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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

10/27/2011

कौन बनेगा करोड़पति-हिन्दी व्यंग्य क्षणिकाएँ (kaun banega karodpati-hindi vayngya kshanikaen or hindi short poem)

गरीब और मजदूर लोग
अपने झुग्गियों और झौंपड़ियों में
सूखी रोटी खाकर
पर्दे पर करोड़ों के खेल देखते हुए
अपना दिल बहलाते हैं,
कभी न पूरे होने वाले सपने
देखते हुए यूं ही सो जाते हैं।
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पर्दे पर करोड़ों के खेल चल रहे हैं,
भूखों में रोटी के सपने भी पल रहे हैं।
सौदागरों ने हड़प ली बाज़ार कि रोशनी
गरीबों के घर टिमटिमाते दीपक जल रहे हैं।
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कौन बनेगा करोड़पति
यह पता नहीं है,
पर्दे पर खेल देखते हुए
कई गरीब मर जाएंगे,
हर पल अमीर होने के सपने सजाएँगे
इसमें कोई खता नहीं है।
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वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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10/16/2011

अन्ना (अण्णा) हजारे का मौन व्रत यानि एक आंदोलन का मौन होना-हिन्दी लेख (anna hazare ka maun vrat or vrut and his anti corruption movement-hindi article

              अन्ना ने मौन व्रत ले लिया है। अपने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के बाद दो बार अनशन करने के बाद यह तीसरा अवसर है जब वह चर्चा में आये हैं। आमतौर से देश की गतिविधियों का गहन अध्ययन करने वाले लोग यह मानते हैं कि अभी यह आंदोलन परिणाम पाना तो दूर उस मार्ग पर आया तक नहीं है। अन्ना साहब ने अनशन के बाद मौन व्रत प्रारंभ कर भले ही प्रचार माध्यमों में स्थान बनाया पर चिंतनशील लोग इससे बहलने वाले नहीं है। यही कारण है कि धीरे धीरे उनका भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जनमानस में अपनी पहचान खो रहा है। अब तो कुछ लोगों को लगने लगा है कि प्रचार माध्यमों को अपना विज्ञापन व्यवसाय चलाने के लिये प्रकाशन तथा प्रसारण का महानायक मिल गया है। उनकी गतिविधियों के साथ ही उनके साथियों के कार्यों के भी समाचार प्रसारित होने के साथ ही लंबी बहसें होती है। बार बार ब्रेक लेकर होने वाले इन प्रकाशनों और प्रसारणों को देखकर तो यही लगता है कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का एक परिणाम लोकतंत्र के चौथे स्तंभों के पास विज्ञापन व्यवसाय बनाये रखने वाले एक महानायक मिलने के रूप में तो सामने आ ही गया है।
            दरअसल अन्ना हजारे स्वयं एक चतुर राजनीतिज्ञ हैं पर उनके सहयोगियों के साथ ऐसा नहीं है। जब अन्ना पहली बार अनशन करने दिल्ली आये थे तो कथित स्वयंसेवी संगठनों के लोगों ने उनके मंच पर आकर आंदोलन को संगठित रूप प्रदान किया। तय बात है कि अन्ना महानायक बने तो उनके सहयोगी नायक बन गये। मुश्किल यह आयी कि इन लोगों के पास भ्रष्टाचार का विरोध एक नारे के रूप में था पर कोई रणनीति नहीं है। दूसरी बात यह कि देश और विदेश से प्राप्त अनुदान से स्वैच्छिक संगठनों के वास्तविक उद्देश्यों पर शक भी किया जाता रहा है और कश्मीर पर अन्ना टीम के एक वरिष्ठ सदस्य की टिप्पणी से यह साफ हो गया है कि अन्ना के सहयोगियों का यह भी एक उद्देश्य है कि वह विद्यमान लोकतंत्र प्रणाली से प्रथक होकर ऐसे समाज सेवी के रूप में अपनी पहचान बनायें जो राज्य प्रतिष्ठानों पर प्रभाव रखता हुआ प्रदर्शित हो। तय बात है राज्य पर प्रभाव रखने से समाज सेवा में दान, अनुदान और सम्मान अधिक मिलता है। अन्ना के सहयोगी के इस बयान ने आंदोलन पर संकट ला दिया है। एक बयान किस तरह पूरे आंदोलन को संकट में डाल सकता है यह पहली बार देखा गया है। इतना ही नहीं एक आंदोलन का प्रमुख अपने लक्ष्य से इतर विषय पर बयान देखकर लोगों के गुस्से का शिकार इस तरह होता है समूचा आंदोलन संदेह के दायरे में आ जाता है यह भी शायद ही कभी पहले देखा गया हो।
