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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

1/28/2010

प्रसिद्ध लोगों का कथन कितना सार्थक-हिन्दी लेख (famous parson of hindi and hindi blog-hindi article)

इस देश में कई ऐसे महान लेखक हैं कि अगर हम स्वयं लेखक न हों तो उनका नाम नहीं जानते होते। इतना ही नहीं समाचार पत्र पत्रिकाओं में कई लेख भी न पढ़ें अगर हमारे अंदर पढ़कर लिखने का जज़्बा न हो। कहने का अभिप्राय यह है कि आम भारतीय अखबार केवल समाचारों की वजह से पढ़ता है उसमें भी स्थानीय समाचारों के छपने की अपेक्षा के साथ-अंदर के लेख तो बहुत कम लोग पढ़ते हैं। इस देश में अनेक समाचार पत्रों ने अनेक ऐसे लेखकों को महान बनाया है जो समसामयिक विषयों पर हल्का फुल्का ही लिख पाते है। इनमें से अनेक महान लोग अनेक ऐसी संस्थाओं के प्रमुख भी बन जाते हैं जो इस देश की फिल्मों, टीवी चैनलों तथा साहित्य का मार्ग दर्शन करती है और उनके कथन बड़े महत्व के साथ समाचार पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनलों तथा रेडियो पर उद्धृत किये जाते हैं।
ऐसे ही अनेक लेखक तथा अन्य विचारक हिन्दी ब्लाग जगत के नकारात्मक पक्षों को उभार कर यह साबित कर रहे हैं कि वहां के लेखक सामान्य स्तर के हैं-या कहें कि संपादक के पत्र लिखने तक की औकात रखते हैं। वह ब्लाग जगत के आपसी विवादों को बाहर भयानक कहकर प्रचारित कर रहे हैं क्योंकि वह स्वयं ही सीमित ब्लाग देखते हैं-वैसे ऐसे बड़े लोग स्वयं नहीं देखते होंगे जब तक चेला चपाटा कंप्यूटर खोलकर न दिखाये। हिन्दी ब्लाग जगत के बहुत कम लेखक इन लोगों की मानसिकता को जानते हैं वह भी पूरी तरह उसे उजागर करने का समय नहीं निकालते।
यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि अंतर्जाल के माध्यम से हिन्दी आधुनिक काल-इसे अब उत्तरोतर काल भी कह सकते हैं-से निकलकर वैश्विक काल में प्रवेश कर चुकी है और इसमें वह लेखक अपना अस्तित्व ढूंढ रहे हैं जो अपने लिखे से कम अपनी चालाकियों और संबंधों की वजह से प्रसिद्ध हुए हैं। कंप्यूटर पर स्वयं टंकित करना या किसी से दूसरे को मोहताज होने में वह अपनी हेठी समझते हैं-इस पर तकनीकी फंडा भी है कि उनको पहले कंप्यूटर गुरु ढूंढना होगा और उसकी जीहुजूरी करनी होगी। ऐसे शब्दों के खिलाड़ी हिन्दी ब्लाग जगत के बारे में जानना तो चाहते हैं पर इसके लिये उनको सहयोगी चाहिये और इससे उनके अंदर यह आशंका बलवती होती होगी कि वह किसी दूसरे लेखक को महत्व देते हुए दिख रहे हैं। सच बात तो यह है कि हिन्दी ब्लाग जगत एक व्यापक रूप धारण करता जा रहा है। अभी तक हिन्दी के उत्तरोतर काल के लेखक संगठित प्रचार माध्यमों-समाचार/साहित्य पत्र पत्रिकाऐं, टीवी चैनल और रेडियो के साथ व्यवसायिक प्रकाशन उद्योग-के सहारे प्रसिद्धि के शिखर पर हैं। एक तरह से वह बाजार की ताकत के सहारे हैं। वह उनको हर जगह मंच उपलब्ध कराता है और इनकी शक्ति इतनी अधिक है कि वह