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6/30/2013

वृंदावन के प्रेम मंदिर और आगरा के ताजमहल की तुलना की जा सकती है-विशिष्ट रविवारीय हिन्दी लेख (prem mandir vrindavan aur agra ke tajmahal ki tulna-special sandey article)

प्रेम मंदिर   वृन्दावन के  बाहर  का दृश्य


      हिन्दू धर्म का मुख्य आधार उसका अध्यात्मिक दर्शन है पर कर्मकांडों ने इस तरह समाज को जकड़ रखा है कि कथित पेशेवर धार्मिक कथाकार प्रारंभ में  तो बात अध्यात्मिक ज्ञान की करते हैं पर धीरे धीरे अपने लिये दान दक्षिणा जुटाने के लिये  कर्मकांडों का निर्वाह कर स्वर्ग दिलाने का सपना बेचने लगते हैं। इतना ही नहीं आदमी को यह आश्वासन बेचते हैं कि इन कर्मकांडों के निर्वाह करने पर न केवल स्वयं उसे बल्कि उसकी पिछली सात पीढ़ियों के साथ आगे की भी सात पीढ़ियां स्वर्ग में अपना निवास सुरक्षित कर लेंगी।  वह वहां बैठा अपनी आगे पीछे की पीढ़ियों के साथ आनंद लेगा।  इस घालमेल से भारतीय समाज में अंधविश्वासों का प्रचार हुआ है जिसके  कारण अनेक अध्यात्मिक ज्ञान साधक अब धर्म तथा अध्यात्मिक दर्शन को प्रथक प्रथक मानने लगे हैं।  यह अलग से बहस का विषय है पर इतना तय है कि भारत में धर्म के नाम पर अनेक पेशेवर व्यक्ति संगठित रूप से हमेशा सक्रिय रहे हैं और कहीं न कहीं बाज़ार के सौदागर तथा प्रचार प्रबंधक किसी न किसी रूप में उनके सहायक बने हैं।  आमतौर से हिन्दू धर्म या सनातन धर्म का इतिहास हम अगर देखें तो वह ब्रह्मा, शिव, और विष्णु की कथाओं पर ही आधारित है।  इनमें भगवान विष्णु के चौदह अवतारों की कथा भी आती है और माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा अध्यात्मिक ज्ञान, शिव शक्ति तथा विष्णु कर्म के प्रतीक हैं। विष्णु के साथ लक्ष्मी का साथ है इसलिये उनको पालनहार भी माना जाता है।  देखा जाये तो भगवान विष्णु सांसरिक सक्रियता के प्रेरक हैं।  उन्हीं के निरंतर अवतारों की कथायें इस बात का प्रमाण भी है कि धार्मिक रूप से सनातन धर्म में जड़ता की स्थिति नहीं रही। नये अवतारों के साथ समाज में नयापान आता रहा है।  ब्रह्मा और शिव ज्ञान तथा शक्ति के प्रेरक हैं पर संसार में सक्रियता बनाये रखने के लिये विष्णु भगवान एक आदर्श हैं।
वृन्दावन के प्रेम मंदिर का अंदर से बाहर का लिया गया दृश्य
              भगवान विष्णु के अवतारों में राम और कृष्ण सर्वाधिक चर्चित हैं।  इसका कारण यह है कि इनका जीवन जन्म से लेकर परमधाम गमन तक मिलता है।  इनकी लीलायें मनुष्य रूप में वर्णित है इसलिये ही भारतीय धर्मभीरु लोग इनको अपने निकट अधिक मानते हैं।  पौराणिक कथाओं के अनुसार कलियुग मेें कल्कि अवतार होना है। इसकी प्रतीक्षा लोग कर रहे हैं। हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि हिन्दू या सनातन धर्मी लोग समय के अनुसार अपने धर्म के नये रूप की कामना भी रखते हैं।  वह एक जगह रुकते नहीं। इसका पेशेवर लोग लाभ उठाते हैं पर जिनके मन में भक्ति भाव है वह इसकी परवाह भी नहीं करते।  कृष्ण और कल्कि अवतार के बीच के इस दौर में भी अनेक भगवान अवतार बताकर प्रस्तुत किये गये हैं पर उसका विरोध किसी ने नहीं किया।  इतना ही नहीं इसी दौर में माता के विभिन्न स्वरूपों की पूजा भी प्रारंभ हो गयी पर किसी ने उसे अस्वीकार नहीं किया।  अनेक कथित संत भी भगवान के अवतार बताये गये पर किसी ने उसके प्रतिकार का प्रयास नहीं किया।  सामाजिक रूप से जितना हम भारतीय बहिर्मुखी है उतना ही धर्म के विषय में  अंतर्मुखी है।  हर कोई अपने धर्म को अपने अंतर्मन से निभाता है।  भले ही भारतीय समाज में अनेक पंथ या संपद्राय  है पर मूल रूप से पौराणिक आधारों से प्रथक कोई  नहीं हैं। संभव है कि किसी संप्रदाय विशेष के अनेक शिष्य हों पर उनकी मान्यतायें अंतमुर्खी रहती हैं।
   अनेक कथित विद्वान लोग भारतीय समाज  में एक इष्ट, एक पूजा पद्धति और एक ही मान्यता प्राप्त स्थान न होने को दोष मानते हैं। उनको लगता है कि अन्य धर्मों में इस विषय में एक रूपता है इसलिये उनसे हिन्दू धर्म प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाता।  जिनके अंदर हिन्दूओं को संगठित रखने की इच्छा है उन्हें यह सबसे बड़ा दोष लगता है पर सच यह है कि यह समय के अनुसार निरंकार परमात्मा के साकार रूप में बदलाव वाली यह  प्रगतिशीलता है जिससे भारतीय अध्यात्म पूरे विश्व में जाना जाता हैं। दूसरी बात यह है कि अपने समाज के संगठित रखने में अध्यात्मिक ज्ञानियों ने अपनी भूमिका निभाई है। भक्तिकाल में जब राजनीति में मुगलकाल चल रहा था तब कबीर, तुलसी, रहीम और मीरा जैसे संत कवियों ने समाज को इसी अध्यात्मिक ज्ञान के बल पर मार्गदर्शन कर जीवंत बनाये रखा। इस तर्क को सभी मानते भी हैं।
प्रेम मंदिर   वृन्दावन का रात्रिकालीन दृश्य
     इस विषय पर विचार करते हुए हम भारत के हरिद्वार, मथुरा और वृंदावन तीर्थों पर बढ़ती भीड़ पर विचार करें तो यह बात समझ में आती है कि वहां पुराने मंदिरों के साथ ही नये मंदिरों का निर्माण भी हुआ है।  इसके अलावा भी बहुत सारे शहर हैं जहां पुराने मंदिर हैं और लोग वहां जाते हैं पर इन तीनों स्थानों का महत्व कहीं उनसे अधिक है।  इन तीनों जगहों पर धार्मिकता के साथ व्यवसायिकता का जोरदार मेल हुआ है।  चूंकि हरिद्वार में हर की पैड़ी एक ऐसा स्थान है जिसका महत्व अधिक है इसलिये वहां भीड़ अधिक जाती है पर उसके अलावा वहां तमाम विशाल मंदिर भी बने हैं जो श्रद्धालुओं के आकर्षण में निरंतरता बनाये हुए हैं। मथुरा में भी कृष्ण जन्मभूमि में बहुत नवीनता लायी गयी है।  वृंदावन में सर्वाधिक महत्व का मंदिर निधिवन है पर बांकबिहारी मंदिर में भीड़ अधिक जाती रही है।  बाद में इस्कॉन ने अपना मंदिर बनाया। उस पर भी भारी भीड़ हुई। उसके बाद इस्कॉन ने ही वहां अक्षयपात्र मंदिर बनाया। इसी बीच कृपालु महाराज का प्रेम मंदिर भी बना है।  इस तरह वृंदावन अपने अंदर धर्म के प्रति निरंतरता का भाव बनाये हुए हैं।  सच बात तो यह है कि वृंदावन में अनेक पुराने मंदिर हैं जिन्होंने एक समय श्रद्धालुओं को आकर्षित किया होगा पर अब यह नये मंदिर उनकी जगह ले चुके हैं।  वर्तमान समय में भीड़ इन्हीं नवीन स्थानों का रुख किये हुए हैं।  हम तो यह मानते हैं कि हम भारतीयों के अंदर अध्यात्म के बीज इस कदर बोये जाते हैं कि हम मनोंरजन में भी उसका तत्व देखना चाहते हैं।  यही कारण है कि समय के साथ धार्मिक पेशेवर लोग अपने स्थानों का रूप भी बदलते हैं।  मुख्य बात  यह है कि जीवन में जीवंतता बनी रहे इस बात तो भारतीय मानते हैं। 
         अपनी  यात्रा में हमने कृपालु महाराज का मंदिर देखा। यह मंदिर हमने बनते हुए दस सालों से देखा है।  जब बन रहा था तब हमें लगा कि वह ताजमहल की चमक फीकी कर देगा। हमने देखा कि भारतीय समाज को विखंडित कर नये आधुनिक रूप में लाने  के नाम पर ताजमहल, कुतुबमीनार और तथा मुगलकालीन स्थापत्यकला वाल स्थानों को पर्यटन स्थल के रूप में प्रचारित किया गया।  ताजमहल को ऐसे प्रेम का प्रतीक माना गया जो दैहिक संबंधों पर आधारित है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि ताजमहल और कुतुबमीनार स्थापत्यकला का एक जोरदार नमूना है पर इसमें कहीं भारतीय अध्यात्म की सुंगंध नहीं है यही कारण है कि यहां भारतीयों की कम विदेशी लोगों की भीड़ अधिक रहती है।  हमने ताजमहल को जब भी देखा कभी उससे आनंद नहंी आया। सच तो यह है कि अध्यात्मिक रूप से जिन लोगों में चेतना है उनको ताजमहल कोई आनंद दे भी नहीं सकता। फिर कथित रूप से कब्रें हैं जो कि हमारी दृष्टि से अजीब बात है। मूलत कब्रें और मूर्तियां पत्थर से बनती हैं कब्रें कहीं न कहीं मृत्यु का आभास दिलाती हैं और मूर्तिंया जीवंत भाव के प्रति विश्वास बनाये रखती हैं।  एक अध्यात्मिक साधक के नाते हमारा मानना है कि मुत्यु शाश्वत सत्य है उसकी क्या परवाह करना, जब तक देह है तब तक जींवतता की अनुभूति रखना ही तत्वज्ञान का मूल है। यही वजह है कि हम जब कृपालु महाराज के प्रेम मंदिर में विचर रहे थे तब इस बात का अनुभव हुआ कि यकीनन वह ताजमहल से अधिक आकर्षण का केंद्र  होगा।  ऐसा लगता है कि वह पूरा संगमरमर का बना हुआ हैं। चारों तरफ बढ़िया मूर्तियां हैं। चारों तरफ हरभरा उद्यान है।  वहां खड़े होकर ताजमहल और प्रेम मंदिर की अनुभूतियों का हृदय में मेल कर देख रहे थे। पानी के फव्वारे पर ही आरती के दौरान अनेक आकृतियां उभरकर आ रही थीं।  रात्रि में प्रेम मंदिर पर पड़ रही रौशनी बार बार रंग बदल रही थी। पर्यटन के साथ सहज अध्यात्म भाव  की अनुभूति हो रही थी। जहां तक ताजमहल और प्रेम मंदिर की आपसी तुलना का प्रश्न है तो इसका कारण यह है कि दोनों ही संगमरमर से बने हैं और कहीं न कहीं प्रेम शब्द उनकी पहचान है।  यह अलग बात है कि ताजमहल से नश्वर प्रेम जुड़ा है और प्रेम मंदिर से शाश्वत!
            हम यहां एक बात बता दें कि कौनसा मंदिर किसने बनवाय इस पर विचार करना ठीक नहीं है।  अगर किसी मंदिर पर यह प्रश्न उठायेंगे तो फिर प्राचीन स्थानों के निर्माण पर भी विवाद उठेंगे।  मूल प्रश्न यह है कि इन स्थानों पर आनंद कितना आता है?  ताजमहल में जाकर ऐसा लगता है कि मन ठहर गया है जबकि प्रेंम मंदिर में हर पल मन संचालित होता है।  शुरुआत में यह विचार था कि वृंदावन के बाद आगरा भी ताजमहल देखने जायेंगे पर जब प्रेम मंदिर में अपने अंतर्मन का अध्ययन किया तो पाया कि वह पर्यटन से तृप्त हो गया था।  ऐसे में दोनों की तुलना करना स्वाभाविक था।  अध्यात्मिक साधक और लेखक होने के नाते ऐसा कुछ लिखना हमारी रुचि है जो दूसरे लिखने की सोच भी नहीं पाते। शुक्रवार को वृंदावन से लौटे तो लगा कि इस रविवार को कुछ खास लिखा जाये। प्रेम मंदिर में जो आनंद आया था इसलिये उस पर लिखने का मन था पर जब अध्यात्मिक विषय पर लिखने बैठें तो पता नहीं क्या से क्या लिख जाते हैं। एक बात तय रही कि प्र्रेम मंदिर में  यकीनन ताज महल से अधिक भीड़ हमेशा रहेगी। इसका कारण यह कि उसमें पर्यटन के साथ अध्यात्मिक आनंद भी मिल सकता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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11/28/2012

