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2/11/2014

भर्तृहरि नीति शतक-भोजन के लिये श्वान नहीं हाथी बनकर व्यवहार करें(bhartrihari neeti shatak-bhojan ke liye shwan nahin haathi bankar vyavhar karen)



      इस संसार में भूख सभी को लगती है पर भोजन पाने और करने के सभी के तरीके अलग हैं।  अपना कमाकर खाने वाले लोग जहां जीवन में आत्मविश्वास से भरे होते हैं वही दूसरे से कर्ज, भीख अथवा मदद मांगने वाले लोग हमेशा ही हृदय में दीनता का भाव लेकर जीते हैं। कहा जाता है कि जैसा खायें अन्न वैसा ही होता है मन। इसका आशय अन्न के दानों का स्वरूप ही नहीं वरन् उसके लिये अर्जित धन से साधन से भी जोड़ना चाहिये।  यह भी कहा जाता है कि परमात्मा पेट देने से ही पहले अन्न के दानों पर खाने वाले का नाम लिख देता है। यह ज्ञान रखने वाले लोग आत्मविश्वास से जीवन में अपना हर काम करते हैं। इसके विपरीत जो मन में कर्ता का भाव लिये होते हैं उन्हें परमात्मा की इस सांसरिक कृति पर यकीन नहीं होता इसलिये अपनी आवश्यकताओं के लिये वह अतिरिक्त सक्रियता दिखाते हैं। उनके मस्तिष्क में चिंताओं का ढेर भरा होता है।  जिसके चलते न केवल वह दैहिक बल्कि मानसिक रूप से भी अस्वस्थ हो जाते हैं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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ङ्गल चालनमधरश्चरणावपातं भूमी निपत्य वदनोदर दर्शनं च।
श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्वते।।
     हिन्दी में भावार्थ-कुत्ता भोजन देने वाले के आगे पूंछ हिलाकर उसके सामने मुंह वह पेट दिखाते हुए लोटपोट उसके  अपनी दीनता प्रदर्शित करता है जबकि हाथी उसे गंभीरता से देखता है और कई बार मनाने पर ही भोजन ग्रहण करता है।

कृमिकुलचित्तं लालक्लिन्नं विगन्धिजुगुप्सितमु निरुपमरसं प्रीत्या खादनन्नरास्थि निरामिषम्।
सुरपतिमपि श्वा पार्श्वस्यं विलोक्य न शंकते न हि गणवति क्षुद्रो जन्तु पिरग्रहफलगुनाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-कीड़ों से युक्त, रसहीन, दुर्गंध से भरी, स्वादरहित, घृणित हड्डी को पकड़ कर बहुत उत्साह से चबाता है। उस सयम अपने पास आये देवता की भी उसे परवाह नहीं होती।
      हम देख रहे हैं कि हमारा परंपरागत भारतीय समाज पूरी तरह से बिखर चुका है।  यह कहा जरूर जाता है कि हम एक संगठित भारतीय समाज के सदस्य हैं पर  सभी को पता है कि यह दावा एकदम खोखला है।  सभी दावा करते हैं कि वह किन्हीं जातीय, धार्मिक, भाषाई अथवा विशिष्ट समाज के सदस्य होने के कारण सुरक्षित अनुभव करते हैं पर सच यह है किसी को हृदय से अपनी ही बात पर ही यकीन नहीं होता है।  पाश्चात्य वस्तुओं को अपनी दैनिक तथा सांस्कारिक आवश्यकताओं के मूल से जोड़ने वाले हमारे  भारतीय समाज का मनोबल गिरा हुआ है।  हम भ्रष्टाचार तथा बेईमानी के विरुद्ध प्रत्यक्ष रूप से अभियान छेड़ने की बात तो करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि इसमें लिप्त लोग इसी भारतीय समाज के सदस्य हैं।  भ्रष्टाचार और बेईमानी में लगे लोगों को दूसरे का अपराध तो दिखता है पर अपना धन का लोभ इस आशंका के मारे नहीं छोड़ पाते कि अगर संपन्नता नहीं है तो समाज उनको पूछेगा भी नहीं-यही नहीं वह लोग अपने बेईमानी को मेहनत की कमाई मानने का तर्क स्वयं को देकर ही समझाते हैं।
      कहने का अभिप्राय यह है कि हम दूसरे की तरफ न देखें वरन् अपने व्यवहार, विचार तथा व्यक्तित्व पर दृष्टिपात करें।  अगर हम दृढ़ता पूर्वक सत्य का मार्ग लेंगे तो कभी जीवन में कुंठा का अनुभव नहीं होगा।  जो व्यक्ति सिद्धांत पर दृढ़ रहता है उसके मुख मंडल पर तेज स्वतः प्रकट होता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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2/07/2014

योग शास्त्र के आधार पर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को चुनौती देना ठीक नहीं-हिन्दू अध्यात्मिक चिंत्तन(yog shastra ke adhar pa aadhunik chikitsa vigyan ko chunauti dena theek nahin-hindu adhyatmik chinttan)



