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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

11/23/2011

शराब बुरी है या अच्छी कौन तय करेगा-हिन्दी व्यंग्य (sharab bur hai ya achchhi kaut tay karega-hindi vyangya)

           अन्ना हजारे ने स्वयं ही अपने विरोधियों को अवसर दिया है यह कहकर कि शराबियों को पिटाई करना चाहिए। अन्ना भ्रष्टाचारियों को फांसी देने की बात भी करते हैं इसलिये उनको फासीवादी भी कहा जाने लगा है। दरअसल अन्ना ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का नेतृत्व परेशान हाल आमजन के हृदय में एक ऐसा देवता की छवि बना ली है जिससे आशा की जा सकती है। यह छवि भी इसलिये बनी क्योंकि वह महाराष्ट्र के थे और बाहर उन्हें ‘दूर के ढोल सुहावने’ होने का लाभ मिला। सच बात तो यह है कि हम उनके अनशन के दौरान निरंतन उनकी भाव भंगिमा  के साथ ही वक्तव्यों का भी अध्ययन करते रहे थे। इस दौरान हमने यह निष्कर्ष निकाला कि वह अनशन और आंदोलन को नारों के सहारे चलाने में महारथी हैं मगर जहां तक समाज को लेकर चिंत्तन का प्रश्न है उसमें अधिक जानकार नहीं है।
           बुजुर्ग हैं इसलिये सम्मानीय हैं पर समाज के संचालन में उनकी हर बात को ब्रह्मवाक्य नहीं माना जा सकता। वह बहुत भोले हैं पर अपने अनशन और आंदोलन के अभ्यास का प्रचार में अपने तरीके से उपयोग करने की कला उन्हें खूब आती हैं। वह धन के लोभी नहीं है यह सत्य है पर मान और सम्मान से परे नहीं है। मूल बात यह है कि अपने तर्क को ही अंतिम मानने का भ्रम उनके अंदर है। कम से कम शराबियों के विषय पर उनका बयान तो इसी बात का प्रमाण है।
         शराब पीना बुरी बात है यह सभी मानते हैं। फिर भी कुछ लोग पीते हैं। शराब पीने से लीवर खराब होता है पर सभी बीमार पड़ें यह जरूरी नहीं है। जब तक आदमी स्वस्थ है तब तक अपनी देह के साथ खिलवाड़ करता है पर जब बीमारी हमला करती है तो चिकित्सक की एक चेतावनी उसकी आदत को हवा कर देती है। फिर भी कुछ नहीं मानते तो समय से पूर्व काल कवलित हो जाते हैं। अगर श्रीमद्भागवत गीता के संदेश को देखें तो उसके विज्ञान के अनुसार इंद्रियां ही विषयों में आसक्त होती हैं और गुण ही गुणों में बरतते हैं। शराब पीना एक गुण है तो उसके जो दुष्परिणाम है वह भी उसके गुणों का परिचायक ही है। आदमी अगर शराब पी रहा है तो वह उसके परिणामों से बच नहीं सकता। ऐसे में आदमी को शराब के सेवन से बचने की सलाह देनी चाहिए न कि उसकी पिटाई करें। यह तामस बुद्धि है।
       किसी भी व्यक्ति के मन में जब यह विचार आता है कि ‘मैं शराब नहीं पीता क्योंकि वह शराब है पर वह पीता है इसलिये बुरा है-यह भाव अहंकार का द्योतक हैं। अन्ना अनेक बार अहंकारवश बात करते हैं। जो लोग शराब नहीं पीते हैं वह यह दावा कैसे करते हैं कि शराब पीने वाले सभी दुष्ट हैं। अन्ना को यह अधिकार किस आधार पर मिल गया है कि वह शराबी को पीटने की बात करें। कुछ शराब पीने वाले भी न पीने वालों को चुनौती देते हुए कहते हैं कि शराब पीना और फिर उसे पचाना बच्चों का खेल नहंी है। अगर किसी ने कभी जिंदगी में शराब नहीं पी तो लोग कह सकते हैं कि वह कमजोर आदमी है शराब पीकर पचा नहीं सकता। अन्ना हजारे सेना में रहे हैं इसलिये यह नहीं लगता कि कभी उन्होंने शराब नहंी पी होगी। कभी शराब के आदी नहीं रहे होंगे और बरसों पहले ही त्यागी हो गये यह हमारा अनुमान है।
