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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

2/28/2011

अदाऐं और चरित्र-हिन्दी शायरी (adaen aur charitra-hindi shayari)

कौन फरिश्ता
कौन शैतान
अब हम कहां तय कर पाते हैं,
छोटे और बड़े पर्दे पर
बाज़ार के मेकअप से
सजे चेहरों की चमक से
आंखें चुंधिया जाती हैं,
उनके अल्फाज़ों का मतलब
समझ नहीं आता
अदाऐं संगीत के शोर में लहराती हैं,
इसलिये हमारी तंग सोच में
चरित्र के सवाल कहां आ पाते हैं।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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2/22/2011

क्रिकेट में गुस्सा फिक्सिंग-हिन्दी हास्य व्यंग्य-हिन्दी हास्य व्यंग्य (cricket matchemein gussa fixing-hindi hasya vyangya)

आस्ट्रेलिया का कप्तान विश्व कप क्रिकेट कप प्रतियोगिता में जिम्बाब्बे के साथ खेले गये मैच में रनआउट हो गया। यह खबर खास न होती अगर रनआउट होने से खफा उस कप्तान ने अपने डेªसिंग रूप में आकर टीवी को अपना बल्ला न दे मारा होता। टीवी टूटा कि उसका कांच पता नहीं। मगर बताया गया कि टीवी टूट गया।
बिचारा कप्तान क्या करता? जब वह रनआउट होकर आया होगा तो उसने उसका रिप्ले यानि दृश्य का पुर्नःप्रसारण वहां देखा होगा। वह तो मैदान से ही गालियां बकता आया था इसलिये उसके साथियों को टीवी बंद कर देना चाहिए था। ऐसा उन्होंने नहीं किया। वैसे आस्ट्रेलिया के कप्तान का गुस्सा किस बात पर उतरा होगा? क्या वाकई अपने आउट होने के दृश्य के पुर्नप्रसारण पर या फिर उसमें कोई ऐसा विज्ञापन आ रहा था जिसमें अनफिट टीम इंडिया यानि बीसीसीआई के खिलाड़ियों ने काम कर जमकर पैसा कमाया है। बीसीसीआई की टीम में अनेक खिलाड़ी अनफिट हैं ऐसा समाचार आ रहा है पर उनके विज्ञापन के धंधे पर उसका कोई असर नहीं है। ऐसा लगता है कि अनेक खिलाड़ी अनफिट थे और उनको वरदहस्त प्रदान करने वाले आर्थिक शिखर पुरुषों ने अपने विज्ञापनों की इज्जत के लिये टीम में शामिल करवाया। वैसे भी भारतीय खिलाड़ियों को फिटनेस की चिंता नहीं है। उनक ध्येय बस टीम में बने रहना है। उनके आकाओं को भी इसकी चिंता नहीं है क्योंकि उनको पैसा कमाना है।
धनपतियों के प्रबंधक अनफिट खिलाड़ियों को भी नायक बना देते हैं। उससे भी नहीं मन भरता तो भगवान बना देतें हैं। इससे भी काम नहीं बनता तो भगवान को ही भारत रत्न देने की मांग करते हैं। पता लगा कि क्रिकेट का भारतीय भगवान भी अनफिट है पर यह बात अभी दबी हुई है। इस पर प्रचार माध्यम चर्चा तब करेंगे जब विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता निपट जायेगी। मतलब भारत के कुछ कथित क्रिकेट भक्त जब अपना धन और आंखों के साथ ही शारीरिक और मानसिक रूप से फिटनेस कुर्बान कर चुके होंगे और तब वह आंसु बहायेंगे कि क्यों इस तरह अपना समय गंवाया। तब तक यही प्रचार माध्यम काफी धन कमा चुके होंगे।
आस्ट्रेलिया ही नहीं विश्व के अनेक खिलाड़ी इस बात से नाराज हैं कि वह बीसीसीआई की टीम के खिलाड़ियों से अधिक फिट और दमदार हैं पर उनकी कमाई उनसे कहीं बहुत कम है। वह जीतते हैं पर इनाम की राशि से उनका घर वैसा नहीं सजता जैसा टीम इंडिया के खिलाड़ियों का महल बन जाता है। अब उनको कौन समझाये कि उनके देश देश छोटे हैं जबकि भारत बहुत बड़ी जनसंख्या वाला देश है इसलिये उनकी जीत से अधिक बीसीसीआई की टीम पा दांव ज्यादा लगता है। ऐसे में उनको ऐसी अपेक्षा नहीं करना चाहिये-खासतौर से जब ऐसा भी सुनने को मिलता है कि अनेक बार ऐसा अवसर आता है कि जीतने में कम तथा हारने पर अधिक धन मिलने की आशा में खिलाड़ी जीजान से हारने पर ही आमादा हो जाते हैं।