      जब हम भारतीय धर्म की बात करते हैं तो कहते है कि इस ेन मानने वालों से भय है। अन्य धर्म के ठेकेदार इसे ध्वस्त करना चाहते हैं।  सामान्य भारतीय इस तरह के प्रचार का शिकार भी हो जाते हैं पर योग तथा अध्यात्म ज्ञान साधकों के विचार में भारतीय धर्म के सबसे अधिक बैरी वह लोग हैं जो प्रचार के नाम पर तमाम तरह के पाखंड रचते हुए धन तथा शिष्य संग्रह के साथ ही सम्मान के लिये प्रयास करते हैं।  महत्वपूर्ण बात यह है कि योगविद्या की प्रेरणा तथा तत्वज्ञान देने वाले कथित धार्मिक प्रचारक  श्रीमद्भागवत गीता तथा पतंजलि योग सूत्रों के बारे में  जानते ही नहीं है या फिर उनका ज्ञान अल्प है।  कुछ लोग तो थोड़ा अध्ययन करने के बाद ही धर्म प्रचार में निकल पड़ते हैं-प्रत्यक्ष वह लोग साधु दिखते हैं पर दरअसल उनका यह अभियान एक तरह से व्यवसाय होता है। वह धर्म के प्रचार के दौरान दान या दाम लेते हैं जिससे उनकी भौतिक उपलब्धियां प्राप्त होती हैं।  अनेक कथित संतों ने इतनी संपदा एकत्रित कर ली है कि बड़े बड़े पूंजीपति तक उनके आगे सिर झुकाते हैं।  कई संत तो अपने संस्थानों का पैसा लाभी के लिये औद्योगिक  क्षेत्र में विनिवेश करते हैं और लगता है कि कहीं न कहीं उनके आगे सिर झुकाने वाले धनपति उनसे लाभ उठाने के कारण ही शिष्य बनते हैं और सामान्यजनों का यह भ्रम होता है कि हमारे गुरु इतने पहुंचे हुए हैं कि उनके आगे बड़े बड़े नतमस्तक हैं।
      अभी हाल ही में एक संस्थागत संत की समाधि को लेकर चर्चा हुई।  उन संत के सीने में दर्द्र हुआ। शिष्य उनको लेकर अस्पताल गये वहां उनकी मृत्यु हो गयी। चिकित्सकों ने उनको मृत घोषित किया पर शिष्य उनका शव आश्रम में ले आये और शीतगृह में रख दिया। शिष्यों का कहना है कि उनके गुरु समाधि में हैं और वापस आयेंगे।  आश्रम के बाहर भक्तजनों का जमावाड़ा है।  इस पर बहस में अनेक साधु भी आये। कुछ ने  संत की मृत्यु को सत्य माना पर समाधि को लेकर उनके बयान भी समझ से परे थे। आधुनिक या पाश्चात्य चिकित्सीय विज्ञान समाधि को नहीं समझ सकता-यह भ्रम फैलाया जा रहा है।  जब संत का हृदय और मस्तिष्क निष्क्रिय हो तो यकीनन उनका देहावसान हो चुका है पर अनेक कथित संत कहते हैं कि भले ही वह चर्चित संत समाधि में न हो पर समाधि में होने पर मस्तिष्क और हृदय की क्रिया बंद रहती है।  वह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को हेय प्रमाणित करते हुए कहते हैं कि समाधि का विषय उसकी समझ की परिधि से बाहर है।
      हमारा मानना है कि चिकित्सा विज्ञान के साथ भारतीय अध्यात्म दर्शन के सिद्धांतों की संगत होना कोई बुरा नहीं है और अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के लिये चुनौती की बात करना आत्मविश्वास की कमी का प्रमाण है ही नहीं हास्य का विषय भी बन जाता है।
      यहां यह बता दें कि समाधि एक प्रकार की मनस्थिति है और देह से उसका कोई संबंध नहीं है। पहली बात तो यह कि समाधि की बात करने वालों ने कभी यह बताया ही नहीं कि उसके भी दो प्रकार होते हैं- एक सबीज दूसरी निर्बीज समाधि।
      पतंजलि योग के अनुसार चित्तवृतियों का निरोध ही समाधि है और यह अभ्यास और वैराग्य से ही संभव है। चित्त में स्थिरता के लिये किया जाने वाला प्रयास अभ्यास है।  यह अभ्यास लंबे समय तक होता है और जब देखे अथवा सुने विषयों पर चित्त का नियंत्रण हो जाता है तब उसे वैराग्य ही समझा जाना चाहिए।  सीधी बात कहें तो चित्त की स्थिरता ही समाधि है। स्वप्न तथा निद्रा का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी स्थिर चित्त या समाधिस्थ कहा जाता है।
      हमारे अध्यात्म दर्शन के अनुसार निद्रा मोक्ष का ही रूप है।  जिस व्यक्ति को यह ज्ञान हो गया है कि प्रातःकाल धर्म, दोपहर काल अर्थ, सांयकाल काम या मनोरंजन और रात्रिकाल मोक्ष के लिये है उसे अन्य किसी ज्ञान की आवश्यकता ही नहीं है।  उसकी निद्रा ही समाधि है।  जब वह निद्रा में होता है तो उसे स्वप्न भी आते हैं पर वह उनकी परवाह नहीं करता। प्रातःकाल वह फिर धर्म कार्य में लग जाता है।  एक तरह से वह योगी या समाधिस्थ पुरुष ही है। सांसों को रोकनस और छोड़ने की प्रक्रिया  जहां स्वाभाविक रूप से होती है तो प्राणायाम में व्यक्ति उसका स्वयं संचालन करता है।  समाधि में इन सांसों के रुकने की बात अपने आप में एकदम कुतर्क लगता है क्योंकि सांसों पर नियंत्रण की प्रक्रिया को प्राणायाम कहा जाता है।
      पतंजलि योग का आष्टांग योग एकदम वैज्ञानिक सूत्रों वाला है।  उसके आधार पर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान या प्राणी विज्ञान को चुनौती देने का कोई अर्थ ही नहीं है। प्राणी या चिकित्सा विज्ञान जीव की देह तक ही सीमित है और पतंजलि योग मनुष्य की मनस्थिति को नियंत्रित करने के सूत्र प्रतिपादित करता है।  देह के विषय में चिकित्सा विज्ञान को चुनौती देने से कोई अपने आपको ज्ञानी साबित करने का प्रयास भले ही करे पर हमारी दृष्टि से यह उसके अज्ञान तथा आत्मविश्वास की कमी का प्रमाण है। अगर चिकित्सक किसी देह को मृत घोषित करते हैं तो उन्हें इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वह समाधि के विषय में कुछ नहीं जानते। अंततः समाधि एक दैहिक नहीं वरन् एक मनस्थित है और यकीनन चिकित्सक देह के बारे में एक योग साधक से अधिक जानते होंगे।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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1/30/2014

अपना ईमान बचा रहे-हिन्दी व्यंग्य कविता(apna eeman bacha rahe-hindi vyangya kavita)



टूटे दिल के लोग
समाज के नाम पर अकड़ कर खड़े हैं,
संस्कार और संस्कृति में मिला दिया विदेशी रंग
फिर भी पुराने रिश्तों की फटी थैली पकड़कर अड़े हैं।
कहें दीपक बापू
कमाई लूट की है या झूठ की
कौन किससे पूछता है,
हर कोई दौलतमंद बनने के लिये
शातिर सोच की पहेलियां बूझता है,
नहीं जानते दीवार के पीछे छिपा सच
सामने पाखंडी अदाओं पर हर कोई मरता है,
कुओं की रखवाली चाहे जिसे सौंप दो
आंख बचाकर अपने बर्तन जरूर भरता है,
हम किससे वफादारी निभाने की  कहें,
किस किसकी  शिकायत कर जुबान थकाते रहें,
जमाने की नज़र में बेईमान ही सबसे बड़े हैं,
अपना ईमान बचा रहे  हम तो इसी पर अड़े हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
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1/25/2014

