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3/28/2009

धरती की रक्षा के लिये अपील नहीं चेतावनी की जरूरत-आलेख

सुना है आज घरती प्रहर दिवस मनाया जा रहा है। नयी सस्कृति अपना चुके इस देश में धीरे धीरे पाश्चात्य संस्कृति स्थापित करने के जो प्रयास अभी तक हुए हैं उसमें कई विद्वान लोगों को सफलता नहीं मिल पा रही है और अब प्रेम दिवस, शुभेच्छु दिवस, मित्र दिवस, नारी दिवस, माता दिवस तथा अन्य अनेक प्रकार के दिवस मनाने की प्रथा के सहारे यह प्रयास किया जा रहा है। पहले अनेक प्रकार के आधुनिक विचार लाकर देश में संस्कृति के विकास अवरुद्ध करने के साथ ही लोगों में चिंतन क्षमता का अकाल पैदा किया और अब नये नये दिवस मनवाकर उसी चिंतन क्षमता को नये रूप मेें स्थापित करने का जो प्रयास हो रहा है।
बहरहाल माता की ममता, सहृदय का प्रेम,तथा स्नेही की मित्रता ऐसे तत्व हैं जिसकी सुगंध को हमारे देश का आदमी स्वाभाविक रूप से अनुभव करता है। लार्ड मैकाले की गुलाम बनाने की शिक्षा के बावजूद हमारे देश में कुछ गुरु और माता पिता अपने बच्चे को अपनी संस्कृति से परिचित कराने के लिये प्रयास करते हैं जिसके कारण आज भी देश की अधिकतर आबादी उस नये परिवेश से परिचित नहीं है जिसका नये विद्वान प्रचार करते है।

ब्रह्मांड में धरती ही जीवन का सबसे बड़ा आधार है। जीवन निर्माण के साथ ही ब्रह्मा ने सभी मनुष्यों से कहा कि आप लोग यज्ञों द्वारा देवताओं की पूजा करें और वह अपने कर्म से धरती पर जीवन का संचार करें। धरती भी उनमें एक ऐसे देवता की तरह है जो अन्य देवताओं को भी अपने यहां ठहरने का आधार देती है ताकि उनकी कृपा मनुष्यों पर निंरतर बनी रहे। देवराज इंद्र की कृपा से वरुण देव जल बरसाते हैं और धरती उसका संचय करती है। जो वायु देवता उन बादलों को खींचकर अपने साथ लाते है उसकी शक्ति को पाताल में न जाकर अपने यहां ही बहने देती है ताकि वह जल को सूखे स्थानों तक पहुंचा सके। सूर्य की गर्मी के संचय से उष्मा संचय कर बादलों का पानी नीचे खींचने में सहायता करती है। अपनी शक्ति से समस्त देवताओं को बांधने वाली इस धरती पर वही इंसान कहर बरपाता है जिसके सुख के लिये वह सभी करती है।

वैदिक धर्म ने अनेक ऐसे यज्ञों का प्रवर्तन किया जिससे धरती पर प्राकृतिक संतुलन बना रहे। प्राचीन काल मेंें राजा भागीरथ ने घोर तपस्या कर गंगा नदी को स्वर्ग से जमीन पर उतारा। गंगा जी में इतना तेज था कि उनके धरती पर न रुककर पाताल में घुस जाने की संभावना थी इसलिये राजा भागीरथ ने उनकी गति की तीव्रता कम रखने के लिये भगवान शिव जी की तपस्या की और उन्होंने उसे अपनी जटाओं में धारण किया। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे प्राचीनतम अध्यात्मिक दर्शन में प्रथ्वी पर जीवन सतत प्रवाहित करने के लिये मनुष्यों से प्रयास किये जाने की अपेक्षा की जाती है। यह माना जाता है कि मनुष्य प्रथ्वी पर पर्यावरण संतुलन करने के लिये जल और वायु प्रदूषण रोकने के साथ ही कृषि, वन, खनिज, और पशु संपदा की रक्षा और शुद्धता के लिये मनुष्य स्वयं निरंतर प्रयत्नशील रहे न कि किसी अवतार का इंतजार करे। यही कारण है कि उसके लिये कोई एक दिन तय नहीं किया गया।

हमने पाश्चात्य शैली का विलासी और सुविधाभोगी जीवन तो अपना लिया है पर धरती पर फैलते जा रहे पर्यावरण प्रदूषण को विचार तो तभी कर सकते हैं जब अपने देह की परवाह कर लें। सभी लोग उपभोग की प्रवृतियों में अपना दिमाग लगाये बैठे हैं। देह, मन और विचार के विकारों को निकालने के लिये लिये कोई प्रयास नहीं करते। अब यह कहना कठिन है कि पर्यावरण प्रदूषण के कारण लोग मनोरोगी हो रहे हैं या वह मनोरोगी हो गये हैं इसलिये पर्यावरण प्रदूषण फैल रहा है। अब समस्या यह भी है कि पहले पर्यावरण प्रदूषण दूर हो या पहले लोगों की मानसिकता में पवित्रता का भाव आये। तय बात है कि ब्रह्मा जी ने मनुष्यों ये देवताओं को प्रसन्न करने के लिये यज्ञ और देवताओं से प्रथ्वी के समस्त जीवों मेंे जीवन का संचार करने का जो आदेश दिया उसका उल्लंघन हो गया है। देवता तो अपनी कृपा करते रहते हैं पर मनुष्य यज्ञ कहां कर रहा है? पेड़ पौद्यों को काटकर वहां पत्थर के शहर बनाने वाला इंसान पत्थर होता जा रहा है। वैसे आज भी कुछ लोग हैं जो पेड़ पोद्यों की रक्षा करने केे लिये प्रयासरत हैं-यह भी एक तरह का यज्ञ है। हमारे देश में अनेक अवसरों पर पेड़ पौद्यों पर जल चढ़ाने की पंरपरा का कुछ लोग मजाक उड़ाते हैं पर उसका महत्व वह नहीं जानते। दरअसल हमारे कुछ यज्ञ भले ही आधुनिक समय में पाखंड लगते हैं पर उनका कोई न कोई वैज्ञानिक महत्व रहा है और इसे कई लोग प्रमाणित कर चुके है।
सच बात तो यह है कि पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिये प्राकृतिक संपदा की रक्षा के लिये लोगों में चेतना जाग्रत कर उनसे सहायता की अपील करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि यह चेतावनी देने की जरूरत है कि अगर विश्व में इसी तरह गर्मी बढ़ती रही तो न केवल वह स्वयं बल्कि उनकी आने वाली पीढि़यां ही अपंग और मनोरोगी पैदा होंगी। अपनी सात पीढि़यों तक को खिलाने के लिये कमाकर रखने का विचार करने वाले धनी लोगों को यह समझाना भी जरूरी है कि उनकी आने वाली पीढि़यां नाम के लिये मनुष्य होगी पर उसका चालचलन पशुओं की तरह हो जायेगा। वैसे भी देश में आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रसित है पर मनोरोगी कितने हैं कोई नहीं जानता। पूरी तरह विक्षिप्त होना ही मनोरोग नहीं होता बल्कि अनावश्यक बातों से तनाव में आना, जल्दी थक जाना तथा निराशा में रहना भी एक तरह से मनोरोग हैं जिनका पता तो रोगी को भी नहीं चलता। कोई कहता है कि देश के चालीस प्रतिशत लोग मनोरोगी है तो कोई कहता है कि इससे भी ज्यादा हैं। अगर हम अपनी चिंतन क्षमता को जाग्रत करें तो यह अनुभव कर सकते हैं कि अधिकतर लोगों की मनोदशा बहुत खराब है। तय बात है कि बढ़ती गर्मी और प्राणवायु में कमी ही ऐसी दशा में इंसान को डालती है।
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3/15/2009

दक्षिण एशिया के साहित्यकार आतंक पर सच लिख भी कहां पाये-आलेख

अभी हाल ही में दक्षिण एशिया के देशों का एक साहित्यकार सम्मेलन संपन्न हुआ। इसमें भारत, पाकिस्तान,श्रीलंका,बंग्लादेश तथा अन्य सदस्य देशों के नामचीन साहित्यकार शामिल हुए। जैसा कि संभावना थी कि इस इलाके में व्याप्त आतंकवाद भी इसमें चर्चा का विषय बना। जब इलाके में आतंकवाद का बोलबाला है तो यह स्वाभाविक भी है। कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है तो साहित्यकार इसी दर्पण की आंख की तरह देखने वाला होता है। इन साहित्यकारों ने आतंकवाद की निंदा की है और अपने देश के हिसाब से ही अपने विचार व्यक्त किये। पाकिस्तान के एक साहित्यकार ने बंग्लादेश में हाल ही में हुए विद्रोह में अपने देश का हाथ होने के आरोप का खंडन किया। बात यहीं पर ही अटक जाती है कि साहित्यकारों को क्या उसी नजरिये पर चलना चाहिये जिस पर उनका समाज या देश चल रहा है।

पहले तो यहां साहित्यकार और पत्रकार का भेद स्पष्ट करना जरूरी है। पत्रकार जो देखता है वही दिखाता और लिखता है पर साहित्यकार का दृष्टिकोण व्यापक होना चाहिये। पत्रकार कल्पना नहीं करता और न उसे करना चाहिये पर साहित्यकार को किसी घटना में तर्क के आधार पर कल्पना और अनुमान करने की शक्ति होना चाहिये। अपने समाज और देश के प्रति साहित्यकार की प्रतिबद्धता होना जरूरी है पर उसे अंधभक्ति से दूर रहना चाहिये। दक्षिण एशिया के साहित्यकारों को अपने देश में जो इनाम मिलते हैं वही उनकी प्रतिष्ठा का आधार बनते हैं पर सच तो यह है कि पूरे क्षे.त्र की हालत एक जैसी है और सभी जगह यह पुरस्कार लेखकों के संबंधों पर अधिक दिये जाते हैं और कई तो ऐसे साहित्यकार भी पुरस्कार पा जाते हैं जिनको समाज में ही अहमियत नहीं दी जाती है। बहरहाल दक्षिण एशिया के साहित्यकारों को अब इस बात का भी मंथन करना चाहिये कि क्या वह वास्तव में ही समाज और देश के लिये महत्ती भूमिका निभा रहे है? दक्षिण एशिया की सभी भाषाओं में बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर उससे सामाजिक सरोकार कितने जुड़े हैं यह भी देखने की बात है।
हम दक्षिण एशिया के साहित्यकारों द्वारा आतंकवाद पर लिखी गयी सामग्रियों पर ही विचार करें तो लगेगा कि वह यथार्थ से परे हैं। लेखक को कल्पना तो करना चाहिये पर उससे यथार्थ का बोध होता हो न कि वह झूठ लगने लगे। हमने केवल हिंदी और अंग्रेजी में ही पढ़ा है। सभी को पढ़ना संभव नहीं है पर पत्र पत्रिकाओं और अंतर्जाल पर इस संबंध में पढ़ते है तो लगता है सभी साहित्यकार एक जैसे ही है। हो सकता है कि कुछ अपवाद हों पर उनकी रचनायें अनुवादों को माध्यम से अधिक नहीं पढ़ने को मिल पाती।
अब साहित्यकारों द्वारा आतंकवाद की निंदा की गयी पर कितने ऐसे साहित्यकार हैं जो इस बात को समझते हैं कि आतंकवाद भले ही जाति,भाषा,क्षेत्र और धर्म के नाम झंडो तले अपना काम करता है पर वास्तव में वह एक व्यापार है। ऐसा व्यापार जिस पर भावना,श्रृंगार और अलंकार से शब्द सजाकर प्रस्तुत करना कभी कभी एकदम निरर्थक प्रक्रिया लगती है। आतंकवाद एक हाथी है जिसे साहित्यकार आंखें बंदकर पकड़ लेते हैं। कोई उसके सूंड़ को पकल लेता है तो कोई पूंछ-फिर उस पर अपनी व्याख्या करने लगता है। जिस तरह पहले किसी सुंदरी का मुखड़ा गढ़कर उसकी आंखें,नाक,कान,कमर,और बालों पर कवितायें और कहानी लिखी जाती थीं वैसे ही आतंकवाद का विषय उनके हाथ आ गया है। जिस तरह किसी सुंदरी के शारीरिक अंगों पर खूब लिख गया पर उसके व्यवहार,आचरण और ज्ञान पर कवि लिखने से बचते रहे वही हाल आतंकवाद का है। साहित्यकारों और लेखकों ने आतंकवादी घटनाओंे से हुई त्रासदी पर वीभत्स रस से सराबोर रचनायें खूब लिखीं। पाठक का दर्द खूब उबारा पर कभी इन घटनाओं के पीछे जो सौदागर हैं उसकी कल्पना किसी ने नहंी की। प्रसंगवश यहां हम मुंबई के खूंखार आतंकवादी कसाब की चर्चा करते हैं। 58 से अधिक बेकसूर लोगों का हत्यारा कसाब इंसान से कैसे राक्षस बना? क्या किसी पाकिस्तानी लेखक ने उसकी कल्पना करते हुए कोई लघुकथा या कविता लिखी। एक गरीब घर का लड़का जिसे उसका बाप आतंकवादी कैंप में यह कहकर भेजता है कि उसकी दो बहिनों की शादी के लिये पैसे मिलने के लिये यही एक रास्ता है। वह एक मामूली चोर डेढ़ से दो लाख रुपये की लालच में अपने देश के लिये योद्धा बनने को तैयार कैसे हो गया? उसमें इतनी क्रूरता कैसे आयी कि बंदूक हाथ में आते ही उसने 58 जाने बेहिचक ले ली? यही इंसान से राक्षस बना कसाब पकड़े जाने पर चूहे की तरह अपनी जान की भीख मांगने लगा। प्रचार माध्यम बता रहे हैं कि अब वह अपने किये पर पछता रहा है तब तो यह सवाल उठता ही है कि आखिर इस राक्षसीय कृत्य के लिये प्रेरित करने वाले कौनसे कारण थे?
कसाब के पीछे जो तत्व हैं उनके सच पर कितने पाकिस्तानी या भारतीय साहित्यकार लिख पाते हैं। कसाब और उसके साथी तो साँस लेते हुए ऐसे इंसान थे जो किन्ही राक्षसों के हथियार बने गये। मुख्य अपराधी कौन हैं? मुख्य अपराधी हैं वह जो इसके लिये धन मुहैया करवा रहे हैं। यह धन देने वाले तमाम तरह के अवैध धंधों में लिप्त हैं और प्रशासन और जनता का ध्यान उन पर न जाये इस तरह के आतंकवाद का प्रायोजन कर रहे हैं। यह सच कितने साहित्यकार लिख पाये? कसाब तो इंसानी रूप में एक बुत है या कहें कि रोबोट है।
पाकिस्तान साहित्यकारों में क्या इतनी हिम्मत है कि वह कसाब को केंद्रीय पात्र बनाकर कोई कहानी लिख सकें? नहीं! दरअसल दक्षिण एशियों के साहित्यकार नायकों पर लिखकर समाज की वाहवाही लूटना चाहते हैं पर खलनायकों के कृत्यों में पीछे समाज की जो स्वयं की कमियां हैं उसे उबारकर लोगों के गुस्से से बचना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि नायकों की विजय के पीछे अगर समाज है तो खलनायक की क्रूरता के पीछे भी इसी समाज के ही तत्व हैं। समाज की की खामियों को छिपाकर उससे अच्छा बताने से तात्कालिक रूप से प्रशंसा मिलती है शायद यही कारण है कि लोग उससे बचने लगे हैं। भारत में हालांकि अनेक लोग समाज की कमियों की व्याख्या करते हैं पर वह भी उसके मूल में नहीं जाते बल्कि सतही तौर पर देखकर अपनी राय कायम कर लेते हैं। नारी स्वातंत्रय पर लिखने वाले अनेक लेखक तो हास्यास्पद रचनायें लिखते हैं और उससे यह भी पता लगता है कि उनके गहन चिंतन की कमी है।

