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7/29/2009

श्रीगीता संदेश-स्वप्न, भय, शोक, विषाद और मद तामसी धारणाशक्ति के प्रतीक (gita sandesh in hindi)

यथा स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुंचति दुमेंधा धृति सा पार्थ तामसी।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य में जिस धारणा शक्ति में स्वप्न, भय, शोक, विषाद और मद व्याप्त होते हैं उसे तामसी धारणाशक्ति कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पंचतत्वों से बनी यह देह नश्वर है पर मनुष्य अपना पूरा जीवन इसकी रक्षा करते हुए बिता देता है। यह देह जो कभी इस संसार को छोड़ देगी-इस सत्य से मनुष्य भागता है और इसी कारण उसे भय की भावना हमेशा भरी होती है। मनुष्य कितना भी धन प्राप्त कर ले पर फिर भी उसमें यह भय बना रहता है कि कभी वह समाप्त न हो जाये। परिणामतः वह निरंतर धन संग्रह में लगता है। भगवान की सच्ची भक्ति करने की बजाय वह दिखावे की भक्ति करता है-कहीं वह स्वयं को तो कहीं वह दूसरों को दिखाकर अपने धार्मिक होने का प्रमाण जुटाना ही उसका लक्ष्य रहता है।
दिन रात वह अपनी उपलब्धियों के स्वप्न देखता है। अगर आपको रात का सपना सुबह याद रहे तो इसका अर्थ यह है कि आप रात को सोये नहीं-निद्रा का सुख आपसे दूर ही रहा। लोग इसके विपरीत रात के स्वप्न याद रखकर दूसरों को सुनाते हैं। दिन में भौतिक लक्ष्य की प्राप्ति का हर मनुष्य हर पल सपना देखता है। जो उसके पास है उससे संतुष्ट नहीं होता।

सभी जानते हैं कि इस संसार में जो आया है उसे एक दिन यह छोड़ना है पर फिर भी अपने सगे संबंधी के मरने पर वह दुःखी होता है। न हो तो भी जमाने को दिखाने के लिये शोक व्यक्त करता है।
यह देह कभी स्वस्थ होती है तो कभी अस्वस्थ हो जाती है। इस दैहिक विपत्ति से बड़े बड़े योगी मुक्त नहीं हो पाते पर मनुष्य के शरीर में जब पीड़ा होती है तब वह विषाद में सब भूल जाता हैं वह पीड़ा उसके मस्तिष्क और विचारों में ग्रहण लगा देती है। देह में यह परेशान मौसम, खान पान या परिश्रम से कभी भी आ सकती है और जैसे ही उसका प्रभाव कम हो जाता है वैसे ही मनुष्य स्वस्थ हो जाता है पर इस बीच वह भारी विषाद में पड़ा रहता है।
थोड़ा धन, संपदा और शक्ति प्राप्त होने से मनुष्य में अहंकार आ जाता है। उसे लगता है कि बस यह सब उसके परिश्रम का परिणाम है। सब के सामने वह उसका बखान करता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि हम दृष्टा की तरह इस संसार को देखें। गुण ही गुणों को बरतते हैं अर्थात हमारे अंदर सपनें, शोक, भय, विषाद और मद की प्रवृत्ति का संचालन वाले तत्व प्रविष्ट होते हैं जिनका अनुसरण यह देह सहित उसमें मौजूद इंद्रियां करती हैं। जब हम दृष्टा बनकर अपने अंदर की चेष्टाओं और क्रियाओं को देखेंगे तब इस बात का आभास होगा कि हम देह नहीं बल्कि आत्मा हैं।
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7/28/2009

श्री गीता से-दूसरे के रोजगार का नाश करना तामस प्रकृत्ति का परिचायक (shri gita sandesh in hindi)

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्रीच कर्ता तामस उच्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
युक्ति के बिना कार्य करने वाला, प्राकृत ( संसार की शिक्षा प्राप्त न करने वाला), स्तब्ध (इस संसार की भौतिकता को देखकर हैरान होने वाला, दुष्ट, किसी की कृति (जीविका) का नाश करने वाला, शोक करने वाला और लंबी चौड़ी योजनायें बनाकर काम करने वाला तामस प्रवृत्ति का कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर उत्पात मचाने वाले दूसरों पर आक्रमण करते हैं। दूसरे का रोजगार उनसे सहन नहीं होता और वह उसका नाश करने पर आमादा हो जाते हैं। सबसे हैरानी की बात तो तब होती है कि श्रीगीता को पवित्र मानने वाले लोग यह काम बेझिझक करते हैं। थोड़ी थोड़ी सी बात पर रास्ता जाम करना, दुकानें-बसें जलाना तथा राह चलते हुए लोगों और अपने रोजगार का कर्तव्य निभा रहे सुरक्षा जवानों पर पत्थर फैंकना कोई अच्छी बात नहीं है। आधुनिक लोकतंत्र में आंदोलन चलते हैं पर उनको चलाने का अहिंसक तरीका भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बता ही दिया है-जैसे सत्याग्रह और बहिष्कार। आज सारी दुनियां उनको मानती है पर इसी देश में जरा जरा सी बात पर हिंसा का तांडव दिखाई देता है। इस तरह युक्ति रहित आंदोलन तामसी प्रवृत्ति का परिचायक हैं।

नैतिक और धार्मिक सहिष्णुता और दृढ़ता हमारे भारतीय अध्यात्म की सबसे बड़ी शक्ति है। जीवन मरण तो सभी के साथ लगा रहता है। मुख्य बात यह है कि कोई मनुष्य किस तरह जिया-उसने सात्विक, राजस या तामस
में से किस प्रवृत्ति को उसने अपनाया। इस देश की विचारधारा को इतनी चुनौती मिलती हैं पर फिर भी वह अक्षुण्ण बनी हुई क्योंकि वह उस सृष्टि के उस सत्य को जानती है जिस पर पश्चिम अब काम कर रहा है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि किसी धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्रीय समूह के सदस्यों की संख्या अधिक है या कम-देखा तो यह जाता है कि उस समूह के सदस्य किस प्रवृत्ति-सात्विक, राजस या तामस-के हैं। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर कोई दूसरा मनुष्य हमसे अलग भी हो तो भी उसकी जीविका का नाश करना अधर्म है-हमें यह नहीं देखना चाहिये कि उसका समूह या वह क्या करता है बल्कि इस बात पर दृष्टि रखना चाहिये कि हम क्या कर रहे हैं? हमारा और समूह का आचरण दृढ़ और धर्म पर आधारित होना चाहिये और यह निश्चय शक्तिशाली बना सकता है।
आज के कठिन युग में जहां तक हो सके दूसरे को रोजगार में सहायता देना चाहिये। इसके लिये अपनी तरफ से कोई प्रयास करना पड़े तो झिझकना नहीं चाहिये। यह न कर सकें तो कम से कम इतना तो करना चाहिये कि दूसरे के रोजगार का नाश न हो।
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7/25/2009

क्या पैबंद की तरह नहीं लगेंगे प्रतिबंध-आलेख hindi article on sach ka samna

पहले सविता भाभी नाम की वेबसाईट पर प्रतिबंध लगा और अब सच का सामना नाम के एक धारावाहिक पर प्रतिबंध की मांग को लेकर अभियान चल रहा है। प्रतिबंधों के औचित्य या अनौचित्य पर सवाल उठाना बेकार है क्योंकि उन पर विचार करने वाले बहुत हैं। हमारा उद्देश्य तो इन पर प्रतिबंध के समर्थक लेखक और बुद्धिजीवियों से यह पूछना है कि यह प्रतिबंध नाम का पैबंद कहां कहां लगाने की मांग करेंगे। समाज को नैतिकतवादी बनाने के साथ आस्थावान तथा संस्कारवान बनाने के लिये प्रतिबद्ध यह बुद्धिजीवी अब यौन सामग्री से भरपूर वेबसाईटों और उत्तेजित करने वाले धारावाहिकों से जिस तरह खौफ खा रहे उससे ऐसा लगता है कि देश में अब एक तरह का वैचारिक संकट पैदा हो गया है। इधर अंतर्जाल पर उत्तेजित करने वाली वेबसाईटें और ब्लाग भी कम नहीं है और क्या सभी पर प्रतिबंध लगाना संभव है?
इस लेखक को एक विद्वान मित्र ने एक किस्सा सुनाया था-वह अंतर्जाल पर सक्रिय है और जरूरत पड़ी तो उसका नाम भी बता देंगे और उससे इस विषय पर लिखने का आग्रह भी करेंगे। किस्सा आचार्य रजनीश का था जिनको बाद में ओशो के नाम से जाना जाने लगा है। वह एक बार इंग्लैंड की यात्रा पर जा रहे थे और वहां उनके आगमन का विरोध इसी आधार पर हो रहा था वह वहां की संस्कृति को पथभ्रष्ट कर देंगे। आचार्य रजनीश वायुयान में थे तो उनके शिष्य ने उनको बताया कि उन पर उनके ब्रिटेन प्रवेश पर रोक लग सकती है।
तब आचार्य ने जवाब दिया था कि ‘जिस देश की संस्कृति इतनी कमजोर है कि वह एक आदमी के वहां पांव रखने से ढह जायेगी वह चलेगी कितने दिन?’
यह पता नहीं कि वह प्रतिबंध लगा कि नहीं या वह वहां उतरे कि नहीं पर उनका उपरोक्त कथन इस लेखक के मन में घर कर गया। वैसे यह तो सही है कि पश्चिमी राष्ट्रों में उनका जमकर विरोध हो रहा था। उस पश्चिम में जो कि अपने खुलेपन के कारण जाना जाता है वह अधिक खुलेपन की उनकी विचारधारा से घबड़ाया रहता था। अक्सर भारतीय संस्कृति और संस्कारों के दब्बू मानने वाले आधुनिक विचारक इसे नोट करें कि पश्चिम से भी अधिक खुली विचाराधारा वाले भी इसी देश में पैदा होते हैं। आचार्य रजनीश को अपने जीवनकाल में ही इस देश में काफी विरोध का सामना करना पड़ा। अब भी उनकी अध्यात्मिक गुरु के रूप में मान्यता नहीं है पर सच बात तो यह है कि वह भारतीय अध्यात्म का पूरा ज्ञान रखते थे। उनका अध्ययन व्यापक था। वह भारतीय योग के उस घ्यान विज्ञान के प्रचारक थे जिसे यहां के लोगों की सबसे बड़ी शक्ति माना जाता है। इस ज्ञान का मुख्य स्त्रोत श्रीगीता ही है जो कि आदमी को दृष्टा भाव से जीवन का आनंद उठाने का संदेश देती है।
हम कुछ देर इसी दृष्टा भाव से देखें तो यह बात समझ में आयेगी कि आधा समाज मनोरंजन के लिये उस हर कार्यक्रमों, किताबों और वेबसाईटों की तरफ भाग रहा है जिसमें उसे मजा आये। यह उसका अधिकार है। हालांकि वह उसका परिणाम नहीं जानता। जिस तरह हम जो खाते हैं उसका प्रभाव उस चीज के स्वभाव के अनुसार हमारे शरीर पर होता है वैसे ही देखी और सुनी हुई बातों का प्रभाव भी हम पर होता है। हमारी इंद्रियां जिन विषयों के संपर्क में आती हैं वैसे ही वह उनका स्वभाव भी हो जाता है। अगर हम विष पीयेंगे तो पूरा शरीर नष्ट हो जायेगा उसी तरह कुछ विषय भी विष की तरह होते हैं। हम एक वस्त्र पहने ठीक ठाक ढंग से दिख रहे एक व्यक्ति को देख लें तो अच्छा लगता है वहीं अगर राह पर चल रहे किसी विक्षिप्त व्यक्ति को गंदे कपड़े या निर्वस्त्र देख लें तो मन खराब हो जाता है। यह प्रत्यक्ष प्रभाव दिखता है पर कुछ प्रभाव देर बाद होते हैं जो हमारा मानसिक संतुलन खराब करते हैं। यह बात उस आधे समाज को समझाना चाहिये जो इन प्रतिबंध समर्थकों की भीड़ में शामिल है।