संत तुलसीदास दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख-दावों और वादों पर यकीन न करें(sant talsidas darshan par aadharit chinntan lekh-dovaon aur vaadon par yakin n karen)



      आधुनिक लोकतंत्र ने हमारे में आम मतदाता को अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है। संसार के अधिकतर मनुष्य राजसी प्रकृत्ति के होते हैं पर सभी राजकीय कर्म नहीं करते न ही करना चाहते मगर जिनमें राजपद का मोह है वह आम मतदाता को लुभाने के लिये अनेक तरह के स्वांग रचते हैं।  इनमें अनेक लोग ऐसे होते हैं जो चुनाव से पूर्व किसी न किसी तरह अपनी धवल छवि सामान्य समाज में बनाये रखते हैं पर जब चुनाव हो जाता है उसके बाद जब उनकी असलियत सामने आती है तो अनेक बार लोग यह सोचकर दुःखी हो जाते हैं कि उन्होंने अपने मत का सही उपयोग न कर गलती की।  चुनाव के समय अनेक लोग लुभावने नारे देते हैं। कई बार तो वह ऐसे वादे करते हैं जिनको पूरा करना संभव नहीं होता। चुनाव लड़ने वाले अनेक लोग गलत वादे या सपने नहीं दिखाते उनको ऐसे प्रपंचियों को प्रचार का सामना करने में कठिनाई आती है। सभी प्रपंचियों को जीत भी नहीं मिलती पर जिनको मिलती है बाद में समाज उनके चयन पर पछताता है।
संत प्रवर तुलसीदास जी कहते हैं कि

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‘तुलसी’ खल वानी मधुर, सुनि समझिअं हियं हेरि।

राम राज बाधक भई, मूढ़ मंथरा चेरि।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-कुटिल लोगों की वाणी अत्यंत मधुर होती है इसलिये उनकी बात पर सोच समझकर यकीन करना चाहिये। मंथरा ने अपनी मधुर वाणी से केकयी को वश में कर ही राम के राज्याभिषेक में बाधा उत्पन्न की थी।

बचन वेष क्या जानिऐ, मनमलीन नर नारि।

सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-वचन तथा  वेषभूषा से किसी मन के मलिन स्त्री या पुरुष की पहचान संभव नहीं है। सुपनखा, मारीचि, पूतना और दशानन रावण को उनके अपराधों से पहचाा जा सका।
      राजनीति में सक्रिय सभी लोग एक जैसे वस्त्र पहनते हैं। अधिकतर राजनेता शौक तथा उत्साह की वशीभूत राजनीति में आते हैं। उनमें छल, कपट या धोखा देने की विचार नहीं होता पर उन्हें भी ऐसे प्रपंची नेताओं की वजह से समाज सम्मान नहीं देता कि शायद वह भी उसी तरह के होंगे।  हम देख रहे हैं कि समाज में राजनेताओं के प्रति अनेक तरह के दुराग्रह पाल लिये गये हैं।  यह देखकर दुःख होता है कि हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली है और उसके स्तंभ यही राजनेता हैं पर उनकी छवि चंद प्रपंची नेताओं की वजह से खराब हो रही है।  इसके लिये पूरी तरह से राजनेताओं को भी जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। जब आम मतदाता भ्रमित होकर स्वच्छ छवि और नीयत वाले नेता का चुनाव नहीं कर पाता तो उसे भी यह जिम्मेदारी लेनी ही चाहिये कि उसने अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं किया।  वह उन प्रपंची नेताओं के वादों तथा विचारों में बह गया जिनकी नीयत पहले से खराब थी जबकि उसके सामने उससे चयन के लिये बेहतर विकल्प मौजूद थे।  हम लोग राजनेताओं पर उंगली उठाने से पहले इस बात भी तो विचार करें कि एक मतदाता के रूप में हमने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया तरह किया।


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1/17/2014

आम आदमी की मजबूरी-हिन्दी कविता(aam aadmi ki mazboori-hindi kavita)



एक ने धोखा दिया
दूसरा दे रहा है
तीसरा भी आगे देगा,
अंतर क्या पड़ता है
जिसको जितना हिस्सा चाहिये
राजी या गैरराजी जरूर लेगा।
कहें दीपक बापू
जिंदगी भरोसे पर चलायें
यह भले इंसानों की मजबूरी है,
कोई विश्वास निभाये
यह ख्वाहिश अभी अधूरी है,
कदम कदम पर खड़े हैं लालची लोग
अपनी हालातों में फंसा आदमी
कहां तक
किस किससे लड़ेगा।
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1/06/2014

अक्ल की आंखें खोलो-हिन्दी व्यंग्य कविता(akla ki aankhen kholo-hindi vyangya kavita)



जज़्बातों के बाज़ार में
मुफ्त में शय देने का वादा कर
ज़माने के नायक बन जाओ,
बाज़ार में खलबली मच जायेगी
आये मांगने कोई छिप जाओ।
कहें दीपक बापू
कोई सौदागर अपना खजाना
यूं ही नहीं लुटाता है,
पर्दे के पीछे अपने फायदे के सामान जुटाता है,
मिल जाये किसी को  छिपा खजाना,
बांटता है कुछ सामान
अकेले में न खाने का करता बहाना,
यकीन करो यारो
यह मुफ्त में कोई नहीं सामान देता
अक्ल की आंखें खोलो
नायकों के सामने यूं न बिछ जाओ।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश
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12/27/2013

अध्यात्मिक ज्ञान के अलावा भ्रष्टाचार रोकने का अन्य कोई उपाय नहीं-हिन्दी धार्मिक चिंत्तन लेख (adhyatmik gyan ke alawa bhrashtachar rokne ka anya koyee upay nahin-hindi dharmik lekh or hindu thought aritcle on curroption in india))