        जिस तरह हमारे यहां संत लोग अपने प्रवचनों में महिलाओं को लुभाने वाली बातें करते हैं वही अन्ना हजारे भी कर रहे हैं। शराबियों को पीटने की बात से देश में महिलाओं का एक वर्ग प्रसन्न होगा और संभव है कि कभी अपने प्रति जनभाव का दोहन करने का इरादा अन्ना का हुआ तो संभव है कि वह उसे वोट में भी बदल सकते हैं। ऐसा लगता है कि अन्ना अपने शिष्यों के लिये राजनीतिक धरातल बना रहे हैं ताकि शराबी को पीटो नारे का सहारा उन्हें मिले। यहां यह भी बता दें कि अगर उनके चेले सत्ता के शिखर पर पहुंच भी गये शराब पीने से अनेक परिवार बरबाद हैं यह हमें पता है। सच बात तो यह है कि देश में मजदूर वर्ग में गरीबी और तंगहाली का यह सबसे बड़ा कारण भी है। इसके बावजूद शराबियों की पिटाई करने का नुस्खा एक उग्रवादी रवैया है। जो पुरुष शराब पीते हैं उनके परिवार उनसे दुःखी हैं। कुछ उनसे लड़ते हैं, कुछ उनको मारते भी हैं। ऐसी हजारों कहानियां हैं पर सवाल यह है कि कोई दूसरा आदमी बिना मांगे किसी के परिवार का नियंता बने यह भी देश का समाज स्वीकार नहंी करता। आदमी गरीब हो या अमीर मुक्त भाव से जीना चाहता है। अन्ना हजारे समाज के स्वयंभू नेता बनकर यह तय नहीं कर सकते कि आदमी के लिये क्या अच्छा है या क्या बुरा? आदमी दूसरे को हानि न पहुंचाये अगर पहुंचाये तो पीड़ित शिकायत न करे तो किसी भी न्यायाधीश के पास इस बात का अधिकार नहीं है कि वह अकारण दंड विधान का उपयोग करे।
           जहां तक अन्ना हजारे के आंदोलन के परिणाममूलक होने का प्रश्न है अब संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है। इसमें लोकपाल या जनलोकपाल विधेयक पारित होना प्रस्तावित है। उसका स्वरूप ही तय करेगा कि अन्ना हजारे के आंदोलन फलीभूत हुआ कि नहीं। जनलोकपाल प्रस्तावित करने वाले लोगों में अन्ना का नाम नहीं है। उनके सहयोगियों ने उसे रचा है। अन्ना भले हैं पर उनकी विद्वता अप्रमाणिक हैं। अन्ना अपनी छवि बनाये रखने के लिये प्रचार माध्यमों को सामग्री दे रहे हैं। जब मौन थे तब लिखकर बोल रहे थे। उनके ज्ञान की सीमा वहीं  पता चल गयी थी। मौन का मतलब इद्रियों के मौन होने से है केवल वाणी का मौन होना नहीं।
          हम देश के उन आमजनों को निराश नहीं देखना चाहते जिन्होंने अपनी आशा अन्ना हजारे पर टिकाई है। अलबत्ता यह बता देते हैं कि जिन प्रचार माध्यमों ने अन्ना हजारे के व्यक्तित्व को आकर्षक ढंग से ढोया था वही अब शराब के बयान पर उनके तालिबानी होने की बात कर रहे हैं। अन्ना हजारे शायद हमारे अध्यात्मिक दर्शन का मूल सिद्धांत भी नहीं जानते कि बुराई से घृणा करो बुरे आदमी ने नहीं, बल्कि अपने सात्विक प्रयासों से उसे मार्ग पर ले आओ। पीटना यकीनन सात्विक प्रयास नहीं है। अन्ना हजारे को धीरे धीरे विवादास्पद बनाया जा रहा है। हम जैसे अध्यात्मिक साधकों के लिये तो अन्ना हजारे और समाज दोनों ही अध्ययन का विषय है और इस पर नजर बनाये हुए हैं।
