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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

4/29/2011

बुढ़ा चुकी राजघराने की परंपरा के वारिसों का मुफ्त प्रचार-हिन्दी संपादकीय (free publicity of older kingdom tredition fo britain in indial hindi news chainal)

             ब्रिटेन के राजघराने की उनके देश में ही इतनी इज्जत नहीं है जितना हमारे देश के प्रचार माध्यम देते हैं। आधुनिक लोकतंत्र का जनक ब्रिटेन बहुत पहले ही राजशाही से मुक्ति पा चुका है पर उसने अपने पुराने प्रतीक राजघराने को पालने पोसने का काम अभी तक किया है। यह प्रतीक अत्यंत बूढ़ा है और शायद ही कोई ब्रिटेन वासी दुबारा राजशाही को देखना चाहेगा। इधर हमारे समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में सक्रिय बौद्धिक वर्ग इस राजघराने का पागलनपन की हद तक दीवाना है। ब्रिटेन के राजघराने के लोग मुफ्त के खाने पर पलने वाले लोग है। कोई धंधा वह करते नहीं और राजकाज की कोई प्रत्यक्ष उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं है तो यही कहना चाहिए कि वह एक मुफ्त खोर घराना है। इसी राजघराने ने दुनियां को लूटकर अपने देश केा समृद्ध बनाया और शायद इसी कारण ही उसे ब्रिटेनवासी ढो रहे हैं। इसी राजघराने ने हमारे देश को भी लूटा है यह नहीं भूलना चाहिए।
               कायदा तो यह है कि देश को आज़ादी और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाले हमारे प्रचारकगण इस राजघराने के प्रति नफरत का प्रसारण करें पर यहां तो उनके बेकार और नकारा राजकुमारों के प्रेम प्रसंग और शादियों की चर्चा इस तरह की जाती है कि हम अभी भी उनके गुलाम हैं। खासतौर से हिन्दी समाचार चैनल और समाचार पत्र अब उबाऊ हो गये हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हिन्दी समाचार चैनल अपने विज्ञापनदाताओं के गुलाम हैं। इनके विज्ञापनदाता अपने देश से अधिक विदेशियों पर भरोसा करते हैं। यही कारण है कि कुछ लोगों के बारे में तो यह कहा जाता है कि वह यहां से पैसा बैगों में भरकर विदेश जमा करने के लिये ले जाते हैं। हैरानी होती है यह सब देखकर। अपने देश के सरकारी बैंक आज भी जनता के भरोसा रखते हैं पर हमारे देश के सेठ साहुकार विदेशों में पैसा रखने के लिये धक्के खा रहे हैं।
बहरहाल भारतीय सेठों का पांव भारत में पर आंख और हृदय ब्रिटेन और अमेरिका की तरफ लगा रहता है। कई लोगों को देखकर तो संशय होता है कि वह भारत के ही हैं या पिछले दरवाजे से भारतीय होने का दर्जा पा गये। अमेरिका की फिल्म अभिनेत्री को जुकाम होता है तो उसकी खबर भी यहां सनसनी बन जाती है। प्रचार माध्यमों के प्रबंधक यह दावा करते हैं कि जैसा लोग चाहते हैं वैसा ही वह दिखा रहे हैं पर वह इस बात को नही जानते कि उनको दिखाने पर ही लोग देख रहे हैं। उसका उन पर प्रभाव होता है। वह समाज में फिल्म वालों की तरह सपने बेच रहे हैं। विशिष्ट लोग की आम बातों को विशिष्ट बताने वाले उनके प्रसारण का लोगों के दिमाग पर गहरा असर होता है। ऐसा लगता है कि समाज में से पैसा निकालने की विधा में महारत हासिल कर चुके हमारे बौद्धिक व्यवसायी किसी नये सृजन की बजाय केवल परंपरागत रूप से विशिष्ट लोगों की राह पर चलने के लिये विवश कर रहे हैं।
