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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

1/04/2008

देशी गुरु और अंग्रेजी शिष्य

एक अंग्रेज ने हिन्दी भाषा और संस्कार सीखने के अपना एक गुरु बनाया जब वह हिन्दी सीख चुका तो गुरु ने उससे कहा की अब तुम जाकर व्यवहारिक अनुभव प्राप्त करो। भारत के टीवी चैनल पर सामाजिक कार्यक्रमों को देखो और इससे तुम्हारी हिन्दी और संस्कार दोनों में ही बहुत अनुभव प्राप्त होगा।

अंग्रेज शिष्य चला गया और फिर कुछ दिन बाद लौट आया और बोला-''गुरुजी, मैने भारत के सारे हिन्दी चैनल देखे पर उसमें जो सामाजिक सीरियल हैं वह तो हारर शो अधिक लगते हैं और उनमें हिन्दी कम और अंग्रेजी अधिक होती है। वहाँ तो ऐसा लगता है की हम अंग्रेजों को दिखाने के लिए सीरियल बनाते हैं। उनको देखकर जितनी हिन्दी और वहाँ के संस्कार जितना सीखा हूँ वह और भूल जाऊंगा।''
गुरूजी ने कहा-''अच्छा कुछ हिन्दी फिल्मों को देखो, उससे तुम्हें लाभ होगा।
शिष्य उनसे आज्ञा लेकर चला गया और फिर कुछ दिन बाद लौटा और बोला-''गुरूजी, उसमें तो हमारी फिल्मों की कहानी की नक़ल होती है और हिन्दी भी वैसी नहीं है जैसी आपने सिखाई है।गांधी के सन्देश को गांधीगिरी कहते है और मुझे मजाक लगता है।''

गुरूजी ने कहा-"अच्छा तुम वहाँ के अखबार और पत्रिकाएँ पढा करो। उसमें तुम्हें कुछ ज्ञान और अनुभव जरूर प्राप्त होगा।

शिष्य वहाँ से चला गया-''उनमें तो केवल मारपीट की खबरें और जो वहाँ से हमारे देश में आकर जो व्यापार करते हैं उन लोगों की तारीफों की खबरें ही छपतीं हैं। उससे क्या सीख पाऊंगा? ''
गुरूजी ने कहा-''तुम नये ज़माने के हो और कंप्यूटर भी जानते हो, इसलिए अंतर्जाल पर हिन्दी के ब्लोगरों को पढो।''

इस बार तो शिष्य उसी दिन लौट आया और बोला-''एक तो यह उन्होने कई वर्ग बना रखे हैं समझ में नहीं आ रहा किसको पढूं, और एक जगह तो मैंने शीर्षक में ही गाली देखी तो में लौट आया।''
गुरूजी ने अपना माथा पीट लिया और कहा-''मेरे ख्याल से तो हिन्दी तो तुम्हारी अब वैसे ही बहुत अच्छी हो गयी है क्योंकि तुम्हें पता लग गया है कि हिन्दी में भारत के ही लोग कहाँ गलती कर रहे हैं और संस्कार भी तुम्हारे अन्दर वैसे ही अच्छे है क्योंकि तुम्हें वह लोग पसंद नहीं आ रहे जो तुम्हारे समाज के पदचिन्हों पर चल रहे हैं। इसलिए अब तुम्हें अब और कुछ सीखने की जरूरत नहीं है।''

शिष्य चला गया तो गुरूजी आकाश की तरफ देखकर बोले-''अच्छा ही हुआ, यह बहुत कुछ मुझे सीखा गया वरना में अपने देश के लोगों के बारे में ग़लतफ़हमी पालकर अपने शिष्यों को भटकाता रहता।

नोट-यह एक काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है.

2 टिप्‍पणियां:

शास्त्री जे सी फिलिप् ने कहा…

व्यंग काल्पनिक है लेकिन उसकी सीख वास्तविक है. सचमुच में हम सब अकसर इन बातों पर सर पीटते है.

आजकत तुम्हारी कलम बडी सशक्त है दीपक. लिखते रहो!!

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सही बात है ।
घुघूती बासूती

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