बात आस्ट्रेलिया कप्तान के गुस्से की है और हम मानते हैं कि यह भी फिक्स रहा होगा। जिस तरह फिक्सिंग का भूत क्रिकेट के पीछे पड़ा है उसे देखकर अब कुछ भी संयोग या दुर्योग नहीं लगता। इसलिये इस गुस्से में कहीं न कहीं फिक्सिंग की सुगंध आ रही है-यही लिखना पड़ रहा है क्योंकि लोग अब लोग खुशबु और बदबू का मतलब ही नहीं जानते।
आखिर यह शक क्यों हुआ? इसलिये कि आजकल विश्व में मंदी चल रही है। भारत इससे बचा हुआ है पर इसके बावजूद इलैक्ट्रोनिक्स क्षेत्र में अब मांग वैसी नहीं है जैसी पहले थी। टीवी और एलसीडी की मांग सीमित है। वजह यह कि अब अधिकतर लोग सामान खरीद चुके हैं और महंगाई के इस युग में शादी में देने के लिये आदमी टीवी या एलसीडी खरीदता है या फिर अपना टीवी बिल्कुल बर्बाद हो जाये तब अपनी जेब ढीली करता है। आस्ट्रेलिया के कप्तान के पास कोई बड़ा विज्ञापन नहीं है कि जिससे यह लगे कि वह भारत के चौदहवें नंबर के खिलाड़ी के मुकाबले भी कमाता होगा। यह संख्या भी हम डरते डरते लिख रहे हैं जबकि संभव यह भी है कि संख्या पचास से ऊपर हो। ऐसे में टीवी और एलसीडी उत्पादों से जुड़े मध्यस्थों ने उसे फिक्स किया होगा। कहा होगा कि ‘गुस्से में टीवी तोड़ने का फैशन चलाने का प्रयास करो, अगर सफल रहा तो तुम्हें विज्ञापन दिलवायेंगे।’
वैसे जिस तरह बीसीसीआई की टीम की फिटनेस है और आगे के मैचों के उसके खेल के जो आसार दिख रहे हैं उससे तो लगता है कि भारत के कथित क्रिकेट भक्त भी इतना गुस्सा झेलेंगे। तब वह अपना सिर फोड़ें या बाल नौंचें इससे अच्छा है कि वह कोई चीज तोड़ने का विचार करें-यही इस दृश्य फिक्स करने का मतलब लगता है। हमारा देश बड़ा है और क्रिकेट देखने वाले ज्ञानी भी कम नहीं है और कथित देशप्रेम के जज़्बात पर बुरे खेल का प्रहार होगा तो उनका गुस्सा भड़केगा। यह गुस्सा व्यर्थ नहीं जायेगा, इसलिये वह चीजें तोड़ने का फैशन अपना सकते हैं, खासतौर से जब वह किसी गौरवर्ण व्यक्ति ने अपनाया हो-इससे बाज़ार का मतलब सिद्ध हो जायेगा। टीवी या एलसीडी टूट जायेगा तो फिर दूसरा खरीदना पड़ेगा। इतने बड़े देश में कितने लोगों को गुस्सा आयेगा यह पता नहीं क्योंकि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के तंतु भी देश में जिंदा हैं। जीत में लोग अपने पौरुष का जश्न मनाते हैं तो हार में लोग हरिनाम लेने लगते हैं। मगर बाज़ार के प्रचार प्रबंधक तो नित नये नुस्खे निकालते ही रहते हैं। अगर टीवी और एलसीडी टूटने की घटनायें बाज़ार में गुणात्मक रूप से व्यापर बढ़ा तो आस्ट्रेलियाई कप्तान को टीवी और एलसीडी के बहुत सारे विज्ञापन मिल सकते हैं। उसमें वह जुबां हिलाता नज़र आयेगा। डायलाग अपने ही देश के सुपर स्टार की आवाज में हो सकता है।
‘‘ऐ, जब भी गुस्सा आये टीवी या एलसीडी तोड़ डालो, इससे मन शांत भी हो जायेगा और घर में नया माडल आ जायेगा नया माडल यानि.................जब भी गुस्सा आये तब..................नया माडल लायें।’
सच बात तो यह है कि अब तो कई घटनायें इस तरह फिक्स लगती हैं कि काल्पनिक व्यंग्य लिखना बेकार लगता है। अनेक बार तो हंसी छूट जाती है। वैसे जिस तरह देश का मनोरंजन क्षेत्र जिस तरह हास्य व्यंग्य के कार्यक्रम पेश करता है उससे तो यही लगता है कि वह समाचार बनाने के लिये ऐसी घटनायें भी कराता है।
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2/10/2011

समाचार और विज्ञापन-हिन्दी हास्य कविता (samachar aur vigyapan-hindi hasya kavita)

समाजसेवक जी ने
प्रचारक से कहा,
‘‘यार, रोज तुम घोटालों का
पर्दाफाश करते हो
क्या हमें मरवाओगे,
अभी तक हमारे चेले फंस रहे हैं
धीरे धीरे हमारे हाथ में हथकड़ी
पड़ जाने की नौबत तुम लाओगे,
मगर याद रखना
हमारे घोटालों में तुम भी भागीदार हो
इसलिये बच नहीं पाओगे।’’

सुनकर प्रचारक महोदय बोले
‘‘यार,
तुम भी निरे मूर्ख हो
घोटालों से हमारे समाचार सनसनीखेज बनते हैं,
विज्ञापनों में अपने जलवे इसलिये छनते हैं,
फिर तुम्हारे चेलों के भी चाटुकार इसमें फंस रहे हैं,
आम लोग बिना सोचे समझे हंस रहे हैं,
फिर हम एक घोटाले पर चलाते हैं
कुछ दिन चर्चा,
कार्यक्रम बनाने में भी नहीं आता खर्चा,
जैसे एक मामला थम जाता है,
फिर कोई नया मामला सामने आता है,
लोग पिछला भूल जाते हैं,
नये को तूल देने में फिर मजे आते हैं,
चिंता मत करो,
बस, भ्रष्टाचार पर
जनता के सामने आहें भरो,
तुम्हारा काम चलता रहेगा जीवन भर,
नहीं है तुम्हें फंसने का डर,
अपनी समाज सेवा की यात्रा
तुम स्वच्छ छवि के साथ तय कर जाओगे।’’
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2/02/2011

राजलुटेरे कभी ऋषि नहीं बन सकते-हिन्दी व्यंग्य (lutere aur rishi-hindi comic article)