            हम देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की जब बात करते हैं तो लगता है कि यह वर्तमानकाल की ही समस्या है। हम जब मनृस्मृति पर दृष्टिपात करते हैं तो लगता है कि यह समस्या मानवीय स्वभाव से जुड़ी है।  काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार की प्रवृत्ति तो देह में जीवात्मा के प्रविष्ट होने के साथ ही आ जाती हैं। यह अलग बात है कि कुछ लोग पारिवारिक संस्कारों, गुरुओं की सात्विक शिक्षा तथा मित्रों की सुसंगत के कारण अपने दुर्गुणो का सीमित शिकार होते हैं।  यह कहना ठीक नहीं है कि उच्च राजसी कर्म जिसे हम राजकीय कर्म में लगे हैं सभी शठ है पर इतना तय है कि मानवीय स्वभाव के कारण बड़ी संख्या में ऐसे राज्य कर्मचारी होते हैं जिनके मन में वेतन से इतर कमाने की चाहत भी होती है।  यह भी सच है कि सभी को भ्रष्टाचार का अवसर नहीं मिलता इसलिये थोपी गयी ईमानदारी का बोझ ढोते हैं। जिनको अवसर मिलता है वह अपने भाग्य की प्रशंसा करते हुए दोनों हाथों से पैसा बटोरते हैं।  दूसरी बात यह है कि हमारे यहां कानून इतने बने हैं कि किस विषय पर कौनसा नियम सही है या गलत इसका पता आम इंसानों को नहीं लगता जिसका लाभ वह राजकीय कर्मी अनुचित ढंग से उठाते हैं जिनका प्रत्यक्ष संपर्क प्रजा से रहता है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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राज्ञो हि रक्षाधिकृतः परस्वादायिनः शठाः।
भृत्याः भवन्ति प्रावेण तेभ्योरक्षेदिनभाः प्रजाः।।
            हिन्दी में भावार्थ-राज्य में प्रजा की रक्षा के  लिये नियुक्त कर्मचारियों को दूसरे के माल हड़पने की शठ प्रवृत्ति होती है। ऐसे कर्मचारियों से प्रजा की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।
ये कार्यिकेभ्योऽर्थमेव गृह्णीयुः पापचेतसः।
तेषां सर्वस्वमादाय राजा कुर्यात्प्रवासनम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-प्रजा से कार्य करने के लिये उससे धन लेने वाले कर्मचारी की संपत्ति छीनकर उसे देश निकाला दिया जाना चाहिये।
            हमारे देश में कुछ समय पूर्व एक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चला था। इस आंदोलन के शिखर पुरुषों को प्रचार माध्यमों में खूब लोकप्रियता मिली। इसका कारण यह था कि देश में बेकारी, बीमारी तथा बुरी प्रबंध व्यवस्था से लोग उकता गये हैं जिससे वह आशा भरी नज़रों से इस आंदोलन को देख रहे थे।  इस आंदोलन से लोकप्रिय लोगों ने अपनी अपनी भूमिका के अनुसार आम जनमानस में अपनी नायकीय छवि बनायी जिसमें से कुछ ने तो उसे भुनाते हुए चुनावी राजनीति में पदार्पण कर सफलता भी प्राप्त की।  जब यह आंदोलन चल रहा था तो ऐसा लगा कि भ्रष्टाचार आज या अभी खत्म हो जायेगा ओर जनहित के काम धरातल पर दिखने लगेंगे।  यह नाटकीय घटनाक्रम चला। प्रचार माध्यमों को अपने विज्ञापनों का समय पास करने के लिये नये नायक मिले जिनकी गतिविधियों से उनके पास समाचार तथा बहसों की सामग्री का निर्माण हुआ।  वास्तविकता में देश की हालत वही है जो पहले थी। कहने का अभिप्राय यह है कि यह भ्रष्टाचार एक मानवीय समस्या है पर राज्य के शिखर पुरुष इसे तभी रोक सकते हैं जब वह अपने अंतर्गत काम करने वाले लोगों में दंड का भय पैदा करें। कुछ राज्य प्रमुख इसे नियंत्रित करते हैं पर सभी के लिये यह संभव नहीं हो पाता।
            कहा भी जाता है कि राजा का काल ही कलियुग, सतयुग तथा त्रेतायुग का निर्माण करता है।  जिन राज्य प्रमुखों के राज्य भ्रष्टाचार नगण्य रहा वह महान कहलाये वरना तो सब वैसे ही चलता रहा जैसे अब चल रहा है।
            भ्रष्टाचार से निपटने का यही उपाय है कि समाज में चेतना लायी जाये। इसका एक ही उपाय है कि लोगों को योगासन, ध्यान, मंत्र जाप तथा ध्यान के माध्यम से दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रूप से दृढ़ बनाया जाये। यह तभी संभव जब लोगों को  अध्यात्मिक ज्ञान निरंतर दिया जाये।  एक योगाचार्य ने अपने व्यवसायिक प्रयासों से भारत में योग विद्या का का प्रचार किया तो सारा समाज प्रभावित हुआ। एसा लग रहा था कि वह एक बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में बढ़ रहे हैं।  समाज को दैहिक तथा मानसिक रूप से मजबूत बनाकर उसे आर्थिक तथा अध्यात्मिक विकास के समन्वित पथ पर  लाया जा सके। उन योगाचार्य ने धन और प्रतिष्ठा प्राप्त की और फिर अपना अभियान राजनीतिक विषयों की तरफ मोड़ दिया।  यह निराशाजनक स्थिति रही।  अब उन्हें कौन समझाता कि मानवीय प्रकृत्तियों को केवल योग और ज्ञान साधक ही लांघ सकते हैं।  बहरहाल भ्रष्टाचार से बचने का एकमात्र मार्ग यही है कि लोगों को अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली बनाया जाये।

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12/11/2013

पांच राज्यों के मतदाताओं को मतदान पर बधाई-हिन्दी चित्तन लेख(election in five state in india-hindi thought article)



