समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

9/26/2011

मौके का इंतजार-हिन्दी शायरी (mauke ka intazar-hindi shayari or hindi kavita)

दर्द के पल गुजर गये,
गम के बादलों ने भी
बरसना छोड़ दिया
तब लबों पर हंसी आ ही गयी।
जिंदगी का फलसफा
जो समझे हम
इसलिये कभी बुरे हालातों पर रोये नहीं
जोर से हंसने के मौके भी नहीं गवांये
जब खुशी घर में आ ही गयी।
---------
कभी करना पड़ता है
मौके का इंतजार
कभी जिंदगी में जीत के मौके
सामने भी आ ही जाते हैं,
काबिल इंसान खुद बने या किस्मत बनाये
मगर मौके ही जिंदगी को बदल जाते हैं।
-----------
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

9/13/2011

हिन्दी दिवस पर विशेष लेख-आम पाठकों का लेखकों से संवाद बनना जरूरी (hindi divas or diwas par lekh-aam pathak aur lekhak mein sanwad avashyak)

          हिन्दी दिवस पर हम बहुत लिख चुके पर लगता है कि फिर भी कुछ छूट रहा है। आज हमारे बीस ब्लाग का समूह अनुमान के अनुसार एक दिन आठ हजार पाठक/पाठक संख्या को पार कर गया। जिस गति से यह चल रहा है नौ हजार तक पहुंचने की भी संभावना लगती है। यकीनन यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। करीब करीब सभी ब्लाग अपने पुराने कीर्तिमानों से बहुत आगे निकल रहे हैं। सच कहें तो हिन्दी के साथ कोई भी शब्द जोड़कर इंटरनेट पर मातृभाषा में पढ़ने वाले आज के लोग हमसे अधिक भाग्यशाली हैं कि उन्हें कुछ पढ़ने को मिल जाता है। हम हिन्दी ब्लाग लेखक मिलों और पाठकों से कुछ कहना चाहते हैं पर क्या? लिखते लिखते कुछ भी लिख जायेंगे। यकीन मानिए वह निरर्थक नहीं होगा। आज मौका अच्छा लगता है क्योंकि हिन्दी दिवस कोई रोज रोज थोड़े ही आता है। कल से संख्या फिर सिमटने लगेगी।
         इंटरनेट खोलने पर पांच साल पहले हमें निराशा हाथ लगती थी। कुछ लिखा नहीं मिलता था। ब्लाग मिला तो लिखना इसलिये नहीं शुरु किया कि किसी को पढ़ाना है बल्कि आत्म संतुष्टि का भाव था। स्वतंत्र रूप से लिखने का भाव! यह अलग बात है कि प्रायोजित हिन्दी बाज़ार हम जैसे इंटरनेट लेखकों को प्रयोक्ता मानता है। यह हम अपने पाठकों को बता दें कि आतंकवाद को एक व्यापार मानने का सिद्धांत इसी ब्लाग समूह पर दिया गया। यह भी माना गया है कि भारत में हो या भारत से बाहर विश्व का आतंकवाद बाज़ार समूहों के धन से प्रायोजित हो सकता है जो अपनी अवैध गतिविधियों से जनता और राज्य का ध्यान बंटाने के लिये करते हैं। देश में गरीबी और भ्रष्टाचार है यह सच है! जनता में आक्रोश है यह भी छिपा हुआ नहीं है, मगर गोलियां और बम खरीदने की क्षमता हमारे आम लोगों में नहीं है। भूखे बंदूक उठायेंगे यह सिद्धांत हमेशा धोखा लगता रहा है। अब छत्तीसगढ़ में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के नक्सलियों को आर्थिक मदद देने के आरोप लगने से यह प्रमाणित हो गया है। इस पर अनेक बहसें इंटरनेट पर हुईं। जब हमने आतंकवादियों के आर्थिक स्तोत्रों के बारे में प्रश्न उठाया तो कोई जवाब नहीं दे सका। अनेक सुधि टिप्पणीकारों ने इसका समर्थन कर अनेक उदाहरण भी दिये कि किस तरह जिस क्षेत्र में आतंकवाद है वही अवैध काम भी अधिक होते है।
         हम यहां स्पष्ट रूप से कहना चाहते हैं कि आप देश के जिन भी अंग्रेजी और हिन्दी के नामी लेखकों, बुद्धिजीवियों के साथ बहसकर्ताओं को टीवी या समाचार पत्रों में देखते सुनते हैं वह कहीं न कहंी इंटरनेट लेखकों की नयी धारा से प्रभावित होकर अपना नाम कर रहे हैं। वह हमारा नाम नहीं देते। गांधी जी को नोबल न मिलने का मामला हो या ओबामा को नोबल मिलने वाला मजाक या आतंकवाद को व्यापार मानने का सिद्धांत हो, इन विषयों पर इस लेखक के पाठ और विचार प्रचार माध्यमों में दिखाई दे रहे हैं। क्रिकेट को खेल की बजाय व्यापार मानने की बात अब अनेक लोग स्वीकारने लगे हैं। हम यहां साफ बता दें कि आप अगर नये विचार और