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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

6/04/2007

आज शहर बंद है

वह प्रदेश बंद कराते हैं
शहर सुनसान कराते हैं
पहले भड़काते हैं आग

फिर बुझाकर हीरो बन जाते हैं
लोग भोगते हैं तकलीफें
शहर के सन्नाटे से दह्लते हैं
सब जानते हैंफिर भूल जाते हैं
आग बुझाने वाले ने हीलगाई थी
यह नहीं समझ पाते हैं
जो समझते हैं वह भी
क्या कर पाते हैं
नेता और मतदाता के रिश्ते
लोकतंत्र में ऐसे ही निभाये जाते हैं
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शहर में सन्नाटा पसरा है
दुकाने हैं बंद
पैट्रोल पंप खाली हैं
लगता है जैसे
कहीं बिजली गिरने वाली है
जहाँ जाता हूँ निराशा मिलती है
बाज़ार से लौटते वक्त
मेरी जेब भरी और थैला खाली है
इससे मैं खुश नहीं होता
क्योंकि घूमता है चेहरा
मेरी आँखों में
उन ठेले वालों का
जो रोज कमाते और खाते हैं
सोचता हूँ क्या करते होंगे
कैसे पकेगी आज घर रोटी उनके
मैं तो पैसे होते हुए भी लाचार
उनकी तो जेबे भी खाली हैं
--------------

3 टिप्‍पणियां:

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

आग बुझाने वाले ने हीलगाई थी
यह नहीं समझ पाते हैं

लोकतंत्र में ऐसे ही निभाये जाते हैं

मेरी जेब भरी और थैला खाली है

जो रोज कमाते और खाते हैं
सोचता हूँ क्या करते होंगे

बहुत सुन्दर।

*** राजीव रंजन प्रसाद

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

आग बुझाने वाले ने हीलगाई थी
यह नहीं समझ पाते हैं

लोकतंत्र में ऐसे ही निभाये जाते हैं

मेरी जेब भरी और थैला खाली है

जो रोज कमाते और खाते हैं
सोचता हूँ क्या करते होंगे

बहुत सुन्दर।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Mired Mirage ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है आपने । सच में रोज कमा कर खाने वालों की कोई नहीं सोचता ।
घुघूती बासूती

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