         जनलोकपाल बनेगा या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है। स्थिति यह है कि पहले से ही उसका श्रेय लेने की तैयारी हो रही है। अन्ना के बयानों का बारीकी से अध्ययन किया जाये तो उन्होंने उसमें अनेक बार बदलाव किये हैं। वह भले ही दावा करते हों कि वह किसी दबाव में नहीं आते पर उनके बदलते बयान इसके विपरीत स्थिति बयान करते हैं। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह उनकी रणनीतिक चतुराई का हिस्सा नहीं है जिससे वह अपने लक्ष्य नहीं पा सकते हैं। मुश्किल यह है कि उनके सहयोगियों में न केवल रणनीतिक चतुराई का अभाव है बल्कि अनेक विषयों पर कार्य कर अपने आपको महानतम साबित करने के प्रयास में वह मूर्खतायें भी करते हैं। हम अन्ना के उस सहयोगी की ही बात कर लें जिन्होंने जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह का समर्थन किया। दरअसल उन्हें शायद पता नहीं है कि अगर देश में भ्रष्टाचार खत्म होने के साथ ही राजकीय कार्यशैली में भी बदलाव आ जाये तो यकीनन जम्मू कश्मीर में कोई समस्या नहीं रहने वाली है। जम्मू कश्मीर में सभी जगह की तरह भ्रष्टाचार है और तय बात है कि वहां भी लोगों में आक्रोश होगा। इसी आक्रोश वहां के कुछ कथित लोग उठा रहे हैं और उनको भी वैसे ही समर्थन मिल जाता है जैसे कि भ्रष्टाचार के मसले पर अन्ना साहेब को मिल गया। मतलब यह कि कहीं भी किसी जगह आक्रोशित लोग व्यवस्था से इतने नाराज होते हैं कि वह किसी का भी समर्थन करने को तैयार हो जाते हैं। अन्ना साहेब भी भ्रष्टाचार का मामला लेकर तभी आगे आये जब भारतीय संसद, न्यायालय तथा प्रचार माध्यमों में अनेक घोटालों का पर्दाफाश हुआ। नेताओं का समूह भ्रष्टाचार के लिये बदनाम हैं पर याद रखने की बात यह है कि भारतीय संसद में घोटालों पर जमकर चर्चा हुई। सरकार ने उन पर कार्यवाही की। न्यायालय ने उनका संज्ञान लिया। भ्रष्टाचार के कुछ आरोपी जेल भी गये जिससे भ्रष्टाचार का मुद्दा ज्वलंत हो गया। तब कहीं अन्ना साहेब अनशन के लिये आये और उनको प्रचार में लाभ मिला।
           अन्ना का एक सहयोगी तो अपने साथियों से बेवफाई कर बाहर हो गया। दूसरा बयान देकर संकट में फंसा है। ऐसे में अन्ना को अपने आंदोलन को संगठित रूप से चलाने के लिये अब अपने नये साथी ढूंढना चाहिए। उनके वर्तमान साथियों में अधिकतर अपने अन्य लक्ष्य प्राप्त करने के लिये सक्रिय दिख रहे हैं। पता नहीं यह बात अन्ना अभी तक समझे कि नहीं पर इतना तय है कि भविष्य में वह इसका अनुभव अवश्य करेंगे। उनका मौन भी एक रणनीति का हिस्सा है। उनके विरोधी मानते हैं कि वह कुछ असुविधाजनक सवालों के जवाब से बचना चाहते हैं। समर्थकों के अनुसार वह अक्सर ऐसा करते हैं। वह पहले भी मौन व्रत रख चुके हैं पर राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार चर्चित हो रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रचार माध्यमों के विज्ञापन व्यवसाय के लिये वह एक ऐसे नायक हैं जिनसे उनको अच्छी आय होती है।