नया चिंत्तन पढ़ना चाहते हैं तो इस समूह का कोई ब्लाग अपने यहां ईमेल का पता दर्ज कर मंगा लें। अन्ना हज़ारे का आंदोलन हो या बाबा रामदेव का अभियान, इन पर हमारी राय आम धारा से मेल नहीं खाती। कुछ पाठक नाराज होते हैं पर कुछ सराहते हैं। सच बात तो यह है कि हम दबी जुबान में लिखते हैं क्योंकि यहां आम पाठकों से कोई समर्थन नहीं है। अगर पाठकों से प्रोत्साहन हो तो शायद हम किसी की परवाह नहीं करें। अगर हमारे किसी ब्लाग के दस हजार पाठक प्रतिदिन हो जायें तो हम ऐसा लिखें कि देश के नामीगिरामी बाज़ार से प्रायोजित बुद्धिजीवी दांतों तले उंगलियां दबा लें। अधिक पाठक होने पर ं वह हमारे पाठ और विचार अपने नाम करने के प्रयास भी नहीं करेंगे।
     दूसरी बात यह है कि आम पाठक एक बात ध्यान रखें कि इंटरनेट पर ब्लाग लिखने वाले हम जैसे स्वतंत्र लेखकों को एक भी पैसा नहीं मिलता। बल्कि साढ़े छह सौ जेब से जाते हैं। स्वयंभू लेखक और संपादक है जिसके पास इस रूप में एक पैसा भी नहीं आता। ऐसे में पाठकों को अधिक से अधिक टिप्पणियां करना चाहिए। दूसरी बात लेखक के नाम की चर्चा अवश्य दूसरी जगह करना चाहिए ताकि उनका प्रचार हो। ऐसा कर वह इंटरनेट लेखकों के ऐसे वर्ग का निर्माण वह करेंगे जो बाज़ार और प्रचार समूहों के बड़े बड़े बुद्धिजीवियों की हवा निकाल देगा। अगर हिन्दी के पाठक चाहते हैं कि इंटरनेट पर हिन्दी में मौलिक, तयशुदा विचाराधारा से प्रथक तथा स्वतंत्र लेखन से सुजज्जित सृजन हो तो उन्हें टिप्पणियों अवश्य करना चाहिए।
         हिन्दी के आम पाठक शायद इस बात को मजाक समझेंगे पर यह सत्य है कि जिन लोगों का बौद्धिक व्यवसाय संगठित प्रचार माध्यमों पर-टीवी, समाचार पत्र, फिल्म तथा साहित्य प्रकाशन-आधारित है वह इस इंटरनेट से प्रभावित होकर सृजन कर रहे हैं। वह यहां के लेखकों का नाम नहीं देते तो केवल इसलिये कि उनको पता है कि देश में बहुत कम आम पाठक इस बात को जानेंगे कि हमने अपना नवीनतम विचार कहां से लिया है? अगर पाठक यहां इंटरनेट लेखकों से संवाद बनायेंगे तो उनको अनेक महत्वपूर्ण रचनायें पढ़ने को मिल सकती हैं। पाठकों की अधिक सक्रियता यहां के लेखकों की कवितायें और कहानियों की चोरी रोकने में सहायक होगी। आम पाठक को यह बात याद रखना चाहिए कि यहां के लेखक भी उनकी तरह आम हैं। उनकी रोजी रोटी का आधार भी आम आदमी की तरह है पर यहां लेखन केवल स्वांत सुखाय है। इस सुख में उनको भागीदार बनना है। यह टिप्पणी कर प्राप्त किया जा सकता है।
        हिन्दी दिवस पर पता नहीं क्या लिखना था क्या लिख गये? मगर जो लिखा डूबकर लिखा। इंटरनेट पर लिखने का अपना एक अलग मजा है और अनुभव है। इतना बड़ा लेख लिखा यह जानते हुए भी कि इसके पाठक होंगे। इससे अच्छा तो बेतुकी, और व्याकरण से पैदल कवितायें लिखना ठीक रहता जो लेखों से अधिक हिट होती हैं। लोग कहते हैं कि यह कविता नहीं है, यह गज़ल नहीं है यह गीत नहीं है पर इतना सब मानते हैं कि उसमें कथ्य जोरदार है। इंटरनेट पर हम कविता जब लिखते हैं तो मुख्य विषय कथ्य होता है। यह हैरानी की बात है कि कवितायें सुनना या पढ़ना आमजीवन में लोग पसंद नहीं करते पर कथ्य जोरदार हो तो इंटरनेट पर उनका नजरिया बदल जाता है। हमने ब्लागों का अवलोकन किया तो पाया कि अध्यात्मिक लेखों के बाद पाठकों की पसंद कवितायें ही रही हैं। बहरहाल इस हिन्दी दिवस पर इस लेख में इतना ही। इस अवसर पर पाठकों और साथी ब्लाग लेखक मित्रों को बधाई।
इस हिन्दी दिवस अवसर पर शपथ लें कि
---------------
1.शुद्ध हिन्दी बोलेंगे। उसमें उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का मिश्रण नहंी करेंगे।
2.इंटरनेट पर हिन्दी की रचनाऐं ही ढूंढेंगे।
3.ऐसे लेखकों को हतोत्साहित करेंगे जो हिन्दी में उर्दू और अंग्रेजी शब्दों का मिश्रण कर अपनी श्रेष्ठता झाड़ते हैं।
शेष फिर कभी
दीपक भारतदीप
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