दक्षिण एशियाई देश भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,गरीबी,अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के कारण विश्व में पिछडे हुए हैं और इसलिये यहां लोगों में कहीं न कहीं गुस्से की भावना है। दक्षिण एशिया की छबि विश्व में कितनी खराब है यह इस बात से भी पता चलता है कि ईरान के सबसे बड़े दुश्मन इजरायल ने भी उसे अपने लिये कम पाकिस्तान को अधिक संकट माना है जो कि दक्षिण एशिया का ही हिस्सा है। जब हम दक्षिण एशिया की बात करते हैं तो फिर भौगोलिक सीमाओं से उठकर विचार करना चाहिये पर जैसे कि सम्मेलन की समाचार पढ़ने को मिले उससे तो नहीं लगता कि शामिल लोग ऐसा कर पाये। सच बात तो यह है कि समाज और देश को दिशा देने का काम साहित्यकार ही कर पाते हैं क्योंकि वह पुरानी सीमाओं से बाहर निकलकर रचनायें करते हैं। सभी साहित्यकार ऐसा नहीं कर पाते जो पर जो करते हैं वही कालजयी रचनायें दे पाते हैं। अगर हम दक्षिण एशिया की स्थिति को देखें तो अब ऐसी कालजयी कृतियां कहां लिखी जा रही हैं जिससे समाज या देश में परिवर्तन अपेक्षित हो।
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3/09/2009

दिवस बनाता कोई और है, मनाता कोई और है-व्यंग्य आलेख

दिवस बनाता कोई और है और मनाता कोई और है। इस देश में हर रोज कोई न कोई दिवस मनाने की चर्चा होती है। अभी वैंलटाईन डे और महिला दिवस निकले नहीं कि होली आ गयी। होली तो अपने देश का परंपरागत पव है और साल में एक बार आता है। इस पर खूब हंसी ठठ्ठा भी होता है। इस पर्व को आम और खास दोनों ही प्रकार के लोग इस त्यौहार को मनाते हैं। तय बात है कि इसकी चर्चा भी होगी पर हम उन दिवसों की बात कर रहे हैं जिससे सामान्य लोग बेखबर रहते हैं पर बुद्धिजीवी,लेखक और पत्रकार उस पर शोर मचाते हैं।
यह महिला,पुरुष,मित्र और प्रेम दिवस यकीनन भारत की देन नहीं है पर यहां चर्चा उनकी खूब होती है। अपने देश में संगठित लेखक बुद्धिजीवी और पत्रकार दो प्रकार के माने जाते हैं-एक प्रगतिशील और दूसरे पंरपरावादी। जब यह दिवस आते हैं तो यही सबसे अधिक शोर मचाते हैं। एक अनुकूल लिखता और बोलता है दूसरा प्रतिकूल। खूब चर्चा होती है। संगठित होने के कारण उनको प्रचार माध्यमों पर खूब प्रचार मिलता है-आजकल अंतर्जाल पर भी उनके पास ही अधिक हिट होते हैं। वह लोग लिखते हैं इसमें कोई आपत्ति नहीं होना चाहिये वरना हमें पढ़ने के लिये कहां से मिलेगा? उनकी मेहरबानी है जो लिखते और बोलते हैं। मगर फिर भी कुछ बातें हमारे समझ में नहीं आती।

