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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

7/14/2007

यह एक यक्ष प्रश्न

एक अमीर के पुत्र विवाह
समारोह में खङा होकर
देख रहा हूँ धन कुबेरों
उच्च पदासीन और
मशहूर लोगों का जश्न
जाम से जाम टकराते
अपनी अमीरी और
संपन्नता पर बतियाते
सब हैं अपनी बात कहने में मग्न


कुछ होश में हैं कुछ बेहोश
कुछ लोग अपनी रईसी पर
इतराते हैं
कुछ अपनी बीमारी पर बतियाते हैं
बहुत जल्दी उकता जाता हूँ
सोचता हूँ बाहर के लोगों को
क्यों यहां स्वर्ग का अहसास होता है
मुझे तो लगता है कि
यहां नरक हैं
ऐसे इंसानों का जमघट है
जिनके बुद्धि और मन हैं भग्न

वर्षा के दिनों में
एक तंग बस्ती से निकलता हूँ
जहां सडक है कि नाला
पता ही नहीं चलता
बच्चे वहां पाने से खेल रहे हैं
मायें हैं अपनी बातचीत में मग्न

मुझे वहाँ भी नरक लगता है
पर जीते हैं गरीब और मजदूर
उसे स्वर्ग की तरह
हर मौक़े पर
बडे जोश से मनाते हैं जश्न

कहाँ स्वर्ग है
और कहाँ नरक
खङा है मेरे सामने
यह एक यक्ष प्रश्न
मैं ढूँढने की कोशिश करता हूँ
चलते-चलते उस बस्ती को
पार कर जाता हूँ
और हो जाता हूँ कहीं और मग्न

2 टिप्‍पणियां:

Shastri J C Philip ने कहा…

इतना मार्मिक वर्णन है कि दिल दहल गया. हां, अपने आप को जांचने का एक अवसर भी मिल गया -- शास्त्री जे सी फिलिप

विजय वडनेरे ने कहा…

बंधुवर,

कहीं आपकी कविता का शीर्षक "यक्ष प्रश्‍न" तो नहीं है जो वर्तनी में भूल के कारण "यश प्रश्‍न" लिखा दिखा है.

अगर शीर्षक "यश प्रश्‍न" ही हो तो क्षमा!!

:)

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