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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

2/03/2008

वही प्यार पाने के लिए तरसे-कविता

कोई दौलत को तो कोई आदमी प्यार को तरसे
कोई तरसता है तो कोई बैचेन होता अपने घर से
ऊहापोह हैं जिन्दगी निकल जाती, पकड़ नहीं पाते
घंटों सोच में बिताते, पर नहीं निभाते पल भर से
दौलत के ढेर पर बैठकर, बदहाल नीचे खडे लोग देखते
नीचे खडे होते, तब ऊपर से रोटी गिरने के लिए तरसे
अपने लिए ढूंढते हैं सभी खुशियों की सौगात
पर अपने दुख दूसरों से बांटने के लिए तरसे
अपने होने का अस्तित्व का अहसास सबको है
नहीं रखते वास्ता रखते, दूसरे के जिगर से
जो जान पाते जिन्दगी का रंग-बिरंगा रूप
तो देख पाते सबके तमाशे अपनी नजर से
अपनी खुशी के आकाश को ऊंचा उठते तो देखा
पर साथ लेते उनको भी, जो उड़ने के लिए तरसे
तभी जाने पाते जिन्दगी जिन्दादिली का नाम
अपने लिए जो जिए, वही प्यार पाने को तरसे
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1 टिप्पणी:

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

सुंदर और सारगर्भित अभिव्यक्ति !

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