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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

12/11/2007

सबका दुख दर्द है एक जैसा

जब लगे हम लोगों में उपेक्षित हो रहे हैं
भीड़ में घिरे होकर भी
अकेले हो रहे हैं
तब समझ लो मन में ही
कई जगह है अपने ही भारीपन
जिसका बोझ हम ढो रहे हैं
भला कौन यहाँ किसकी परवाह करता है
सामने करें कोई तारीफ
पीठ फेरते ही वह जहर भी उगलता है
इस दुनिया में सबके साथ होते हादसे
जिसके साथ हो वही अपने साथ ही हुआ
समझता है
इसलिए सब भीड़ में अकेले हो रहे हैं
कौन किसको सम्मान देता है
बिना मतलब कौन किसको दान देता है
सब अपने आप में खो रहे हैं
सबका दर्द और दुख एक जैसा होता है
यह भ्रम है कि हम ही उसे ढो रहे हैं

4 टिप्‍पणियां:

मीनाक्षी ने कहा…

बहुत सहज रूप में कितना जटिल रूप वाला सत्य कह दिया.... कड़वा सत्य

Mired Mirage ने कहा…

बढ़िया दर्शन से भरी कविता । हाँ, जीवने में ऐसा ही होता है ।
घुघूती बासूती

mamta ने कहा…

सबका दर्द और दुख एक जैसा होता है
यह भ्रम है कि हम ही उसे ढो रहे हैं

सजीव चित्रण।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

कडुआ सच कहती कविता है आप की. एक एक शब्द बिल्कुल सच्चा और धारधार. बधाई
नीरज

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