समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

7/11/2008

मरे मुद्दों की राख अंतर्जाल पर मत सजाओ-आलेख

प्रचार माध्यमों पर निरंतर आ रही जानकारियों ने देश के लोगों को आंदोलित किया है। सभी कहते हैं कि अंतर्जाल का जमाना है। सब इस परिवर्तन को दर्शाती कहानियों, आलेखों और कविताओं को पढ़ना चाहते हैं। वह अपनी आंखों से बदलते इस विश्व को देखने के साथ उसके बारे में पढ़ना चाहते है।
अंतर्जाल पढ़ने वाले लोग निराश है। जो लिख रहे हैं वह सारी सुविधाओं होने के बावजूद पुराने विषयों पर ही लिख रहे हैंं। वही वाद और नारे लगाने के साथ उसमें लिपटी कवितायें और कहानियां लिखे रहे हैं। लिखने वालों के पास ज्ञान की गहराई का अभाव है। टीवी चैनलों और अखबारों में अनेक लेखक चर्चित हैं मगर आम आदमी की वाणी पर किसी का नहीं है।
कई कवि और शायर अपनी रचनाओं को जबरन हृदयस्पर्शी बनाने का प्रयास करते हैं-उनके शब्दों का उपयोग यह स्पष्ट कर देता है। चंद घटनाओं को कविता का रूप देते हैं जिनको पहले ही लोग समाचारों पढ़ कर भूल चुके हैं। वह इन घटनाओं को ऐसे लिखते हैं जैसे उससे देश का इतिहास बदला हो। लोग अपनी कहानियों और व्यंग्यों में उन हिंसक मुद्दों को जीवंत बनाने का प्रयास कर रहे हैं जो चंद जगहों पर हुईं। देश के बहुत से लोगों ने उसे केवल समाचारों में पढ़ा। कई लेखक और कवि अभी भी उन पर लिख रहे हैं। उनको मुगालता है कि अतर्जाल पर लोकप्रियता मिल जायेगी। कुछ लोग उनकी किताबों की चर्चा करते हैं कि शायद उन्हें भी उसका कुछ अंश यहां मिल जायें। वह अंतर्जाल पर लिख रहे कवियों और लेखकों को अपने जैसा ही मानते हैं और उनका प्रचार करने से भय लगता है।
आखिर उनका उद्देश्य क्या है? वह खुद नहीं जानते। बस लिखना है। लोगों की संवेदनाओं को उबारने से शायद उनको लोकप्रियता मिल जाये। बेकार की कोशिश! लोगों की संवेदनायें मरी नहीं हैं यह एक सच है पर इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि लोगों ने प्रचार माध्यमों से इस सच का जान लिया है कि यहां कई घटनायें पहले से तय की जाती हैं। लड़ाईयों भी फिक्स होती हैंं। एक लेखक, कवि या शायर किसी समाचार पर एक कविता लिख देता है। वह कहता है कि मैं सैक्यूलर हूं और यह घटना उसके लिये खतरा है। दूसरा उस पर उबलता है। कहीं गुस्से और तो कहीं झगड़े होते हैं। कहीं विवाद होते हैं। ऐसे कवियों और शायरों के नाम अखबारों मे आते हैं जिनको कोई जानता नहीं। उनके विरोधी भी ऐसे ही हैं। मगर लोग सच जानते हैं कि आजकल सभी जगह फिक्सिंग है।

किसी आम आदमी से पूछिये तो वह बेहिचक कह देगा कि‘यह सब नाटक है।
मगर कवि और शायर है कि मुगालते में लिखे जा रहे हैं। लोग उम्मीद कर रहे थे कि अंतर्जाल पर कुछ नया पढ़ने को मिलेगा। मगर नही,ं यहां तो उन्हीं घिसे पिटे वाद और नारों पर चलने वाले गुरूओं के शिष्यों की जमात आ गयी है-जिनके पास न स्वतंत्र विचार हैं न मौलिकता से लिखने की क्षमता। समाचार पत्रों से उठाये गये विषयों को ही यहां रख रहे हैं। ऐसे लोग आत्ममुग्ध हैं उनको पता ही नहीं है कि लोगों की सोच में बदलाव आ रहा है। वह कुछ नया पढ़ना चाहते हैं। मगर इस पर उन्हें सोचने की फुरसत ही कहां? वह तो अखबार पढ़ा और फिर उस पर लिखने बैठ जाते हैं। अंतर्जाल पर कई नये लेखक बहुत अच्छा लिख रहे हैं पर कोई उनका लिखा अपने अंतर्जालीय पृष्ठों पर नहीं लिखता। कहीं से किताबों के अंश ले आये तो कभी किसी विदेशी कि कविता छाप दी। बस! वही ढर्रा! जिस पर देश चलता आ रहा है।

आम आदमी जानता है कि जहां तक अध्यात्म का प्रश्न है हमारे पुराने ग्रंथों में अपार सामग्री है। उसके बाद भी संतगण-तुलीसदास, कबीरदास, मीरा, रहीम और सूर- उनके लिये बहुत कुछ लिख गये हैं। अब और क्या लिख पायेगा पर वर्तमान सामाजिक परिवेश और अंतर्जाल से संबंधित अच्छी कहानियां, व्यंग्य और लेख पढ़ने को मिल जाये तो अच्छा है-लोग ऐसा सोचते हैं।
अंतर्जाल पर लिखने वाले इस नयी विधा पर कोई कहानी क्यों नहीें लिखते? क्या अंतर्जाल पर उनके पास कोई पात्र नहीं हैं या वहां कोई कहानियां नहीं बनती। मगर वाद और नारों पर चले इस देश का समाज चला तो फिर लेखक भी ऐसे ही हैं। कोई नई कल्पना करने की बजाय वह उपलब्ध विषयों पर ही लिखते हैं। अपने देश के किसी व्यक्ति द्वारा सुझाया गया विषय उनको मंजूर नहीं है। उन्हें तो अमेरिका और ब्रिटेन के अंग्रेज लेखकों द्वारा खोजे गये विषयों पर ही लिखना पसंद है। अंतर्जाल पर पढ़ने वाले लोगों को यह देखकर निराशा होती है कि अभी वहां स्वतंत्र रूप से कोई नहीं लिख पा रहा जबकि उसे यहां उस पर कोई बंधन नहीं है। अंतर्जाल लेखकों को पुराने विषयों से हटकर नये विषय चुने होंगे। उन्हें अपना मौलिक लेखन करना होगा वरना वह पिछड़ जायेंगे। ध्यान देने की बात है कि अब आप लिख किसी भी भाषा में रहे हैं पर उसे अन्य किसी भाषा का व्यक्ति भी पढ़ सकता है। पुराने वाद और नारों से दूर हो जाओ। पुराने हिंसक और तनाव के मुद्दों पर अब इस देश का आदमी नहीं भड़कता। वह जानता है कि आजकल कई मुद्दे बनाये जाते हैं। उन मरे मुद्दों की राख उठाकर अंतर्जाल पर मत सजाओ।

कोई टिप्पणी नहीं:

लोकप्रिय पत्रिकायें

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर