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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

4/19/2011

क्रिकेट और कपड़े उतारने का टोटका-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (cricket aur cloth-hindi satire thought)

                    देश में क्लब स्तरीय प्रतियोगिता चल रही है। एक क्लब का मालिक मुंबईया फिल्म का अभिनेता है-यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वह भी बाज़ार के सौदागरों का एक मुखौटा है जो क्लब के मालिक की तरह लगाया गया है। इस अभिनेता ने कहा है कि अगर उसका क्लब यह प्रतियोगिता जीत गया तो वह अपनी शर्ट उतारेगा-वैसे तो अपनी शर्ट सभी उतारते हैं पर कैमरे के सामने सार्वजनिक रूप से उतारने की घोषण करना एक फैशन बन गया है। वह शर्ट उतारे या नहीं फर्क क्या पड़ता है। उसका क्लब प्रतियोगिता जीते या दूसरा उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। अलबत्ता ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं क्रिकेट कराने वालों को लाभ या तो कम हो रहा है या फिर उनको ऐसा लग रहा है कि भविष्य में कम हो सकता है। इसलिये यह कपड़े उतारने की घोषणायें करने का टोटका अजमाया जा रहा है।
         क्रिकेट के सौदागर अपन खेल का आकर्षण लोगों में बनाये रखना चाहते हैं। वैसे क्रिकेट मैच में सार्वजनिक रूप से कपड़े उतारना कोई नई चीज नहीं है। एक इंग्लैंड में एक भारतीय खिलाड़ी जब बल्लेबाजी कर रहा था तब एक अंग्रेज महिला निर्वस्त्र उसके पास शाबाशी देने पहुंच गयी थी। उसके बाद एक भारतीय कप्तान ने त्रिकोणीय श्रृंखला जीतने पर अपनी कमीज उतारकर खुशी का इजहार किया था। हालांकि उस समय देश के कुछ तमीजदार लोगों ने इसकी आलोचना करते हुए देश की सांस्कृतिक पंरपराओं का हवाला दिया था।
उसके बाद ऐसी कोई घटना नहीं हुई। फिर अचानक यह कपड़े उतारने का चक्कर कहां से दोबारा प्रारंभ हो रहा है। हुआ यूं कि एक कम प्रसिद्ध तथा अपने भविष्य के लिऐ संघर्षरत एक अभिनेत्री ने हाल ही में भारत में संपन्न विश्व कप प्रतियोगिता में देश की टीम की जीत पर अपने सारे कपड़े उतारने की घोषणा की थी। टीम जीत गयी पर अब वह इंतजार कर रही है कि बीसीसीआई उसे इजाजत दे तो वह कपड़े उतारे। इधर बीसीसीआई इस बात से बेफिक्र हैं क्योंकि वह दुनियां का सबसे अमीर बोर्ड है और क्रिकेट में उसे कमाने का निंरतर अवसर मिल रहा है। इसलिये उसे कपड़े उतारकर यह खेल लोकप्रिय बनाने की अभी कोई जरूरत नहीं है। अलबत्ता हो सकता है कि कहीं इसकी लोकप्रियता कम होने लगे तो तब इस अभिनेत्री से कहा जाये कि चलो कपड़े उतारकर इस खेल को लोकप्रिय बनाओ। हालांकि तब तक वह अधेड़ या वृद्ध हो चुकी होगी।
                  उस अभिनेत्री ने कपड़े नहीं उतारे या वह आगे भी नहीं उतारेगी यह प्रश्न अब महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि पता चला है कि महज इस घोषणा से ही जो प्रचार मिला उसकी दम पर उसे बहुत सारा काम फिल्म और टीवी में मिल गया। ऐसा लगता है कि यह सब उसने ऐसा ही प्रचार पाने के लिये किया था। इधर अपने हीरो भी कोई अधिक सफल नहीं है। कोई उनको किंग कहता है तो कोई बादशाह पर सच यह है कि यह केवल बाज़ार के सौदागरों तथा उनके संगठित प्रचार की वजह से है। उनकी तुलना अमिताभ बच्चन से की जाती है जबकि सफलतम तथा यादगार फिल्मों की बात की जाये वह कहीं टिकता। उसने शायद यह अपेक्षा की होगी इससे उसको प्रचार मिल जायेगा तो हमें लगता है कि उसका यह काम तो अभी भी हो जाता है। जहां तक वास्तविक लोकपियता का सवाल है तो शर्ट के साथ पेंट या जींस उतारने की बात भी करते तो उसमें कोई बढ़ोतरी नहीं होती-यहां हम अंर्तवस्त्रों को उतारने की बात नहीं कह रहे क्योंकि एक पुरुष के लिये यह शोभा नहीं देता।
                 यह बात सही है कि क्रिकेट की लोकप्रियता अभी भी बहुत दिखती है पर वह पहले से बहुत कम है। विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता 2011 में बीसीसीआई यानि टीम इंडिया के पाकिस्तान के साथ हुए सेमीफायनल तथा श्रीलंका के साथ हुए फायनल के दौरान क्षणिक लोकप्रियता देखी गयी थी। अब तो उस जीत को लोगों ने भुला दिया है। मनोरंजन के बहुत सारे स्तोत्र हो गये हैं इसलिये क्रिकेट को वैसी लोकप्रियता नहीं मिल सकती। टीवी चैनल और अखबार अपने विज्ञापनों से प्रतिबद्धता के चलते भले ही क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रचार कर लें पर उसकी लोकप्रियता सीमित है। जितनी है वह बड़े शहरों तक ही दिखती है। मैदान पर दर्शक भले ही मिल जाते हों पर टीवी पर उसे उतने लोग नहीं देखते जितनी अपेक्षा की जाती है। ऐसे में कपड़े उतारने के टोटके केवल लोकप्रियता बनाये रखने के प्रयास के अलावा कुछ नहीं है। वैसे भी क्रिकेट वहीं तक खेल है जहां तक गली मोहल्लों में लड़के लड़कियां खेलती हैं। उसके आगे वह व्यापार हो जाता है और व्यापारी अपने लाभ और प्रचार के लिये सारे हथकंडे अपनाता है।
चलते चलते
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                             एक बात दूसरी भी है कि इस तरह सार्वजनिक रूप से कपड़े-चाहे वह शर्ट उतारना भर हो-अश्लीलता की परिधि में आती है पर लगता है कि मुंबईया फिल्म अभिनेता और अभिनेत्रियों पर कोई नियम या नीति लागू नहीं होती। वैसे भी क्रिकेट में यह सब चलता है। क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में लड़कियां चौके या छक्के लगने पर नृत्य कर गाना गायें तो चीयर्स गर्ल कहलाती हैं। अगर किसी निजी कार्यक्रम में यही करें तो उनको बार गर्ल कह दिया जाता है। मतलब यह कि दौलतमंद की छवि के अनुसार ही उनके अनुचरों की छवि भी धवल होती है। यही कारण है कि अमीरों के सामने नाचने वाली डांसर तो गरीब के सामने नाचने वाली को बार गर्ल कहा जाता है भले ही वह अच्छे चरित्र वाली हो।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
http://dpkraj.wordpress.com
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1 टिप्पणी:

Prarthana gupta ने कहा…

whtevr the case may be...gals r used...

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