                 यह भी लगता है कि सेठ लोगों की देह हिन्दुस्तानी है पर दिल अमेरिका या ब्रिटेन का है। उनको लगता है कि अमेरिका, ब्रिटेन या फ्रांस उनके अपने देश हैं और उनकी तर्फ से वहां केवल धन वसूली करने के लिये पैदा हुए हैं। अगर यह सच नहीं है तो फिर विदेशी बैंकों में भारी मात्रा में भारत से पैसा कैसे जमा हो रहा है? सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों को विदेश बहुत भाता है और राष्ट्रीय स्तर की बात छोड़िये स्थानीय स्तर के शिखर पुरुष बहाने निकालकर विदेशों का दौरा करते हैं।
प्रचार प्रबंधकों को लगता है कि जिस तरह पश्चिमी देशों में भारत की गरीबी, अंधविश्वास तथा जातिवादपर आधारित कहानियां पसंद की जाती हैं उसी तरह भारत के लोगों को पश्चिम के आकर्षण पर आधारित विषय बहुत लुभाते हैं। यही कारण है कि ब्रिटेन के बुढ़ा चुके राजघराने की परंपरा के वारिसों की कहानियां यहां सुनाई जाती हैं।
                 बहरहाल ऐसा लगता है कि हिन्दी समाचार चैनल बहुत कम खर्च पर अधिक और महंगे विज्ञापन प्रसारित कर रहे हैं। इन समाचार चैनलों के पास मौलिक तथा स्वरचित कार्यक्रम तो नाम को भी नहीं। स्थिति यह है कि सारे समाचार चैनल आत्मप्रचार करते हुए अधिक से अधिक समाचार देने की गारंटी प्रसारित करते हैं। मतलब उनको मालुम है कि लोग यह समझ गये हैं कि समाचार चैनलों का प्रबंधन कहीं न कहीं विज्ञापनदाताओं के प्रचार के लिये हैं न कि समाचारों के लिये। आखिर समाचार चैनलों को समाचार की गारंटी वाली बात कहनी क्यों पड़ी रही है? मतलब साफ है कि वह जानते हैं कि उनके प्रसारणों में बहुत समय से समाचार कम प्रचार अधिक रहा है इसलिये लोग उनसे छिटक रहे हैं या फिर वह समाचार प्रसारित ही कब करते हैं इसलिये लोगांें को यह बताना जरूरी है कि कभी कभी यह काम भी करते हैं। विशिष्ट लोगों की शादियों, जन्मदिन, पुण्यतिथियों तथा अर्थियों के प्रसारण को समाचार नहीं कहते। इनका प्रसारण शुद्ध रूप से चमचागिरी है जिसे अपने विज्ञापनदाताओं को प्रसन्न करने के लिये किया जाता है न कि लोगों के रुझान को ध्यान में रखा जाता है।
                  शाही शादी जैसे शब्द हमारे देश के अंग्रेजी के देशी गुलामों के मुख से ही निकल सकते हैं भले ही वह अपने को बौद्धिक रूप से आज़ाद होने का दावा करते हों।
                 बहरहाल जिस तरह के प्रसारण अब हो रहे हैं उसकी वजह से हम जैसे लोग अब समाचार चैनलों से विरक्त हो रहे हैं। अगर किसी दिन घर में किसी समाचार चैनल को नहीं देखा और ऐसी आदत हो गयी तो यकीनन हम भूल जायेंगे कि हिन्दी में समाचार चैनल भी हैं। जैसे आज हम अखबार खोलते हैं तो उसका मुख पृष्ठ देखने की बजाय सीधे संपादकीय या स्थानीय समाचारों के पृष्ठ पर चले जाते हैं क्योंकि हमें पता है कि प्रथम प्रष्ठ पर क्रिकेट, फिल्म या किसी विशिष्ट व्यक्ति का प्रचार होगा। वह भी पहली रात टीवी पर देखे गये समाचारों जैसा ही होगा। समाचार पत्र अब पुरानी नीति पर चल रहे हैं। उनको पता नहीं कि उनके मुख पृष्ठ के समाचार छपने से पहले ही बासी हो जाते हैं। हिन्दी समाचार चैनलों को भी शायद पता नहीं उनके प्रसारण भी बासी हो जाते हैं क्योंकि वही समाचार अनेक चैनलों पर प्रसारित होता है जो वह कर रहे होते हैं। एक ही प्रसारण सारा दिन होता है। शादियों और जन्मदिनों का सीधा प्रसारण पहले और बाद तक होता है।
कितने मेहमान आने वाले हैं, कितने आ रहे हैं, कितनी जगहों से आ रहे हैं। फिर कब जा रहे हैं, कहां जा रहे हैं जैसे जुमले सुने जा सकते हैं। संवाददाता इस तरह बोल रहे होते हैं जैसे आकाश से बिजली गिरने का सीधा प्रसारण कर रहे हों। वैसे ही टीवी अब लोकप्रियता खो रहा है। लोग मोबाइल और कंप्यूटर की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। खालीपीली की टीआरपी चलती रहे तो कौन देखने वाला है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
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4/25/2011

बाज़ार के भगवान रो दिये-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (bazar ke bhagwan ro diye-hindi vyangya kavitaen)

किराये के भगवान
पैसे के लिये रोते और हंसते हैं,
ज़माने में फुरसत पाये
लोगों की कमी नहीं हैं,
खेलते देख भगवान को
ताली बजाते
और रोने लगें तो
उनके आंसु भी बहते हैं,
आंख के अंधे और गांठ के पूरे लोग
प्रचार के जाल में यूं ही फंसते हैं।
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अब रोना और हंसना
दौलत और शोहरतमंदों को ही आता है,
शायद आम आदमी की हंसी हो गयी हवा
आंखों के सूख गये आंसु
इसलिये प्रचार में सजी तस्वीरों में
वह हड्डियों और मांस का
एक बेकार पुतला नज़र आता है।
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बाज़ार के भगवान
पता नहीं क्यों रो दिये,
मगर सौदागरों के सभी भौंपू
उनकी आवाज़ के संग हो लिये।
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4/19/2011

क्रिकेट और कपड़े उतारने का टोटका-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (cricket aur cloth-hindi satire thought)

                    देश में क्लब स्तरीय प्रतियोगिता चल रही है। एक क्लब का मालिक मुंबईया फिल्म का अभिनेता है-यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वह भी बाज़ार के सौदागरों का एक मुखौटा है जो क्लब के मालिक की तरह लगाया गया है। इस अभिनेता ने कहा है कि अगर उसका क्लब यह प्रतियोगिता जीत गया तो वह अपनी शर्ट उतारेगा-वैसे तो अपनी शर्ट सभी उतारते हैं पर कैमरे के सामने सार्वजनिक रूप से उतारने की घोषण करना एक फैशन बन गया है। वह शर्ट उतारे या नहीं फर्क क्या पड़ता है। उसका क्लब प्रतियोगिता जीते या दूसरा उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। अलबत्ता ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं क्रिकेट कराने वालों को लाभ या तो कम हो रहा है या फिर उनको ऐसा लग रहा है कि भविष्य में कम हो सकता है। इसलिये यह कपड़े उतारने की घोषणायें करने का टोटका अजमाया जा रहा है।
         क्रिकेट के सौदागर अपन खेल का आकर्षण लोगों में बनाये रखना चाहते हैं। वैसे क्रिकेट मैच में सार्वजनिक रूप से कपड़े उतारना कोई नई चीज नहीं है। एक इंग्लैंड में एक भारतीय खिलाड़ी जब बल्लेबाजी कर रहा था तब एक अंग्रेज महिला निर्वस्त्र उसके पास शाबाशी देने पहुंच गयी थी। उसके बाद एक भारतीय कप्तान ने त्रिकोणीय श्रृंखला जीतने पर अपनी कमीज उतारकर खुशी का इजहार किया था। हालांकि उस समय देश के कुछ तमीजदार लोगों ने इसकी आलोचना करते हुए देश की सांस्कृतिक पंरपराओं का हवाला दिया था।
