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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

3/31/2011

क्रिकेट में महाजीत का प्रपंच-हिन्दी लेख (cricket mein mahajeet ka prapanch-hindi article)

पाकिस्तान की पीसीबी तथा भारत की बीसीसीआई की टीमों के बीच विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता का सेमीफायनल मैच आखिर निपट गया। सेमी और फायनल से मिला यह शब्द किसी भी प्रतियोगिता के फाइनल मैच से पूर्व के मैचों के लिये प्रयुक्त होता है। सीधा कहें तो छोटा फायनल कहना चाहिए जिसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने महायुद्ध, महाजंग, महामुकाबला और जाने क्या उपाधियां देकर महा साबित करने का प्रयास किया। वह सफल रहे। चार वर्ष पूर्व हुए विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में बीसीसीआई टीम की उसी धोनी नामधारी कप्तान के नेतृत्व में नाक कट गयी थी जो इस प्रतियागिता में जादूगर कप्तान कहला रहा है। स्थिति यह हो गयी थी कि सभी कथित महान खिलाड़ियों से अभिनीत कराये गये विज्ञापन पर्दे से गायब कर दिये गये। इस तरह प्रचार माध्यमों का बहुत बड़ा घाटा हुआ। अब यह घाटा उससे कई गुना अधिक राशि का होकर लाभ के रूप में परिवर्तित हो गया है। पिछले चार वर्ष में क्रिकेट दर्शक बहुत कम हो गये थे पर 30 मार्च 2011 को खेले गये उस मैच ने यकीनन कीर्तिमान स्थापित करते हुए दर्शक जुटाये होंगे इसमें संदेह नहीं है। इसके लिये प्रचार माध्यमों ने पूरी तरह से जोर लगा दिया था। इसमें कोई खास बात नहीं है पर इतना जरूर प्रमाणित हो गया है कि आजकल प्रचार माध्यमों के दम पर पूरा देश और उसकी बुद्धि अपहृत की जा सकती है।
फिक्सिंग के लिये बदनाम क्रिकेट से दूर हटे भारतीय दर्शकों की जेब में माल है यह सभी जानते थे। वेस्टइंडीज की 2007 में विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में बीसीसीआई की बुरी तरह हार के बाद उसका आर्थिक आधार जब लड़खड़ाने लगा तब बाज़ार के सौदागर तथा उनके प्रबंधकों को इस बात का होश आया था कि अंततः भारत इस खेल का सबसे बड़ा प्रायोजक है और यहां के निवासी जज़्बाती हैं इसलिये खेल को खेल की तरह नहीं बल्कि उसमें युद्ध की तरह विजय पाने की साम्राज्यवादी भावनाऐं उनमें है। उनकी मनोरंजन में भी साम्राज्यवाद की इस भावना को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि भले ही भारत की जीत पर दांव अधिक लगने से उसके हारने पर सट्टबाज भले ही फायदे में रहें पर प्रत्यक्ष रूप से प्रायोजक के रूप में दिखने वाली कंपनियों को भारी घाटा होता है। सट्टेबाजो के आका इन्हीं कंपनियों में भी पैसा लगाते हैं इसलिये वह भी इस घाटे से बच नहीं सकते। दूसरा इस तरह की हार के बाद क्रिकेट का शौक कम हो जाने से सट्टेबाजों को कालांतर में हानि होती है। माफिया, मीडिया और मनीपॉवर के संयुक्त उपक्रम के इस क्रिकेट खेल का पूरा दारोमदार भारत के मनोरंजन में है जो क्रिकेट से तभी तक ही संभव है जब तक उसमें जीत है।
2007 में विश्व कप प्रतियोगिता से बीसीसीआई की टीम शर्मनाक वापसी ने क्रिकेट के शौक को भारत में तहस नहस कर दिया था। इधर इंटरनेट ने भी अपनी ताकत दिखानी शुरु कर दी थी। कहीं प्रत्यक्ष तो सामने नहीं आया पर यकीनन इस व्यवसायिक पतन को मीडिया, माफिया, और मनीपॉवर के संयुक्त उपक्रम के प्रबंधकों ने कहीं न कहीं  अनुभव किया होगा कि क्रिकेट में लोगों का उतरता खुमार उनके बैंक खातों में बढ़ोतरी रोक सकता है। इसलिये जल्द प्रयास करने होंगे। ऐसे में उसी वर्ष आयोजित बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगता का आयोजन किया गया जिसमें बीसीसीआई को जीत मिली-कुछ लोग यह भी कहते हैं कि दिलवाई गयी। कभी तो लगता है कि यह संयोग भी हो सकता है क्योंकि जिस तरह दुनियां भर की टीमें इसमें शामिल हुईं और इसमें बीसीसीआई यानि भारत की टीम की जीत पर यहां प्रतिक्रिया हुई उससे सभी भौंचक्क रह गये। दूसरी टीमों के कप्तानों ने माना कि वह इस प्रतियोगिता को लेकर गंभीर नहीं थे इसलिये हारे तो बीसीसीआई के कप्तान तथा खिलाड़ियों ने भी माना कि इस जीत से देश उनको सिर आंखों पर बिठा लेगा इसकी आशा तो उनको भी नहीं थी। कई खिलाड़ियों ने तो यहां तक माना कि इतने दर्शक उनको यहां देख रहे हैं इसका आभास तक उनको नहीं था। इन बातों से लगता है कि शायद वह प्रतियोगिता संयुक्त उपक्रम की बुराईयों से दूर रही होगी मगर इसमें जिस तरह का पैसा है उससे लगता है कि संयुक्त उपक्रम निंरतर शोध, प्रयोग, अनुसंधान तथा सर्वेक्षण भी करता रहता है ताकि उनके काले तथा सफेद व्यवसाय निरंतर चलते रहें। यही कारण है कि बीस ओवरीय प्रतियोतगता के बीसीसीआई की टीम की जीत के एकदम बाद बीस ओवरीय प्रतियोगिता मेें ऐसे क्लब बनाकर मैच खेल जाने लगे जिनके नाम भी भारत के बड़े शहरों के दर्शकों को प्रसन्न करने वाले रखे गये। इस प्रतियोगिता में भारी सट्टा चलता है। खिलाड़ी नीलाम तो पहले ही होते हैं। इसमें राष्ट्रभावना नहीं है इसलिये सट्टा या फिक्सिंग के आरोप लगने पर गद्दार कहने वाला कोई नहीं है। इसके साथ ही यह भी सत्य है कि इसमें दर्शक भी अधिक नहीं जुड़े हैं जितना राष्ट्रीय भाव होने से मिलते हैं।
यही कारण है कि 30 मार्च को होने वाले सेमीफायनल मैच को अधिक से अधिक जज़्बाती बनाया गया। मैच की हर संज्ञा में महा शब्द जुड़ा था। आखिरी बात यह कि लोगों का जज़्बा केवल जीत तक ही रहता है। मतलब यह कि मुंबई में फायनल मैच में बीसीसीआई की टीम जीतती है तभी भारत में अगले चार वर्ष तक क्रिकेट की खुमारी बनी रह सकती है। वैसे संभावना है कि मुंबई में श्रीलंका को बीसीसीआई की टीम हरा देगी क्योंकि 6 अप्रैल से प्रारंभ होने वाली क्लब स्तरीय प्रतियोगिता भी प्रारंभ होनी है। वह भी संयुक्त उपक्रम के लिये भारी कमाई का जरिया है। ऐसे में क्रिकेट प्रबंधकों सब तरफ देखना होता है। यही कारण है कि इसमें फिक्सिंग वगैरह भी हो जाये तो आश्चर्य क्या है? अंततः क्रिकेट के अब दो रूप हैं एक खेल का दूसरा व्यापार का! व्यापार में कुछ बुराईयां चलती हैं चाहे वह क्रिकेट का हो। क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता की लोकप्रियता इस बात पर निर्भर अवश्य करेगी कि बीसीसीआई की टीम विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता 2011 जीते। यकीनन बाज़ार, प्रचार माध्यम तथा क्रिकेट प्रबंधक बीसीसीआई की टीम के जीत के लिये उसके खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने तथा श्रीलंका की टीम के खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ाने का काम भी करेंगे। हम यहां फिक्सिंग की बात नहीं कहेंगे क्योंकि यह चैनल वाले ही है जों मैच के पहले तो महाजंग, महायुद्ध और महामुकाबला की बात करते हुए उसका रोमांच बढ़ाते हैं फिर खत्म होने पर फिक्सिंग वगैरह की बात भी करते हैं। जैसा कि पाकिस्तान पर हार फिक्सिंग का आरोप कुछ टीवी चैनल लगा रहे हैं। अब यह कैसे संभव है कि एक की जीत महा हो दूसरे की हार फिक्स? इसका जवाब ढूंढना कठिन ही है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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3/20/2011

श्रीमद्भागवत गीता तथा ब्रज की होली-हिन्दी चिंत्तन लेख (shrimadbhagawat geeta aur brij ki holi-hindi chinttan lekh or thought article)

         ब्रज की होली पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। होली पर अनेक गीत ऐसे रचे गये हैं जिनमें बालरूप में भगवान श्रीकृष्ण के शामिल होने की कल्पना सहज भाव से हृदय में उभरती है। गोपियों के साथ श्री कृष्ण के होली के अवसर पर रंग खेलने की बात साकार रूप में भक्ति करने वालों को बहुत सुहाती है। होली को रंगों का त्यौहार कहा गया है और तत्वज्ञानियों की दृष्टि में सांसरिक रंग मनुष्य की आंखों को मोहित करते हैं और इससे वह अंतर्मन के अमूर्त रूप का दर्शन नहीं कर पाता। वैसे जिस तरह समय के साथ आधुनिक विज्ञान के कारण मनुष्य के पास भोग विलास के ऐसे साधन उपलब्ध हो गये हैं जो आंखों के सामने रंग ही रंग लाते हैं इसलिये होली पर रंग खेलने का प्रचलन कम होता जा रहा है। फिर भी लोगों के मन में उल्लास और उत्साह का वातावरण तो रहता ही है।
        बीच में ऐसा दौर आया था जब होली के अवसर पर लोग कीचड़ वगैरह फैंककर दूसरों को हानि पहुंचाते थे। इसके अलावा बुरी तरह से मजाक करने का भी सिलसिला भी चलने लगा जिसने अनेक शांतिप्रिय लोगों को इस त्यौहार से विरक्त कर दिया। हालांकि बाद में सरकारी एजेसियों ने ऐसी घटनाओं को रोकने के इंतजाम शुरु किये और उसमें वह सफल रही। अब शांतिप्रिय आदमी चाहे तो धुलेड़ी पर घर से बाहर निकला सकता है। वैसे भी बढ़ती महंगाई में महंगे रंग खरीदकर अब कोई अनजान आदमी से होली नहीं खेलना चाहता। बहरहाल उत्तर भारत में होली का त्यौहार जिस तरह सांसरिक रंगों से मनाया जाता है उसी तरह उसके अध्यात्मिक रंग भी है। कुछ लोग भक्ति भाव से भजन करते हैं तो कुछ लोगों को चिंतन करना भी रास आता है।
       बात ब्रज की होली की हो तब भगवान श्रीकृष्ण की चर्चा होने पर जहां साकार उपासक प्रसन्न होते हैं वहीं निराकार तथा ज्ञानी उपासक श्रीमद्भागवद में तत्वज्ञान का रहस्य का विचार करके गद्गद् होते हैं। सच तो यह है कि एक बार वृंदावन से निकलने के बाद भगवान श्रीकृष्ण फिर वापस लौटे ही नहीं। वहां से निकलते ही उन्होंने कंस का वध कर उसकी कैद में रह रही अपनी जननी देविक तथा जनक वासुदेव को मुक्त करवाया। उस समय उनकी आयु छोटी थी इसलिये कंस के समर्थकों से दूर रखने के लिये उन्हें वृंदावन वापस नहीं लौटाया गया। उसके बाद बाणासुर के प्रकोप से अपने लोगों को बचाने के लिये वह द्वारका चले गये। फिर अपने दैहिक जीवन का पूरा समय उन्होंने वहीं बिताया। उनकी विरह में गोपियां पूरा जीवन जीती रहीं पर वह उनका बालकृष्ण तो युवक हो गया था जो अब पूरे संसार में धर्म की स्थापना के लिये उनके प्रति निष्ठुरता दिखा रहा था। वह धर्म जिसका कोई नाम नहीं था बल्कि जिसका आशय सद्आचरण और सभ्य जीवन से था। उसका संदेश देने के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी निरंतर सक्रियता बनाये रखी जिसे उनकी लीला भी कहा जाता है। श्रीमद्भागवत जैसा अनुपम ग्रंथ उनकी इन्हीं लीलाओं के बीच से निकलकर इस प्रथ्वी पर अवतरित हुआ। सारी दुनियां में विभिन्न धर्म हैं। अनेक लोग विभिन्न रूपों में परमात्मा के स्वरूप को मानते हैं। इनमें कई भगवान श्रीकृष्ण के उपासक नहीं हैं। अन्य धर्मों की बात क्या करें, हिन्दू धर्म में ही भगवान श्रीकृष्ण को न मानने वाले भी हैं। वह अन्य देवताओं या भगवान के अन्य स्वरूपों को भजते हैं। इसके बावजूद श्रीमद्भागवत को पूरी दुनियां तथा धर्मों के लोग अलौकिक और तत्वज्ञान से परिपूर्ण ग्रंथ मानते हैं। श्रीमद्भागवत गीता में ज्ञान नहीं बल्कि विज्ञान भी है। यही कारण है कि उस पर आधुनिक विज्ञानी भी शोध करते हैं।
         श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूं।’ वह प्रहलाद जिसे उसकी बुआ होलिका मारना चाहती थी। होलिका के पास एक चादर थी। उसे वरदान था कि वह जिस पर भी डालेगी वर मर जायेगा पर उसका स्वयं का बालबांका भी नहीं होगा। उसने प्रहलाद को गोदी में लिया और वह चादर डाल दी। उसी समय हवा तेज चली और प्रहलाद पर डली चादर उड़कर होलिका पर गिरी और वह जल गयी। इसी अवसर के स्मरण में होली पर्व आयोजित किया जाता है। आमतौर से हमारा समाज देवताओं का पूजक है पर दैत्य होकर भी प्रहलाद भगवद्स्वरूप कर सके जो कि उनकी भक्ति का ही परिणाम था। जब भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘दैत्यों में मैं प्रहलाद हूं;’ तो वह इस बात का संदेश भी देते हैं कि मनुष्यों को जातीय भाव से मुक्त होना चाहिए। गुणों के आधार पर मनुष्य की पहचान करना सही है। यही कारण है कि श्रीगीता में उन्होंने ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’ तथा ‘इंद्रियां ही इंद्रियों में बरतती हैं’ जैसे वैज्ञानिक फार्मूल या सूत्र दिये। ऐसे में चिंतन करते हुए ब्रज की होली भूल जाती है क्योंकि तत्वज्ञानी तो प्रतिदिन होली और दिवाली मनाते हैं। उनको प्रसन्नत और आनंद प्राप्त करने के लिये अवसर या दिन का इंतजार नहीं करना पड़ता
       होली के इस पावन पर्व पर भगवान श्रीकृष्ण तथा भक्ति के प्रतीक श्री प्रहलाद को कोटि कोटि नमन। इस अवसर पर अपने ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों को हार्दिक बधाई।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’
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3/12/2011

भारत की कथित अमीरी बोरियत का कारण-हिन्दी लेख (bharat ki amiri aur boriyat-hindi lekh)

जापान में भूकंप के बाद समंदर अपनी मर्यादा छोड़कर सुनामी की लहरें ले आया जिससे वहां भारी तबाही हुई है। निश्चित रूप से यह खबर लोगों के लिये डरावनी है। इधर भारत में यह लग रहा है कि जापान की सुनामी पर समाचार और बहस प्रसारण में भारतीय चैनलों के लिये विज्ञापनों की सुनामी आ गयी। ऐसे खास अवसरों ं टीवी चैनल के दर्शक कुछ विस्तार से सुनना और जानना चाहते हैं और यह बात देश के प्रचार प्रबंधकों को पता है और वह पर्दे के सामने चिपके रहेंगे इसलिये उनके सामने विज्ञापन दिखाकर अपने प्रायोजकों को खुश करते हैं। मुश्किल यह है कि उनके पास प्रबंध कौशल केवल अपने विज्ञापनदाताओं करे खुश करने तक ही सीमित है कार्यक्रम के निर्माण और प्रस्तुति में नज़र नहीं आती। उनको समाचार और बहसों के बीच केवल अपने विज्ञापनों की फिक्र रहती है।
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विज्ञापनों की वजह से इतने सारे समाचार चैनल चल रहे हैं और उनका लक्ष्य विज्ञापन प्रसारित करना है और समाचार और बहस तो उनके लिये फालतु का विषय है। जो नये चैनल आ रहे हैं वह भी इसी उद्देश्य की पूर्ति में लग जाते हैं इसलिये वह पुराने चैनलों को परास्त नहीं कर पा रहे। सच बात तो यह है कि इन प्रबंधकों के पास पैसा कमाने के ढेर सारे तरीके होंगे पर प्रबंध कौशल नाम का नहीं है। प्रबंध कौशल से आशय है कि अपने व्यवसाय से संबंधित हर व्यक्ति को खुश करना और कम से कम भारतीय समाचार टीवी चैनलों के दर्शक उनसे खुश नहीं है। समाचारों और बहसों के बीच जिस तरह विज्ञापन जिस तरह दिखाये जा रहे हैं उससे तो यह बात साफ लगती है कि दर्शकों की परवाह उनको नहीं है। एक मिनट का समाचार पांच मिनट का विज्ञापन। यह भी चल जाये पर बहस बीच में भी यही हाल। चार विद्वान जुटा लिये और आधे घंटे की उनकी बहस में पांच मिनट का भी वार्तालाप नहीं होता।
कई बार तो यह हालत हो जाती है किसी विषय पर विद्वान अपनी एक मिनट की बात पांच मिनट के विज्ञापन के साथ दो बार पूरी करा करता है। ऐसा लगता है कि उधर जब सुनामी आ गयी तो भारत के टीवी चैनलों के प्रबंधक विज्ञापनों का प्रबंधन कर रहे होंगे क्योंकि उनको मालुम था कि उनके कर्मचारी विदेशी टीवी चैनलों की कतरनों से समाचार प्रसारित करने के साथ ही चार चार पांच लाईने बोलने वाले विद्वान भी जुटाकर कार्यक्रम ठीकठाक बना लेंगे। कौन हिन्दी दर्शक अंग्रेजी टीवी चैनल देखता है जो इस घटिया स्तर को समझ पायेगा।
ऐसा लगता है कि विश्व पटल पर भारत जो कर्थित आर्थिक विकास कर रहा है वहां यहां के आम लोगों के लिये महत्वहीन होता जा रहा है। भारत के आर्थिक ताकत होने पर यहां कौन यकीन कर सकता है जब यहां के आम आदमी की किसी को परवाह न हो। विकास कंपनियों के नाम पर शक्तिशाली लोगों के समूहों को रहा है। कलाकार, विद्वान, पूंजीपति, समाजसेवी और बाहुबली सभी जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और यही प्रसिद्ध चेहरे कहीं न कहीं  कंपनियों के पीछे रहनुमा क तरह खड़े हैं। इतनी सारी कपंनियां और उनके विज्ञापन बार बार देखकर मन उकता जाता है। वही क्रिकेट, फिल्म और टीवी धारावाहिकों में सक्रिय चेहरे सतत सामने आते हैं तो लगता है कि टीवी बंद रखना ही श्रेयस्कर है। देश की कथित अमीरी अब बोरियत का कारण बन रही है।
जापान की सुनामी की चर्चा में कहीं  कुछ ऐसा सुनने को मिला जिसे याद रखने योग्य माना जाये। वहां भारी तबाही है। प्रकृति के प्रकोप से आई सुनामी के निशान मिट जायेंगे पर वहां जो परमाणु संयत्र पर विस्फोट हुआ है वह काफी चिंताजनक हैं। मर्यादा लांघकर आया समंदर लौट जायेगा पर मानवजनित उस परमाणु ऊर्जा से उपजा प्रकोप से निपटना आसान काम नहीं होगा। लोग बता रहे हैं कि जापान में आई सुनामी का भारत पर प्रभाव नहीं होगा पर अगर परमाणु संयंत्र से गैस का रिसाव हुआ तो वह समंदर के साथ ही विश्व की पूरी धरती पर विष घोल सकता है। समंदर में रेडिएशन घुल गया तो वह बरसात के माध्यम से कहां बरसेगा पता नहीं। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस रिसाव से कोई खतरा नहीं पर हमारे हिसाब से उनको अभी अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है। हमारा मानना तो यह है कि इस तरह के प्रकोप इसलिये हो रहे हैं कि अमेरिका और चीन सहित अनेक देशों ने ज़मीन और समंदर में ढेर सारे विस्फोट किये हैं।
ऐसे में एशिया के सबसे संपन्न जापान पर आया संकट यही संदेश दे रहा है कि प्रकृति से अधिक मानव स्वयं के लिये अधिक खतरनाक है। समंदर तो आज नहीं तो कल वापस अपनी जगह जायेगा पर परमाणु संयत्र से आया संकट आसानी से पीछा नहीं छोड़ेगा। जापान के लोगों ने 1942 में अपने दो शहरों हिरोशिमा और नागासकी पर अमेरिका के परमाणु बम गिरते देखें हैं और वह इसे जानते हैं। बहरहाल उनके यहां आयी सुनामी भारत के टीवी चैनलों के लिये भी सुनामी लायी है।

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