            अभी हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए।  इन चुनावों के परिणाम आने के साथ ही नयी सरकारों के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।  एक स्वतंत्र फोकटिया लेखक होने के कारण हमने इन चुनावों पर एक आम आदमी की तरह दिलचस्पी ली।  मध्यप्रदेश, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ राज्यों के चुनाव तथा उसके परिणामों में इस लेखक की  स्वाभाविक दिलचस्पी थी। मध्यप्रदेश तो स्वयं का राज्य है और छत्तीसगढ़ कभी चूंकि इसी प्रदेश का भाग था तो उससे अभी भी आत्मीयता बरकरार है। राजस्थान एक तो पड़ौसी राज्य है दूसरा वहां इस लेखक की ससुराल है इस कारण उसमें भी रुचि होना स्वभाविक है।  अब कौनसा दल हारा और कौनसा जीता, यह तो बड़े विद्वानों के लिये विश्लेषण का विषय है मगर  अपनी दिलचस्पी तो बस इतनी है कि शासन सहजता से चले ताकि अपना जीवन शांति से चलता रहे।  चुनाव तो दिल्ली में भी हुए पर उसे हम अधिक महत्व नहीं दे रहे थे।  इसका कारण यह था कि वहां के विधानसभा के एक चुनाव क्षेत्र की शायद जितनी सीमा होगी वह मध्यप्रदेश में कुछ नगरनिगमों के एक वार्ड से भी कम होगी।   बहुत कम लोगों को पता होगा कि संसद की सीटों का राज्यों के गठन के समय निर्धारण जनसंख्या के आधार पर हुआ था जो कि आज तक चल रहा है। उस कारण क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य होने के बावजूद मध्यप्रदेश के लिये कम संसदीय क्षेत्र बने जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों को अधिक स्थान मिले।  दिल्ली की सात लोकसभा क्षेत्रों का जितना क्षेत्र है वह मध्यप्रदेश दो नहीं तो तीन लोकसभा क्षेत्रों से भी कम होगा। सही क्षेत्रफल का आंकड़ा नहीं वरना हम कह सकते थे कि मध्यप्रदेश का कोई लोकसभा क्षेत्र दिल्ली के सात लोकसभा क्षेत्रों के बराबर भी हो सकता है।
            आमतौर से भारतीय प्रचार माध्यम बृहद शहरों को ही भारत का प्रतीक मानते हैं पर हम उनसे सहमत नहीं हो पाते। वजह जब हम उन पर प्रसारित समाचारों तथा बहस की विषयों को देखते हैं तो लगता है कि वह भारी गलतफहमी में रहते हैं। उनके अनेक विषयों में हमारे शहर के बहुत कम लोग रुचि लेते दिखते हैं।  अभी दिल्ली में हुए चुनावों के परिणाम बहुत दिलचस्प थे पर इतने नहीं कि उसमें देश के लिये कोई विशेष संदेश ढूंढा जा सके।  ऐसा नहीं है कि हमारी दिलचस्पी दिल्ली के चुनावों के कतई नहीं थी पर चूंकि उससे अपना कुछ बनता बिगड़ता नहीं है इसलिये मन में उत्साह नहीं था।  अन्ना भक्तों ने इस चुनाव में सफलता इतनी प्राप्त की है कि वह वहां एक राष्ट्रीय दल को तीसरे स्थान पर पहुंचा सके तो दूसरा बहुमत से वंचित हो गया।  यह अलग बात है कि यह दल अन्ना भक्तों से आगे रहा है।  हमने अन्ना भक्त इसलिये कहा क्योंकि हम उनकी पहचान इसी तरह करते हैं, यह अलग बात है कि अन्ना हजारे ने किसी राजनीतिक दल से संपर्क न रखने के निर्णय के चलते उनसे नाता तोड़ लिया है।  एक बात तय है कि अन्ना हजारे का आंदोलन देश में व्यापक भावनात्मक प्रभाव डालने में सफल रहा है तो यह भी सत्य है कि अन्ना के भक्त से राजनीतिक चोला पहनने वाले इन लोगों ने उनसे अपने पुराने संबंधों को पूरी तरह से चुनावों में अधूरी सफलता प्राप्त कर भुना ही लिया।  अब अन्ना हजारे साहब  ने इनके बिना अपना अनशन जनलोकपाल के लिये पुनः प्रारंभ कर लिया है और यकीनन अन्ना भक्तों को अब उनके साथ किये गये प्रयासों को लाभ नहीं मिलने वाला।  सीधी बात कहें तो अन्ना हजारे जी के साथ आंदोलन करने के लिये जो उन्होंने श्रमदान किया उसका पूरा पुण्य कमा चुके हैं और जब वह अपने राजनीतिक अभियान को दिल्ली से चलाकर पूरे देश में चलाने की बात कह रहे हैं तो उन्हें अब उन्हें श्रमदान के नये प्रयास करने होंगे।
            भारत के आंदोलनों से बने नेता लोकप्रिय बनते हैं। चुनावों में उनकी सफलता कदम भी चूमती है पर एक प्रशासक के रूप में सभी की छवि धवल बनी रहे, यह कभी नहीं देखा गया।  कुछ की छवि जहां जनहित करने वाली बनी तो कुछ की छवि मलिन होती भी देखी गयी है।  अन्ना भक्तों ने दो राष्ट्रीय दलों का सामना अपने इष्ट के साथ खड़ी तस्वीरों के साथ ही किया यह भूलना नहीं चाहिये।  अन्ना भक्तों की छवि इसलिये अभी तक धवल है क्योंकि उन्होंने अभी राजकाज के क्षेत्र में कदम ही नहीं रखा। दिल्ली में उनको इतनी सीटें मिली है कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के बिना शर्त समर्थन से वह सरकार बना सकते हैं पर वह इसके लिये तैयार नहीं है।  उनका मानना है कि दोबारा चुनाव हों ताकि किसी एक दल के पक्ष में फैसला हो सके।  