दरअसल सच का सामना ने कई तरह से इस देश के बौद्धिक समाज की पोल खोलकर रखदी है। देश के धार्मिक, आर्थिक तथा साामजिक शिखरों पर बैठे वर्तमान कथित महापुरुषों की चाटुकारिता करने का आदी बौद्धिक वर्ग अपने को असहज स्थिति में अनुभव कर रहा है। यह चाटुकारिता वह दो तरह से करता है एक तो वह उनकी प्रशंसा में गुणगान करता है या फिर उनके सुझाये विषयों पर लिखकर पाठकों के समक्ष रखता है। समाज के संरक्षक और बुद्धिजीवियों को हमेशा यह भ्रम रहा है कि समाज उनकी बताई राह पर चलता है। अगर कोई ऐसा विषय जो उनके लिये असहज या समझ से परे है तो वह उसका विरोध इसलिये करते हैं कि समाज उनकी शक्ति की सीमा से बाहर जा रहा है। सीधी बात कहें तो समाज के शिखर पुरुषों और उनके मातहत बुद्धिजीवियों को अपने खास होने का अहंकार है और उनको पता ही नहीं कि आम आदमी उनको पढ़ता, सुनता और देखता जरूर है पर वह उनको महापुरुषों और विद्वानों की श्रेणी में नहीं रखता।
सच का सामना कार्यक्रम कोई खास प्रभावी नजर नहीं आ रहा। ऐसा लगता है कि झूठमूठ की प्रायोजित चर्चा है। फिर भी इस कार्यक्रम को दो चार साल तक दर्शक मिल जायेंगे। कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज और धुन पर होने के बावजूद यह वैसी लोकप्रियता शायद ही अर्जित कर पाये। अलबत्ता विवादों ने भी इसकी दर्शक संख्या में बढ़ोतरी की होगी ऐसा लगता है। इस प्रचार के दो तरीके हैं-एक तो प्रशंसात्मक दूसरा है नकारात्मक। लगता है अंतर्जाल और टीवी चैनलों पर इसे अजमाया जा रहा है।
इससे अलग बात यह है कि अंतर्जाल पर अगर देखा जाये तो अश्लीलता से अधिक बदतमीजी वाली वेबसाईटें देखने को मिल रही हैं। अनेक ब्लाग वेबसाईट तो देखते ही मन खराब हो जाता है। गाली गलौच से भरे वह ब्लाग लेखक जानते ही नहीं यौन साहित्य सभ्यता से भी लिखा जाता है। यौन भावना का संबंध मन से होता है। अभद्र शब्द पढ़ने का मजा खराब करते हैं। फिर यौन क्रियाओं को जितना व्यंजना विधा में लिखा जाये उतना ही उनके पाठक मजा ले सकते हैं।

इसके साथ ही हम यह भी अपने पाठकों को बता दें कि वह इतना पागल न बने। यौन का विषय कोई हमारी देह से अलग नहीं है। खाना बहुत अच्छा लगता है पर हम में से कितने लोग खाना बनाने वाले सीरियल देखते हैं? इसलिये बेहतर है कि वह सात्विक विषयों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें। सच का सामना जैसा कार्यक्रम देखकर अपनी बुद्धि विषाक्त न करें। इससे अच्छा तो कामेडी धारावाहिक देखें जिनको एक दो चैनल चला रहे हैं। हल्की फुल्की कामेडी वाले यह सीरियल दिल और दिमाग को ताजगी देते हैं।
इधर हम अंतर्जाल पर जो हालत देख रहे हैं उससे देखकर एक प्रश्न बार बार आता है कि आखिर कहां कहां किस पर प्रतिबंध लगाये जायेंगे। इसमें देश के साथ ही अप्रवासी और विदेशी लोग वेबसाईटें और ब्लाग बनाये बैठे हैं। समाज को बचाने के लिये सभी बुद्धिजीवियों को एक अभियान छेड़ना चाहिये। देश के धनपति लोगों को उन बुद्धिजीवियों की सहायता करना चाहिये। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल के सात्विक उपयोग से सभी को दीर्घकालीन फायदा है और यह तामसिक विषयों से अधिक समय तक नहीं हो सकता। इस तरह के प्रतिबंध एक पैबंद की तरह लगते जायेंगे पर कोई नतीजा नहीं निकलेगा। दरअसल हम जिस युवा वर्ग की आस्था और संस्कार डांवाडोल होने की बात कर रहे हैं वह मध्यम वर्ग का और शिक्षित है। उसे समझाया जाये तो समझाया जायेगा। जहां तक पूरे समाज का सवाल है तो निम्न मध्यम और निम्न वर्ग अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुसार अपने वैचारिक खजाने के साथ ही आस्था और संस्कारों की रक्षा कर लेता है। इस कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगे या नहीं यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है क्योंकि अपने देश की अध्यात्मिक शक्ति कोई कम नहीं है-यह इस लेखक का यकीन है। इन प्रतिबंधों को पैबंद इसलिये कहना पड़ा क्योंकि निजीकरण और उदारीकरण का जो मतलब हमने निकाला है उससे जो व्यवस्था बनी है वह व्यापार को अंध स्वतंत्रता देने की पोषक है। अब यही व्यवस्था एक समस्या बनती नजर आ रही है। सवाल यह है कि यह प्रतिबंध इसी व्यवस्था को बचाने के लिये पैंबंद की तरह नहीं लगेंगे? जो लोग इन विवादों को दृष्टा की तरह देख रहे हैं उनके लिये तो प्रतिबंध लगें तो भी ठीक न लगे भी तो उनको इसकी परवाह नहीं होगी। अलबत्ता बुद्धिजीवियों और लेखकों का अंतद्वंद्व भी सच का सामना ही करा रहा है जो कि कम मनोरंजक नहीं है। वैसे सुनने में आ रहा है कि सच का सामना वालों को प्रतियोगी नहीं मिल पा रहे जो कि इसी समाज की दृढ़ता का प्रतीक हैं।
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7/23/2009

निरर्थक कौतुहल- आलेख ( social hindi article)

सच बात तो यह है कि लोग अब कल्पना और सच का अंतर ही भूल गये हैं। टीवी धारावाहिकों हों या किताबों में शब्द और चित्र जिनमें सनसनी या रोमांच होता है उसमें दर्शक और पाठक इस तरह लिप्त हो जाते हैं जैसे कि कोई सच देख रहे हों। कई लोग तो टीवी धारावाहिकों को इतना खलपात्रों सच मान लेते हैं कि वह उनको रात में सताते हैं। सभी लोग जानते हैं कि खेल हो या फिल्म उनमें पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार लोगों में कौतूहल पैदा करने के वाले दृश्य बनाये जा रहे हैं। फिर भी वह उस निरर्थक कौतूहल में लिप्त हो जाते हैं।
इसके पीछे संगीत का उपयोग किस तरह होता है यह तो कोई विशारद ही समझ सकता है। अब तो यह हालत है कि क्रिकेट में चैके और छक्के पर लोगों में अधिक कौतूहल पैदा करने के लिये संगीत और नृत्य का सहारा लिया जाने लगा है।
इस तरह का निरर्थक कौतूहल करने की आदत हमारी अज्ञानता का ही प्रमाण है। हमारे पुराने ऋषि और मुनि इस तरह के कौतूहल से बचने की सलाह देते हैं। फिर आजकल बाजार इतना ताकतवर हो गया है कि तो एक के बाद एक नये कौतूहल पूर्ण दृश्य पैदा करता जा रहा है। एक धारावाहिक या यौन सामग्री से परिपूर्ण वेबसाईट पर प्रतिबंध लगाने से कुछ नहीं होने वाला। यह राज्य की नाकामी से अधिक हमारे समाज में गुरु की भूमिका निभाने की नाकामी है। सच बात तो यह है कि प्रतिबंध लगाना ही हमारे समाज की बौद्धिक क्षमताओं का प्रमाण बनता जा रहा है। यौन सामग्री से संपन्न अनेक वेबसाईट या धारावाहिक भी इस देश के समाज का कुछ नहीं बिगाड़ सकते अगर हमारे ं गुरु का दायित्व निभाने वाले लोग पूरी क्षमता और ईमानदारी से काम करते।
वैसे इस तरह की वेबसाईट या धारावाहिकों को देखने वाला एक छोटा तबका है जो हमारे देश की इतनी बड़ी बृहद जनसंख्या को देखते हुए बहुत कम है। वह भी ऐसा ही है जिसके पास समय और पैसा अधिक है और उसे अपना समय बिताने के लिय इस तरह के निरर्थक कौतूहल के अलावा अन्य कोई मार्ग नजर नहीं आता।
इसी निरर्थक कौतूहल पर हमारे प्राचीन ऋषि मनुमहाराज का संदेश यहां वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या समेत प्रस्तुत है।

