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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

10/18/2009

तांडव नृत्य-व्यंग्य कविता (tandav dance-vyangya kavita)

तैश में आकर तांडव नृत्य मत करना
चक्षु होते हुए भी दृष्टिहीन
जीभ होते हुए भी गूंगे
कान होते हुए भी बहरे
यह लोग
इशारे से तुम्हें उकसा रहे रहे हैं।
जब तुम खो बैठोगे अपने होश,
तब यह वातानुकूलित कमरों में बैठकर
तमाशाबीन बन जायेंगे
तुम्हें एक पुतले की तरह
अपने जाल में फंसा रहे हैं।

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कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर
http://dpkraj.blogspot.com
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1 टिप्पणी:

Suman ने कहा…

तुम्हें एक पुतले की तरह
अपने जाल में फंसा रहे हैं। nice

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