गुरु नानक देव के जन्म दिन प्रकाश पर्व पर विशेष हिन्दी लेख-गुरुग्रंथ साहिब भारतीय समाज में गुरु की तरह ही प्रतिष्ठित (Guru nanak dev ke janma din prakash parva par vishesh hindi lekh-guru granth sahib bhartiya samaj mein guru ki tarah pratishthat)

                         आज पूरे देश में गुरुनानक जयंती मनाई जा रही है।  नवीन पीढ़ी के लोग यह समझते हैं कि यह केवल सिख धर्म के लिये पवित्र दिन है।  इसका कारण यह है कि आधुनिक शिक्षा में अंग्रेजी पद्धति से नौकरी प्राप्त करने के लिये दी जा रही शिक्षा में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बच्चों को अध्यात्मिक ग्रंथों तथा धर्म की रूपरेखा से दूर रखा जा रहा है।  आमतौर से गुरुनानक जयंती का पर्व मनाया भी गुरुद्वारों में जाता है और इससे नयी पीढ़ी में सिख धर्म को हिन्दू धर्म से प्रथक कोई अन्य धर्म होने का विचार  पुष्ट होता है।  बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि गुरुनानक जी के तत्कालीन हालतों सभी समाजों में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों तथा पाखंड को दूर करने के लिये ही अपना पूरा जीवन अर्पित किया। इतना ही नहीं उनकी वाणी से निकले संदेशों में कहीं न कहीं उन प्राचीन ग्रंथों के आधार तत्व मौजूद हैं जिनको आज केवल हिन्दू धर्म की संपत्ति माना जाता है।  कुछ अध्यात्मिक ज्ञानी तो श्रीमद्भागवत गीता के समक्ष गुरुग्रंथ साहिब को रखते हैं इसकी जानकारी वर्तमान पीढ़ी के लोगों को शायद ही हो।  निष्काम कर्म, निष्प्रयोजन दया और हृदय से परमात्मा की भक्ति का जो संदेश गुरुनानक जी ने नवीन संदर्भों में दिया वह श्रीमद्भागवत गीता के आधार से मेल खाता है।
          उनका दैहिक जीवन मध्यकाल में समय का  है जब भारत में धार्मिक, सामाजिक तथा संस्कृति संघर्षों की शुरुआत हो गयी थी। पहले से ही जातीय समुदायों में बंटा समाज धार्मिक विभाजनों की तरफ बढ़ रहा था।  यही कारण है कि भगवान गुरुनानक देव जी ने उसमें अधंविश्वासों और रूढ़ियों के विरुद्ध अभियान छेड़ा।  उनका यह प्रयास सामयिक था और देखा  जाये तो उनकी कोशिश रंग लाई। आज हम अपने जिस प्राचीन  अध्यात्मिक ज्ञान को जीवंत अवस्था में देख रहे हैं यह उनकी कर्म कृपा का ही परिणाम है।  इतना ही नहीं अध्यात्मिक ज्ञानी सिद्ध और साधक गुरुनानक जी के नाम को   हिन्दू और सिख धर्म में नहीं बांटते और गुरुद्वारों में  सभी समुदायों के लोग इस प्रकाश पर्व पर  अपनी श्रद्धा व्यक्त करने जाते हैं।  श्रीगुरुनानक जी निष्काम और निरंकार भक्ति के प्रवर्तक थे और प्राचीन भारतीय अध्यात्मिक दर्शन इस प्रणाली को सर्वश्रेष्ठ मानता है।
         सिख पंथ में गुरुनानक देव के बाद भी नौ गुरु हुए। इन सभी गुरुओं ने मुख्य रूप से तत्कालीन धार्मिक कुरीतियों और  अंधविश्वासों को दूर करने के लिये काम जारी रखा।  दसवें तथा अंतिम गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने देह त्याग के पूर्व ही यह स्पष्ट आदेश दिया कि ‘‘अब पंथ का प्रदर्शक गुरु ग्रंथ साहिब होगा।
            अंगिआ भई अकाल की, तभी चलाइओ पंथ।
            सब सिखन को हुकम है, गुरु मानिओ ग्रंथ।।
            गुरु ग्रंथ जी मानिओ, प्रगट गुरां की देह।
            जो प्रभि कउ मिलबो चहै, खोज शबद में लेह।।
       हमारे भारतीय समाजों में गुरु शिष्य की परंपरा का हमेशा दुरुपयोग होते देखा गया है।  कहा जाता है कि गुरु से शिक्षा प्राप्त कर फिर शिष्य को उसका सानिध्य त्यागना चाहिए।  मगर ऐसा होते देखा नहीं जाता।  एक बार किसी ने कोई गुरु बना लिया तो वह बस पूरा शिष्य समुदाय उसके आश्रम के चक्कर काटता रहता है। अनेक गुरु तो स्वयं के  जन्म दिन के साथ ही  गुरुओं के जन्म और मरण दिवस पर अपने शिष्यों से गुरुदक्षिणा लेते रहते हैं।  सिख गुरुओं ने इसका  हमेशा ध्यान रखा।  यही कारण है कि अंतिम गुरु गुरु गोविंद सिंह ने इस दैहिक गुरु परंपरा को खत्म करते हुए गुरुग्रंथ साहिब को ही अपना गुरु मानने का उपदेश दिया।   गुरुनानक जी एकदम अध्यात्मिक तत्वज्ञानी थे। उन्होंने अपने बाद अपने शिष्यों और समाज की देखभाल के लिये गुरु अंगददेव को उत्तराधिकारी बनाया। गुरुनानक देव जी के दो पुत्र थे पर उन्होंने निष्पक्ष तथा निष्काम भाव में  रहते हुए पंथ के भविष्य के लिये जिस तरह अपने प्रिय शिष्य लहणाजी को गुरु अंगददेव का नाम देकर दायित्व सौंपा उससे उन्होंने रक्त संबंधों के आधार पर स्वाभाविक योग्यता के भ्रमित सिद्धांत को खंडित ही किया।  वंशवाद के इस सिद्धांत को तिलांजलि देकर उन्होंने साबित किया कि जो व्यक्ति समाज के हित में सोचता है उसे अपने वैयक्तिक पूर्वाग्रह छोड़ देना चाहिए।      
           गुरुनानकजी उन लोगों के लिये एक आदर्श महापुरुष है जो लोग अध्यात्मिक ज्ञान में रुचि रखते हैं।   उनके बाद हुए सभी गुरु भी समाज का मार्गदर्शन जिस तरह करते रहे उससे यह साबित होता है कि गुरुनानक देव जी एक महान आत्मा थे। इसलिये उनके लगाये पेड़  पर वैसे ही पवित्र फल उगते रहे।  हालांकि अब कुछ लोग अपने स्वार्थों की वजह से सिख और हिन्दू धर्म को प्रथक प्रथम बताते हैं पर सच यह है कि गुरुग्रंथ साहिब में प्राचीन भारतीय अध्यात्म दर्शन को नवीन रूप प्रदान करने वाली सामग्री संग्रहित।  नये विषयों में नये संदर्भों में उस अध्यात्मिक ज्ञान की व्याख्या की गयी है। अगर कोई प्राचीन  भारतीय अध्यात्म ग्रंथ न पढ़कर केवल गुरुग्रंथ साहिब का श्रद्धा से अध्ययन करने तो उसे वह तत्वज्ञान प्राप्त कर इस लोक में सहज जीवन व्यतीत कर सकता है।
         गुरुनानक देव जन्म दिन पर हम अपने सभी पाठकों और ब्लाग लेखक को बधाई देते हैं।  हमें विश्वास है कि अगर सभी लोग भारत के महान अध्यात्मिक पुरुष गुरुनानक जी का जीवन चरित्र उनके लिये प्रेरणादायी होगा।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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4/14/2012

गुनाह और जुबान-हिन्दी शायरी (gunah aur zubaan-hindi shayari or kavita)

अपने दिल के हाथ
हम क्यों इतना मजबूर हो जाते हैं
गुनाह हमने जो किये नहीं
उनका हिसाब देते हैं जमाने को
कसूरवारों के शोर के आगे
अपनी गर्दन क्यों झुकाते हैं।
कहें दीपक बापू
नकारा लोग
करते हैं अपनी कामयाबी का बयान
ऊंची आवाज में
हम क्यों उसमें बहक जाते हैं,
सच समझने की तमीज नहीं जमाने को
हम अपनी सफाई के बयान में
क्यों अपनी जुबां थकाये जाते हैं।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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