न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्।
नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये।

न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्य´्जलिना पिबेत्।
नौत्संगे भक्षयेद् भक्ष्यानां जातु स्यात्कुतूहली।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि जिस कार्य को करने से अच्छा फल नहीं मिलता हो उसे करने का प्रयास व्यर्थ है। अंजली में भरकर पानी और गोद में रखकर भोजन करना ठीक नहीं है। बिना प्रयोजन का कौतूहल नहीं करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब आदमी तनाव रहित होता है तब वह कई ऐसे काम करता है जो उसकी देह और मन के लिये हितकर नहीं होते। लोग अपने उठने-बैठने, खाने-पीने, सोने-चलने और बोलने-हंसने पर ध्यान नहीं देते जबकि मनुमहाराज हमेशा सतर्क रहने का संदेश देते हैं। अक्सर लोग अपनी अंजली से पानी पीते हैं और बातचीत करते हुए खाना गोद में रख लेते हैं-यह गलत है।
जब से फिल्मों का अविष्कार हुआ है लोगों का न केवल काल्पनिक कुतूहल की तरफ रुझान बढ़ा है बल्कि वह उन पर चर्चा ऐसे करते हैं जैसे कि कोई सत्य घटना हो। फिल्मों की वजह से संगीत के नाम पर शोर के प्रति लोग आकर्षित होते हैं।
मनुमहाराज इनसे बचने का जो संदेश देते है उनके अनुसार नाचना, गाना, वाद्य यंत्र बजाना तथा गधे की आवाज जैसे शब्द बोलना अच्छा नहीं है। फिल्में देखना बुरा नहीं है पर उनकी कहानियों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों को देखकर कौतूहल का भाव पालन व्यर्थ है इससे आदमी का दिमाग जीवन की सच्चाईयों को सहने योग्य नहीं रह जाता।

नाचने गाने और वाद्य यंत्र बजाना या बजाते हुए सुनना अच्छा लगता है पर जब उनसे पृथक होते हैं तो उनका अभाव तनाव पैदा करता है। इसके अलावा अगर इस तरह का मनोरंजन जब व्यसन बन जाता है तब जीवन में अन्य आवश्यक कार्यों की तरफ आदमी का ध्यान नहीं जाता। लोग बातचीत में अक्सर अपना प्रभाव जमाने के लिये किसी अन्य का मजाक उड़ाते हुए बुरे स्वर में उसकी नकल करते हैं जो कि स्वयं उनकी छबि के लिये ठीक नहीं होता। कहने का तात्पर्य यह है कि उठने-बैठने और चलने फिरने के मामले में हमेशा स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए।
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7/20/2009

इंसान कभी बंदर नहीं रहा होगा-व्यंग्य आलेख (insan aur bandar-hindi hasya vyangya)

आदमी कभी बंदर रहा होगा-इस सिद्धांत पर यकीन नहीं होता। दरअसल बरसों पहले यह पश्चिमी सिद्धांत पढ़ा था कि आदमी पहले बंदर था या इसे यूं कहें कि बंदर धीरे धीरे आदमी बन गया। दरअसल हमने चालीस बरसों से किसी बंदर को आदमी बनते हुए नहीं देखा। कहा जाता है कि आदमी की बुद्धि इस सृष्टि में सबसे तीव्र है इसलिये ही वह पशु और पक्षियों तथा अन्य जीवों पर नियंत्रण कर लेता है और जिसमें बंदर भी शामिल है।
कई बार हमने बंदर को देखा है। उसे कभी हमलावर नहीं पाया। हमारे देश में कई ऐसे पवित्र स्थान हैं जहां बंदरों के झुंड के झुंड रहते हैं। वहां उनका आचरण आदमी से मेल नहीं खाता नजर नहीं आता। बंदर शरारती होते हैं पर खूंखार नहीं। आदमी अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर कब खूंखार हो जाये कहना कठिन है।
इस सिद्धांत को न मानने के अनेक तर्क हैं। सबसे पहला तो यह है कि इंसान अगर बंदर था तो वह वर्तमान स्थिति में कभी नहीं आता। इधर हमने अध्यात्मिक ग्रंथ भी छान मारे पर कहीं इस बात का उल्लेख नहीं मिलता कि आदमी पहले कभी बंदर था। वैसे यह खोज पश्चिम की है इसलिये इस पर आपत्ति करना आसान नहीं है पर उनके इस सिद्धांत में अविश्वास के कारण है। एक तो यह है कि सृष्टि के प्रारंभ में ही सभी प्रकार के जीव प्रकट हो गये थे। सभी का चाल चलन, रहन सहन, आयु और स्वभाव के मूल तत्व कभी नहीं बदले। इसी स्वभाव के वशीभूत हर जीवन अपने कर्म करता है।


एक बार हम दूसरे कोटा (राजस्थान)शहर गये। वहां मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर पर प्रसाद चढ़ाया और हाथ में उसका लिफाफा लिये परिक्रमा लगाने गये। परिक्रमा के बीच में मंदिर के पीछे एक बंदर आया और हमारे हाथ से वह लिफाफा ऐसे लेकर चलता बना जैसे कि उसको देने ही आये थे। बाद में हमने देखा कि वह आराम से अपने परिवार के साथ वह खा रहा है।
हम यह कहें कि उसने छीना तो यह एक अपराध की तरह है। उस समय वह इतने आराम से ले गया कि हाथ से जाने के बाद हमें पता लगा कि वह तो लिफाफा ले गया।
हम मंदिर के बाहर निकले तो वहां अनेक भिखारी प्रसाद मांग रहे थे। हमारे हाथ से लिफाफा जा चुका था इसलिये हम तो चुपचाप चले आये। घर आकर मेजबान से कहा तो उन्होंने कहा-‘हां, ऐसा होता है। कई लोगों के साथ ऐसा हुआ है पर हम भी कई बार वहां गये पर ऐसी घटना नहीं हुई।
कुछ दिन पहले एक मंदिर के बाहर एक औरत चिल्ला रही थी। कोई उसका पर्स उसके हाथ से छीनकर भाग गया था। वह चिल्लाती रही पर जब तक किसी का ध्यान इस ओर जाता तब तक छीनने वाला लोगों की नजरों से ओझल हो गया।
तब हमें उस बंदर की याद आयी। हम सोच रहे थे कि ‘क्या उसके द्वारा हमारे हाथ से प्रसाद का लेना क्या छीनना कहा जा सकता है?’
उत्तर भी हमने दिया ‘नहीं’।
इंसान दो ही काम कर सकता है-भीख मांगना या छीनना। भीख मांगने और छीनने वाला भी इंसान है पर इसी इंसान की फितरत है कि अगर कोई इंसान बंदर की तरह आराम से चीज ले जाये तो हल्ला मचा देगा। भीख देगा पर यह नहीं चाहेगा कि कोई उसकी चीज को अपनी समझकर ले जाये। छीन जाये अलग बात है। आशय यह है कि लेनदेन में सहजता का भाव तो नहीं रह सकता जैसे कि बंदर द्वारा हमारे हाथ से प्रसाद लेने पर हुआ था। हमने जरा भी प्रतिवाद नहीं किया। सोचा भूखा होगा? फिर आये भी तो वानरराज हनुमान जी के मंदिर में थे। अगर वहां कोई इंसान होता तो उससे प्रतिवाद कर वह लिफाफा वापस लेते पर बंदर से हमें स्वयं ही डर लग रहा था कि कहीं हमला कर भाग गया तो कहां उसे पकड़ पायेंगे?
तब ही हमेें इस बात पर यकीन हो गया था कि इंसान कभी बंदर नहीं रहा। बंदर के पीछे हम नहीं भाग सकते पर वह हमारे पीछे भाग सकता है। वह हमसे डरता है पर हमेशा नहीं! हां, हम उससे हमेशा डरते हैं।
बंदर की पतली टांगें और हाथ तथा देह की लंबाई चैड़ाई देखकर नहीं लगता कि उसकी कोई पीढ़ी आगे इंसान भी बन सकती है। बंदर में अपने भोजन का संचय करने की प्रवृत्ति नहीं होती। इंसान में तो वह इतनी विकट है कि उसका कहीं अंत नहीं है। सोने के लिये बिस्तरा और खाने के लिये रोटी चाहिये पर इंसान को उससे भी चैन कहां? उसे तो बैंक खाते में भी एक बड़ा आंकड़ा चाहिये जिससे देखकर उसका मन हमेशा अपने साहूकार होने के भ्रम में जीता रहे।
जब भी हम कहीं बंदर देखते हैं तब सोचते हैं कि क्या कभी इंसान भी ऐसा रहा होगा? तमाम तरह के विचार मंथन किये पर इस सिद्धांत को मन नहीं मानता। बंदर शरारती होता है पर अपराधी नहीं।
हम एक बार एक उठावनी कार्यक्रम में गये थे। वहां पर एक स्कूटर के पास खड़े थे जिस पर बंदर चढ़ा और हमारा चश्मा लेकर पास ही खड़े मकान की गैलरी पर बनी लोहे की सींखचों से चिपक कर बैठ गया। एक लड़का उसे पत्थर मारकर वह चश्मा वापस लेने का प्रयास करने लगा। वहां खड़े एक आदमी ने कहा कि ’कोई खाने वाली चीज फैंको तो उसे लेने के चक्कर में वह चश्मा नीचे फैंक देगा।’

