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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

6/12/2007

हरियाली मिटाकर रेगिस्तान बनाया

आसमान से बरसती आग में
झुलसता हुआ बदन
तरस जाता है ठंडी हवा के लिए
जहाँ तक दृष्टि जाती है
सूरज के शोले बिखरे दिखाई देते हैं
तरसे हैं चक्षु
धरती-पुत्र वृक्षों को देखने के लिए
शहर में खडे पत्थर के महलों में भी
खाली हैं बरतन
आदमी तरस रहा है पानी के लिए
आसमान में उड़ने के लिए
विकास का काल्पनिक विमान बनाया
अपने हाथ से ही हरियाली को मिटाया
अब खङा आदमी आकाश की ओर
टकटकी लगाए देख रहा है
पानी बरसने के लिए
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बादल नहीं जाते जहाँ- जहां
ऐसे कई रेगिस्तान बन गये
हरियाली मिटाकर
रेगिस्तान बनाकर
आदमी खडा है इन्तजार में
पर बादल रेगिस्तान
समझकर बिन बरसे चले गये
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3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

वाह, दीपक भाई-बहुत बड़ा मुद्दा बड़ी सुन्दरता से उठाया है, बधाई.

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत बुरा किया। रेगिस्तान बना दिया।

हरिराम ने कहा…

आइए, अब रेगिस्तानों को नखलिस्तान में बदलें। पर्यावरण के लिए विशेष उपाय अपनाएँ।

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