पूर्व मंत्री और घोटालों के राजा को केंद्रीय जांच संस्था ने गिरफ्तार कर लिया। इसका राजनीतिक, वैधानिक तथा सामाजिक पक्ष तो सभी समझ सकते हैं। एक टीवी चैनल पर एक दक्षिण भारतीय राजनीतिक विशेषज्ञ की इस बात पर यकीन किया जाये कि राजा साहब को उनका दल भी कल अपनी आमसभा के बाद अपने घर से निकाल देगा-मतलब उनकी सदस्य समाप्त कर देगा।
वैसे तो यह माना जा रहा है कि राजा साहब के दल और केंद्रीय दल के बीच रस्साकशी होगी पर दक्षिण भारतीय राजनीतिक विशेषज्ञ ने बताया कि उनके दल का ही एक समूह उनको पंसद नहीं करता। कुछ लोग तो पहले ही उनको दल से निकालने की मांग कर चुके हैं। बहरहाल भारत में अब तक के कथित रूप से एक लाख उन्नासी करोड़ रुपये के घोटाले में खलनायक की छबि बना चुके राजा साहब की स्थिति को देखकर महर्षि बाल्मीकी की बहुत याद आ रही है। राजा साहब के साथ अब कोई नहीं है पर जब वह राजकीय संपत्ति को अपना समझकर लुटा रहे थे तब उनको इस बात का अहसास नहीं था कि उनके इस कार्य से लाभार्थी लोग समय आने पर उनको अकेला छोड़ देंगे। इतने बड़े घोटाले में वह अकेले बड़े आदमी नहीं हो सकते। उनके लाइसेंस के परमीशन में खेल में कई लोगों ने प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से कमीशन या डोनेशन लिया होगा। निजी रिश्तेदारों ने तो मजे किये ही दोस्तों ने भी कम माल नहीं बनाया होगा। मगर जेल सभी नहीं जा रहे। हालांकि राजासाहब की अकेले भी जेलयात्रा नहीं हो रही साथ में कुछ निजी अनुचर भी हैं पर मुश्किल यह है कि बड़े कद के वह अकेले आदमी हैं और इतिहास ने उनकी गिरफ्तारी को भ्रष्टाचार के आरोप में सबसे बड़ी गिरफ्तारी माना है-ऐसा प्रचार माध्यम कहते हैं। तय बात है कि जब आप घोटालों में राजा होंगे तो आपका पतन भी इतिहास में ऐसे ही दर्ज होगा।
उनका क्या होगा, यह तो भविष्य ही बतायेगा मगर जब यह प्रकरण चल रहा था तब राजा साहब जिस तरह मुस्करा रहे थे उससे लगता था कि अपने कार्य से लाभार्थी लोगों से उनको आसरा था मगर अब!
महर्षि बाल्मीकि के बारे में कहना सूरज को दीपक दिखाना है मगर सच बात यह है कि वह मगर भगवान श्री राम जी के चरित्र पर रामायण जैसा महाग्रंथ न लिखते और केवल भक्ति पूर्वक राम राम जपते ही अपना जीवन गुजारते तो भी उनका नाम उनकी स्वयं की दो निजी कथाओं के कारण अमर होता। एक कथा के अनुसार बाल्मीकी पहले लुटेरे थे। यह काम बरसों तक किया। एक दिन वह लूटने के लिये घात लगाये बैठे थे तो देखा कुछ संत लोग आ रहे हैं। उनको लूटनें के लिये वह अपना फरसा लेकर डट गये । जब संत उनके पास आये तो वह अपना फरसा लेकर उनके पास पहुंच गये और बोले-‘जो भी माल असबाब हो वह मुझे दो या फिर मरने के लिये तैयार हो जाओ।’
संतों ने कह कि-‘ठीक है, पर तुम यह पाप कर रहे हो उसके लाभार्थी अपने परिवार के सदस्यों से यह पूछकर आओ कि क्या वह इसके दंड में भी यमराज के दंड सामने तुम्हारे सहभागी बनेंगे?’’
बाल्मीकि ने पहले ना-नुकर की मगर फिर पहुंच गये अपने परिवार के सदस्यों के पास यह पूछने के लिये कि‘यमराज के सामने उनके पाप के दंड में कौन कौन सहभागी बनेगा?’’
सभी का उत्तर एक जैसा था कि ‘हमें पालना तुम्हारा जिम्मा है। चाहे जैसा पालो, पर हम तुम्हारे पाप के दंड में भागी नहीं बनेंगे।