तब एक बिस्कुट लेकर उसकी तरफ उछाला गया। उसे पकड़ने के चक्कर में वह चश्मा उसके हाथ से छूट गया और हमने नीचे उसे लपक लिया। वह बिस्कुट भी नीचे आ गिरा पर हमने उसे स्कूटर पर रख दिया और वहां से हट गये और वह उसे लेकर चला गया। उसने उस चश्मे को नष्ट करने का प्रयास नहीं किया बस उसे पकड़े रहा। तब उसकी इस शरारत पर हमें हंसी आयी। तब भी यही ख्याल आया कि इंसान कभी बंदर नहीं रहा होगा।
एक आदमी ने हमें एक बात बताई थी पता नहीं वह सच है कि झूठ। उसने बताया था कि भुटटे लगाने वाले खेतिहर यह दुआ करते हैं कि कोई बंदर उनके खेत पर आये। होता यह है कि बंदर एक भुट्टा उठाकर अपनी कांख में दबाता है फिर दूसरा तोड़ता है। बंदर इस तरह बहुत से भुट्टे तोड़कर खेत स्वामी की मेहनत बचाता है। आखिर तक उसकी कांख में एक ही भुट्टा बना रहता है। कुछ न कहो कहीं से बंदिरया की आवाज आये तो वह भी छोड़ कर चलता बने। इंसान ऐसा कभी नहीं रहा होगा।
बंदरों की मस्ती देखते ही बनती है। इंसान प्रकृत्ति की मस्ती को समझता नहीं है बल्कि उसे उजाड़ कर कागजी मुद्रा में परिवर्तित कर वह बहुत प्रसन्न होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि इंसान कभी बंदर नहीं रहा होगा। यह सच है कि इस सृष्टि में परिवर्तित होते रहते हैं। कई प्रकार के जीव बनते और बिगड़ते हैं, पर उनके स्वरूप में बदलाव नहीं आता। यह स्वरूप उनका मूल स्वभाव निर्धारित करता है। हो सकता है कि इंसानों जैसे बंदर रहे हों पर उनसे यह इंसान बना होगा यह संभव नहीं है। वह मिट गये होंगे पर इंसान नहीं बने होंगे। इंसान तो शुरु से ऐसा था और ऐसा ही रहा होगा। जीवों के मूल स्वभाव में परिवर्तन नहीं होता भले ही वह मिट जाते हों।
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7/19/2009

भर्तृहरि नीति शतक-रोजी पाने वाले से प्रणाम पाकर आदमी को अंहकार का बुखार चढ़ जाता है (ahankar ka bukhar-adhyatmik sandesh)

स जातः कोऽप्यासीनमदनरिमुणा मूध्निं धवलं कपालं यस्योच्चैर्विनहितमलंकारविधये।
नृभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कैश्चिदधुना नमद्धिः कः पुंसामयमतुलदर्प ज्वर भरः।
हिंदी में भावार्थ-
महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि भगवान शिव ने अपने अनेक खोपड़ियों की माला सजाकर अपने गले में डाल ली पर जिन मनुष्यों को अहंकार नहीं आया जिनके नरकंकालों से वह निकाली गयीं। अब तो यह हालत है कि अपनी रोजी रोटी के लिये नमस्कार करने वाले को देखकर उससे प्रतिष्ठित हुआ आदमी अहंकार के ज्वर का शिकार हो जाता है।

न नटा न विटा न गायकाः न च सभ्येतरवादचंचवः।
नृपमीक्षितुमत्र के वयं स्तनभारानमिता न योषितः।।
हिंदी में भावार्थ-
महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि न तो हम नट हैं न गायक न असभ्य ढंग से बात करने वाले मसखरे और न हमारा सुंदर स्त्रियों से कोई संबंध है फिर हमें राजाओं से क्या लेना देना?

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिसे देखो वही अहंकार में डूबा है। जिसने अधिक धन, उच्च पद और अपने आसपास असामाजिक तत्वों का डेरा जमा कर लिया वह अहंकार में फूलने लगता है। अपने स्वार्थ की वजह से सामने आये व्यक्ति को नमस्कार करते हुए देखकर कथित बड़े, प्रतिष्ठित और बाहूबली लोग फूल जाते हैं-उनको अहंकार का बुखार चढ़ता दिखाई देता है। यह तो गनीमत है कि भगवान ने जीवन के साथ उसके नष्ट होने का तत्व जोड़ दिया है वरना वह स्वयं चाहे कितने भी अवतार लेते ऐसे अहंकारियों को परास्त नहीं कर सकते थे।
अधिक धन, उच्च पद और बाहूबल वालों को राजा मानकर हर कोई उनसे संपर्क बढ़ाने के लिये आतुर रहता है। जिसके संपर्क बन गये वह सभी के सामने उसे गाता फिरता है। इस तरह के भ्रम वही लोग पालते हैं जो अज्ञानी है। सच बात तो यह है कि अगर न हम अभिनेता है न ही गायक और न ही मसखरी करने वाले जोकर और न ही हमारी सुंदर स्त्रियों से कोई जान पहचान तब आजकल के नये राजाओं से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह हमसे संपर्क रखेंगे। बड़े और प्रतिष्ठित लोग केवल उन्हीं से संपर्क रखते हैं जिनसे उनको मनोरंजन या झूठा सम्मान मिलता है या फिर वह उनके लिये व्यसनों को उपलब्ध कराने वाले मध्यस्थ बनते हों। अगर इस तरह की कोई विशेष योग्यता हमारे अंदर नहीं है तो फिर बड़े लोगों से हमारा कोई प्रयोजन नहीं रह जाता।
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7/18/2009

‘सच का सामना’ वह ख्याल से कर रहे होते-हास्य व्यंग्य और कवितायें (sach se samana-hindi vyangya aur kavitaen)

ख्याल कभी सच नहीं होते
आदमी की सोच में बसते ढेर सारे
पर ख्याल कभी असल नहीं होते।
कत्ल का ख्याल आता है
कई बार दिल में
पर सोचने वाले सभी कातिल नहीं होते।
धोखे देने के इरादे सभी करते
पर सभी धोखेबाज नहीं होते।
हैरानी है इस बात की
कत्ल और धोखे के ख्याल भी
अब बीच बाजार में बिकने लगे हैं
सच की पहचान वाले लोग भी अब कहां होते।।

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आदमी का दिमाग काफी विस्तृत है और इसी कारण उस अन्य जीवों से श्रेष्ठ माना जाता है। यह दिमाग उसे अगर श्रेष्ठ बनाता है पर इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि अगर उस पर कोई कब्जा कर ले तो वह गुलाम भी बन जाता है। इसलिये इस दुनियां में समझदार आदमी उसे ही माना जाता है जो बिना अस्त्र शस्त्र के दूसरे को हरा दे। अगर हम यूं कहे कि बिना हिंसा के किसी आदमी पर कब्जा करे वही समझदार है। हम इसे अहिंसा के सिद्धांत का परिष्कृत रूप भी कह सकते हैं।
अंग्रेजों ने भारत को डेढ़ सौ साल गुलाम बनाये रखा। वह हमेशा इसे गुलाम बनाये नहीं रख सकते थे इसलिये उन्होंने ऐसी योजना बनायी जिससे इस देश में अपने गोरे शरीर की मौजूदगी के बिना ही इस पर राज्य किया जा सके। इसके लिये उन्होंने मैकाले की शिक्षा पद्धति का सहारा लिया। बरसों से बेकार और निरर्थक शिक्षा पद्धति से इस देश में कितनी बौद्धिक कुंठा आ गयी है जिसे अभी दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रम सच का सामना में देखा जा सकता है।
‘आप अपने पति का कत्ल करना चाहती थीं?’
‘आप अपनी पत्नी को धोखा देना चाहते थे?’
पैसे मिल जायें तो कोई भी कह देगा हां! हैरानी है कि समाचार चैनल कह रहे हैं कि ‘हां, कहने से पूरा हिन्दुस्तान हिल गया।’
सबसे बड़ी बात यह है कि लोग सच और ख्याल के बीच का अंतर ही भूल गये हैं। कत्ल का ख्याल आया मगर किया तो नहीं। अगर करते तो जेल में होते। अगर धोखे का ख्याल आया पर दिया तो नहीं फिर अभी तक साथ क्यों होते?
वह यूं घबड़ा रहे हैं
जानते हैं कि झूठ है सब
फिर भी शरमा रहे हैं।
सच की छाप लगाकर ख्याल बेचने के व्यापार से
वह इसलिये डरे हैं कि
उसमें अपनी जिंदगी के अक्स
उनको नजर आ रहे हैं।
कहें दीपक बापू
ख्यालों को हवा में उड़ते
सच को सिर के बल खड़े देखा है
कत्ल और धोखे का ख्याल होना
और सच में करना
अलग बात है
ख्याल तो खुद के अपने
चाहे जहां घुमा लो
सच बनाने के लिये जरूरत होती है कलेजे की
साथ में भेजे की
अक्ल की कमी है जमाने के
इसलिये सौदागर ख्याल को सच बनाकर
बाजार में बेचे जा रहे हैं।
ख्यालों की बात हो तो
हम एक क्या सौ लोगों के कत्ल करने की बात कह जायें
सामना हो सच से तो चूहे को देखकर भी
मैदान छोड़ जायें
पैसा दो तो अपना ईमान भी दांव पर लगा दें
सर्वशक्तिमान की सेवा तो बाद में भी कर लेंगे
पहले जरा कमा लें
बेचने वालों पर अफसोस नहीं हैं
हैरानी है जमाने के लोगों पर
जो ख्वाबों सच के जज्बात समझे जा रहे हैं
शायद झूठ में जिंदा रहने के आदी हो
हो गये हैं सभी
इसलिये ख्याली सच में बहे जा रहे हैं।

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7/15/2009

नकली और मिलावटी आतंक-हास्य व्यंग्य (nakli aur milavti atank)