उनको अपनी धवल छवि का इतना भरोसा है दोबारा चुनाव पर उनको पूर्ण बहुमत मिल जायेगा पर राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों को लगता है कि यह अतिआत्मविश्वास है।  एक डेढ़ वर्ष से सक्रिय प्रयासों से उन्होंने यह सफलता प्राप्त की। अब दोबारा चुनाव तक वह उसे जारी रख पायेंगे इसमें संदेह न भी हो पर मतदाता की लगातार उनमें दिलचस्पी रहे यह शंकास्पद है।  अन्ना भक्त देश में बदलाव लाने की प्रक्रिया में निंरतर लग गये हैं पर आम आदमी अपना मनोबल बनाये रखेगा इसमें संदेह है।  मुख्य बात यह है कि दिल्ली की जिस सफलता पर वह पूरे देश में छाने की बात कह रहे हैं वह वैसी नहीं है जैसा वह तथा उनके समर्थक प्रचार माध्यम कह रहे है।  दिल्ली में अगर सरकार नहीं बनती तो  अन्ना भक्तों की विजेता की छवि नहीं बनती दिखती  जो आगे के अभियान में  सहायक होने वाली थी।  जनता संघर्ष करने वाले को देखते प्रसन्न होती है पर वह उसे विजेता भी देखना चाहती है।  अगर उनसे अधिक स्थान प्राप्त राष्ट्रीय दल भी सरकार नहीं बनाता तो यह अनिर्णय की स्थिति जनता में चिढ़ पैदा करेगी।  सीधी बात कहें तो अन्ना भक्त या तो विजेता के रूप में जायें या पराजित योद्धा की छवि के साथ आगे जायें।  इसमें भी पैचं है। अगर सबसे अधिक स्थान प्राप्त राष्ट्रीय दल ने सरकार बना ली तो अन्ना भक्त हारे दिखेंगे तब भारतीय जनमानस की उनसे सहानुभूति होगी या नहीं कहना कठिन है। जिस दिल्ली के चुनाव में दूसरे स्थान पर रहकर अन्ना भक्त प्रसन्न हैं हमारे हिसाब से वही उनके लिये उलझा विषय बनने वाला है।  दूसरों की क्या कहें अपने अनेक वर्ग के अनेक लोगों से अन्ना भक्तों की छवि पर मन टटोला। सभी उनकी सफलता पर चमत्कृत तो हैं पर यह प्रश्न भी उठा रहे हैं कि क्या वह सरकार बनायेंगे?
            लोकतंत्र में आंदोलनों का महत्व तो है पर सरकार और विपक्ष का भी महत्व है। चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक दल के पास यही भूमिकायें होती हैं।  जिस दल का पहला चुनाव हो उसे सरकार या विपक्ष में रहकर अपनी प्रतिभा दिखानी होती है और दिल्ली में अन्ना भक्तों को वही कर दिखाने का अवसर है। उनमें जीत का उत्साह है और प्रचार माध्यम भी उनके साथ हैं पर क्या यह सब  भारतीय जनमानस वैसे ही ले रहा है जैसा वह चाहते हैं यह भी देखना होगा।  अगर विधानसभा त्रिशंकु रही तो लोग पूछेंगे कि कौनसी सफलता हासिल करके आ रहे हो और अगर सरकार बनायी तो दिल्ली में उलझे रहेंगे। विपक्ष में बैठे तो लोग पहले उनकी वहां की भूमिका जांचेंगे।  दूसरी बात यह कि पहला पत्थर रखने पर मूहूर्त होता है तब फावड़ा चलाया जाता है।  चुनावों के बाद सरकार या विपक्ष की भूमिका में बैठना इसी तरह का है।  कोई मकान बनाया जाता है तो भी उसका मूहूर्त किया जता है। अन्ना भक्त अभी भी आंदोलन की भूमिका है।  एक पत्थर लगाया और दूसरा लगाने चल पड़े। एक मकान बनाया और ताला लगाकर दूसरा बनाने चल पड़े।  लोग तो पहले के काम का हिसाब पूछेंगे कि ‘वहां क्या कर आये हो?’
            पुराने प्रतिष्ठित दलों राजनीतिक दलों पर यह अन्ना भक्त अभी तक बरसते थे तब चूंकि चुनावी राजनीति से दूर थे इसलिये लोग उनकी बात ध्यान से सुनते थे पर जब वह इस क्षेत्र में आ ही गये हैं तो उन्हें अपनी सफलतायें पहले चुनाव से ही बतानी पड़ेंगी।  दूसरी बात यह भी कि इन स्थापित राजनीतिक दलों को अब उन पर व्यंग्य बाण छोड़ने की सुविधा भी होगी जिनका सामना करने के लिये उन्हें अब अतिरिक्त ऊर्जा चाहिये। अन्ना हजारे की जनलोकपाल की मांग से अब काम चलने वाला नहीं है। बहरहाल हमारे समझ में यह नहीं आया कि वह लिख क्या गये? फिर सोचते हैं कि हमने लिखा भी तो ऐसे लोगों के बारे में जिनको यही पता नहीं कि वह कर क्या रहे हैं।
            बहरहाल अन्ना हजारे और उनके राजनीतिक भक्तों में हमारी दिलचस्पी है सो उनकी गतिविधियां हमेंशा कुछ न कुछ लिखने को बाध्य करती हैं।  बहरहाल पांच चुनावों में जिन लोगों ने मतदाता के रूप में भाग लिया उनको ढेर सारी बधाई।  उन्होंने चाहे जिस दल को मत दिया हमें इससे हमारा कोई संबंध नहीं है पर उन्होंने एक निष्काम कर्म हृदय से किया यह पुण्य का काम है। मानव समाज में एक राजा का होना अनिवार्य है।  हम यह कहते हैं कि नेता कुछ काम नहीं कर रहे पर कम से कम राज्य व्यवस्था तो बनाये हुए हैं क्योंकि अगर यह नहीं हो तो उसका परिणाम क्या होगा, यह हम सभी जानते हैं। जब हम मत डालते हैं तो कम से कम एक राज्य व्यवस्था को बनाये रखने का समर्थन करते हैं तो मानव समाज में अनुशासन बनाये रखने के लिये आवश्यक है।





लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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12/01/2013

जीवन में उत्थान का संक्षिप्त मार्ग मिलना सहज नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख (no short cut root in life on development-hindu religion thought article)



            जिंदगी में अपने कर्म क्षेत्र के उच्च स्थान पर पहुंचने की आशा हर व्यक्ति करता है पर कुछ लोगों को इतनी उतावली होती है कि वह अतिशीघ्र सफलता की चाहत में गलत मार्ग का अनुसरण कर बैठते हैं जिसका परिणाम  हमेशा ही दुःखदायी होता है।  सच बात तो यह है कि ईमानदारी, परिश्रम तथा नैतिक आधार पर काम करने वालों के लक्ष्य का मार्ग हमेशा ही लंबा तथा दुर्गम होने के बावजूद सुरक्षित होता है।  आजकल हर कोई लक्ष्य(target)  प्राप्ति के लिये संक्षिप्त मार्ग (short cut root)ढूंढता हैं।  प्रचार माध्यमों की प्रसारण के साथ प्रकाशन सामग्री में  राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, पत्रकारिता, फिल्म तथा कला के क्षेत्र के प्रतिष्ठित पुरुषों की ही महिमा गायी जाती है। स्थिति यह है कि इन क्षेत्रों में अब सामान्य परिवारों के बच्चों का स्थापित होना ही कठिन हो गया है। यह मान लिया गया है कि राजनीति, पत्रकारिता, समाज सेवा, फिल्म तथा कला क्षेत्र में कार्य करने के गुण  भी जन्म के साथ विरासत में रक्त के साथ ही आ जाते हैं, इसी कारण वहां भी व्यापार की तरह वंशवाद शुरु हो गया है।  यही कारण है कि सामान्य परिवारों के युवाओं का मनोबल गिरा रहता है।  जहां पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण कुछ लोगों को जल्दी अवसर (chance) मिलता है वहीं सामान्य परिवारों के युवाओं को किसी सार्वजनिक क्षेत्र के विषय से स्वयं को जोड़ने के लिये अथक प्रयास करना पड़ता है। कुछ लोग संक्षिप्त मार्ग (short cut root) ढूंढने के लिये दूसरों की चाटुकारिता करने के लिये तैयार होते हैं तो कुछ उससे भी आगे जाकर अपराध की श्रेणी में आने वाला काम भी कर बैठते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात्।
आयुविप्रापवादेन दाने च परिकीर्तनात्।।
            हिन्दी में भावार्थ-झूठ बोलने से यज्ञ, अविश्वास से तप तथा विद्वानों की निंदा करने से आयु तथा दान का बखान करने उसके फल का नाश होता है।
धर्म शनैः सञ्चिनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिकाः।
परलोक सहायार्थ सर्वभूतान्यपीडयन्।।
            हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह दीमक धीरे धीरे अपने लिये बॉबी का निर्माण करती है उसी तरह मनुष्य को भी धर्म पथ धीमे धीमे चलते हुए पर किसी को पीड़ा पहुंचाये अपनी पुण्य कर्म का संग्रह करना चाहिये।
            जीवन में हमेशा सत्य के साथ चलना चाहिये।  हमेशा अपनी स्थिति तथा शक्ति पर आत्ममंथन करते हुए अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिये।  वर्तमान समय में हर शाख पर एक उल्लू बैठा है इसलिये इस गुलिस्तां में हर तरफ हरियाली होने की कामना नहीं करना चाहिये।  होता यह भी है कि अनेक क्षेत्रों के शिखर पुरुष अपना चेहरा तथा छवि उज्जवल बनाये रखने के लिये काले काम अपने ऐसे ही चेलों से करवाते हैं जो उनके पास अपना उज्जवल भविष्य गिरवी रखते हैं।  कालांतर में विपत्ति आने पर ऐसे चेलों से पीछा छुड़ाया जाता है। सच बात तो यह है कि हम उच्च शिखरों पर बैठे लोगों के बारे में यह भ्रम पालते हैं कि वह कोई उदारमना है। दरअसल ऐसे लोग भी हमारी तरह ऐसे इंसान होते हैं जो अपने परिवार से आगे किसी का विकास सोच नहीं पाते।  उनके परिवार का सदस्य न होने पर उनसे किसी सदाशयता की आशा करना पत्थर से पानी निकालने की सोचने जैसा है।
            कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा ही अपने परिवार की स्थिति तथा व्यक्ति शक्ति के आधार पर अपना पवित्र लक्ष्य निर्धारित करना चाहिये। यह लक्ष्य तथा उसके साधन धार्मिक आधार से पुष्ट होना चाहिये।  भले ही यह मार्ग लंबा लगता है पर यही सुरक्षित है।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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11/04/2013

योग साधना में नियम का विषय भी जुड़ा है-हिन्दी चिंत्तन लेख(yoga sadhna mein niyam ka vishay bhee juda hai-hindi chinttan lekh)