बाबा रामदेव का योग और शराब 
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           बाबा रामदेव ने अन्ना के बयान पर टिप्पणी की कि ‘‘शराब पीने वालों को हम कपाल भारतीय के स्ट्रोक लगवाकर उनकी आदतें छुड़ाते हैं उनको पेड़ से बांधकर मारने की आवश्यकता नहीं है।’’
        सत्य वचन महाराज! हमने अपने अनुभव से देखा है कि अनेक योग साधकों ने इस आदत से छुटकारा पाया है।
          दिलचस्प बात यह है कि बाबा रामदेव और अन्ना हजारे साहब दोनों ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अगुआ है पर जहां तक क्षमताओं की बात आती है तो एक योगसाधक होने के नाते बाबा रामदेव को अधिक प्रासंगिक मानते हैं। अन्ना हजारे का कोई भी आंदोलन स्थाई परिणाम देने वाला नहीं रहा न रहने वाला है जबकि बाबा रामदेव का योग प्रचार अभियान लंबे समय तक परिणाम बनाये रखने में सहायक होगा यह हमारा दावा है।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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11/17/2011

अर्थशास्त्री कि अनर्थशास्त्री-हिन्दी लघु हास्य व्यंग्य (hindi short comic satire-economics and economist)

      पेट्रोल की कीमतें बढ़ी तो पूरे देश में आक्रोश का माहौल दिखा। पेट्रोल के मूल्यों को लेकर तमाम बहसें हुईं। ऐसे में कुछ बहसकर्ताओं ने कहा कि ‘देश की अर्थव्यवस्था जनता की स्थिति और लोकप्रियता को देखकर नहीं बनाई जाती बल्कि अर्थशास्त्र के आधार पर अर्थशास्त्रियों के राय के अनुसार तय की जाती है।’’
            हम यहां पेट्रोल के अर्थशास्त्र पर बहस नहीं कर रहे हैं क्योंकि यह तय करना अब कठिन है कि इस देश में कौन अर्थशास्त्री है और कौन अनर्थशास्त्री। स्पष्टतः हम वाणिज्य विषय के विद्यार्थी रहें और अर्थशास्त्र हमारा एक अप्रिय विषय रहा है इसलिये अपने को अर्थशास्त्री कहते हुए तो संकोच होता है अलबत्ता व्यंग्यकार होने के नाते भाई लोग अनर्थशास्त्री जरूर कहते हैं। स्नातक होने के बाद हमें अर्थशास्त्री बनने का ख्याल आया तो पुनः उसे पढ़ा। उसे पढ़ा तो अर्थशास्त्री तो बन गये पर देश के हालातों को देखकर लगा कि हम स्वयं ही अनर्थशास्त्री हैं। प्रचार माध्यमों के अनुसार पाकिस्तान और बंग्लादेश में भारत की अपेक्षा पेट्रोल बहुत सस्ता है। जिस तरह हमारे देश में पेट्रोल के दाम बढ़ते रहे हैं उससे तो लगता है कि पाकिस्तान और बंग्लादेश की जनता भाग्यशाली है कि वहां कोई अर्थशास्त्री नहीं है। बहरहाल हम सब खामोशी से देखते रहे।
          अब पेट्रोल के दाम कम हो गये तो कुछ लोगों के पेट में मरोड़ उठते दिखा। कथित विद्वानों ने कहा कि ‘देश में लोकप्रियता पाने के लिये जनप्रतिनिधियों के दबाव में इस तरह दाम कम किये गये पर अर्थशास्त्रियों की नज़र से गलत है। पहले पेट्रोल के भाव अर्थशास्त्रियों की सलाह पर किये गये और अब जनप्रतिनिधियों के कहने पर कम किये गये।’
        इस तर्क पर हमारे पास हंसने के अलावा कोई चारा नहीं था। हमने एक मित्र से कहा-‘‘यार देश में ऐसे कौनसे अर्थशास्त्री हैं जिनको पेट्रोल के दाम कम होने पर एतराज है?‘‘
        वह बोलो-‘मुझे क्या मालुम? मैं तो विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं अर्थशास्त्र का नहीं। न तुम्हारी तरह अनर्थ वाली बातें लिखता हूं। मुझे अफसोस है कि मेरी तुम्हारे से दोस्ती हुई पर इतना तय है कि तुम अर्थशास्त्र के जानकार न ही सही पर अनर्थशास्त्र तुम्हें खूब ज्ञान है। तुम कोई व्यंग्य लिखने वाले हो और एक चाय की कीमत पर मैं तुम्हारे साथ कोई सहयोग करने को तैयार नहीं हूं।’’
           हमने कहा-‘‘हमें तुमने अनर्थशास्त्री कहा इसके लिये शुक्रिया! याद रखना हम उन अर्थशास़्ित्रयों से तो ठीक हैं जिनको पेट्रोल के दाम कम होने का अफसोस है।’’
       भगवान ही जानता है कि इस देश में ऐसे कौनसे अर्थशास्त्री हैं जिनको तेल के दाम कम होने पर अफसोस हुआ। इन अक्लमंदों से कोई पूछे तो यह सलाहें देते हैं कि विदेशों से ऐसे समझौते करने चाहिए जिससे देश लोग दोहरे कराधान का शिकार न हों। मतलब यह कि अगर किसी ने विदेश में कर चुकाया हो तो वह देश में राहत पाये। सीधी मतलब यह है कि पूंजीपतियों को लाभ हो ताकि वह देश को लूट सकें। यहां पेट्रोल पर दोहरा नहीं तिहड़ा चोहड़ा टैक्स लगता है। केंद्र का अलग, राज्य का अलग तथा क्षेत्रीय अलग। तब क्या इन अर्थशास्त्रियों को दिमाग का क्या घास चरने चलाज जाता है? अमीर के साम्राज्य में देश की रक्षा तथा गरीब के शोषण में विकास देखने वाले इन अर्थशास्त्रियों को हम जैसे अनर्थशास्त्री से सामना नही हुआ है। इसलिये लगे रहें, रोते रहें, हंसते रहें! प्रचार माध्यमों में बहस कर अपना काम चलायें। यही ठीक है। अपने विद्वान होने का भ्रम न पालें तो ठीक है।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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11/12/2011

मनुस्मृति के आधार पर संदेश-द्रव्यमय यज्ञ से श्रेष्ठ है जप यज्ञ (manu smriti ke adhar par sandesh-dravya maya yagya se shreshth hai japyagya)

        मनुष्य देह का स्वामी आत्मा है हम भ्रमवश मन को मान लेते है। यह मन बहुत चंचल है। कभी भौतिकता से उकता कर अध्यात्म की तरफ तो कभी एकांत से ऊबकर भीड़ की तरफ देह को भगाता है। तत्वज्ञानी इसकी गति और मति को जानते हैं इसलिये इस पर नियंत्रण किये रहते हैं पर सामान्य आदमी मन को ही ब्रह्मा मानकर उसके अनुसार इधर उधर चलता है। भौतिक संग्रह से आदमी का मन कभी नहीं थकता। यह अलग बात है कि बीच बीच में मन में शांति की चाहत होती है। तब कोई मनुष्य अध्यात्म तो कोई मनोरंजन की तरफ मुड़ता है। मनुष्य की नियमित दिनचर्या के बीच मन की शांति के लिये अनेक तरह के स्वांग भावनाओं के सौदागर रचते हैं। इस तरह मनोरंजन की अनेक विधाओं का निर्माण होता है जिसमें आदमी पैसा खर्च कर मन की विलासिता ढूंढता है। इस तरह अधिकतर लोग मनोरंजन में लिप्त हो जाता है।