प्रगतिशील वर्ग पश्चिम का धुर विरोधी है। पूरे वर्ष वह उस पश्चिम पर बरसता है। अमेरिका ने यह कर दिया और वह कर दिया। उसे इराक छोड़ना चाहिये। उसे अफगानिस्तान से बाहर जाना चाहिये। वगैरह वगैरह।
मगर पश्चिम द्वारा बनाये गये यह दिवस आते हैं तब महिला,बाल,श्रमिक,और जाने कौन से प्रताडि़त वर्गों के नाम लेकर यही प्रगतिशील वर्ग उसके लिये उमड़ पड़ता है। इसके विपरीत परंपरावादी लेखक जो पूरा वर्ष पश्चिम को विजेता की तरह पेश करते हैं उस दिन अड़ जाते हैं कि यह दिवस हमारे देश के संस्कारों के अनुकूल नहीं है। हमारी परंपरायें अलग हैं। वगैरह वगैरह। प्रगतिशील को बाजार की स्वतंत्रता पसंद नहीं है पर वह इन दिवस को प्रचार देकर उसकी खुलकर मदद करता है। प्रगतिशीलों को पुराने धर्म पसंद नहीं है और ऋषियों और मुनियों को वह पुरातनपंथी मानते हैं पर वैलंटाईन ऋषि में के नाम पर मनाये गये दिवस उन्होंने जितना शोर मचाया वह ठीक उनकी विपरीत चाल का हिस्सा था।

हाल ही में महिला दिवस भी ऐसे ही मना। प्रगतिशीलों ने महिलाओं की आजादी के नारे लगाते हुए जमकर लिखा और बोला। एक आलेख पर नजर पड़ी जिसमें ‘बिने फेरे हम तेरे’ की प्रथा का जमकर विरोध किया गया। कहा गया इससे नारी पर ही संकट आयेगा। प्रगतिशीलों की एक बात समझ में नही आती कि वह आखिर विवाह प्रथा के साथ चिपटे क्यों रहना चाहते हैं जबकि वह उन्हीं प्राचीन धर्मों का हिस्सा है। चलने दीजिये उस प्रथा को जिसमें बिना विवाह किये ही लड़के लड़कियां रहना चाहते हैं। फिर उस प्रथा को जो जोड़े अपना रहे हैं उनमें नारियां भी हैं। वह उन नारियों में ही चेतना क्यों नहीं जगाना चाहते कि ऐसा मत करो-वह यहां भी महिलाओं के अधिकारों के कानूनी संरक्षण की बात कर रहे हैं। वह एक तरफ नारियों को समान अधिकार की बात करते हैं पर दूसरी तरफ उनको यह भी लगता है कि उनमें विवेक शक्ति की कमी है और ‘बिन फेरे हमे तेरे’ की प्रथा से वह अपना भविष्य संकट में डाल सकती है।

दरअसल बात यह है अगर इस देश में बिन फेरे हम तेरे की प्रथा आम हो जाये तो कानून के डंडे के सहारे पुरुष समाज के विरुद्ध अभियान छेड़कर महिलाओं में अपनी छबि बनाने का प्रगतिशीलों के अवसर कम हो जायेंगे। इतने सारे पुरुष आजाद होकर मजे करेंगे तो उनको घास कौन डालेगा?

हम अपने अनुभव से यही समझ पाये है कि इस तरह वर्ग बनाकर लोगों को कल्याण का भ्रम दिखाना अंग्रेजों की शैली है। समाज के टुकड़े कर फिर उसमें एकता लाने का यह तरीका इतना प्राचीन है कि विचारधारा से परे लिखने और बोलने वाले लोग उस पर हास्य व्यंग्य ही लिखते हैं। संपूर्ण समाज का विकास होना चाहिये पर यहां महिला,बालक,मजदूर,व्यापारी, और पता नहीं कितने प्रकार के भेद कर उनका कल्याण करने की बात होती है। हमारे देश में परिवार परंपरा दुनियां में सबसे अधिक शक्तिशाली है। अगर पुरुष को कुछ अतिरिक्त मिलता है तो क्या वह अपनी पत्नी और बच्चों से छिपाकर खाता है? मगर यहां तो यह मान लिया गया जाता है कि पुरुष हमेशा ही स्त्री का शोषक है। स्त्री को नौकरी और धन दो पर पुरुष की आय बढ़े इसका कोई उपचार नहीं करना चाहता। बालकों के लिये धन दो क्योंकि उनके पिता उनके लिये कुछ नहीं करते। कमाने वाले पुरुष-चाहे वह कमाते होेंं या अधिक-शोषक मानकर प्रगतिशील पता नहीं क्या कहना चाहते हैं जबकि आज भी देश की रीढ़ यही पुरुष वर्ग है। अब कुछ लोग कहेंगे कि साहब नारियां भी कमाई के क्षेत्र में आयें। जनाब, अमेरिका की एक संस्था की रिपोर्ट कहती है कि भारत में गृहस्थी का काम करने वाली महिलाओं की कमाई का आंकलन किया जाये तो वह पुरुषों से अधिक है। इसमें सच्चाई भी है। कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है पर उसे लक्ष्य लेकर बढ़ाने की बात करना इस बात का प्रमाण है कि गृहस्थी का काम करने वाली महिलाओं का कमतर आंका जा रहा है। सच बात तो यह है कि इस देश के भविष्य की रक्षा यही गृहस्थी का काम करने वाली महिलायें जिस निष्काम भाव से करती हैं वह मन को मोह लेता है।

बात कहां से निकली कहां तक पहुंच गयी। अंतर्जाल पर लिखते हुए ऐसा ही होता है। इस देश में तमाम तरह के दिवस पहले से ही मनाये जाते हैं और पश्चिम का विरोध करने वालो लोग जब उन दिवसों को यहां भी मनाते हैं तब तो हंसी आना स्वाभाविक है। खासतौर से जब प्रचार माध्यमों और अंतर्जाल पर उन दिवसों पर ढेर सारा मसाला हो पर आमजन में उसकी चर्चा तक नहीं हो। इसका कारण भी है कि अपने देश के लोगों के संस्कार इतने मजबूत हैं कि उनके लिये हर दिन नया होता है। पश्चिम में भला कौन प्रतिदिन धार्मिक स्थान पर जाता है? अपने यहां तो ऐसे लोग भी हैं जो प्रतिदिन सर्वशक्तिमान के दर्शन कर अपना दिन शुरु करते हैं और यही कारण है कि चाहे भले ही बाजार के संरक्षक प्रचार माध्यम जमकर दिवस का नाम सुनाते हों पर आम जनता में उसकी प्रतिक्रिया नहीं होती। हां, नयी पीढ़ी का वह तबका जरूर उनकी जाल में फंसता है जो इश्क मुश्क में चक्कर में रहता है। इन अवसरों पर कार्यक्रम अपने देश में जितने होते हैं शायद ही कहीं होते हों।
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3/01/2009

दूसरा तस्सल-हिंदी लघुकथा

वह किसी मकान के लिये बन रही नींव के लिये गड्ढा खोद रहा था। उसके पास ही थोड़ी दूर स्थित मैदान में गरीब मजदूरों के उद्धारक और समाज कल्याणक का भाषण चल रहा था। उसी समय एक बुद्धिजीवी वहां से निकला और बोला-‘अरे, तुम यहां काम में लगे हो। चलो उधर तुम्हारे उद्धारक का भाषण चल रहा है। क्या बहरे हो? तुम्हें सुनाई नहीं देता।’
मजदूर खामोशी से उस बुद्धिजीवी को हैरानी से देखने लगा तो बुद्धिजीवी ने कहा-‘लगता है कि बहरे होने के साथ गूंगे भी हो। तब तो तुम्हें वहां जरूर चलना चाहिये।’
बुद्धिजीवी महोदय उसे इशारों में समझाने लगे तो वह मजदूर बोला-‘आप गलत समझ रहे हैं। मैं न तो बहरा हूं न गूंगा। मैं तो मजदूर हूं पेट से भूखा हूं। वह भाषण कर रहे हैं। जिनके पास कोई काम नहीं हैं या पेट भरे हुए हैं वह उनका भाषण सुन रहे हैं। मैं तो छोटा आदमी हूं। उद्धारक साहब तो बड़े आदमी हैं।
बुद्धिजीवी ने कहा-‘चलो! मुझे उन पर एक लेख लिखना है। तुम वहां चलोगे तो तुम्हारा औरा उनका फोटो निकाल कर छाप दूंगा। क्या जोरदार मसाला बनेगा? वह गरीबों और मजदूरों के मसीहा हैं। तुम यह फावड़ा तस्सल हाथ में पकड़े जब उनका भाषण सुनोगे तब तुम्हारा फोटो निकाल कर उसे प्रकाशित करूंगा। लोगों को पता लग जायेगा कि उद्धारक जी कितने महान हैं कि मजदूर लोग तक उनको प्यार करते हैं?’
मजदूर ने कहा-‘आप मुझे कुछ पैसा दें तो चलने को तैयार हूं। मेरी हाजिरी का नुक्सान होगा? उसकी भरपाई कौन करेगा? वह और आप तो बड़े आदमी है अपना काम निकालकर चले जायेंगे पर मेरा पेट कैसे भरेगा?
बुद्धिजीवी ने कहा-धत तेरे की! तुम गरीब और मजदूर इसलिये ही तरक्की नहीं कर पाते क्योंकि जो तुम्हारे लिये लड़ता है उसका साथ नहीं देते। बस हमेशा पैसे और रोटी की बात करते हो।’
मजदूर ने कहा-‘अगर आप मुझे सौ रुपये दें तो चलने को तैयार हूं।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘फिर तुम्हें क्यों ले चलूं, मैं किसी एक्टर को नहीं ले आऊंगा। वह एक्टर मेकअप करके आयेगा और आधुनिक मजदूर की तरह लगेगा तो मेरे लेख के साथ लगे फोटो में रौनक भी आयेगी।’
बुद्धिजीवी वहां से चला गया और मजदूर अपने काम में लग गया। थोड़ी देर बाद वह बुद्धिजीवी उसी मजदूर के पास अपने साथ एक एक्टर को ले आया जो पेंट शर्ट पहने हुए था। उसने मजदूर से कहा-‘देखो कितना बढि़या एक्टर लाया हूं। इसका फोटो देखकर सभी सोचेंगे कि देखो मजदूर भी इस देश में कितने खुशहाल हैं। लाओ अपना तस्सल और फावड़ा दे दो तो वह इसके हाथ में रखकर फोटो खिंचवाना है।’
मजदूर ने पास खड़े ठेकेदार की तरफ इशारा किया और कहा-‘साहब, यह भी किराये से आते हैं। आप हमारे ठेकेदार साहब से बात कर लो।’

तब ठेकेदार भी उनके पास आया। वह बुद्धिजीवी से परिचित था। बुद्धिजीवी ने उससे कहा-‘यह कैसे मजदूर तुम अपने पास रखते हो। वहां फोटो खिंचवाने भी नहीं चल सकते और न अपना यह सामान थोड़ी देर के लिये दे सकते हैं। पैसा मांगते हैं।’
ठेकेदार ने हंसकर कहा-‘आप भी तो नहीं सोचते। जिस काम के लिये एक्टर हों उसके लिये असली मजदूर की क्या जरूरत है? रहा सामान का सवाल तो आप फावड़ा तस्सल ले जाईये, तब इसने जो मिट्टी निकाली है उसे दूसरे तस्सल से उठाकर फैंकता रहेगा।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘भई, वाह आप जैसा आदमी होना चाहिये जो समाज सेवा करे।’
ठेकेदार ने हंसकर कहा-‘नही! ऐसी बात नहीं है। उद्धारक साहब के लिये भीड़ जुटाने का ठेका भी मैंने लिया है। वहां ऐसे मजदूर भेजे हैं जिनके लिये आज मेरे पास काम नहीं है। हां, आपने अच्छा याद दिलाया। अब उन लोगों को तस्सल, फावड़ा,गैंती और दूसरे साजोसामान के साथ ही भेजूंगा। उसके लिये कुछ किराया जरूर अधिक लूंगा पर आयोजक तैयार हो जायेंगे।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘हां, फिर हमें किसी ऐसे मजदूर के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है। हालांकि मैं भी अब सोच रहा हूं कि अपने साथ ऐसे कार्यक्रमों के लिये एक्टर भी जरूरी है जो मजदूरों की भीड़ में चमकदार लगे। जब सभी काम एक्टिंग से हो सकता है तो फिर असली की क्या जरूरत है?’
एक्टर, बुद्धिजीवी और ठेकेदार वहां से चले गये। मजदूर अपने होठों से बुदबुदाया-दूसरा तस्सल’।
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