अपने ही चेलों को भी एक सीमा तक आगे ले आते हैं-अन्य किसी व्यक्ति का सामने आना उनको मंजूर नहीं है। हिन्दी ब्लाग जगत में भी बाजार सक्रिय होगा पर पर फिर भी असंगठित क्षेत्र के ब्लाग लेखक उनके बस में नहीं होंगे-सीधा आशय यह है कि हिन्दी ब्लाग जगत हमेशा ही संागठनिक ढांचों की पकड़ से बाहर रहेगा। ऐसे में बेहतर लिखने वाले किसी की परवाह नहीं करेंगे तब हमारे यह उत्तरोत्तर कालीन महान लेखक अपनी गुरुता किसे दिखायेंगे? यह खौफ अनेक विद्वानों में हैं और चाहे जब हिन्दी ब्लाग जगत पर कुछ भी प्रतिकूल टिप्पणी करने लगते हैं।
इनकी दूसरी मुश्किल यह भी है कि देश को कोई भी ब्लाग लेखक बिना सांगठनिक ढांचों की सहायता के अपनी बात अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा रहा है। ब्लाग पर लिखा अनुवाद कर दूसरी भाषाओं के लोग भी पढ़ते हैं। हिन्दी के लेखक अंग्रेजी तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में पढ़े जा रहे हैं। उनको कितने पाठक पढ़ रहे हैं यह अभी विवादों के घेरे में लगता है। कभी कभी तो लगता है कि लोग अधिक पढ़ रहे हैं पर काउंटर कम व्यूज दिखा रहा है और अधिक दिखते हैं तो यह भी शक होता है कि कहीं से फर्जी व्यूजा नहीं है। एक जगह से भेजा गया व्यूज दूसरी जगह नहंी दिखता। कहीं दिख रहा है तो वह मूल स्थान पर नहीं दिखता। महत्वपूर्ण यह है कि हिन्दी ब्लाग जगत के बेहतर पाठ निरंतर पाठक जुटा रहे हैं तो सामयिक पाठ भी।
अक्सर लोग कहते हैं कि अखबार लाखों लोग पढ़ते हैं। सच है पर कितने लोग पूरा पढ़ते हैं और कितने याद रखते हैं यह भी एक विचार का विषय है। यह ब्लाग तो चलते फिरते अखबार और किताबें हैं और इससे कम लोग पढ़ते हैं यह सच है पर आगे भी पढ़ जाते रहेंगे न कि किसी अल्मारी में बंद होंगे। हिन्दी ब्लाग जगत में जो नये लेखक हैं उनको यह गलतफहमी नहीं रखना चाहिये कि अधिक स्तर पर छपना ही बड़े लेखक होने का प्रमाण है। वह इन बड़े लेखकों के नाम सुनते होंगे पर इनकी कोई रचना उनकी स्मृति में नहीं होगी। एक भाषाविद् की तरह अपने शब्दों में अधिक से अधिक कठिन शब्द लिखना या लंबे वाक्य घुमा फिराकर कहने से कोई बड़ा लेखक नहीं हो जाता। एक ही घटना पर साल भर लिखना से विद्वता प्रमाणित नहीं होती। यहां तक कि उपन्यास लिखने से भी कोई महान नहीं हो जाता। अगर आपकी कोई एक रचना भी बेहतर निकल आये तो वह आपकी याद सदियों तक रख सकती है-‘उसने कहा था’ कहानी की तरह जो गुलेरी साहब ने लिखी थी। आधुनिक हिन्दी के महान साहित्यकार प्रेमचंद,जयशंकर प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्र कुमारी चैहान और सूर्यकांत त्रिपाठी जैसे महान लेखक अब यहां नहीं होते क्योंकि लोग थोड़ा लिखकर सुविधाओं की पीछे भागते हैं-इसी प्रयास में ही वह लिखना भी शुरु करते हैं और उनके शब्द बहुत गहराई तक छूते नहीं लगते।
हमने यह तो सुना है कि अच्छा पढ़े बिना अच्छा नहीं लिख सकते। साथ ही यह भी चालीस लाईनें पढ़ेंगे तब एक लाईन लिख पायेंगे। अंतर्जाल पर आकर इस बात की सच्चाई भी देख ली। अनेक बड़े लेखकों ने ब्लाग बनाये हैं पर उनका लिखा देखकर यही लगता है कि वह पढ़ते बिल्कुल नहीं हैं। छात्र जीवन के बाद उन्होंने शायद ही पढ़ने को अधिक महत्व दिया है। उनका लेखन सतही लगता है।
एक जगह पर हम दो दिन रुके थे वहां अंतर्जाल की सुविधा एक बालिका उपयेाग करती थी। वह अंतर्जाल पर सौंदर्य सामग्री से संबंधित विषय अंग्रेजी में पढ़ रही थी। उसने अंतर्जाल पर हिन्दी के न होने की बात कही तो हमने अपना लेखकीय परिचय न देते हुए उसे ब्लागवाणी तथा चिट्ठाजगत का पता दिया इस जानकारी के साथ कि वहां हिन्दी के ढेर सारे ब्लाग पढ़ने को मिलते हैं। हमने उसे अपने ब्लाग का परिचय इसलिये नहीं दिया क्योंकि उनके कुछ हास्य कवितायें थी जिन पर उपहास बन सकता था।
अगले दिन फिर उसके घर जाना हुआ। वह चिट्ठाजगत खोले बैठी थी और उसने मस्ती कालम के द्वारा हमारा ब्लाग पकड़ लिया था। इसी लेखक का ब्लाग दिखाते हुए कहा-‘इस कविता से मेरी चिढ़ छूट रही है।’
हमने वह कविता देखी तो कह दिया कि ‘यह तो बेकार लेखक लग रहा है।’
वह लड़की प्रतिवाद करते हुए दूसरी कविता दिखाते बोली-‘नहीं, इसकी यह कविता बहुत अच्छी है।’
उसने तीन कविताओं को ठीक और दो को बहुत अच्छा और एक को चिढ़ाने वाली बताया। सबसे बड़ी बात तो यह कि उसने एक अन्य ब्लाग लेखक के लेख तारीफ की‘इसका यह दो लेख बहुत अच्छे हैे। तीसरा यह ठीक लगता है।’
हमने दोनों लेखकों की तुलना पूछी तो उसका जवाब था कि ‘दोनों अलग अलग तरह के हैं पर ठीक लिखते हैं। दूसरे लोग भी ठीक लगे पर इन दोनों को ज्यादा पढ़ा। दूसरे लोग के भी ब्लाग देखे पर उनमें कुछ ही ठीक हैं और बाकी का तो समझ में नहीं आया।’
उसने जिस दूसरे ब्लागर की खुलकर तारीफ की उसका नाम लिखेंगे तो लोग कहेंगे कि चमचागिरी कर रहा है पर उस ब्लागर का मत भी वही है कि अधिक पढ़ो तभी लिख पाओगे। वह ब्लाग जगत में बहुत लोकप्रिय है और यकीनन उसका स्तर अनेक मशहूर लेखकों से अच्छा है। वह ब्लागर भी सांगठनिक ढांचे के प्रकाशनों से त्रस्त रहा है और यह ठीक है कि उसे बहुत लोग नहीं पढ़ते होंगे पर वह इस हिन्दी ब्लाग जगत को ऐसी रचनायें देगा जो अविस्मरणीय होंगी। उस बालिका के मुख से उस ब्लागर की प्रशंसा ने हमारे इस मत को पुष्ट किया कि बड़े लेखक भले ही मशहुर हैं पर पढ़ते नहीं है और इसलिये उनके चिंतन सतही हो जाते हैं जबकि स्वतंत्र और मौलिक ब्लागर जो सब तरफ पढ़कर और फिर अपने चिंतन के साथ यहां पाठ-कहानियां, व्यंग्य, आलेख और कवितायें रखेगा उसके सामने बड़े बड़े लेखक पानी भरते नज़र आयेंगे। अंतर्जाल पर वैश्विक काल की हिन्दी अनेक बेजोड़ लेखक ला सकती है जो गागर में सागर भरेंगे।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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1/25/2010

इंटरनेट और कंप्यूटर की व्याधियों से बचने का उपाय योग साधना-आलेख (internet,computer and yog sadhna-hindi article)


कुछ समाचारों के अनुसार इंटरनेट पर अधिक काम करना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। इंटरनेट का संबंध कंप्यूटर से ही है जिसके उपयोग से वैसे भी अनेक बीमारियां पैदा होती हैं। एक खबर के अनुसार कंप्यूटर पर काम करने वालों में विटामिन डी की कमी हो जाती है इसलिये लोगों को धूप का सेवन अवश्य करना चाहिये। अगर इन खबरों का विश्लेषण करें तो उनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि कंप्यूटर और इंटरनेट के अधिक प्रयोग से ही शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा इनके उपयोग के समय अपने आपको अनावश्यक रूप से थकाने के साथ ही अपनी शारीरिक तथामानसिक स्थिति पर पर्याप्त ध्यान न देना बहुत तकलीफदेह यह होता है। सच बात तो यह है कि इंटरनेट तथा कंप्यूटर पर काम करने वालों के पास उससे होने वाली शारीरिक और मानसिक व्याधियों से बचने का एकमात्र उपाय योग साधना के अलावा अन्य कोई उपाय नज़र नहीं आता।
दरअसल कंप्यूटर के साथ अन्य प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक सावधानियां रखने के नुस्खे पहले बहुत पढ़ने को मिलते थे पर आजकल कहीं दिखाई नहीं देते । कुछ हमारी स्मृति में हैें, जो इस प्रकार हैं-
कंप्यूटर पर बीस मिनट काम करने के बाद विश्राम लें। पानी अवश्य पीते रहें। खाने में नियमित रूप से आहार लेते रहें। पानी पीते हुए मुंह में भरकर आंखों पर पानी के छींटे अवश्य मारें। अगर कंप्यूटर कक्ष से बाहर नहीं आ सकें तो हर बीस मिनट बार अपनी कुर्सी पर ही दो मिनट आंख बंद कर बैठ जायें-इसे आप ध्यान भी कह सकते हैं। काम खत्म करने पर बाहर आकर आकाश की तरफ जरूर अपनी आंखें केंद्रित करें ताकि संकीर्ण दायरे में काम कर रही आंखें व्यापक दृश्य देख सकें।
दरअसल हम भारतीयों में अधिकतर नयी आधुनिक वस्तुओं के उपयोग की भावना इतनी प्रबल रहती है कि हम अपने शरीर की सावधनी रखना फालतु का विषय समझते हैं। जहां तक बीमारियों का सवाल है तो वह शराब, सिगरेट और मांस के सेवन से भी पैदा होती हैं इसलिये इंटरनेटर और कंप्यूटर की बीमारियों से इतना भय खाने की आवश्यकता नहीं है मगर पर्याप्त सावधानी जरूर रखना चाहिए।
इंटरनेट और कंप्यूटर पर काम करने वाले हमारे देश में दो तरह लोग हैं। एक तो वह है जो शौकिया इससे जुड़े हैं और दूसरे जिनको इससे व्यवसायिक बाध्यता ने पकड़ा है। जो शौकिया है उनके लिये तो यह संभव है कि वह सावधानी रखते हुए काम करें-हालांकि उनके मनोरंजन की प्यास इतनी गहरी होती है कि वह इसे समझेंगे नहीं-पर जिनको नौकरी या व्यवसाय के कारण कंप्यूटर या इंटरनेट चलाना है उनके स्थिति बहुत दयनीय होती है। दरअसल इंटरनेट और कंप्यूटर पर काम करते हुए आदमी की आंखें और दिमाग बुरी तरह थक जाती हैं। यह तकनीकी काम है पर इसमें काम करने वालों के साथ एक आम कर्मचारी की तरह व्यवहार किया जाता है। जहां कंप्यूटर या इंटरनेट पर काम करते एक लक्ष्य दिया जाता है वहां काम करने वालों के लिये यह भारी तनाव का कारण बनता है। दरअसल हमारे देश में जिनको कलम से अपने कर्मचारियेां को नियंत्रित करने की ताकत मिली है वह स्वयं कंप्यूटर पर काम करना अपने लिये वैसे ही हेय समझते हैं जैसे लिपिकीय कार्य को। वह जमीन गड़ढा खोदने वाले मजदूरो की तरह अपने आपरेटरों से व्यवहार करते हैं। शारीरिक श्रम करने वाले की बुद्धि सदैव सक्रिय रहती है इसलिये वह अपने साथ होने वाले अनाचार या बेईमानी का मुकाबला कर सकता है। हालांकि यह एक संभावना ही है कि उसमें साहस आ सकता है पर कंप्यूटर पर काम करने वाले के लिये दिमागी थकावट इतनी गहरी होती है कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता काम के तत्काल बाद समाप्त ही हो जाती है। इसलिये जो लोग शौकिया कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़े हैं वह अपने घर या व्यवसाय में परेशानी होने पर इससे एकदम दूर हो जायें। जिनका यह व्यवसाय है वह भी अपने साइबर कैफे बंद कर घर बैठे या किसी निजी संस्थान में कार्यरत हैं तो पहले अवकाश लें और फिर तभी लौटें जब स्थिति सामान्य हो या उसका आश्वासन मिले। जब आपको लगता हो कि अब आपको दिमागी रूप से संघर्ष करना है तो तुरंत कीबोर्ड से हट जायें। घर, व्यवसाय या संस्थान में अपने विरोधी तत्वों के साथ जब तक अमन का यकीन न हो तब कंप्यूटर से दूर ही रहें ताकि आपके अंदर स्वाभाविक मस्तिष्कीय ऊर्जा बनी रहे।
कंप्यूटर पर लगातार माउस से काम करना भी अधिक थकाने वाला है। जिन लोगों को लेखन कार्य करना है अगर वह पहले कहीं कागज पर अपनी रचना लिखे और फिर इसे टाईप करें। इससे कंप्यूटर से भी दूरी बनी रहेगी दूसरे टाईप करते हुए आंखें कंप्यूटर पर अधिक देर नहंी रहेंगी। जो लेाग सीधे टाईप करते हैं वह आंखें बंद कर अपने दिमाग में विचार करते हुए टंकित करें।
वैसे गूगल के फायरफाक्स में बिना माउस के कंप्यूटर चलाया जा चलाया जा सकता है। जहां तक हो सके माउस का उपयोग कम से कम करें। वैसे भी बेहतर कंप्यूटर आपरेटर वही माना जाता है जो माउस का उपयोग कम से कम करता है।
कुछ लोगों का कहना है कि कंप्यूटर पर काम करने से आदमी का पेट बाहर निकल आता है क्योंकि उसमें से कुछ ऐसी किरणें निकलती हैं जिससे आपरेटर की चर्बी बढती है। इस पर थोड़ा कम यकीन आता है। दरअसल आदमी जब कंप्यूटर पर काम करता है तो वह घूमना फिरना कम कर देता है जिसकी वजह से उसकी चर्बी बढ़ने लगती है। अगर सुबह कोई नियमित रूप से घूमें तो उसकी चर्बी नही बढ़ेगी। यह अनुभव किया गया है कि कुछ लोगों को पेट कंप्यूटर पर काम करते हुए बढ़ गया पर अनेक लोग ऐसे हैं जो निरंतर काम करते हुए पतले बने हुए हैं।
आखिरी बात यह है कि कंप्यूटर पर काम करने वाले योगसाधना जरूर करें। प्राणायाम करते हुए उन्हेंइस बात की अनुभूति अवश्य होगी कि हमारे दिमाग की तरफ एक ठंडी हवा का प्रवाह हो रहा हैं। सुबह प्राणायाम करने से पूर्व तो कदापि कंप्यूटर पर न आयें। रात को कंप्यूटर पर अधिक देर काम करना अपनी देह के साथ खिलवाड़ करना ही है। सुबह जल्दी उठकर पहले जरूर पानी जमकर पियें और उसके बाद अनुलोम विलोम प्राणायाम निरंतर करंें। इससे पांव से लेकर सिर तक वायु और जल प्रवाहित होगा उससे अनेक प्रकार के विकार बाहर निकल आयेंगे। जब आप करेंगे तो आपको यह लगने लगेगा कि आपने एक दिन पूर्व जो हानि उठाई थी उसकी भरपाई हो गयी। यह नवीनता का अनुभव प्रतिदिन करेंगे। वैसे कंप्यूटर पर काम करते समय बीच बीच में आंखें बंद कर ध्यान अपनी भृकुटि पर केद्रित करें तो अनुभव होगा कि शरीर में राहत मिल रही है। अपने साथ काम करने वालों को यह बता दें कि यह आप अपने स्वास्थ्य के लिये कर रहे हैं वरना लोग हंसेंगे या सोचेंगे कि आप सो रहे हैं।
किसी की परवाह न करें क्योंकि सबसे बड़ी बात तो यह है कि जान है तो जहान हैं। भले ही इस लेख की बातें कुछ लोगों को हास्यप्रद लगें पर जब योगासन, ध्यान, प्राणायाम तथा मंत्रोच्चार-गायत्री मंत्र तथा शांति पाठ के सा ओम का जाप- करेंगे और प्रतिदिन नवीनता के बोध के साथ इंटरनेट या कंप्यूटर से खेलें्रगे तक इसकी गंभीरता का अनुभव होगा।



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1/20/2010

आज बसंत पंचमी है-आलेख (today basat panchami-hindi article)

इस बार की बसंत पंचमी में सर्दी का प्रकोप घेर कर बैठा है। कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा कि मौसम समशीतोष्ण हुआ हो, अलबत्ता लगता है कि सर्दी थोड़ा कम है पर इतनी नहीं कि उसके प्रति लापरवाही दिखाई जा सके।
अगर पर्व की बात करें तो बसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। यह मौसम खाने पीने और घूमने के लिये बहुत उपयुक्त माना जाता है-यानि पूरा माह आनंद के लिये उपयुक्त है। समशीतोष्ण मौसम हमेशा ही मनुष्य को आनंद प्रदान करता है। वैसे हमारे यहां भले ही सारे त्यौहार एक दिन मनते हैं पर उनके साथ जुड़े पूरे महीने का मौसम ही आनंद देने वाला होता है। ऐसा ही मौसम अक्टुबर में दिपावली के समय होता है। बसंत के बाद फाल्गुन मौसम भी मनोरंजन प्रदान करने वाला होता है जिसका होली मुख्य त्यौहार है। दिवाली से लेकर मकर सक्रांति तक आदमी का ठंड के मारे बुरा हाल होता है और ऐसे में कुछ महापुरुषों की जयंती आती हैं तब भक्त लोग कष्ट उठाते हुए भी उनको मनाते हैं क्योंकि उनका अध्यात्मिक महत्व होता है। मगर अपने देश के पारंपरिक पर्व इस बात का प्रमाण हैं कि उनका संबंध यहां के मौसम से होता है।
प्रसंगवश फरवरी 14 को ही आने वाले ‘वैलंटाईन डे’ भी आजकल अपने देश में नवधनाढ्य लोग मनाते हैं पर दरअसल मौसम के आनंद का आर्थिक दोहन करने के लिये उसका प्रचार बाजार और उसके प्रचार प्रबंधक करते हैं।
बसंत पंचमी पर अनेक जगह पतंग उड़ाकर आनंद मनाया जाता है हालांकि यह पंरपरा सभी जगह नहीं है पर कुछ हिस्सों में इसका बहुत महत्व है।
बहुत पहले उत्तर भारत में गर्मियों के दौरान बच्चे पूरी छूट्टियां पतंग उड़ाते हुए मनाते थे पर टीवी के बढ़ते प्रभाव ने उसे खत्म ही कर दिया है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि पहले लोगों के पास स्वतंत्र एकल आवास हुआ करते थे या फिर मकान इस तरह किराये पर मिलते कि जिसमें छत का भाग अवश्य होता था। हमने कभी बसंत पंचमी पर पतंग नहीं उड़ाई पर बचपन में गर्मियों पर पतंग उड़ाना भूले नहीं हैं।

आज टीवी पर एक धारावाहिक में पंतग का दृश्य देखकर उन पलों की याद आयी। जब हम अकेले ही चरखी पकड़ कर पतंग उड़ाते और दूसरों से पैंच लड़ाते और ढील देते समय चरखी दोनों हाथ से पकड़ते थे। मांजा हमेशा सस्ता लेतेे थे इसलिये पतंग कट जाती थी। अनेक बाद चरखी पकड़ने वाला कोई न होने के कारण हाथों का संतुलन बिगड़ता तो पतंग फट जाती या कहीं फंस जाती। पतंग और माजा बेचने वालों को उस्ताद कहा जाता था। एक उस्ताद जिससे हम अक्सर पतंग लेते थे उससे एक दिन हमने कहा-‘मांजा अच्छा वाला दो। हमारी पतंग रोज कट जाती है।’
उसे पता नहीं क्या सूझा। हमसे चवन्नी ले और स्टूल पर चढ़कर चरखी उतारी और उसमें से मांजा निकालकर हमको दिया। वह धागा हमने अपने चरखी के धागे में जोड़ी। दरअसल मांजे की पूरी चरखी खरीदना सभी के बूते का नहीं होता था। इसलिये बच्चे अपनी चरखी में एक कच्चा सफेद धागा लगाते थे जो कि सस्ता मिलता था और उसमें मांजा जोड़ दिया जाता था।
बहरहाल हमने उस दिन पतंग उड़ाई और कम से कम दस पैंच यानि पतंग काटी। उस दिन आसपास के बच्चे हमें देखकर कर हैरान थे। अपने से आयु में बड़े प्रतिद्वंदियों की पंतग काटी। ऐसा मांजा फिर हमें नहीं मिला। यह पतंग उड़ाने की आदत कब चली गयी पता ही नहीं चला। हालांकि हमें याद आ रहा है कि हमारी आदत जाते जाते गर्मियों में इतने बड़े पैमाने पर पतंग उड़ाने की परंपरा भी जाती रही।
एक बात हम मानते हैं कि परंपरागत खेलों का अपना महत्व है। पहले हम ताश खेलते थे। अब ताश खेलने वाले नहीं मिलते। शतरंज तो आजकल भी खेलते हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता होने के कारण साथी खिलाड़ी मिल जाते हैं। जितना दिमागी आराम इन खेलों में है वह टीवी वगैरह से नहीं मिलता। हमारे दिमागी तनाव का मुख्य कारण यह है कि हमारा ध्यान एक ही धारा में बहता है और उसको कहीं दूसरी जगह लगाना आवश्यक है-वह भी वहां जहां दिमागी कसरत हो। टीवी में आप केवल आंखों से देखने और कानों से सुनने का काम तो ले रहे हैं पर उसके प्रत्युत्तर में आपकी कोई भूमिका नहीं है। जबकि शतरंज और ताश में ऐसा ही अवसर मिलता है। मनोरंजन से आशय केवल ग्रहण करना नहीं बल्कि अपनी इंद्रियों के साथ अभिव्यकत होना भी है।
वैसे कल बसंत पंचमी पर लिखने का विचार आया था पर एक दिन पहले लिखने में हमें मजा नहीं आता। सुबह बिजली नहीं होती। हमारे घर छोड़ने के बाद ही आती है। इधर रात आये तो पहले सोचा कुछ पढ़ लें। एक मित्र के ब्लाग पर बसंत पंचमी के बारे में पढ़ा। सोचा उसे बधाई दें पर तत्काल बिजली चली गयी। फिर एक घंटा बाद लौटी तो अपने पूर्ववत निर्णय पर अमल के लिये उस मित्र के ब्लाग पर गये और बधाई दी। तब तक इतना थक चुके थे कि कुछ लिखने का मन ही नहीं रहा। वैसे इधर सर्दी इतनी है कि बसंत के आने का आभास अभी तो नहीं लग रहा। कुछ समय बाद मौसम में परिवर्तन आयेगा यह भी सच है। बसंत पंचमी का एक दिन है पर महीना तो पूरा है। इस अवसर पर ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई। उनके लिये पूरा वर्ष मंगलमय रहे।