आतंक कोई बाहर विचरने वाला पशु नहीं बल्कि मानव के मन में रहने वाला भाव है जो उसके सामने तब उपस्थित होता है जब वह अपने लिये कठिन हालत पाता है। पूरे विश्व के साथ भारत में भी आंतक फैले होने की बात की जाती है पर अन्य से हमारी स्थिति थोड़ी अलग है। दूसरे देश कुछ लोगों द्वारा उठायी गयी बंदूकों के कारण आतंक से ग्रसित हैं पर भारत में तो यह आतंक का एक हिस्सा भर है। यह अलग बात है कि हमारे देश के बुद्धिमान बस उसी बंदूक वाले आतंक पर ही लिखते हैं।
बहुत दिन से हम देख रहे हैं कि हम सारे जमाने के आतंक पर लिख रहे हैं पर अपने मन में जिनका आंतक है उसकी भी चर्चा कर लें। सच बात तो यह है हम नकली नोटों और मिलावटी सामान से बहुत आतंकित हैं।
बाजार में जब किसी को पांच सौ का नोट देते हैं तो वह ऐसे देखता है कि जैसे कि किसी अपराधी ने उसे अपने चरित्र का प्रमाणपत्र देखने के लिये दिया हो। जब तक वह दुकानदार लेकर अपनी पेटी में वह नोट डालकर सौदा और बचे हुए पैसे वापस नहीं करता तब तक मन में जो उथल पुथल होती है उसमें हम कितनी बार घायल होते हैं यह पता ही नहीं-याद रहे पश्चिमी चिकित्सा शास्त्र यह कहता है कि तनाव से जो मनुष्य के दिमाग को क्षति पहुंचती है उसका पता उसे तत्काल नही चलता।
हमने अनेक दुकानदारों के सामने ताल ठौंकी-अरे, भईया हम यह नोट ए.टी.एम से ताजा ताजा निकाल कर लाये हैं।’
वह कहते हैं कि ‘साहब, आजकल तो ए़.टी.एम. से भी नकली नोट निकल आते हैं और वह सभी ताजा ही होते हैं।’
उस समय सारा आत्मविश्वास ध्वस्त नजर आता है। ऐसा लगता है कि जैसे बम फटा हो और हम अपनी किस्मत से साबित निकल गये।
यही मिलावटी सामान का हाल है। बाजार में खाने के नाम पर दिन-ब-दिन डरपोक होते जा रहे हैं। इधर टीवी पर सुना कि मिलावटी दूध में ऐसा सामान मिलाया जा रहा है जिसमें एक फीसदी भी शरीर के लिये पाचक नहीं हैं। मतलब यह कि पूरा का पूरा कचड़ा है जो पेट में जमा होता है और समय आने पर अपना दुष्प्रभाव दिखाता है। अभी उस दिन समाचार सुना कि एक तेरहवीं में विषाक्त खोये की मिठाई खाकर 1200 लोग एक साथ बीमार पड़ गये। उस समय हमारी सांसें उखड़ रही थी। उसी दौरान एक मित्र का फोन आया और उसने पूछा-‘क्या हालचाल हैं? तुम्हारे ब्लाग हिट हुए कि नहीं। अगर हो गये हों तो मिठाई खिला देना। हम अंधेरे में बैठे हैं और आज तुम्हारा ब्लाग नहीं देख पा रहे।’
हमने कहा-‘अच्छा है बैठे रहो। अगर लाईट आ गयी तो तुम टीवी समाचार भी जरूर देखोगे। वहां जब मिठाई खाकर बीमार पड़ने वालों की खबर सुनोगे तो फिर मिठाई नहीं मांगोगे बल्कि मिठाई खाना ही भूल जाओगे।’
मित्र ने कहा-‘’तुम चिंता मत करो। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। तुम कभी हिट नहीं बनोगे इसलिये मिठाई भी नहीं मिलेगी सो खतरा कम है। पर यार, वाकई बाहर खाने में हम दिमाग तनाव मे आ जाता है कि कहीं गलत चीज तो नहीं खा ली। उस दिन एक जगह चाय पी और बीच में छोड़ कर दुकानदार को पैसे दिये और उससे कहा‘यह हमारी इंसानियत ही समझना कि हमने पैसे दिये वरना तुम्हारा दूध खराब है उसमें बदबू आ रही है।’ उसने भी हमसे पैसे ले लिये। हैरानी की बात यह है कि लोग उसी चाय को पी रहे थे किसी ने उससे कुछ कहा नहीं।’’
पिछली दो दीवाली हमने बिना खोये की मिठाई खाये बिना ही मनाई हैं। कहां हमें उस दिन मिठाई खाने का शौक रहता था पर मिलावट के आतंक ने उसे छीन लिया। वजह यह है कि इधर दीवाली के दिन शुरु हुए उधर टीवी पर मिलावटी दूध के समाचार शुरु हो जाते हैं कहते हैं कि
1-शहरों में खोवा आ कहां से रहा है जबकि उस क्षेत्र में इतनी भैंसे ही नहीं्र है।
2-खोये में तमाम ऐसे रसायन मिले होते हैं जो पेट की आंतों में भारी हानि पहुंचाते हैं।
3-घी भी पूरी तरह से नकली बन रहा है।’
ऐसे समाचार जो दिमाग में आंतक फैलाते हैं वह बारूद के आतंक से कहीं कम नहीं होते। आप ही बताईये खोय की विषाक्त मिठाई खाकर 1200 लोग एक साथ बीमार हों तो उसे भला छोटी घटना माना जा सकता है? क्या जरूरी है कि दुनियां के किसी हिस्से में बारूद से लोग मरे उसे ही आतंकवादी घटना माना जायेगा?
समस्या यह नहीं है कि दूध, घी या खोवा मिलावटी सामान बन रहा है बल्कि हल्दी, मिर्ची और शक्कर में मिलावट की बात भी सामने आती है। इतना ही नहीं अब तो यह भी कहने लगे है कि सब्जियों और फलों में भी दवाईयां मिलाकर उन्हें प्रस्तुत किया जा रहा है और वह भी कम मनुष्य देह के लिये कम खतरनाक नहीं है।

जब बारूदी आतंक का समाचार चारों तरफ गूंज रहा होता है तब कुछ देर उस पर ध्यान अधिक रहता है पर जब अपने जीवन में कदम कदम पर नकली और खतरनाक सामान से सरोकार होने की आशंका है तो वह भी अब कम आतंकित नहीं करती। मतलब यह है कि चारों तरफ आंतक है पर हमारे देश के बुद्धिमान लोगों की आदत है कि विदेश के बताये रास्ते पर ही अपने विषय चुंनते हैं। हम इससे थोड़ा अलग हैं और हर विषय को एक आईना बनाकर अपने आसपास देखते हैं तब लगता है कि इस विश्व में बारूदी आतंक खत्म वैसे ही न होने वाला पर जो यह नकल और मिलावट का यह अप्रत्यक्ष आतंक है उसके परिणाम उससे कहीं अधिक गंभीर हैं। सोचने का अपना अपना तरीका है कोई सहमत न हो यह अलग बात है।
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आठवी वरीयता का दूसरा प्रमाण भी साईडबार में लगाया-संपादकीय (second certificat of 8th raking)

निशांत मिश्र बहुत अच्छा लिखते हैं। उनके ब्लाग और रुचि देखकर बहुत खुशी हुई। उनका विवरण देखकर पता लगा कि वह जुलाई 2008 से सक्रिय हैं। उन्होंने इस ब्लाग को विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त होने के प्रमाण पर सवाल उठाये थे जो उनको इस लेखक ने भेज दिया है। उनकी टिप्पणी की वजह से ही दूसरा प्रमाण भी इस ब्लाग पर लगा दिया है ताकि यह कहा न जा सके कि किसी एक जगह से ही प्रमाण जुटाया है।
मैंने उनको बता दिया है कि एलेक्सा की टाप साईट में जाकर वह blogger.com पर क्लिक करें और site widgest में जाकर एक खाने में इस ब्लाग http://anantraj.blogspot.com का नाम टाईप करें और और फिर नीचे देखें तो उनका पता लग जायेगा कि इस ब्लाग की विश्व में आठवीं वरीयता है फिर मैंने एक दूसरी भी बेवसाईट का प्रमाण पत्र साईड बार में लगा दिया है।
दरअसल अलेक्सा की टाप साईट पर जो बेवसाईट हैं वह अपने पीछे छिपी बेवसाईटों का भी प्रतिनिधित्व करती है। अलेक्सा में उन्हीं दस वेवसाईटों का जानकारी देने के लिये भुगतान लेने की व्यवस्था है। अलबत्ता उसने अपना प्रमाण पत्र ब्लाग स्वामी को ले जाने की इजाजत दे रखी है। चूंकि इस लेखक को अपने ब्लाग से कोई आय नहीं है इसलिये उसकी जरूरत नहीं है। यह जानकारी तो स्वतंत्र मौलिक लेखकों के साथ बांटी है-इसका कोई अन्य उद्देश्य नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि यह ब्लाग आठवीं वरीयता प्राप्त है। जहां तक इसके हिंदी होने का सवाल है तो हिंदी लेखक होने पर शर्मिंदगी होने की जरूरत नहीं है। दिसम्बर 2007 से सक्रिय होने के बाद इस अंतर्जाल पर बहुत कुछ समझ में आ रहा है। कोई हिंदी वेबसाईट सौ नंबर की रैंक में नहीं है-इस तरह के दावे इस लेखक को प्रभावित नहीं करते। जिन दस साईटों को सामने अलेक्सा दिखा रहा है उनको तो कोई पीट ही नहीं सकता क्योंकि वह तो अंतर्जाल का आधार स्तंभ हैं। यह हिट या फ्लाप का खेल तो उनके उपभागों का है जिसमें ब्लागर काम का एक छोटा हिस्सा यह ब्लाग/पत्रिका भी है। यही कारण है कि उस ब्लागर काम के पीछे इसको स्थान मिला हुआ है अगर भुगतान किया जाये तो इसी ब्लाग का नाम मिलेगा जैसे कि दूसरी वेबसाईट ने दिखाया है।
बहरहाल अब इस बहस को अब अन्य ब्लाग/पत्रिकाओं पर जारी रखेंगे। यह और चिंतन ब्लाग हमारे ऐसे ब्लाग हैं जो सर्वाधिक प्रिय हैं। हां, अब कोई अनंत शब्दयोग की इससे अलग वास्तविक रैंकिंग प्रमाणित करे तो अच्छा रहेगा। सबसे अधिक तो यह लेखक आभारी रहेगा क्योंकि किसी प्रकार का भ्रम तंग करता है और सच का सामना करने का उसमें साहस है। बहरहाल आठवीं वरीयता प्राप्त इस ब्लाग में नियमित रूप से लिखने का प्रयास होगा और जिसमें इस ब्लाग की प्रशंसा में कुछ नहीं लिखा जायेगा। बहरहाल इसके पिछले आलेखों में पहले ही सब स्पष्ट कर दिया गया है उनको पढ़कर ही अपनी राय कायम करें तो अधिक सुविधाजनक रहेगा।
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7/14/2009