         इन सबसे प्रथक भारतीय जनमानस के उतार चढ़ाव के भावों को भी देखना चाहिए। अन्ना साहेब ने देश की जनता में एक आशा की किरण फूंकी थी। वह स्वयं भी मानते हैं कि जनता ही उनके आंदोलन का आधार हैं। अन्ना का मौन होने का मतलब है एक आंदोलन का मौन होना। उनके सहयोगियों की संकीर्ण मानसिकता तथा सीमित चिंत्तन क्षमता का आभास अब लोगों को हो गया है ऐसे में अन्ना के अभियान के सफल होने में संदेह जनमानस को उनसे दूर ले जायेगा। इतना ही नहीं अब अन्ना साहेब पर देश के जागरुक लोगों की नजर है और वह यह यकीन माने कि अब टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में पेशेवन बुद्धिमान बाजार और प्रचार समूहों के हितों को देखने हुए केवल प्रशंसात्मक वाक्य लिखें पर इंटरनेट पर लिखने वाले बिना लाग लपेटे के लिखने वालो लोगों की कमी नहीं है जो केवल जनहित के परिणाम देखकर ही विचार करेंगे। भले ही वह ज्यादा नहीं पढ़े जाते पर समाज तक अपनी बात तो वह पहुंचा ही देते हैं। अलबत्ता फिर भी अन्ना टीम नामक संगठन अब कुछ दिन मौन रहेगा पर जब यह व्रत टूटेगा तब अनेक परिवर्तन परिलक्षित होंगे। तब यह देखना होगा कि उनका दूरगामी परिणाम क्या होता है। अगर अन्ना टीम का यथारूप रहता है तो आंदोलन के साथ उसकी सफलता का संदेह भी साथ चलता रहेगा।
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वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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10/09/2011

शब्दलेख पत्रिका ने पार की दो लाख पाठ/पाठन संख्या-हिन्दी संपादकीय

          दीपक भारतदीप समूह का ‘शब्द लेख पत्रिका’ ब्लाग/पत्रिका ने पाठक/पाठ पठन संख्या दो लाख पार कर ली। इस समूह का यह पांचवा ब्लाग है जिसने यह संख्या पार की है। यह ब्लाग भी वर्डप्रेस पर ही बना है। अभी तक यह समझ में नहीं आया है कि ब्लॉग स्पॉट के ब्लाग के मुकाबले वर्डप्रेस के ब्लाग अधिक पाठक संख्या क्यों जुटाते हैं। इसका कारण शायद यह है कि वर्डप्रेस पर अपने पाठ के साथ लेबल या मुंह कहें या टैग या पूंछ कहें अधिक संख्या में लगाने की सुविधा है जिनसे पाठों को सर्च इंजिन पर अधिक पाठक मिल जाते हैं। बीच में अधिक लेबल लगाने की सुविधा ब्लॉग स्पॉट के ब्लॉग पर मिली थी पर पता नहीं अचानक वह बंद हो गयी।
शुरुआती दौर में यह लगा था इंटरनेट पर ब्लॉग लिखने से कोई हिन्दी जगत का नया रूप सामने आयेगा पर वह अभी तक परिलक्षित नहीं हुआ। मुख्य विषय यह है कि हिन्दी भाषी अधिक संख्या होने के बावजूद भारत में इंटरनेट पर हिन्दी के पाठक अत्यंत कम हैं जो हैरान करती है। कम से कम हम जैसे आम लेखक के लिये स्वांत सुखाय लिखने के अलावा कोई अन्य प्रेरणा नहीं है। अब यह हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों की मानसिकता है या बाज़ार की थोपी गयी बाध्यता कि उसे शुद्ध हिन्दी लेखक तब तक रास नहीं आता जब तक लेखन से इत्तर उसके पास अन्य कोई उपलब्धि न हो। लेखक अगर नेता, अभिनेता, समाज सेवी, धार्मिक गुरु या फिर पूंजीपति हो तो उसे समाज पढ़ने के लिये तैयार है। इसके अलावा वह अंग्रेजी में श्रेष्ठता साबित कर हिन्दी में अनुवाद होकर छपे तो भी वह स्वागतयोग्य है। अगर कोई आम जीवन वाला मनुष्य है और हिन्दी में लेखन करता है तो वह भाषाई दृष्टि से वह सराहनीय नहीं है। मतलब उसे जीवन में सिद्ध होना चाहिए तभी उसका लेखन भी पठनीय है।
           हम लिखे जा रहे हैं इस बात की परवाह किये बिना कि उसकी कोई प्रशंसा करता है या नहीं। अलबत्ता ऐसा लगता जरूर है कि कहीं न कहंीं ऐसे लोग हमारे ब्लॉग पढ़ते हैं जो फिर उनको अपने विचार बताकर प्रस्तुत करते हैं। कभी कभी तो लगता है कि बड़े लोग स्वयं या उनके अनुयायी इसे पढ़कर अपनी रणनीति भी बनाते हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के चुनावी राजनीति की तरफ मुड़ने की संभावना इसी ब्लाग समूह पर व्यक्त की गयी थी। यह हुआ भी। उस समय समाचार पत्र या चैनल में किसी विद्वान ने उस पाठ को पढ़ लिया होता तो वह तत्काल व्यक्त कर देता। आज की तारीख में उसकी जयजयकार होती। संभव तो यह भी लगता है कि अन्ना के ही किसी अनुयायी ने उसे अवश्य पढ़ा होगा और व्यक्त संभावना को भविष्य की रणनीति बना लिया हो। संभव है कि यह हमारी आत्ममुग्धता हो पर इतना तय है कि हम जैसे आम लेखक की उपेक्षा करने की वजह से ही हिन्दी भाषा के व्यवसायिक क्षेत्र में ऐसे मुखौटे छा गये हैं जिनकी चिंत्तन क्षमता भी केवल तत्कालिक मुद्दों भी क्षणिक रूप सीमित है। हिन्दी में गंभीर तथा सुरुचिपूर्ण लेखन नहीं होता यह शिकायत गलत है बल्कि बाज़ार और प्रचार के शिखर पुरुषों की आत्ममुग्धता इसके लिये जिम्मेदार है यह बात अब हमारे समझ में आने लगी है। आम पाठक को दोष देना बेकार है क्योंकि वह बाज़ार और प्रचार के संयुक्त ढांचों पर ही निर्भर है। इंटरनेट में तकनीकी समस्या है और कंप्यूटर बेचने वाली तथा इंटरनेट चलाने वाली कंपनियों को हिन्दी से पैसा तो चाहिए पर उसके लेखकों की सहायता करना उनके लक्ष्यों में शािमल नहीं है। इसके अलावा पाठकों तथा प्रयोक्ताओं को प्रथक से कोई बेहतर सामग्री देने की भी उनकी कोई योजना नहीं है। ऐसे में आम हिन्दी ब्लाग लेखक और पाठकों के बीच सर्च इंजिन ही एक पुल है। उसमें भी याहू तो किसी तरह हिन्दी का मददगार नहीं है। इसके अलावा गूगल ने तो ब्लॉग तक पहुंचने के रास्ते बनाये हैं पर याहू तो एकदम खामोश है। हिन्दी सर्च इंजिनों में रफ्तार और गुरुजी चल रहे हैं पर जनमानस को इसके बारे में अधिक नहीं मालुम।
           बहरहाल हम पाठ लिखते हैं तो पाठक पढ़ता है। हमारा पाठ भी उनको पढ़कर बता जाता है कि उसे किस तरह पढ़ा गया। अपने अनुभवों में सबसे अधिक हमें जिस बात ने चौंकाया है वह यह कि जब देश में क्लब स्तरीय प्रतियोगितायें होती हैं तब यहां पाठक संख्या तीस से चालीस प्रतिशत तक गिर जाती है। फिक्सिंग के आरोपों के चलते हम क्रिकेट कम ही देखते हैं और जब अचानक पाठक संख्या कम दिखती है तो दो तीन तक तो सोचते नहीं और बाद में पता चलता है कि यह सब चैंपियन लीग और आईपीएल की वजह से हुआ है। इससे पता चलता है कि भारत में लोग मनोरंजन का लंबा घटनाक्रम चाहते हैं और क्रिकेट जैसा सुस्त खेल उनको इसकी सुविधा प्रदान करता है। इस पर बीस ओवरीय मैचों में चौके छक्के अधिक लगने से लोग ज्यादा मनोरंजन लेते हैं। बाज़ार और प्रचार समूहों के पास क्रिकेट एक ऐसा हथियार लग गया है जिसे वह समय के अनुसार परिवर्तन कर अपने लिये आय के साधन जुटा लेते हैं। ऐसे में फिक्सिंग के आरोप भी इस खेल से लोगों को विरक्त नहीं कर पाये। यही कारण है कि 14 सितम्बर हिन्दी के दिवस आसपास जहां इस ब्लाग समूह के 20 ब्लाग जहां एक दिन में नौ हजार के आसपास पाठक/पाठ पठन संख्या जुटा रहे थे अब दो हजार की संख्या पार करने को भी तरस गये हैं। उस समय दीपक बापू कहिन अकेला ही इस संख्या के पास था। चैपियन लीग के चलते सब गड़बड़ हो गया। बहरहाल यह शिकायत नहीं है। यह एक ऐसा तथ्य है जिसका हम पहले भी उल्लेख कर चुके हैं पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
        ‘शब्दलेख पत्रिका’ को दो लाख पर करना कोई बड़ी बात नहीं है पर इसका उल्लेख इसलिये भी करना जरूरी है ताकि हिन्दी ब्लाग जगत के विश्लेषक उसे देख सकें। पाठक भी यह बात समझें कि वह अकेले ही हिन्दी ब्लाग पर सक्रिय नहीं है बल्कि उनकी गतिविधियों का सकारात्मक प्रभाव लेखक पर पड़ता है। इस पर सभी साथी ब्लाग लेखकों और पाठकों धन्यवाद करते हुए इस बात का वादा करते हैं कि अपने निष्काम प्रयास करते हुए निष्प्रयोजन लेखन दान हम करते रहेंगे।
दीपक भारतदीप
         नीचे वह लेख  अवश्य   पढ़ें जो दीपक बापू कहिन पर अन्ना हजारे के आद्नोलन के राजनीती की तरफ बढ़ने  की संभावना व्यक्त की गयी थी ।              
अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे)  का अनशन समाप्त होने का मतलब-हिन्दी संपादकीय लेख (anna hazare ka anshan samapt hone ka matlab-hindi editorial article or lekh)
अन्ना हजारे का अनशन समाप्त होने पर पूरे देश में जश्न मनाया जा रहा है। कोई इसे लोकतंत्र की जीत बता रहा है तो किसी का दावा है कि इस लोकचेतना का संचार हुआ है। भ्रष्टाचार रोकने के लिये जनलोकपाल बनाने को लेकर महाराष्ट्र के समाजसेवी अन्ना हजारे ने 12 दिन तक जमकर अनशन किया। अंततः कुछ आश्वासनों पर हजारे साहब ने बड़े राजनीतिक चातुर्य के साथ आधी जीत बताकर उसे समाप्त कर दिया। संविधान और राजनीतिक विश्लेषकों की बात माने तो आधी जीत तो दूर अभी उनका अभियान अपनी जगह से एक इंच हिला भी नहीं है। इतना ही नहीं अब कथित रूप से गैरराजनीतिक होने का दावा करने वाली उनकी कथित ‘अन्ना टीम’ अंततः परंपरागत राजीनीतिक दलों के शिखर पुरुषों में की दरबार में मदद मांगने भी जा पहंुची। जब देश में कानून बनाने में संसद सर्वोपरि है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि वह दलीय राजनीतिक दलों के आधार पर ही गठित होती है। ऐसे में उनके साथ संवाद करना उस आदमी के लिये भी जरूरी होता है जो स्वयं गैरराजनीतिक है पर किसी जनसमस्या का हल चाहता है। दूसरी बात यह है कि अगर कोई समूह अपने मनपसंद का कानून बनाना चाहता है तो उसके पास चुनाव लड़ना ही एक जरिया है। किसी गैर राजनीतिक आंदोलन के माध्यम से कानून बनाना एक आत्ममुग्ध प्रक्रिया हो सकती है जिससे परिणाम प्रकट नहीं होता चाहे नारे कितने भी लग जायें। अन्ना की टीम यह जानती है और ऐसा लगता है कि कहंी न कहीं भविष्य के चुनाव उसकी नजर में है।

          अब हम जो देख रहे हैं तो लग रहा है कि अन्ना हजारे और अन्ना टीम दो अलग अलग केंद्र बन गये हैं। अन्ना टीम के सदस्य पेशेवर अभियानकर्ता हैं जबकि अन्ना स्वयं एक फकीर हैं। अलबत्ता राजनीतिक चातुर्य उनमें कूटकूटकर भरा ही यही कारण है कि उन्होंने पेशेवर अभियानकताओं की दाल नहीं गलने दी। इससे हुआ यह कि एक स्वामी नामधारी एक पेशेवर अभियानकर्ता उनसे नाराज हो गया। उसका सीडी जारी हो गया है जिसमें वह अपने किसी मित्र के साथ सहयोगियों की निंदा कर रहा है। सच तो यह है कि उसके शामिल होने की वजह से लोग इस आंदोलन को अनेक बुद्धिजीवी शक की नजर से देख रहे थे। कहने को वह जोगिया वस्त्र पहनता है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की निंदा उसके श्रीमुख से कई बार सुनी गयी है। उस पर यह आरोप लगता है कि वह समाज सेवा की आड़ के केवल दिखावा करता है। हमारा उसके चरित्र से मतलब नहीं है पर इतना जरूर अब लग रहा है कि आने वाले समय में अन्ना टीम को अनेक तरह के सवालों का सामना करना पड़ेगा।
       अन्ना हजारे ने कहा था कि यह आधी जीत है। लोग फूल रहे हैं। जश्न बनाये जा रहे हैं। विवेकशील लोगों के लिये इतना ही बहुत है कि अन्ना जी ने अनशन तोड़ दिया। दूसरी बात यह भी लग रही है परंपरागत समाज सेवी और राजनीतिक संगठन अब चेत गये हैं। अभी तक वह देश के जनमानस में फैले असंतोष का शायद सही अनुमान नहीं कर पाये थे जो अन्ना के अनशन के लिये शक्ति बना और अन्ना टीम उसके आधार पर ऐसा व्यवहार करने लगी कि वह कोई संवैधानिक संगठन है। वैसे हम यहां साफ कर दें कि इस अनशन की समाप्ति से कोई हारा नहीं है कि किसी को विजेता बताया जाये। अलबत्ता प्रचार माध्यमों के लिये यह अनशन महान कमाई का साधन बन गया। पूरे पंद्रह दिन तक उन्होंने इस प्रकरण को जिस तरह चलाया वह आश्चर्यजनक लगता है। अलबत्ता इस चक्कर में उन्होंने देश के संविधानिक संगठनों के महत्व को कम कर दिखाया। आज तो सारे चैनल दूसरी आजादी का जश्न मना रहे हैं। अब इस आजादी का मतलब कौन पूछे?
        भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों के लिये यह एक दो दिन आत्म मंथन का समय है जब उनको प्रचार माध्यम हाशिए पर बैठा दिखा रहे हैं। विवेकवान लोग जानते हैं कि भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान में अनेक बुद्धिमान लोग सक्रिय हैं। शीर्ष पदों पर है और अपनी चतुराई से उन्होंने इस आंदोलन की हवा निकाल दी है। यह अलग बात है कि इस आंदोलन की वजह से उनके मन में अब तेजी से जनकल्याण का भाव आया लगता है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारा संविधान हैं तो हम बचे हुए हैं और संसद और सत्ता प्रतिष्ठान कहीं न कहीं हमारे चुने हुए लोगों की सक्रियता के कारण चल रहे हैं।
पिछले 15 दिनों से परंपरागत राजनीतिक संगठन को शीर्ष पुरुषों ने शायद बहुत तनाव झेला होगा पर अब वह यकीनन चेत गये होंगे। अन्ना साहेब भले हैं पर उनकी टीम का का व्यवहार राजनीतिक रूप से अपरिपक्व हैं। सबसे बड़ी बात यह कि अन्ना अकेले अनशन कर रहे थे पर यह अन्ना की टीम केवल राजनीति करती दिखी। ऐसा लगा कि अन्ना का अनशन उनकी निजी जागीर हो। अभी एक स्वामी की हवा निकली है और अब उनका सामना देश के समस्त परंपरागत राजनीतिक संगठनों से होगा तो पता नहीं कितनों की हवा निकल जायेगी।     आखिरी बात यह है कि इस गलत फहमी में किसी को नहीं रहना चाहिए कि अन्ना टीम कोई हाथ पर हाथ धरे बैठेगी। ऐसा लगता है कि अगले चुनाव में इसके लोग मैदान में भी उतर सकते हैं। परंपरागत राजनीतिक दलों को उनकी इस बात पर यकीन नहीं करना चाहिए वह गैरराजनीतिक लोग हैं। दरअसल अन्ना टीम धीरे धीरे परंपरागत राजनीतिक संगठनों को अप्रासंगिक दर्शाते हुए जनता में उनकी छवि खराब करेगी फिर आखिर यही कहेगी कि चुनाव में हमें जितवाने के अलावा जनता के पास कोई चारा नहीं है।
          विवेकशील पुरुष इस बात से खुश हैं कि अन्ना साहेब के अनशन से देश भर में उपजा तनाव खत्म हो गया है पर जिस तरह इसकी कथित विजय पर जश्न मन रहा है वह शक पैदा करता है कि वाकई यह कोई भ्रष्टाचार की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाले हैं। अब तो मामला चुनाव सुधार की तरफ मुड़ गया है। अन्ना साहेब भले हैं पर अपना राजनीतिक इस्तेमाल होने देते हैं। कोई उनको चला नहीं सकता यह सच है पर अपनी राजनीतिक मौज के चलते वह अपने चेलों की सहायता करते हैं। वह कहते हैं कि वह महात्मा गांधी के अनुयायी हैं और यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी छवि राजनीतिक संत की रही है। अन्ना साहब की वाक्पटुता गजब की है और उनका एक एक वाक्य जनमानस में प्रभाव डालता है। जब वह कहते हैं कि अभी अनशन स्थगित किया है खत्म नहीं किया तो समझना चाहिए कि उनकी राजनीतिक मौज का सिलसिला जारी रहेगा। यह स्पष्ट है कि अनशन की समाप्ति पर वह विवेकवान लोगों के नजरिये को समझते हैं पर यह भी जानते हैं कि उनके नाम से जुटी भीड़ नारों पर चलने और वादों में बहने वाली है इसलिये उसे अपने साथ बनाये रखने के लिये यह अहसास दिलाना जरूरी है कि आधी ही सही जीत जरूर हुई है।

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) का अनशन समाप्त होना स्वागतयोग्य-हिन्दी लेख (end of anna hazare fast and agitation-hindi lekh or article)               