उनके ज्ञान चक्षु खुल गये। वह बाल्मीकि डकैत ऐसा बदला कि आज हम उनको महर्षि बाल्मीकि कहते हैं और नाम भले ही उनका कम लिया जाता है पर भक्त लोगों के हृदय में भगवान से दर्जा कम नहीं है।
उनकी दूसरी कथा यह कि उनको संतों ने राम राम जपने का मंत्र दिया पर वह उसे भूल गये पर भक्ति में लीन रहने लगे। एक दिन वह एक तालाब के किनारे टहल रहे थे कि किसी शिकारी ने आपस में क्रीड़ारत क्रोंच पक्षी के जोड़े में से नर को तीर मार दिया जिससे वह पेड़ से जमीन पर गिरा और मर गया। उनके मुख से निकला‘मरा, मरा।’
तब उन्हेें याद आया कि वह तो राम के नाम का वह मंत्र जो संतों ने दिया था। उसके बाद रामायण नाम के उस महाग्रंथ की रचना हुई जिसका दुनियां में कोई सानी नहीं है। सच तो यह है कि महर्षि बाल्मीकी के निजी जीवन की यह दो कथायें ही बहुत बड़े अध्यात्मिक संदेश प्रदान करने वाली हैं। एक तो यह कि आप चाहे जो भी करते हों उसके जिम्मेदार आप हैं। आपके कृत्य या दुष्कृत्य का अच्छा और बुरा परिणाम आपके नाम ही चढ़ना है, दूसरे लाभार्थी अच्छे परिणाम तक ही आपके साथ हैं, बुरा वक्त आने पर उनसे अपेक्षा न करिये। दूसरा यह कि अभ्यास करते रहिये आपको अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो जायेगा। राजा चाहे होटलों के बनो या घोटालों के आपके दुष्कर्म आपका पीछा करेंगे।
इस देश के बड़े लोगों का आचरण देखकर हैरानी होती है। पेट से ज्यादा बैंक के खातों की फिक्र है। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को केवल हिन्दू धर्म तक सीमित मानकर उनकी उपेक्षा करने वाले लोग धर्मनिरपेक्ष होनें का दिखावा करते हैं पर उनको यह मालुम ही नहीं कि यह सिद्धांत तो ठगों, चोरों, डकैतों, लुटेरों और बेईमानों का है। अपराधी अपने शिकार करते समय किसी का धर्म, जाति, या समूह नहीं देखते। तय बात है कि हमने विदेशी व्यवस्था का अनुसरण कर अपने समाज में नकारा और नीच प्रवत्तियोंु का समाज बनाने का प्रयास किया है।
बार बार सवाल एक मन में आता है कि सारे डकैत और लुटेरे सुधरते क्यों नहीं? तब जवाब भी हमारे दिमाग में आता है कि सभी ऐसे संत कहां मिलते हैं जो महर्षि बाल्मीकि को मिले। देश की हालत देखकर को तो महर्षि बाल्मीकी से कम उन संतों के प्रति कृतज्ञता से भर उठता है जिन्होंने उनका हृदय परिवर्तन किया। ऐसे संत मिल गये तो महर्षि बाल्मीकी ने रामायण जैसा ग्रंथ लिखकर कौनसा तीर मार लिया? बाल्मीकि महाराज को ही उन अज्ञात संतों का आभारी होना चाहिए था जिन्होंने जेल जाने से पहले ही उनके अपराधों से दूर कर दिया वरना फंस जाते एक बार तो अंदर ही फंसकर मरा मरा करके रह जाते।
वैसे बाल्मीकि से घोटालों के राजा की तुलना करना बेकार है। महर्षि बाल्मीकी का तो पेशा था लुटना तो लूटते रहे, फिर भक्त बने तो उसी राह का अनुसरण पर यह तो राजासाहब पहरेदार बनकर राजद्वार पर आये थे। लूट के लिये राजद्वार पर खड़े व्यक्ति के पास संत समझाने आयेंगे यह सोचना भी कठिन है क्योंकि उनके लिये तो राजद्वार तो क्या राजमार्ग ही कंटकमय होता है जहां सिद्ध लोग जाना पसंद नहीं  करते। इसलिये सभी राजलुटेरे यानि भ्रष्ट लोग कभी ऋषि नहीं बन सकते।
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A raja,CBI,2Gspactrum

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