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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

1/19/2008

ऐसी जोरदार कविता लिखो-कविता साहित्य

तुम्हारे अंतर्मन में पल रहे दर्द
तुम्हारे मस्तिष्क चल रहे द्वंद से
बन रहे काव्यात्मक शब्द
चौराहे पर जब सुने जाएं
तो लोग स्तब्ध रह जाएं
ऐसी जोरदार कविता लिखो

फल सब्जी की तरह शब्दों की
दलाली करने वालों के तंबू
तुम्हारे तेज से उखाड़ने लगें
असल माल की जगह
नक़ल माल बेचने की तरह
अपने शब्द बेचने वालों को
तुमसे होने लगे ईर्ष्या
ऐसी जोरदार कविता लिखो

दिखते हैं बाहर से ताक़तवर
अन्दर से हैं एकदम खोखले
लोग उनकी छबि से व्यर्थ डरते है
इसलिए उधार के लिए शब्दों लेकर
कुछ लोग उन पर राज्य करते हैं
तुम अपने पसीन से नहाए
जो तुम्हारे दिल में गायें
छद्म रूप धरने वालों को डरा सकें
ऐसी जोरदार कविता लिखो

जजबातों का व्यापार करते हैं
उनके दिल होते हैं खाली
लिखने-पढ़ने के लिए
शब्दों को ऐसे बिछाएं जैसे भोजन की थाली
तुम्हारे शब्दों के प्रहार से
विचलित हो जाएं
जहाँ से निकलें तुहरे शब्द निकलें
उस रास्ते को वह छोड़ दें
ऐसी जोरदार कविता लिखो

1 टिप्पणी:

Dr.Parveen Chopra ने कहा…

दोस्त, यह रचना पढ़ कर तो बस यही ध्यान आया....
चक दे इंडिया।
काश, आप के आह्वान पर कुछ ऐसी ही कविताएं लिखीं जाएँ.

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