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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

1/15/2008

आजादी की चाहत

एक तरफ आजादी से उड़ने की चाहत
दूसरी तरफ रीतिरिवाजों के काँटों में
फंसकर करते अपने को आहत
अपने क़दमों पर चलते हुए भी
अपनी अक्ल के मालिक होते हुए भी
तमाम तरह के बोझ उठाते हैं
समाज से जुड़ने बाबत

जमीन पर चलने वाले इंसान को
परिंदों की तरह पंख भी होते तो
कभी उड़ता नहीं
क्योंकि अपने मन में डाले बैठा है
सारे संसार को अपना बनाने की चाहत
हाथ में कुछ आने का नहीं
पर जूझ रहा है सब समेटने के लिए
नहीं माँगता कभी मन की तसल्ली या राहत

अगर चैन से चलना सीख लेता
अपने क़दमों को अपनी ही तय दिशा
पर चलने देता
तो ले पाता आजादी की सांस
पर जकड़ लिया झूठे रीतिरिवाज के
बन्धन अपने
और फिर भी पालता आजादी की चाहत
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1 टिप्पणी:

rajivtaneja ने कहा…

सच्चाई से रुबरू करती आपकी कविता....
मृग तृष्णा के पीछे भागता है हर इनसान...
बहुत कुछ पाने के बाद भी और पाने की चाह खत्म नहीं होती....
लालच ही ऐसा है कि सुरसा के मुँह की तरह बढता ही जाता है ....

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