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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

6/17/2007

मुख, मुखौटा और सिंहासन


मुखों की बैठक में सिंहासन पर
मुखोटा रखने का मसला उठा था
सबके चेहरे थे दागदार
चुनाव के जुए में
लोगों को भरमाने के लिए
सुन्दर चेहरा जरूरी था
नकली मुखौटे सिंहासन नहीं चला सकते
इसीलिये असली चलते-फिरते आदमी जैसा
मुखौटा ढूँढने का प्रश्न उठा था
सब बडे-बडे मुख भले लग रहे थे
उन पर तस्करी, अपहरण ,ह्त्या
और अवैध कब्जे के दाग लगे थे
पहने थे वह नकाब
पर चोर और जेबकतरों का मुँह खुला था
बैठक बहुत लंबी चली
आदमी जैसा मुखौटा कहॉ मिले
प्रश्न वहीं का वहीं था
जेब कतरे ने कहा
जल्दी करो फैसला
मुझे धंधे पर जाना है
नहीं मिलता आदमी जैसा तो
किसी आदमी को ही मुखौटा बना लो
उसकी बात पर बैठक में
माहौल खुशगवार हो चला था
माफिया मुख ने कहा
सदियों से यही होता आ रहा है
मुख आपस में लड़ने की बजाय
सिंहासन पर मुखौटा सजाते हैं
राजनीती की सारी प्रणाली एक तरफ
राज तो हम चलाते हैं
कौनसा देश हैं जहां
हम जैसे मुखौटे नज़र नहीं आते हैं
उसकी बात का समर्थन किया सभी ने
प्रस्ताव पास हो चला था

1 टिप्पणी:

अफ़लातून ने कहा…

बहुत खूब ! साधुवाद , धारदार कविता पेश करने के लिए ।

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