       महाराष्ट्र के समाज सेवी अन्ना हजारे आज पूरे देश के जनमानस में ‘महानायक’ बन गये हैं। वजह साफ है कि देश में जन समस्यायें विकराल रूप ले चुकी हैं और इससे उपजा असंतोष उनके आंदोलन के लिये ऊर्जा का काम कर रहा है। पहले अप्रैल में उन्होंने अनशन किया और फिर अगस्त माह में उन्होंने अपने अनशन की घटना को दोहराया। जब अप्रेल   में उन्होंने अनशन आश्वासन समाप्त किया तब उनका मजाक उड़ाया गया था कि वह तो केवल प्रायोजित आंदोलन चला रहे हैं। अब की बार उन्होंने 12 दिन तक अनशन किया। इस अनशन से भारत ही नहीं बल्कि विश्व जनमानस पर पड़े प्रभावों का अध्ययन अभी किया जाना है क्योंकि इस प्रचार विदेशों तक हुआ है। फिर जिन लक्ष्यों को लेकर यह अनशन किया गया उनके पूरे होने की स्थिति अभी दूर दिखाई देती है मगर देश के चिंतकों के लिये इस समय उनकी उपेक्षा करना ही ठीक है। अन्ना हजारे के अनशन आंदोलित पूरे देश के लोगों ने उसकी समाप्ति पर विजयोन्माद का प्रदर्शन किया पर महानायक ने कहा‘‘यह जीत अभी अधूरी है और अभी मैंने अनशन स्थगित किया है समाप्त नहीं।’ इस बयान से एक बात तो समझ में आती है कि अन्ना साहेब में राजनीतिक चातुर्य कूट कूटकर भरा है।
              अन्ना साहेब के बारह दिनों तक चले अनशन में तमाम उतार चढ़ाव आये और अगर उनका उसे छोड़ना ही सफलता माना जाये तो कोई बुरी बात नहीं है। साथ ही लक्ष्य से संबंधित परिणामों पर दृष्टिपात न करना भी ठीक है। पूरे देश का जनमानस ही नहीं जनप्रतिनिधियों के मन में जो भारी तनाव इस दौरान दिखा वह चौंकाने वाला था। इसका कारण यह था कि हिन्दी प्रचार माध्यम निरंतर इससे जुड़े छोटे से छोटे से घटनाक्रम का प्रचार क्रिकेट मैच की तरह कर रहे थे गोया कि देश में अन्य कोई खबर नहीं हो।
            अगर हम तकनीकी दृष्टि से बात करें तो अन्ना साहेब के प्रस्तावित जनलोकपाल ने अभी एक इंच कदम ही बढ़ाया होगा पर अन्ना साहेब की गिरते स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह भारी सफलता है। हम तत्काल इस आंदोलन के परिणामों पर विचार कर सकते हैं पर ऐसे में हमारा चिंत्तन इसके दूरगामी प्रभावों को देख नहीं पायेगा।  इस आंदोलन के लेकर अनेक विवाद हैं पर यह तो इसके विरोधी भी स्वीकारते हैं कि इसके प्रभावों का अनदेखा करना ठीक नहीं है।
         प्रधानमंत्री श्रीमनमोहन सिंह की चिट्ठी मिलने के बाद श्री अन्ना साहेब न अनशन तोड़ा। अपने पत्र में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने यह अच्छी बात कही है कि ‘संसद ने अपनी इच्छा व्यक्त कर दी है जो कि देश के लोगों की भी है।’’
           उनकी इस बात में कोई संदेह नहीं है और इस विषय पर संसद के शनिवार को अवकाश के दिन विशेष सत्र में सांसदों ने जिस तरह सोच समझ के साथ ही दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपने विचार जिस तरह दिये वह इसका प्रमाण भी है। संभव है विशेषाधिकार के कारण कुछ सांसदों के मन में अहंकार का भाव रहता हो पर कल सभी के चेहरे और वाणी से यही भाव दिखाई देता कि किस भी भी तरह इस 74 वर्षीय व्यक्ति का अनशन टूट जाये जो कि इस देश के जनमानस का ही भाव है। सच बात तो यह है कि इस बहस में आंदोलन से जुड़े संबंधित सभी तत्वों का सार दिखाई देता है। यही कारण है कि प्रचार माध्यमों के सहारे इस आंदोलन की सफलता की बात कही गयी। अनेक सांसदों ने इस आंदोलन के उन देशी विदेशी पूंजीपतियों से प्रायोजित होने की बात भी कही जो भारत की संसदीय प्रणाली पर नियंत्रण करना चाहते हैं। इसके बावजूद सभी ने श्री अन्ना हजारे के प्रति न केवल सभी ने सहानुभूति दिखाई बल्कि उनके चरित्र की महानता को स्वीकार भी किया। देश के जनमानस का अब ध्यान करना होगा यह बात कमोबेश सभी सांसदों  ने स्वीकार की और इस आंदोलन के अच्छे परिणाम के रूप में इसे माना जा सकता है।