9/08/2011

दिल्ली हादसे के पीड़ितों से सहानुभूति जतायें-हिन्दी लेख (bam visfot in delhi-hindi lekh or article)

         दिल्ली में तीस हजारी अदालत के बाहर हुए विस्फोट से प्रत्यक्ष रूप से किसी का कोई उद्देश्य पूरा नहीं होने वाला यह सभी जानते हैं। मुंबई में भी हाल ही में हुए विस्फोटों में भी आम आदमी मरा और दिल्ली में हुए विस्फोटों में भी आम आदमी मरा।
        ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस तरह के विस्फोटों से क्या होता है? अभी हाल ही में एक टीवी चैनल ने आतंकियों को तमाम तरह के धनपतियों से पैसे मिलने की बात कही थी। इसमें कोई संदेह नहीं है जो इस तरह के  वह केवल पैसे के लिये करते हैं। जो पेसे देते हैं वह भी कोई न कोई उद्देश्य पूरा करते हैं। हम अनुभवों की बात करें। आज से पंद्रह वर्ष पूर्व हम कई प्रसिद्ध स्थानों पर बिना किसी रोक टोक के आ जा सकते थे। अनेक मंदिर, पर्यटन स्थल, बाज़ार तथा प्रसिद्ध स्थान हमने बिना किसी रोक टोक के देखे। अब स्थिति वह नहीं रही। अब तो ऐसे सार्वजनिक महत्वपूर्ण स्थानों के साथ ही शापिंग सेंटरों और मॉलों में भी ऐसी सुरक्षा देखने को मिलती है जैसे कि सारा देश ही खतरामय हो रहा है। सभी जगह मैटल डिक्टेटर लगे रहते हैं। सुरक्षा कर्मी इस तरह तलाशी लेते हैं जैसे कि किसी दूसरे देश की सीमा में प्रविष्ट हो रहे हैं। तमाम तरह के सीसीडी कैमरों का उपयोग भी हो रहा है। अगर हम एक सवाल पूछें कि अगर आतंकवाद न होता तो क्या इन चीजों का उपयोग आम होता? यकीनन नहीं होता पर तब यह सवाल उठता भी इनकी निर्माता कंपनियों का क्या होता? अनेक तरह के अवैघ हथियार बिक रहे हैं उनका उपयोग कम होता हो पर उनकी देखादेखी सुरक्षा उपकरण भी बिकने लगते हैं।
          बाज़ार का आतंकवाद से क्या संबंध है यह शोध का विषय हो सकता है। यह जरूरी नहीं है कि बाज़ार के सौदागर स्वयं ही ऐसा करने के लिये पैसा देते हों पर जिनको वह देते हैं यकीनन वह उनको सुरक्षा मुहैया कराने के नाम पर ऐसा असुरक्षापूर्ण वातावरण बनाये रखते हैं ताकि उनको अपना पैसा मिलता रहे। साथ ही अपने आकाओं के सुरक्षा उपकरण, हथियार तथा अन्य सामग्री बिकती रहे ऐसे अवसर दिलाने के लिये वह ऐसे हादसे करते हैं।
      दिल्ली में दर्दनाक हादसा हुआ है यह कहना और लिखना कोई मुश्किल बात नही है पर जिनके लोग मारे गये हैं उनकी पीड़ा की अनुभूति उनके निकटस्थ लोग ही कर सकते हैं। आजकल असंवेदनशील समाज किसी का दर्द नहीं समझता। मेले चाहे जितने भी लगा लो आदमी अंततः रहता अकेला ही है। हमारा मानना है कि आतंकवाद की घटनायें प्रचार के लिये हैं। अगर प्रचार माध्यम इसके दर्दनाक पक्ष को इतना विस्तार से न दिखायें जैसा कि दिखा रहे हैं तो शायद आतंकवाद के व्यापारी यह सब न करें। अब देखिये एक ही हादसे का दावा दो संगठन कर रहे हैं। क्या इन संगठनों के कर्ताधर्ता ऐसे हादसे के लिये जानबूझकर जिम्मा ले रहे हैं जो उन्होंने किया ही नहीं पर अपने आकाओं से धन वसूलने का मौका दिला सकता है भले ही वह तीसरे संगठन ने किया हो? जैसे ही कोई हादसा होता है वैसे ही प्रचार माध्यम अमुक जगह सुरक्षा की जा रही है तो अमुक जगह असुरक्षित है जैसे जुमले उछालने लगते हैं। दो दिन तक मामला प्रचार माध्यमों पर छाया रहता है। यकीनन इसी कारण आतंकवाद के व्यापारी इसलिये यदाकदा हिंसक वारदातें अपने धन के साधन बचाये रखने के लिये करते हैं। कोई उनको डरकर पैसा देता होगा तो कोई फायदा पाने पर देता होगा।

            दिल्ली हादसों में अस्पतालों में मृतकों और घायलों से जो व्यवहार हो रहा है उसकी प्रचार माध्यमों पर चल रही चर्चा से तो यह लगता है कि संवेदनाऐं तो इस समाज की मर ही चुकी हैं। बहरहाल ऐसा लगता है कि फिलहाल इस तरह की घटनाओं को रोकना मुश्किल है। जो मर गये उनके निकटस्थ रोऐंगे, घायल अपनी पीड़ाओं के स्वयं झेलेंगे। प्रचार माध्यमों के लिये दो दिन तक की सामग्री हो गयी। ऐसे में अगर संवेदनशील होंगे तो यकीनन आपकी आवाज भी निकलेगी क्योंकि आप जानते होंगे कि उससे कुछ होने वाला नहीं है। जिसको आपकी बात सुननी है उनका कान कुछ और सुन रहा है, आपकी तरफ जिसे देखना है वह कहीं अन्यत्र देख रहा है। जिसे आपके लिये कुछ करना है उसने अपने हाथ बांध लिये हैं। जुबानी जमा खर्च अलबत्ता कोई भी कर लेगा क्योंकि उसमें न खर्च होता है न परिश्रम! वाणी विलास हो जाता है सो अलग! इस हादसे में मरे लोगों से सहानुभूति जताना व्यर्थ है क्योंकि यह एक ढोंग है पर भगवान से हम प्रार्थना करते है मृतकों के परिवार के सदस्यों तथा घायलों को पीड़ा सहने की शक्ति प्रदान करे।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

लोकप्रिय पत्रिकायें

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर