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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

4/15/2010

खेल में पर्दा-हिन्दी क्षणिका

यह सच है 
खेल खुले में खेले जाते हैं,
पर अब तो परदे की पीछे से 
आये  इशारों पर भी दाव चले जाते  हैं.
खिलाड़ी हो गए हैं अभिनय के फन में माहिर 
उसके असर में
परदे के पीछे खेल, आखों से नज़र नहीं आते हैं..
--------------------------------
 
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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1 टिप्पणी:

Shekhar kumawat ने कहा…

sahi he bhai



shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

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