                        इस बार की दीपावली के दो दिन हमारे लिये दैहिक दृष्टि से सुखद नहीं रहे।  धनतेरस की शाम से चला बुखार और जुकाम नाम के विकारों का संयुक्त अभियान रविवार शाम तक हमें हैरान किये रहा।  योग साधना का अभ्यास इतना ही इसमें काम आया कि हमने अपने घरेलु उपायों से इसे थामे रखा।  इन्हेलर से एक दो बार नाम को साफ करने का प्रयास किया तो वह भी उल्टा पड़ा। कहा जाता है कि जुकाम तीन दिन तक तो रहता ही है। यह सही हो सकता है पर चिकित्सक से इलाज कराते हुए आदमी तो तसल्ली तो रहती है कि उसे कोई दूसरा ठीक कर लोग। इन्हेलर ने जुकाम को जाम कर दिया तो वह ज्यादा उग्र हो उठा।  बहरहाल हमने जिन उपायों से जुकाम और बुखार का इलाज किया वह सार्वजनिक करना यूं भी ठीक नहीं है क्योंकि हमारे पास कोई चिकित्सीय प्रमाणपत्र नही है।  चार पांच तरीके तो उपयोग किये ही एक बार विक्स की गोली भी मन को शांत करने के लिये ले ही ली।
                        एक साथी ने प्रश्न किया-‘‘तुम्हें जुकाम कैसे हुआ? तुम तो रोज योगसाधना करते हो।’’
                        हमने कहा कि’’हमेशा ही योगसाधना थोड़े ही करते हैं। फिर हम नियम से कभी विचलित न हों ऐसे कोई सिद्ध भी नहीं है।’’
                        वह बोला-‘‘यह ठीक है पर तुम तो ज्ञानी भी हो।
                        हमने कहा-‘‘यह ठीक है कि हम कभी कभी ज्ञान बघारते हैं पर हम उसके भी साधक है, कोई सिद्ध नहीं! ज्ञानी का प्रमाण पत्र हमें दूसरा क्या देगा हमें स्वयं ही स्वीकार्य नहीं है।
                        योग साधना का आशय केवल प्राणायाम और आसन से ही नहीं होता वरन् उसमें नियम का भी बहुत महत्व है। नियम या नीति के विपरीत चलने का परिणाम विकार के रूप में प्रकट होता है।  दिपावली के दिनों में जब खाद्य विशेषज्ञ चिल्लाकर यह बता रहे हों कि हर जिले में इतना दूध नहीं होता जितना खोया मिल रहा है, इसलिये मिलावटी या नकली होने की पूरी संभावना है। जवाब यह भी हो सकता है कि दूसरे जिले से असली भी तो आ सकता है इसलिये नकली खोया नहीं भी हो सकता है। यह अत्यंत मूर्खतपूर्ण जवाब होगा क्योंकि यहां पूरे देश की बात हो रही है। हर जिले में ऐसा नहीं हो सकता।  दूध उत्पादन के बनिस्बत हर जिले में  उससे कई गुना खोया बाज़ार में दिख रहा है।
                        हमने जिस दुकानदार से मिठाई खरीदी उसकी छवि मध्यम स्तर की है इसलिये सब बात पर यकीन था कि शुद्ध सामान मिलेगा।  खाने के बाद जो प्रतिक्रिया हुई उससे मन दुःखी हो गया। हमने एक साथी से इस बात की चर्चा की तो उसने यह शंका जाहिर की कि खोया नकली न हो पर संभव है मिठाई रखी हुई हो। हमें सच पता नहीं पर उस मिठाई ने एक नहीं दो दिन परेशान किया।  मतलब वह दुकानदार नकली सामान न दे पर रखा हुआ दे सकता है यही उसकी मध्यम स्तर छवि का परिचायक है।
                        शुक्रवार शाम को मिठाई खरीदकर दो टुकड़े खाये।  उसके तत्काल बाद दैहिक स्थिति थोड़ी तनावपूर्ण लगी। रात तक उसने पूरी तरह घेर लिया। नींद आती जाती रही।  बहरहाल यह आसन और प्राणायाम का प्रभाव रहा कि शानिवार प्रातःकाल उठते समय थकावट नहीं लगी पर तनाव अनुभव हो रहा था।  योग साधना से निवृत होकर नहाधोकर चाय पी तो वह तनाव अधिक बढ़ गया।  बुुखार और जुकाम शांत भाव से आक्रामक दिख रहे थे। हमें लगा कि वायु विकार के कारण भी यह हो सकता है जो जुकाम के सहयोग से बना है।  दोपहर को खाने के बाद राहत अनुभव हुई पर दुर्भाग्य यह कि हमने सोचा कि फिर दो टुकड़े खा लिये।  उसके बाद बुखार तथा जुकाम ने आक्रामक रूप धारण कर लिया।  बहरहाल हमने नींद आराम से ली।  रविवार को गर्म पानी से नहाये।  ठंड लगने लगी थी।  होम्योपैथी की गोलियां  बुखार और जुकाम के विरुद्ध दागी। साथ ही तय किया कि अब मिठाई को हाथ नहीं लगायेंगे।  दिन में हमने दोनों विकारों के विरुद्ध  जवाबी हमला भी किया।  हमें लगा कि अगर यह मिठाई का असर है तो रविवार शाम तक ठीक हो जाना चाहिये।  हैरानी है शाम छह बजे होते होते हमारा शरीर यह बताने लगा कि विकार अब पीछे हटने लगे।  इससे हमारा मनोबल बढ़ा।  बीमारी के दौरान जो सबसे महत्वपूर्ण बात लगी वह यह कि आदमी का मनोबल ही उसे चलता है।  संघर्ष करते हुए हम निश्चित थे कि यह विकार दो दिन तक हैरान करेगा पर मनोबल गिरा हुआ था। सच कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  जब दैहिक शक्ति ने सकारात्मक संकेत दिये तो हमने अपने आपसे ही पूछा वह एक घंटे अंदर बैठा मन कौनसा था जो विचलित था और यह कौन है जो अब आश्वस्त होकर बाहर घूमने की प्रेरणा दे रहा है। यह मजे की बात है कि धूप में जाते हुए भी जो कदम लड़खड़ा रहे थे वही रात को तन कर खड़े थे।
                        हमने अनेक बार तय किया था कि जहां तक हो सके बाज़ार में तैयार खुली खाद्य पेय सामग्री से बचें रहें।  हमने देखा है कि जब बाज़ार का ऐसा सामान जो रखा जा सकता है उसे खाने पर हमें ऐसे ही जूझना पड़ता है।  कमाल इस बात का है कि बाज़ार से तैयार खुली खाद्य सामग्री। न खाने तक हमें कोई परेशानी नहीं होती। बीमार होने पर निकटवर्ती इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो हमने अपना नियम तोड़ा है।  बाज़ार में कभी खा लिया तो इस बात से डरे रहते हैं कि कहीं बीमार न पड़ जायें।  इसलिये कम ही खाते हैं पर दो बार निकल गये पर तीसरी बार  फंस ही जाते है।  स्थिति यह है कि हम पैक सामग्री की निर्माण अथवा पैक करने की तिथि देख लेते हैं।  हमारे कुछ विद्वान सही कहते हैं कि हमारे देश में भूखमरी बहुत है पर सच यह है कि यहां भूख की बनिस्पत बल्कि  खाकर मरने वाले लोगों की संख्या ज्यादा होती है।   मिलावटी, विषैले और नकली सामान खाकर मरने वाले लोगों की संख्या का अनुमान हमारे पास  नहीं है वरना वह भी कम नहीं हो सकती। 
                        कहते हैं कि भगवान जो करता है वह अच्छे के लिये ही करता है। भौतिक रूप से दीपावली पर लाभ होने की कामना पालने वाले बहुत हैं पर हम जैसे अध्यात्मिक ज्ञान साधक को इस दीपावली पर बीमार होकर चिंत्तन करने का अवसर मिला उससे लगता है कि योग माता ने मति फेरकर वह अवसर दिया। जैसे संदेश दिया हो कि आसन और प्राणायम पर न इतराओ नियम भी कोई विषय है जिस पर कुछ चिंत्तन करो। दीपावली के दिन तो खूब पटाखे छोड़े गये, मिठाईयां खायी गयीं और अनेक जगह कार्यक्रम आयोजित किये गये।  सोमवार की प्रातःकाल हमें यह पता लगा कि हमारे फेफड़ों में कोई संक्रमण जरूर हुआ है क्योंकि सारे आसन हो गये पर हास्यासन पहले की तरह नहीं हो सका या कहें कि कर ही  नही पायें।  इससे ज्यादा चिंता यूं नहीं हुई क्योंकि बाकी अंग सही काम कर रहे हैं। दूसरी बात यह भी कि हम हास्यासन नहीं करते होते तो यह पता ही नहीं लगता कि हमारे फेफड़ों में संक्रमण विद्यमान है।  हो सकता है ऐसे में मिठाई फिर खा लेते।  कम से कम अब सावधानी रखने का विचार तो आया।  इसलिये हम तो यह कहेंगे कि हमारे लिये यह दीपावली भी शुभ रही। 
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

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