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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

12/14/2010

मौन कर रहा है बयान-हिन्दी कविता (maun ka raha hai bayan-hindi kavita)

सोचा था सिर पर भले लोग ही ताज़ पहने हैं,
मगर उनके तजुर्बे ही अपने देश के गहने हैं।
पता लगा कि वह भी सौदागरों के बुत हैं,
उनके यकीन करने के बुरे नतीज़े अब सहने हैं।
लूट की आदत बन गयी, बाज़ार में खुला व्यापार,
अभी तो बेईमानी के बहुत सारे नाले बहने हैं।
ज़माने के खजाने की पहरेदारी में जो लोग लगे
बेईमानी और रिश्वत उनकी सगी बहने हैं।
कमबख्त, उस्तादों से कौन सफाई मांग रहा है अब
मौन कर रहा बयान, जो लफ्ज़ उनको कहने हैं।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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12/09/2010

ईमान का चेहरा-हिन्दी कविता (iman ka chehra-hindi kavita)

बहुत बार उजड़ा है चमन
माली के रहते,
लुट गया खज़ाना
पहरेदारों के रहते।
दूसरे इंसानों के दर्द पर क्या बयान करें
फुर्सत नहीं मिलती जिंदगी में
रोज आते ग़मों का तूफान सहते।
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जैसे जैसे पहाड़ पर वह चढ़ते जा रहे हैं,
जिदंगी के उनके लिये बदले नज़र आ रहे हैं।
वही लोग तंगहाली से होकर अमीरी के महल में पहुंचे
जो बेईमानी को ईमान का चेहरा बता रहे हैं।
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12/05/2010

हम अंधेरे में आंखें डाले हैं-हिन्दी कविता (hum andhere mein aahkhen dale hain-hindi gazal)

कहावत है पर किसने कब आस्तीन में सांप पाले हैं,
पर डसने का भय से बंद सोच, सच के मुंह पर ताले हैं।
शक है कि काले नाग भी इतने ही काले होंगे,
यहां तो आदमी के ख्याल उससे अधिक काले हैं।
जिन्हें ताज़ पहनाया वही विषधर बनकर डसने लगे
सिंहासन पर बैठे, हमारी आशा पर पांव डाले हैं।
मृगों की तरह नृत्य कर दिल जीत लिया जिन्होंने
लूटकर हमारे सपने बने अमीर, अब वह महल वाले हैं।
घर में जलते अकेले ‘दीपक’ की लौ भी चुरा ले गये
रौशन है उनका आंगन, हम अंधेरे में आंखें डाले हैं।
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