इस ब्लाग/पत्रिका को 8वीं वरीयता मिलना सामुदायिक प्रयासों का परिणाम-संपादकीय (editorial on ranking 8)

इस ब्लाग के साईड बार में जो एलेक्सा का प्रमाणपत्र लगा है उसे कहीं से कोई चुनौती नहीं मिली। यह दुनियां की आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग/पत्रिका है-इस पर अब बहस की गुंजायश नहीं है। इसलिये अब इस पर अब भविष्य में अधिक गंभीरता से लिखने का प्रयास किया जायेगा। अभी तक यह लेखक केवल यही सोचकर चलता आ रहा था कि हिंदी में लिख रहे हैं इसलिये किसी अच्छे मुकाम पर पहुंचने की संभावना नहीं है पर जैसे ही यह ब्लाग/पत्रिका आठवीं वरीयता प्राप्त कर गया इसने नई संभावनाओं के संकेत दिये। हम उस पर इस ब्लाग पर चर्चा अब नहीं करेंगे।
सबसे पहले तो हम आभारी हैं निर्मला कपिला जी, विवेक सिंह जी, काजल कुमार जी, और संगीता पुरी जी के जिन्होंने दूसरे ब्लाग पर टिप्पणी देकर इस संपादकीय की रूपरेखा को बदल दिया। दरअसल इस लेखक के मन में इनकी टिप्पणियां देखकर यह विचार आया कि हिंदी ब्लाग जगत एकल प्रयासों से सफल नहीं हो सकता। यहां सफलता की पहली शर्त यह है कि आप बेहतर और स्वाभाविक रूप से लिखने का प्रयास करें और दूसरी यह है कि आप दूसरो का लिखा पढ़े और स्वयं भी उन पर टिप्पणियां करें। इसका लाभ आपके ब्लाग को भी मिलता है।
अनंत शब्दयोग ब्लाग/पत्रिका का विश्व स्तर पर आठवीं वरीयता में पहुंचना कोई एकल प्रयास नहीं है न अकेले इस ब्लाग पर लिखे पाठों का परिणाम है। इसके सहयोगी ब्लाग चिंतन, शब्दलेख सारथी, अंतर्जाल पत्रिका तथा अन्य ब्लाग/पत्रिकाओं के समर्थन का भी परिणाम है। आपके ब्लाग से दूसरी जगह से पाठक आते और जाते हैं यह ब्लाग के अंक बढ़ाता है। सच बात तो यह है कि अनंत शब्दयोग एक सामुदायिक ब्लाग होने के कारण आठवीं वरीयता में पहंुचा है क्योंकि इसके ईमेल से अन्य ब्लाग भी जुड़े हैं। इसमें हिंदी दिखाने वाले चारों फोरमों नारद, चिट्ठाजगत,ब्लागवाणी तथा हिंदी ब्लाग्स का भी योगदान है। सर्च इंजिनों में कई जगह यह फोरम केवल ब्लाग की वजह से ही पहुंचकर वह उसे वहां पाठक भी दिलवाते हैं। वैसे अब इस ब्लाग पर नियमित रूप से लिखा जायेगा क्योंकि इसके साथ ही इस ब्लाग लेखक की आगे की संभावनायें भी जुड़ी हुई हैं। इसके साथ ही इस ब्लाग पर अब अन्य ब्लाग मित्रों के भी लिंक भी बढ़ाये जायेंगे। इस अवसर पर सभी मित्रों और पाठकों का आभार व्यक्त करते हुए शुभकामनायें।
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7/13/2009

विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त यह हिंदी ब्लाग/पत्रिका!

यह एलेक्सा की चूक भी हो सकती है और सच भी कि इस ब्लाग को विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त है। पिछले सप्ताह यह सातवें नंबर पर था। इस समय यह विकिपीडिया के पीछे है। इसके लेखक ने ऐलेक्सा की टाॅप साईटस देखी तो वहां blogger.com रहा हैं और जब वहां क्लिक करते हैं तो ब्लाग खाता खोलने वाला ब्लाग सामने आ जाता है। एक बार इस लेखक ने टाप साईटस के लिये प्रयास किया तो एक जगह यह पता लगा कि भुगतान करने पर ही दसों साईटस का पता दिया जायेगा। इसका आशय यह है कि इन साईट में भी अन्य साईट छिपी हुई हैं। वहां क्लिक करने के बाद एक ईमेल भी आया कि शायद आप प्रक्रिया पूरी नहीं कर सके इसलिये दोबारा कर सकते हैं इसका आशय यह है कि यह ‘अनंत शब्दयोग’ चूंकि ब्लागर काम के अंतर्गत हैं इसलिये उसे सीधे नहीं दिखा रहे हैं-क्योंकि इससे उनको कोई लाभ नहीं होगा।
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बहरहाल उन्होंने हमें अनंत शब्दयोग का लिंक उठाने से नहीं रोका। हम तो यही मानकर चल रहे हैं कि यह सही होगा अगर गलत भी हुआ तो परवाह किसे है पर यह तो इतिहास में दर्ज हो गया कि एक हिंदी ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’ को 12 जुलाई 2009 रविवार के दिन विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त थी। अभी तक अनेक लेखक किसी हिंदी ब्लाग के एक लाख से नीचे आने पर ही खुश हो जाते हैं ऐसे में सभी हिंदी ब्लाग लेखकों को यह सोचकर खुशी होना चाहिये कि उनके बीच में ही सक्रिय ब्लाग विश्व की आठवीं वरीयता पा रहा है। जो बात इतिहास में दर्ज हो गयी तो हो गयी। क्रिकेट के खेल में अंपायर की भूमिका सभी जानते हैं कि एक बार स्टंप के बाहर जाती हुई गेंद पर उसने बल्लेबाज को एल.बी.डब्लयू. दे दिया तो दे ही दिया। यह ब्लाग विकिपीडिया के बाद आठवें नंबर पर रहा तो इसे अब कोई बदल नहीं सकता। अब यह ब्लाग हमेशा वहां बना रहेगा यह कहना कठिन है पर अब लेखक सोच रहा है कि क्यों न इस पर थोड़ा अधिक ध्यान दिया जाये और इसकी वरीयता ऊपर लायी जाये। यहां यह भी याद रखें कि हमें यह जानकारी दूसरी वेबसाईट से मिली थी तब हमने प्रयास कर देखा तो पाया कि इसको आठवी वरीयता प्राप्त होने की बात सच थी।
इस लेखक के बीस अन्य ब्लाग भी है-इसके अलावा दो जब्त हुए भी पड़े हैं-और उनमें सबसे अधिक वरीयता वर्डप्रेस के ब्लाग हिंदी पत्रिका को है जो कि 22 लाख के आसपास है। बहरहाल इस ब्लाग का इतना ऊंचा पहुंचने से खुश होने की जरूरत नहीं है। कल को यह गिरा तो अफसोस भी होगा। वैसे हमने गंभीरता से इधर उधर देखा तो लगा कि इन रैक देने वाली वेबसाईटों मेें कुछ ऐसा है जो अभी तक भारत में कोई नहीं समझ सका। फिर जो व्यूज बताने वाली वेबसाईटें हमने लगा रखी है वह सभी व्यूज बता पाती हैं यह भी दावे से नहीं कहा जा सकता। बहरहाल देखते हैं आगे क्या होता है? वैसे कल हम एक लेख लिखकर यह आशा कर रहे थे कि कोई इसमें हमारी चूक बतायेगा पर यह नहीं हुआ। वैसे कोई हमें यह कहे कि हम गलती कर रहे हैं तो भी अफसोस नहीं खुशी होगी क्योंकि हमें अपना फ्लाप होना मंजूर है पर भ्रम में जीना नहीं। हम तो स्वयं ही धर्म, जाति, भाषा, और क्षेत्र के नाम पर समूह बनाकर भ्रम मेें जीते लोगों को यही संदेश देते हैं कि यह सब भ्रम है तब भला स्वयं कैसे यह मान सकते हैं कि सफलता के भ्रम में जियें। अगर यह सच भी हो तो भी हम लिखते रहेंगे क्योंकि अपनी सफलता पर इतराना आगे नाकामी को दावत देना है। हां, यह सच है कि अगर सफल हो गये तो हमारी बात को आधिकारिक माना जायेगा। खैर, आगे आगे देखिये होता है क्या? अगर यह स्थिति अगले कुछ दिन तक रहती है और इस सफलता को प्रमाणिक मान लिया जाता है तो कुछ तथ्य ऐसे भी हैं जो इस ब्लाग को आठवी वरीयता प्राप्त होने को सच मानते हैं और हम इन पर तभी लिखेंगे जब स्वयं संतुष्ट हो जायेंगे। संतुष्ट नहीं है इसलिये तो किसी को धन्यवाद तक ज्ञापित नहीं कर रहे। वैसे साईडबार में ऐलेक्सा से उठाया प्रमाणपत्र भी लगा दिया है। जिसे देखना हो देख ले। बस, यार कुछ उल्टा पुल्टा हो जाये तो हंसना नहीं क्योंकि हम तो वही लिख रहे हैं जो देख रहे हैं।
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7/12/2009

इस ब्लाग की ऐलेक्सा में ट्रैफिक रैकिंग 8 हो सकती है?