उसके बाद ऐसी कोई घटना नहीं हुई। फिर अचानक यह कपड़े उतारने का चक्कर कहां से दोबारा प्रारंभ हो रहा है। हुआ यूं कि एक कम प्रसिद्ध तथा अपने भविष्य के लिऐ संघर्षरत एक अभिनेत्री ने हाल ही में भारत में संपन्न विश्व कप प्रतियोगिता में देश की टीम की जीत पर अपने सारे कपड़े उतारने की घोषणा की थी। टीम जीत गयी पर अब वह इंतजार कर रही है कि बीसीसीआई उसे इजाजत दे तो वह कपड़े उतारे। इधर बीसीसीआई इस बात से बेफिक्र हैं क्योंकि वह दुनियां का सबसे अमीर बोर्ड है और क्रिकेट में उसे कमाने का निंरतर अवसर मिल रहा है। इसलिये उसे कपड़े उतारकर यह खेल लोकप्रिय बनाने की अभी कोई जरूरत नहीं है। अलबत्ता हो सकता है कि कहीं इसकी लोकप्रियता कम होने लगे तो तब इस अभिनेत्री से कहा जाये कि चलो कपड़े उतारकर इस खेल को लोकप्रिय बनाओ। हालांकि तब तक वह अधेड़ या वृद्ध हो चुकी होगी।
                  उस अभिनेत्री ने कपड़े नहीं उतारे या वह आगे भी नहीं उतारेगी यह प्रश्न अब महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि पता चला है कि महज इस घोषणा से ही जो प्रचार मिला उसकी दम पर उसे बहुत सारा काम फिल्म और टीवी में मिल गया। ऐसा लगता है कि यह सब उसने ऐसा ही प्रचार पाने के लिये किया था। इधर अपने हीरो भी कोई अधिक सफल नहीं है। कोई उनको किंग कहता है तो कोई बादशाह पर सच यह है कि यह केवल बाज़ार के सौदागरों तथा उनके संगठित प्रचार की वजह से है। उनकी तुलना अमिताभ बच्चन से की जाती है जबकि सफलतम तथा यादगार फिल्मों की बात की जाये वह कहीं टिकता। उसने शायद यह अपेक्षा की होगी इससे उसको प्रचार मिल जायेगा तो हमें लगता है कि उसका यह काम तो अभी भी हो जाता है। जहां तक वास्तविक लोकपियता का सवाल है तो शर्ट के साथ पेंट या जींस उतारने की बात भी करते तो उसमें कोई बढ़ोतरी नहीं होती-यहां हम अंर्तवस्त्रों को उतारने की बात नहीं कह रहे क्योंकि एक पुरुष के लिये यह शोभा नहीं देता।
                 यह बात सही है कि क्रिकेट की लोकप्रियता अभी भी बहुत दिखती है पर वह पहले से बहुत कम है। विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता 2011 में बीसीसीआई यानि टीम इंडिया के पाकिस्तान के साथ हुए सेमीफायनल तथा श्रीलंका के साथ हुए फायनल के दौरान क्षणिक लोकप्रियता देखी गयी थी। अब तो उस जीत को लोगों ने भुला दिया है। मनोरंजन के बहुत सारे स्तोत्र हो गये हैं इसलिये क्रिकेट को वैसी लोकप्रियता नहीं मिल सकती। टीवी चैनल और अखबार अपने विज्ञापनों से प्रतिबद्धता के चलते भले ही क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रचार कर लें पर उसकी लोकप्रियता सीमित है। जितनी है वह बड़े शहरों तक ही दिखती है। मैदान पर दर्शक भले ही मिल जाते हों पर टीवी पर उसे उतने लोग नहीं देखते जितनी अपेक्षा की जाती है। ऐसे में कपड़े उतारने के टोटके केवल लोकप्रियता बनाये रखने के प्रयास के अलावा कुछ नहीं है। वैसे भी क्रिकेट वहीं तक खेल है जहां तक गली मोहल्लों में लड़के लड़कियां खेलती हैं। उसके आगे वह व्यापार हो जाता है और व्यापारी अपने लाभ और प्रचार के लिये सारे हथकंडे अपनाता है।
चलते चलते
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                             एक बात दूसरी भी है कि इस तरह सार्वजनिक रूप से कपड़े-चाहे वह शर्ट उतारना भर हो-अश्लीलता की परिधि में आती है पर लगता है कि मुंबईया फिल्म अभिनेता और अभिनेत्रियों पर कोई नियम या नीति लागू नहीं होती। वैसे भी क्रिकेट में यह सब चलता है। क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में लड़कियां चौके या छक्के लगने पर नृत्य कर गाना गायें तो चीयर्स गर्ल कहलाती हैं। अगर किसी निजी कार्यक्रम में यही करें तो उनको बार गर्ल कह दिया जाता है। मतलब यह कि दौलतमंद की छवि के अनुसार ही उनके अनुचरों की छवि भी धवल होती है। यही कारण है कि अमीरों के सामने नाचने वाली डांसर तो गरीब के सामने नाचने वाली को बार गर्ल कहा जाता है भले ही वह अच्छे चरित्र वाली हो।
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4/10/2011

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और योग साधना का अंतर्द्वंद्व- अन्ना हज़ारे के आंदोलन पर विशेष हिन्दी लेख-2 (bhrashtachar virodhi andolan aur yog sadhana-anna hazare ke andolan par vishesh lekh2)

अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते जनलोकपाल कानून का प्रारूप बनाने वाली समिति मे न्यायविद् पिता पुत्र के शामिल होने पर आपत्ति कर बाबा रामदेव ने गलती की या नहीं कहना कठिन है। इतना तय है कि वह श्रीमद्भागवत गीता का ‘गुण ही गुणों में बरतते हैं’ और ‘इद्रियां ही इंद्रियों में बरतती हैं’ के सिद्धांतों को नहीं समझते। वह दैहिक रूप से बीमार समाज के विकारों को जानते हैं पर मानसिक विकृतियों को नहंी जानते। दरअसल उनका योग लोगों को स्वस्थ रखने तक ही सीमित हो जाता है। उनका मानना है कि स्वस्थ शरीर में ही ही स्वस्थ मन रहता है इसलिये देश के लोग स्वस्थ रहेगा। यह ठीक है पर मन की महिमा भी होती है। भौतिकता में उसे लिप्त रहना भाता है जिससे अंततः विकार पैदा होते हैं। इस मन पर निंयत्रण करने की विधा भी योग में है पर उसके लिये जरूरी है कि योग साधक योग के आठ अंगो को समझे। उसके बाद श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करे। बाबा रामदेव अनेक बाद श्रीगीता के संदेश सुनाते हैं वह अभी ‘गीता सिद्ध’ नहीं बन पाये। यही कारण है कि वह अनेक घटनाओं पर तत्कालिक रूप से अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। कहीं न कहीं प्रचार की भूख में उनके मन के लिप्त होने का प्रमाण है। है। उनको यह मालुम नहीं कि यह देश नारों पर चलता है घोषणाओं पर खुश हो जाता है लोग सतही विषयों बहसों में मनोरंजन करने की आदत को जागरुकता का प्रमाण मान लेते हैं। सच तो यह है कि बाबा रामदेव की सोच भी समाज से आगे नहीं बढ़ पायी है। अन्ना हजारे के आंदोलन से अस्तित्व में आई लोकजनपाल समिति में जनप्रतिनिधियों के नाम पर ‘वंशवाद’ की बात कर बाबा रामदेव ने अपने वैचारिक क्षमताओं के कम होने कप प्रमाण दिया है। इस समिति का पद कोई सुविधा वाला नहीं है न ही इस पर बैठने वाले को कोई नायकत्व की प्राप्ति होने वाली है। फिर सवाल यह है कि इसमें शामिल होने का मतलब क्या कोई सम्मान मिलना है या उसमें जिम्मेदारी निभाने वाली भी कोई बात है। बाबा रामदेव ने पूर्व महिला पुलिस अधिकारी के शामिल न होने पर निराशा जताई पर वह जरा यह भी बता देते कि क्या वह यह मानते हैं कि वह अपनी जिम्मेदार जनता की इच्छा के अनुरूप निभाती क्योंकि उनमें ऐसा सामर्थ्य भी है।
ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव प्रचार माध्यमों में रचित ‘रामदेव विरुद्ध हज़ारे’ मैच के खेल में फंस गये। प्रचार माध्यम तो यह चाहते होंगे कि यह मैच लंबा चले। दरअसल बाबा रामदेव और श्री अन्ना हज़ारे एक ही स्वयंसेवी बौद्धिक समूह के संचालित आंदोलन के नायक बन गये जो बहुत समय से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिये जूझ रहा है। पहले वह स्वामी रामदेव को अपने मंच पर ले आया तो अब स्वप्रेरणा से दिल्ली में आये अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन शिविर में अपना मंच लेकर ही पहुंच गया। बाबा रामदेव का अभियान एकदम आक्रामक नहीं हो पाया पर अन्ना जी का आमरण अनशन तीव्र सक्रियता वाला साबित हुआ जिससे स्वयंसेवी बौद्धिक समूह को स्वाभाविक रूप से जननेतृत्व करने का अवसर मिला। उसमें कानूनविद भी है और जब कोई बात कानून की होनी है तो उनको बढ़त मिली है इसमें बुरा नहीं है। फिर अगर कानून बनाने वाली समिति में पिता पुत्र हों तो भी उसमें बिना जाने बूझे वंशवाद का दोष देखना अनुचित है। खासतौर से तब जब काम अभी शुरु ही नहीं हुआ है।
अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के व्यक्तित्व में कोई समानता नहीं है। ंअन्ना जी सच्चे समाज सेवक का प्रतीक हैं जिनका अभी तक कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र तक सीमित था। इसके विपरीत बाबा रामदेव का व्यक्त्तिव और कृतित्व विश्व व्यापी है। दोनों एक ही लक्ष्य के लिये एक साथ आये जरूर हैं पर दोनों की भूमिका इतिहास अलग अलग रूप से दर्ज करेगा वह भी तब जब आंदोलन अपनी एतिहासिक भूमिका साबित कर सका।
जब श्री अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आमरण अनशन पर थे तब वह प्रचार माध्यमों में छा गये जिससे उनकी जनता में नायक की छवि बनी। जबकि ऐसी छवि अभी तक अकेले स्वामी रामदेव की थी। ऐसे में उनको लगा कि वह पिछडे रहे हैं। वह अन्ना हजारे के शिविर में भी अंतिम दिन आये। उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि वह इस आंदोलन में अन्ना हजारे के साथ हैं। सच तो यह है कि उनका बयान इस तरह था कि जैसे अन्ना हजारे उनके ही अभियान को आगे बढ़ाने आये हैं। यह इसी कारण लगा कि वहां वही बौद्धिक समूह उपस्थित था जो कि पहले बाबा रामदेव के साथ रहा है।
वैसे अन्ना हजारे बाबा रामदेव से योग न सीखें पर राजनीतिक दृढ़ता के बारे में उनको हजारे जी का अनुकरण करना चाहिए। एक भी बयान चालाकी से नहीं दिया और अपनी निच्छलता से ही योग होने का प्रमाण प्रस्तुत किया। अब तो ऐसा लगने लगा है कि बाबा रामदेव योग से इतर अलग अपनी गतिविधियों में अपनी श्रेष्ठता के प्रचार में फंसने लगे हैं।
बाबा रामदेव को यह बात समझ लेना चाहिए कि अभी भारतीय समाज नारों और घोषणाओं में ही सिमटने का आदी है। ऐसे में एक वाक्य और शब्द का भी कोई दुरुपयोग कर सकता है। अतः जहां तक हो सके अधिक बयानबाजी से बचना चाहिए। आप कहीं पचास वाक्य बोलें पर यहां आदमी एक पंक्ति या शब्द ढूंढेगा जिसको लेकर वह आप भड़क सके।
मान लीजिये आपने यह कहा कि ‘अपने घर में बेकार पड़े पत्थर मै। किसी दिन बाहर सड़क पर फैंक दूंगा।’

ऐसे में आपको बदनाम करने के लिये कोई भी आदमी बाहर कहता फिरेगा कि वह कह रहे हैं कि‘ मैं पत्थर किसी सड़क पर फैंक दूंगा। अब आप बताओ किसी को लग गया तो, कोई घायल हो गया तो, चलो उसके घर पर प्रदर्शन करते हैं।’
यहां अनेक बुद्धिजीवियों और प्रचारकों ने इस झूठे प्रचार में महारत हासिल कर रखा है। दरअसल भ्रष्टाचार देश के समाज में घुस गया है। यही कारण है कि यथास्थिति सुविधाभोगी जीव इस आंदोलन से आतंकित है। ऐसे में वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकारियों के नेतृत्व के शब्दों और वाक्यों का अपनी सुविधा से इस्तेमाल कर सकते हैं। श्री अन्ना हजारे के समर्थकों को अभी यह अंदाजा नहीं है कि उनका अभी कैसे कैसे वीरों से सामना होना है जो यथास्थितिवादियों के समर्थक या किराये पर लाये जायेंगे। एक बात तय रही है कि यह घटना सामान्य लगती है पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा लेने वाले अग्रिम पंक्ति के सभी बड़े लोगों को यह बात समझना चाहिए कि यह उन लोगों की तरफ से भी प्रतिरोध होगा जो यथास्थितिवादी हैं।
बाबा रामदेव ने गलती की तो न्यायविद् पिता पुत्र भी पीछे नहीं रहे। कानून का प्रारूप बनाना योग सिखाने से अधिक कठिन है। विशुरु रूप से मजाकिया वाक्य है भले ही गंभीरता से कहा गया है। बात वहीं आकर पहुंचती है कि योग पर वही लोग अधिक बोलते हैं जिनको इसका ज्ञान नहीं है। कानून बनाना कठिन काम हो सकता है पर अपने देश में इतने सारे कानून बनते रहे हैं। कुछ हटते भी रहे हैं। मतलब कानून बनाने वाले बहुत हैं पर योग सिखाने वाले बहुत कम हैं। बाबा रामदेव जैसे तो विरले ही हैं। भ्रंष्टाचार विरोधी आंदोलन का योग से कोई वास्ता नहीं है। अगर आप बाबा रामदेव पर योग का नाम लेकर प्रहार करेंगे तो तय मानिए इस देश में योग साधकों का एक बहुत बड़ा वर्ग आप पर हंसेगा और बनी बनाई छवि मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी। अभी भारतीय योग साधना का प्रचार अधिक हो रहा है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि टीवी पर योगासन और प्राणायाम देख सुनकर उसके बारे में पारंगत होने का दावा कर लें। अगर कोई सच्चा योगी है तो उसके लिये कानून बनाना किसी न्यायविद् से भी ज्यादा आसान है क्योंकि आष्टांग योग के साधक वैचारिक योग में भी बहुत माहिर हो जाते हैं। न्यायविद् तात्कालिक हालत देखकर कानून बनाता है और योगी भविष्य का भी विचार कर लेता है। इसका प्रमाण यह है कि योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने आज से हजारों वर्ष पूर्व श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान दिया था वह आज भी प्रासंगिक लगता है।
बहरहाल बाबा रामदेव ने श्री अन्ना हजारे का सम्मान करते हुए अनेक बातें कही हैं तो श्री अन्ना हजारे ने भी निच्छलता से स्वामी रामदेव के बारे के प्रति अपना विश्वास दोहराया है। यह अच्छी बात है। हम जैसा आम आदमी और फोकटिया लेखक दोनों महानुभावों के कृत्यों पर अपनी दृष्टि जिज्ञासावश रखता है तब यह जानने की उत्सुकता बढ़ती जाती है कि आखिर समाज में बदलाव की चल रही मुहिम कैसे आगे बढ़ रही है।
चलते चलते
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चलते चलते एक बात! पता नहीं यह बात इस विषय से संबंधित है कि नहीं! एक योगसाधक के रूप में हम यह दावा कर सकते हैं कि योग साधना मजाक  का विषय नहीं है। टीवी पर चल रहे एक कामेडी कार्यक्रम में इस पर फब्तियां कसी गयीं। यह देखकर यह विचार आया। हमें भी हंसी आई पर कामेडियनों पर नहीं बल्कि उन पटकथा लेखकों पर जो बिचारे अपनी व्यवसायिक बाध्यताओं की वजह से ऐसा लिखते हैं। हमारे लिए  वह अपने अज्ञान की वजह से दया के पात्र हैं क्रोध का नहीं।

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
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