           देश के जिन रणनीतिकारों ने इस विषय पर संसद का विशेष सत्र आयोजित करने की योजना बनाई हो वह बधाई के पात्र हैं क्योंकि श्री अन्ना साहेब की वजह से देश के युवा वर्ग ने उसे देखा और यकीनन उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रुचि बढ़ेगी। देश के संासदों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने इस बात को अनुभव किया कि अन्ना साहेब की देश में एक महानायक की छवि है और उन पर आक्षेप करने का मतलब होगा देश की आंदोलित युवा पीढ़ी के दिमाग में अपने लिये खराब विचार करना इसलिये शब्दों के चयन में सभी ने गंभीरता दिखाई। बहरहाल कुछ सांसदों ने प्रचार माध्यमों पर आंदोलन को अनावश्यक प्रचार का आरोप लगाया पर उन्हें यह भी याद रखना होगा इसी विषय पर हुए विशेष सत्र के बहाने उन्होंने पूरे देश को संबोधित करने का अवसर पाया जिसे इन्हीं प्रचार माध्यमों ने अपने समाचारों में स्थान दिया। यह अलग बात है कि इस दौरान उनके विज्ञापन भी अपना काम करते रहे। वैसे तो संसद की कार्यवाही चलती रहेगी पर इस तरह पूरे राष्ट्र को संबोधित करने का अवसर सांसदों के पास बहुत समय बाद आया। उनको इस बात पर भी प्रसन्न होने चाहिए कि अभी तक प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र को संबोधित न करने के कारण जनप्रतिनिधियों पर देश के जनमानस की उपेक्षा का आरोप लगता है वह इस अवसर के कारण धुल गया क्योंकि उन्होंने देश की इच्छा को ही व्यक्त किया।
         हम जैसे आम लेखकों के पास इंटरनेट और प्रचार माध्यम ही है जिसके माध्यम से विचारणीय सामग्री मिलती है यह अलग बात है कि उसे छांटना पड़ता है। होता यह है कि समाचार पत्र और टीवी चैनल अपनी रोचकता का स्तर बनाये रखने के लिये किसी एक घटना में बहुत सारे पैंच बना देते हैं और फिर अलग अलग प्रस्तुति करने लगते हैं। सामग्री में दोहराव होता है और जब पाठकों और दर्शकों के अधिक जुड़ने की संभावना होती है तो उनके विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं। समस्त प्रचार माध्यम धनपतियों के हाथ में और यही कारण है कि अन्ना साहेब के आंदोलन के प्रायोजन की शंका अनेक बुद्धिमान लोगों के दिमाग में आती है। इसमें कुछ अंश सच हो सकता है पर एक बात यह है अन्ना साहेब एक सशक्त चरित्र के स्वामी हैं।
             आखिरी बात यह है कि भोगी कितना भी बड़ा पद पा जाये वह बड़ा नहीं कहा जा सकता। बड़ा तो त्यागी ही कहलायेगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्ना साहेब ने अन्न का त्याग किया था। पूरे 12 दिन तक अन्न का त्याग करना आसान काम नहीं है। हम जैसे लोग तो कुछ ही घंटों में वायु विकार का शिकार हो जाते हैं। अन्ना साहेब ने एक ऐसे भारत की कल्पना लोगों के सामने प्रस्तुत की है जो अभी स्वप्न ही लगता है पर सबसे बड़ी बात वह अभी अपने प्रयास जारी रखने की बात भी कह रहे हैं। मुश्किल यह है कि वह अनशन शुरु कर देते हैं तब आदमी का हृदय कांपने लगता है। यही कारण है कि उनका अनशन टूटना भी ही लोगों में विजयोन्माद पैदा कर रहा है। उन्होंने जिस तरह आज की युवा पीढ़ी को वैचारिक रूप से सशक्त बनाया उसकी प्रशंसा तो की ही जाना चाहिए जो कि अंततः हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के वाहक हैं।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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