रही थी और मैं सोच था कि क्या उसके रचनाकार को पता है कि उसकी रचना पढी जा रही है?
बहरहाल मुझे यह अच्छा लगा और मेरा विचार है कि नारद के ठीकठाक होते हुए भी हमें इन दूसरी चौपालों पर चहल-पहल करने की आदत डालनी चाहिए। पिछले दो तीन दिन से मैंने जितनी कमेन्ट डालीं है उन्ही चौपालों में डाली हैं। जिनके निज पत्रक वर्ड प्रेस पर हैं उन्हें तो वियुज से पता लग जाता है जिनके केवल ब्लागस्पाट पर हैं उन सबको शायद इसकी जानकारी नहीं होगी कि उनको दूसरी चौपालों पर भी देखा जा रहा है। मैंने इन चौपालों पर जाकर देखा उन्होने नारद से कई चीजें सीखकर उसमें काफी सुधार किया है। मैं देख रहा हूँ कुछ लोग जानते हैं पर सब इसे जानते हैं इसमें मुझे शक है क्योंकि अगर वर्डप्रैस के ब्लोग पर वियुज नहीं होते तो मुझे पता ही नहीं लगता। खैर! मैं अपने जैसे अल्प ज्ञानी लोगों को बता दूं कि लोग लोग ब्लोगवाणी, चिट्ठा जगत और हिंदी ब्लोग कॉम के बारे में लिखते तो हैं पर सरल भाषा में कोई नहीं बता रहा कि यह क्या है?
यह नारद जैसी चौपालें हैं जो आपके ब्लोग को लिंक कर चुकी हैं और उनकी साज़-सज्जा बहुत अच्छी है सबसे बडी बात इण्टरनेट पर हिंदी को फलती-फूलती देखने का हमारा भाव है उसकी तरफ इसे कदम माना जाना चाहिए। निरपेक्ष भाव से उन लोगों के परिश्रम की प्रशंसा करना चाहिए-और अपनी चहल -पहल वहाँ भी करना चाहिऐ क्योंकि हम सब वहां जाकर एक दुसरे को पढेंगे तो संपर्क सतत बना रहेगा। नारद के मित्र वहां भी है और मेरे लिए दो ही चीजें महत्वपूर्ण हैं मेरा लेखन। और मेरे मित्र मैंने इसी ब्लोग पर उन चौपालों के झंडे-डंडे लगा दिए हैं ताकि एक नहीं तो दूसरी जगह जा सकूं, बिना पढे मैं लिख सकूं यह मेरे लिए संभव नहीं है।
कुछ जानकर लोग कहेंगे यह क्या कचडा लिख दिया पर मैं बता दूं कि भारत एक व्यापक देश है सभी कंप्युटर के जानकार और अंगरेजी पढे लोग लेखक नहीं हैं उसी तरह सारे लेखक भी कंप्युटर और अंगरेजी के विशेषज्ञ नहीं हो सकते -अगर कंप्यूटर पर लिखने की कोई ऎसी शर्त होती तो मुझे आप लोग यहां पढ़ नही सकते थे।
यह तो थी तकनीकी रुप से अपने जैसे अल्प ज्ञानियों से अपनी बात! अब मैं अपने जैसे फ्लॉप निज-पत्रक लेखकों (ब्लोगार्स ) को भी यही कहूँगा कि नारद के बाद वहां भी चहल कदमी अवश्य करें । नारद के और वर्डप्रैस के हिट वहाँ नही चल सकते -उन्होने अधिक और नियमित पोस्ट लिखने वालों की सूची अलग जारी कर रखी है -आप अपने वियुज कितने भी जुटाये वहाँ हिट नियमित और अधिक लेखन से ही संभव है। वहाँ की सूची में आपको पता चल जाएगा कि कौन कितने पानी में हैं। मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता पर कभी कभी यह लगता है लोगों ने लेखन को मजाक बना लिया है। मैंने कई ऐसे लेखक देखे हैं जो निरपेक्ष भाव से अच्छी रचनाएं दे रहे हैं पर कभी कभी उन्हें लगता है कि उनकी उपेक्षा जा रही है-ऐसे लेखको को वहाँ लगेगा कि वहाँ उन्हें सही प्रस्तुत किया जा रहा है। उनकी हिट दिखाने का तरीका बहुत सही है।
आखरी बात एग्रीगेटरों से समय आ गया है कि वह जो आचार संहिता बनाएं हुये हैं तो उस पर चलें भी-जिन नियमों को बना रहे हैं उन्हें न स्वयं तोड़े न किसी को तोड़ने दें। आपस में प्रतिस्पर्धी नही पूरक बनें क्योंकि अभी सफर बहुत लंबा है । किसी लेखक के साथ पक्षपात न करें । सभी के प्रति समान दृष्टिकोण रखें-चाहे कोई उन्हें पसन्द हो या न हो। साथ ही आचरण और मान मर्यादा का उल्लंघन न हो यह उनकी जिम्मेदारी है । वह यह कहकर नहीं बच सकते कि हम किस-किस पर निगाह रखेंगें । और हाँ आलोचनाओं से उन्हें घबडाना चाहिए। जब आप सार्वजनिक काम करते हैं तो आपको जहाँ प्रशंसा मिलती है तो आलोचना झेलने के लिए भी तैयार रहना चाहिऐ।
जिस तरह में एग्रीगेट्रों से कह रहा हूँ वैसे ही मैं लेखकों से भी कह रहा हूँ कि वह भी सभी के प्रति समान दृष्टिकोण रखें और सभी चौपालों पर आवक-जावक करें। नारद का मोह हमारे मन से खत्म नहीं हो सकता पर उस पर दबाव खत्म करने के लिए यह जरूरी है। इससे एक तो आपके अन्दर ज्यादा से ज्यादा लिखने की इच्छा पैदा होगी और स्वत: अच्छी रचनाएं बाहर आयेंगी और दूसरा हमारे पास इतना समय ही नहीं रहेगा कि हिट और फ्लॉप का लेखा-जोखा रख सकें। अब हिट और फ्लॉप का मुकाबला रचना के स्तर और संख्या के आधार पर होने वाला है । मैं छुपाऊंगा नहीं आज यह रचना मैं अपनी संख्या बढाने के लिए ही लिख रहा हूँ-क्योंकि एक चौपाल पर संख्या के आधार पर रेटिंग हो रही है।

4/24/2007

गर्मी में ठंडा गले से पंगा-व्यंग्य

गर्मी में ठंडा यानी अपने गले से पंगा। मजाक लगने वाली यह बात मेरे लिए एकदम सही बैठती । ऐसा कई बार हुआ है जब मैं गर्मी में कभी ठंडे पानी का सेवन करता हूँ मेरे गले में खराश होने लगती है और फिर लगता है ज़ुकाम और बुखार है।
कल तेज गर्मी में स्कूटर पर सवार होकर मैं ऑफिस पहुंचा और अपने काम में मशगूल हो गया , कुछ देर बाद पानी पिलाने वाला आया और मेरी टेबल पर भरा ग्लास रख दिया, मैंने न चाहते हुए भी उस गटक लिया । फ्रिज का होने के कारण पानी एकदम ठंडा था , हालांकि मुझे ठंडा पानी पीना पसंद नहीं है पर चूंकि पानी लेकर लड़का पास ही आ गया तो फिर उसे मना करने में ठीक नहीं लगता। मैं अपने काम में लगा रहा, करीब आधे घंटे बाद फिर वह पानी लेकर आया फिर मैंने अपनी उदारता का परिचय देते हुए गटक लिया और लड़के से कहा"यार , इसमे कुछ गर्म पानी मिला लिया करो , इतना ठण्डा मुझे पीया नहीं जाता। वह बोला-"साहब लोग तो इससे भी ठंडा पानी पिलाने के लिए कहते हैं। "
वह चला गया तो मैं सोचने लगा या तो मेरे शरीर में ही कोई गड़बड़ है या फिर लोग के या फिर यह लड़का मुझे चला रहा है। उसके जाने के बाद पांच-दस मिनट में मुझे अपने गले में खराश अनुभव होने लगी और फिर लगा के मेरे फैफदों में बलगम जमा हो रहा है, मुझे यह समझते देर न लगी कि मैंने अपने गले में ठंडा डालकर उससे पंगा मोल ले लिया है। एक घंटे बाद लड़का फिर आया पर मैंने उससे ग्लास वापस करते हुए कहा-"मेरे लिए ठंडा पानी कभी मत ले आना।"
कुछ देर बाद एक आवश्यक कार्य से मैं कम्प्यूटर कक्ष में गया, वहां जाकर एक कम्प्यूटर पर अपना काम शुरू किया तो देखा जो पास में सज्जन बैठें है वह अपने गले को साफ कर रहे थे, मैंने उनसे पूछा-"सुबह से कितने ग्लास ठंडे पाने के पी चुके हो ?"
वह एकदम चौंक कर बोले-" छ: ग्लास पी चुका हूँ, पर तुम क्यों पूछ रहे हो?"
मैंने कहा-"बस ऐसे ही।"
वह बोले-"अब मैं समझा! मुझे एकदम ज़ुकाम क्यों हो गया? यार अब मैं कभी ठंडा पानी नहीं पीयूँगा। घर पर जबसे फ्रिज आया है गर्मियों में मुझे ज़ुकाम हो जाता है।
मैंने कहा-"मुझे तुम्हारा तो पता नहीं पर मैंने अपने जीवन में लंबा समय बिना कूलर और फ्रिज के निकाला है तो अब मुझे सूट नहीं करते, गर्मी में जब तक मेरे शरीर से पसीना न निकले तब तक मैं अपने को बीमार महसूस करते हूँ । आज चूंकि सारा दिन कूलर या ऎसी.में निकालना है ही तो शाम तक मुझे बुखार भी आयेगा।
उन सज्जन ने मुझे लक्जरी आइटमों के तमाम दोष गिनाए पर मैं जानता था कि इससे कोई परिणाम नहीं निकलने वाला। आप ऑफिस या घर में कहीं भी न तो अकेले रहते है और न ही समर्थ होने के बावजूद अपने मन से फैसले लेने सक्षम होते है। जब शुरू में फ्रिज आया था तो मैंने देखा कि मुझे आये दिन ज़ुकाम होता था, और वह इतना कहर बर्पाता था कि भीषण गर्मी में भी मैं परेशान हो जाता था। एक दिन अखबार में जब फ्रिज के बारेमें दोषों को पढा मैं उसी दिन जाकर मटका ले आया और यकीनन उसके बाद मुझे जुकाम से निजात मिल गयी, जो चीजें लोगों को सुख देती हैं वही मुझे काटती हैं । छुट्टी के दिनों में जब मैं सायकिल पर बाहर जाता हूँ तो लोग हसते हैं और कहते हैं-"यार पैट्रोल के पैसे बचा रहे हो। "
और ऐसा कहने वाले वह लोग होते हैं जो एक टांग उठाते हैं तो दूसरी कब उठेगी यह पता नहीं लगता। हांफते हुए चलते हैं और अपनी दवा किसी डॉक्टर के यहां से ला रहे होते हैं। मैं हंसता हूँ । एक दिन एक लड़के ने मुझसे कहा-"आप सायकिल पर क्यों चलते हैं ?आपके पास स्कूटर है और लोग सोचते हैं कि
आप कजूस हैं!
मैंने कहा -"तुम जिम में जाकर सायकिल भी चलाते हो और फ़ीस भी देते हो कम से कम मैं इससे तो बचा हुआ हूँ। "
एक दिन वही लड़का मोटर सायकिल पर एक डॉक्टर के यहाँ से दवा लेकर लॉट रहा था, मेरे पूछने पर बोला,कल शादी मैं गया था तो वहां खाने के बाद जमकर ठंडा पानी पी लिया और आज तेज ज़ुकाम हो गया है डाक्टर ने ठंडा पीने से मना किया है। अब आप हे बताईये एसी गर्मी में बिना ठंडे के का कैसे रहा जा सकता है?
मैंने हसते हुए कहा-"रहा जा सकता है न! ठंडा पीकर ज़ुकाम के साथ।

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