         अध्यात्म ज्ञान में नीरसता का बोध होता है जबकि मनोरंजन मन को एक नया रूप देता है इसलिये लोग परिवर्तन के लिये पर्यटन, फिल्म और टीवी और फिल्म पर दृश्य दर्शन तथा संगीत सुनने जैसे कार्यक्रमों को पंसद करते हैं। वह इस सच को नहीं जानते कि अध्यात्म ज्ञान प्रारंभ में भले ही नीरसता का बोध कराता है पर जब वह मनुष्य की बुद्धि धारण कर लेती है तब अपने आसपास मोह माया के जाल में फंसे मनुष्य के स्वांग वास्तविक रूप से देखकर उसे सजीव दृश्य चित्रण का आनंद प्राप्त होता है। यह आनंद किसी फिल्म की काल्पनिक पटकथा से अधिक मनोरंजन देता है क्योंकि कल्पित चित्रण क्षणिक तो सत्य चित्रण अविस्मरणीय होता है। इसके विपरीत छोटे या बड़े पर्दे के काल्पनिक दृश्य अंततः अपना प्रभाव खो बैठते हैं और फिर मन वहीं की वहीं बोरियत के दौर में पहुंच जाता है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायमः परं तपः।
सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते।।
           औंकार (ॐ शब्द  ) ही परमात्मा की भक्ति तथा उसे पाने का सर्वाेत्म मार्ग है। प्राणायाम से बड़ा कोई तप नहीं है। सावित्री (गायत्री) से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहंी है। मौन रहने से अच्छा सत्य बोलना है।’’
योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः।
स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान्।।
              ‘‘आलस्य का त्याग कर जो मनुष्य तीन वर्षों तक ओंकार तथा सहित तीन चरणों वाले गायत्री मंत्र का जाप करता है वह परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति कर लेता है। उसकी गति वयाु के समान स्वतंत्र हो जाती है। वह कहीं भी आ जा सकता है। वह शरीर की सीमा से परे जाकर आकाश के समान असीम रूप धारण कर लेता है।’’
विधियाजापयज्ञो विशिष्टो दर्शाभिर्गुणैः।
अपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्त्रो मानसः स्मृतः।।
         ‘‘विधि के अनुसार यज्ञों से अधिक दस गुना श्रेष्ठ जप यज्ञ है। उपांशु जप तो जप यज्ञ से भी श्रेष्ठ है। मानस जप यज्ञ उपांशु जप यज्ञ से हजार गुना श्रेष्ठ है।’’
          हमारे अध्यात्म ग्रंथों में जहां गंभीर सृजनात्मक संदेश है वहीं उनमें कुछ कथाऐं भी हैं जिनसे मनुष्य के अंदर प्रेरणा का प्रवाह होता है। तय बात है कि उनमें कुछ मनोरंजन का भी पुट है पर देखा गया है कि कथित अध्यात्मिक पुरुष उन्हीं कथाओं और काव्य प्रस्तुतियों को अपनी वाणी से प्रकट करते हैं जिससे मनुष्य का मनोरंजन हो। इतना ही नहीं प्रमाद भी करते हैं। कथित रूप से अनेक अध्यात्मिक समूह और व्यक्ति अपने स्थानों को सिद्ध बताकर वहां लोगों की भीड़ लगाते हैं। सामूहिक यज्ञों में स्वर्ग का सपना दिखाया जाता है। इस कारण भक्ति के नाम पर अनेक लोग भारी कष्ट उठाते हैं। श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार शरीर को कष्ट देकर हठपूर्वक भक्ति करना तामस प्रवृत्ति का परिचायक है। फिर भी कथित गीता सिद्ध ऐसे यज्ञों को महायज्ञ कहकर लोगों को पुकारते हैं। धर्म के नाम पर भ्रमित लोग उनकी पुकार पर कष्ट उठाकर चल पड़ते हैं।
मनुस्मृति सहित हम अपने अध्यात्म ग्रंथों का मूल संदेश का अर्थ हम समझें तो उसमें यह स्पष्ट किया गया है कि परमात्मा का नाम स्मरण ही पर्याप्त है। अगर हम भक्ति को कुछ रोचक तथा व्यापक बनाना चाहते हैं तो ओम शब्द और गायत्री मंत्र का जाप करके भी हम शक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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