यह दिलचस्प भी और अविश्वसनीय भी। अक्सर ब्लाग लेखक अपने ब्लाग के लिये ऐलेक्सा का प्रमाण देते हैं। इस लेखक ने भी वहां कई बार देखा है तो उसके ब्लाग हमेशा पिछड़े रहते हैं। मगर यह सबसे पुराना ब्लाग है ‘अनंत शब्दयोग’ जिसके बारे में एलेक्सा हमेशा कहता है कि इसके लिये डाटा उपलब्ध नहीं है। लेखक ने भी मान लिया कि उस पर बहुत लिखा जाता है इसलिये उसकी स्थिति यही हो सकती है। मगर ‘दीपक भारतदीप’ के नाम से सर्च करते हुए इस ब्लाग पर नजर पड़ी। वह वल्र्ड डोमेज से जुड़ा हुआ था। वहां खोलने पर पता लगा कि एलेक्सा में इसकी ट्रेफिक रैकिंग आठ है। लिंक 9 नंबर भी दिया था। जब एलेक्सा पर देखा गया तो फिर वही पुराना जवाब दिया गया।
बहरहाल हम यहां लिंक दे रहे हैं।


UrlTrends Quick Summary
URL: http://anantraj.blogspot.com

Google PageRank: 3/10
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Accurate as of: July 12th, 2009
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ऐसा लगता है कि एलेक्सा बहुत ऊंची रैकिंग देता नहीं है या हम से ही कोई गलती हो गयी है। अलबत्ता हिंदी के ब्लाग लेखक लिखते हैं कि एक लाख की संख्या से अगर कोई नीचे हिंदी ब्लाग हो तो उसे भी अच्छा माना जाना चाहिये मगर यह तो दो अंकों से भी कम है। हम यहां दो लिंक दे रहे हैं। सुधि पाठक और ब्लाग लेखक इसे चेक करें। लेखक का यह दावा कतई नहीं है कि यह हिंदी का सबसे लोकप्रिय ब्लाग है क्योंकि इस अंतर्जाल की माया ही कुछ ऐसी है कि समझ में तो हमारे भी नहीं आती। बहरहाल यह आंकड़ा दिलचस्प है और इसे हम अपने मित्रों से ही बांट रहे हैं पर इस पर अभिभूत कतई नहीं है। अगर गलती हो जाये तो मजाक न बनायें यही अपेक्षा है। अगर यह सही है तो फिर लिखने लायक बहुत कुछ हमारे पास है वह भी लिख देंगे। नहीं तो यह पाठ यहां नहीं रहने देंगे। अपनी बेवकूफी कौन जगजाहिर करता है। यहां यह भी बता दें कि अभी हाल ही में एक पौर्न बेवसाईट को प्रतिबंधित किया गया था उसकी भी हमने एलेक्सा वाली रैकिंग एक जगह लिखी देखी थी 1124। ऐसे में इस ब्लाग की रैकिंग हमें चौंका सकती है।
http://www.urltrends.com/viewtrend.php?url=http%3A%2F%2Fanantraj.blogspot.com
वैसे हम उस ब्लाग शब्दलेख सारथी की भी जानकारी दे रहे हैं जिससे हम सबसे अधिक हिट समझते हैं पर ऐलेक्सा में उसकी रैकिंग 81,50,877 है और दोनों ही वेबसाईट उसे प्रमाणित कर रही है। एक सवाल यह भी है कि क्या ऐलेक्सा उच्च रैकिंग वाले ब्लाग की जानकारी स्वयं कोई नहीं देता और दूसरों को कैसे जाती हैं। बहरहाल विस्तृत जानकारी मिल जाये तो आगे कुछ लिखे।
UrlTrends Quick Summary
URL: http://deepkraj.blogspot.com

Google PageRank: 4/10
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DMOZ Listed: No

Accurate as of: July 12th, 2009
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http://www.urltrends.com/viewtrend.php?url=http%3A%2F%2Fdeepkraj.blogspot.com
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

7/11/2009

यौन वेबसाइट का मुद्दा-व्यंग्य आलेख (hindi satire on the ben website)

समाज के बिगड़ने का खतरा किससे है? इंटरनेट की वेबसाईटों पर यौन साहित्य-लोगों का दिल रखने के लिये इसे हम शिक्षाप्रद भी मान लेते हैं- पढ़ने वालों की संख्या अधिक है कि समलैंगिकों की। हम क्या समझें कि यह यौन वेबसाईटें अधिक खतरनाक हैं या समलैंगिकता की प्रथा?
जहां तक हमारा सवाल है तो मानते हैं कि समाज के बनने और बिगड़ने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसे कोई चला और बदल नहीं सकता। अच्छी और बुरी मानसिकता वाले लोग इस धरती पर विचरते रहेंगे-संख्या भले लोगों की अधिक होगी अलबत्ता बेहूदेपन की चर्चा अधिक दिखाई और सुनाई देगी। समलैंगिकता या यौन साहित्य पर प्रतिबंध हो या नहीं इस पर अपनी कोई राय नहीं है। हम तो बीच बहस कूद पड़े हैं-अपने आपको बुद्धिजीवी साबित करने की यही प्रथा है। वैसे तो हम अपने मुद्दे लेकर ही चलते हैं पर इससे हमेशा हाशिये पर रहते हैं। देश में वही लोकप्रिय बुद्धिजीवी है जो विदेशी पद्धति वाले मुद्दों पर बहस करता है।
अब देश के अधिकतर बुद्धिजीवी बंदूक वाले आतंकवाद पर बहस करते हैं तो उनको खूब प्रचार मिलता है। हम नकल और मिलावट के आतंक की बात करते हैं तो कोई सुनता ही नहीं। इसलिये सोचा कि अंतर्जाल के यौन साहित्य और समलैंगिकता के मुद्दे पर लिखकर थोड़ा बहुत लोगों का ध्यान आकर्षित करें। वैसे इन दोनों मुद्दों पर हम पहले लिख चुके हैं पर यौन साहित्य वाली एक सविता नाम की किसी वेबसाईट पर प्रतिबंध पर हमारे एक पाठ को जबरदस्त हिट मिले तब हम हैरान हो गये।
ऐसे में सोचा कि चलो कुछ अधिक हिट निकालते हैं। दूसरा पाठ भी जबरदस्त हिट ले गया। समलैंगिता वाला पाठ भी हिट हुआ पर अधिक नहीं। हम दोनों विषयों को भुला देना चाहते थे पर टीवी और अखबारों में समलैंगिकता का मुद्दा बहस का विषय बना हुआ है। इस मुद्दे पर पूरे समाज के बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है जो निरर्थक है। हमारा दावा है कि इस देश में एक या दो लाख से अधिक समलैंगिक प्रथा को मानने वाले नहीं होंगे। इधर अंतर्जाल पर भी इसी मुद्दे पर अधिक लिखा जा रहा है।

सवाल यह है कि सविता भाभी नाम की उस वेबसाईट पर प्रतिबंध को लेकर कोई जिक्र क्यों नहंी कर रहा जिसके बारे में कहा जाता है कि पूरे देश के बच्चों को बिगाड़े दे रही थी। एक अखबार में यह खबर देखी पर उसके बाद से उसकी चर्चा बंद ही है। टीवी वालों ने तो इस पर एकदम ध्यान ही नहीं दिया-यह एक तरह से जानबूझकर किया गया उपेक्षासन है क्योंकि वह नहीं चाहते होंगे कि लोग उस वेबसाईट का नाम भी जाने। उसका प्रचार कर टीवी वाले अपने दर्शक नहीं खोना चाहेंगे। हो सकता है कि यौन साहित्य वाली वेबसाईटों को यही टीवी वाले अपने प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रहे हों। वैलंटाईन डे पर अभिव्यक्ति की आजादी पर बवाल मचाने वाले लोग पता नहीं कहां गायब हो गये हैं। गुलाबी चड्डी प्रेषण को आजादी का प्रतीक मानने वाले अब नदारत हैं। यह हैरान करने वाला विषय है।
समलैंगिकता पर बहस सुनते और पढ़ते हमारे कान और आंख थक गये हैं पर फिर भी यह दौर थम नहीं रहा।
हम बड़ी उत्सुकता से सविता भाभी वेबसाईट पर प्रतिबंध के बारे में बहस सुनना चाहते हैं-करना नहीं। बड़े बड़े धर्माचार्य और समाजविद् समलैंगिकता के मुद्दे पर उलझे हैं।
1.पूरा समाज भ्रष्ट हो जायेगा।
2.मनुष्य की पैदाइश बंद हो जायेगी।
3.यह अप्राकृतिक है।
बहस होते होते भ्रुण हत्या, बलात्कार और जिंदा जलाने जैसे ज्वलंत मुद्दों की तरफ मुड़ जाती है पर नहीं आती तो इंटरनेट पर यौन साहित्य लिखने पढ़ने की तरफ।
इसका कारण यह भी हो सकता है कि समलैंगिकता पर बहस करने के लिये दोनों पक्ष मिल जाते हैं। कोई न कोई धर्माचार्य या समलैंगिकों का नेता हमेशा बहस के लिये इन टीवी वालों को उपलब्ध मिलते हैं। सविता भाभी प्रकरण में शायद वजह यह है कि इसमें सक्रिय भारतीय रचनाकार (?) कहीं गायब हो गये हैं। एक संभावना हो सकती है कि वह सभी छद्म नाम से लिखने वाले हों ऐसे में जो पहले से डरे हुए हैं वह क्या सामने आयेंगे? उन लोगों ने कोई सविता भाभी सेव पोजेक्ट बना लिया है पर अंतर्जाल के बाहर उनका संघर्ष अधिक नहीं दिख रहा। उनका सारा संघर्ष कंप्यूटर पर ही केंद्रित है। एक वजह और भी हो सकती है कि इंटरनेट पर काम करने वालों का कुछ हद तक सामाजिक जीवन प्रभावित होता है इसलिये वह अपने बाह्य संपर्क जीवंत बना नहीं पाते और जिनके हैं उनकी निरंतरता प्रभावित होती है। शायद इसलिये सविता भाभी के कर्णधारों को बाहर कोई नेतृत्व नहीं मिल रहा जबकि समलैंगिकों के सामने कोई समस्या नहीं है।
समाज के बिगड़ने वाली वाली हमारे कभी समझ में नहीं आती। यौन साहित्य तो तब भी था जब हम पढ़ते थे और आज भी है। इस समय जो लोग अपनी उम्र की वजह से इसका विरोध कर रहे हैं यकीनन उन्होंने भी कहीं न कहीं ऐसा साहित्य पढ़ा होगा। हमने भी एकाध पढ़ा पर मजा नहीं आया पर पढ़ा तो!
समलैंगिकता से पूरा समाज बिगड़ जायेगा यह बात केवल हंसी ही पैदा कर सकती है वैसे ही जैसे यौन साहित्य से सभी बच्चे बिगड़ जायेंगे? इस देश का हर समझदार बच्चा जाता है कि समलैंगिकता एक अप्राकृतिक क्रिया है।
यौन साहित्य की बात करें तो क्या देश में कभी बच्चों ने ऐसा साहित्य पढ़ा नहीं है? क्या सभी बिगड़ गये हैं? एक आयु या समय होता है जब ऐसी बातें मनुष्य को आकर्षित करती हैं पर फिर वह इससे स्वतः दूर हो जाता है।
हम तो मिलावटी खाद्य सामग्री और नकली नोटों के आतंक की बात करते थक गये। इधर समलैंगिकता पर चल रही बहस उबाऊ होती जा रही है। इसलिये कहते हैं कि-‘यार, सविता भाभी वेबसाईट पर लगे प्रतिबंध पर भी कुछ बहस करो तो हम समझें कि बुद्धिजीवी संपूर्णता से समाज की फिक्र करते हैं।’
हम तो समर्थन या विरोध से परे होकर बहस सुनना चाहते हैं। बीच बहस में भी हम कोई तर्क नहीं दे रहे बल्कि बता रहे हैं कि यह भी एक मुद्दा जिस पर बहस होना चाहिए।
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
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7/03/2009

प्यार तो बस एक अनुभूति है-आलेख (hindi article on love)

प्यार एक अनुभूति जिसे व्यक्त करने से अधिक उसे हृदय में सृजित करने की आवश्यकता है। अपने मुख से शब्दों में व्यक्त करना या फिर चूमना प्यार के अभिव्यक्त रूप हैं पर करने वाला उससे लाभ कितना ले पाता है इस पर विचार करना चाहिये। कई बार तो उसे हानि भी होती है। मानव मन में विचरने वाले नफरत और घृणा दोनोें भाव बाहर आकर अभिव्यक्त होना चाहते हैं, मगर उससे लाभ और हानि दोनों ही हो सकते हैं।
एक मित्र ब्लाग लेखक ने एक ईमेल भेजा जिसमें उन्होंने अमेरिकी लोगों को सूअर और उनके के बच्चों को चूमते हुए अनेक फोटो थे। उन फोटो में सुअर और उनके बच्चों के मूंह से टपक रही लार साफ दिख रही थी। उस पर लिखा था कि ‘सूअर ज्वर का कारण’। यहां यह स्पष्ट कर देना चाहिये कि स्वाइन फ्लू के भारत में जो मरीज पाये गये हैं वह सभी विदेश से वापस आये हैं। चूंकि यह विदेश से आयातित बीमारी है इसलिये भारत में इसकी चर्चा खूब हो रही है और यहां गर्मी और बरसात में फैलने वाली बीमारियों के समाचार नेपथ्य में चले गये हैं। यहां बस विदेश से जुड़ी कोई बात होना चाहिये वह देशी बातों से अधिक चर्चित हो जाती है। इस देश में स्वाईन फ्लू के मरीज सौ से अधिक नहीं है पर देश के लोगों के सावधानी रखने की सलाह दी जा रही है। स्पष्टतः इसके पीछे बाजार की कोई योजना हो सकती है। मलेरिया, टीवी और पीलिया की दवाईयां तो यह आराम से बिक जाती हैं पर स्वाइल फ्लू की दवाईयों के लिये यहां कोई बाजार नहीं है।
बहरहाल मित्र ब्लाग लेखक द्वारा भेजे गये फोटो का अध्ययन करने पर यह लगा कि लोग भले ही बड़े प्यार से सूअर के मूंह को चूम रहे थे पर वह खतरनाक था। उनके प्यार की अभिव्यक्ति मन को प्रसन्न करने की बजाय हैरान कर रही थी।
इस तरह की बाह्य प्रेम अभिव्यक्ति पश्चिम की देन हैं। चूमना, लिपटना और नाचना प्यार के अभिव्यक्त किये जाने वाले रूप हैं और इसमें कोई बुराई भी नहीं है मगर यही पश्चिम के वैज्ञानिक ही अपने शोधों से इसके दोष गिनाते हैं। अब उनके कुछ शोधों से प्राप्त जानकारी पढ़िये जो समय समय पर उनके द्वारा दी जाती रही है।
1.जिसे चूमा जाता है उसकी उम्र पांच मिनट कम हो जाती है।
2.चूमने वाले के गंदे कीटाणु उसके ही प्रिय आदमी के शरीर में पहुंच जाते हैं।
3.अधिकतर पशुओं में रैबीज होता है। यह रैबीज उनके शरीर में नहीं बल्कि उनके मूंह से लार के रूप में बहने के साथ होठों पर हमेशा रहता है। उस लार पर हाथ या पांव रखना भी ठीक नहीं होता।
4.कुछ पशु तेज स्वांस लेते और छोड़ते हैं और उससे उनके गंदे कीटाणु सांस के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर उसे सांस की बीमारी प्रदान करते हैं।
मित्र द्वारा भेज गये फोटो बच्चे, बड़े, स्त्री पुरुष अपने होंठ बाकायदा शूकर के मूंह से लगा रहे थे। पालतू होने के कारण वह सूअर साफ सुथरे थे पर उनके मूंह की लार से मनुष्यों के होंठ लगते देख मित्र द्वारा लिखा गया यह संदेश दिमाग में बज रहा था ‘सूअर ज्वर का कारण’।
एक बात यहां स्पष्ट कर दें कि यहां पशुओं के प्रति कोई हिकारत का भाव हमारे मन में नहीं है। सभी जीव सर्वशक्तिमान के बनाये हुए हैं और सभी को यहां समान रूप से जीवन जीने का अधिकार है। पशु पशुओं की अनेक प्रजातियों का लुप्त होना मानव सभ्यता के लिये शर्म की बात है। किसी भी पशु को पालना पुण्य का काम है पर प्यार का वह रूप जो अंततः हमारी देह के लिये दुःख का कारण बने वह कोई बुद्धिमानी नहीं है।
हां, सच है कि पास में मनुष्य रहे या पशु उससे प्रेम हो जाता है। कई बार अपने पास खड़ा वह निरीह पशु जब हमारी तरफ प्रेम से देखता है तो कोई पत्थर दिल ही उसकी अनदेखी करेगा। प्रेम न केवल अपनी बल्कि अपने प्रिय जीव की भी आयु बढ़ाता है और इसलिये उसकी अभिव्यक्ति होना भी आवश्यक है।
प्यार की अभिव्यक्ति का स्पर्श सभी जीवों को प्रसन्नता देता है। इन पशुओं को प्यार करने का सबसे अच्छा तरीका यह बताया गया है कि अपने हाथ से उनकी गर्दन के नीचे हाथ फिराना चाहिये क्योंकि वहीं से वह अच्छी तरह प्यार की अनुभूति कर सकते हैं। अधिकतर पालतू पशुओं के शरीर पर घने बाल होते है इसलिये सिर या पीठ पर हाथ फेरने से उन्हें वह अभिव्यक्ति नहीं मिलती जो गर्दन के नीचे-जहां बाल नहीं होते-फेरने से मिलती है।
वैसे प्यार हृदय में बनने वाला वह भाव है जिसकी अनुभूति का लाभ स्वयं को भी कम नहीं होता पर इसके लिये यह जरूरी है कि अपने प्रिय जीव को देखकर जब प्यार अंदर पैदा होता है तो पहले अपनी देह में उठती तरंगों को ध्यान में रखें। अंदर खून की लहरों में उसकी अनुभूति करना चाहिये। एकदम उतावली में प्रेम की अभिव्यक्ति करने से उसका लाभ समाप्त भी हो जाता है। परिस्थितियों के अनुसार प्यार को व्यक्त करना और छिपाना ं पड़ता है। प्यार खाने या पीने की चीज नहीं है कि उसे मूंह से अंदर ले जायें। वह तो एक ऐसा अदृश्य भाव है जो मन को प्रफुल्लित करता है। यह अनुभूति बाहर के दृश्यों से भले आती है पर उसका उद्गम स्थल तो अंदर ही है। उसका कोई भौतिक स्वरूप नहीं है। स्वार्थ से बने संबंधों में अनेक बार प्यार आता है पर फिर स्वतः ही नष्ट भी हो जाता है।
भारत में सूअर पालने की परंपरा नहीं है पर कुत्ता पाला जाता है। अनेक बार देखा गया है कि घर के बच्चे उन पालतू कुतों के मूंह से मूंह लगा देते हैं। कुछ समय पहले एक रिपोर्ट देखी थी जिसमें बताया गया कि 90 प्रतिशत लोगों को रैबीज पालतू कुतों की वजह से होता है। बहरहाल यह तो सर्वशक्तिमान की बनाई दुनियां हैं। जिसमें रहने वाले हर जीव में घृणा और प्यार के भाव रहते हैं पर इंसान को थोड़ा सतर्कता बरतना चाहिये। सच बात तो यह है कि प्यार तो बस एक अनूभूति जिसे न हाथ से पकड़ा जा सकता है न मूंह से खाया जा सकता हैं।
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