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1/15/2010

मकर संक्रांति और सूर्यग्रहण-हिन्दी लेख (makar sakranti, surya grahan, chandra grahan-hindi lekh)

कई लोगों को काम धंधे से फुरसत नहीं मिलती या फिर किसी के पास पैसा नहीं होता कि वह जाकर मकर संक्रांति, सूर्यग्रहण तथा चंद्रग्रहण के अवसर पर पवित्र नदियों में जाकर स्नान करे। अनेक लोग हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और इलाहाबाद नियमित रूप से घूमने जाते हैं पर जब इन शहरों में कुंभ लगता है तो भीड़ के कारण घर ही बैठे रह जाते हैं। कुछ लोग धर्म और विश्वास की वजह से तो कुछ लोग इस भौतिक संसार का आनंद लेने के लिये ही देश में फैली परंपराओं को निभाते हैं जिनको कुछ लोग अंधविश्वास कहते हैं।
पूरे विश्व में श्रीमद्भागवत गीता को हिन्दुओं का ग्रंथ माना जाता है और उसकी उपेक्षा भी की जाती है। बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि सारे संसार का ज्ञान, विज्ञान और मनोविज्ञान उसमें समाया हुआ है। इतना ही नहीं श्रीमद्भागवत गीता को ‘सन्यास’ की तरफ प्रवृत्त करने वाली मानने वालों को पता ही नहीं है कि वह निर्लिप्ता का अभ्यास कराती है न कि विरक्ति के लिये उकसाती है। श्रीगीता में सांख्यभाव-जिसे सन्यास भी कहा जाता है-को कठिन माना गया है। अप्रत्यक्ष रूप से उसे असंभव कहा गया है क्योंकि अपनी आंखें, कान, नाक तथा अन्य इंद्रियां निचेष्ट कर पड़े रहना मनुष्य के लिये असंभव है और वही सांख्यभाव माना जाता है। अगर हमारी देह में इंद्रियां हैं तो वह सक्रिय रहेंगी। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीगीता में इस संसार में मुुक्त भाव से विचरण के लिये कहा गया है यह तभी संभव है जब आप कहीं एक जगह लिप्त न हों। इसलिये सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के अवसर अनेक अध्यात्मिक ज्ञानी अगर पवित्र नदियों पर नहाने जाते हैं तो उन पर हंसना नहीं चाहिये। दरअसल वह ऐसे स्थानों पर जाकर लोगों में न केवल अध्यात्मिक रुझान पैदा करते हैं बल्कि ज्ञान चर्चा भी करते हैं।


इधर देखने को मिला कि कुछ लोग इसे अंधविश्वास कहकर मजाक उड़ा रहे हैं तो उन पर तरस आ रहा है। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान हर किसी की समझ में नहीं आता और इसलिये यह अधिकार हर किसी को नहीं है कि वह किसी के धाार्मिक कृत्य को अंधविश्वास कहे। अगर कोई पूछता है कि ‘भला गंगा में नहाने से भी कहीं पाप धुलते हैं?’
मान लीजिये हमने जवाब दिया कि ‘ हां!’
तब वह कहेगा कि ‘साबित करो।’
इसके हमारे पास दो जवाब हो सकते हैं उसका मुंह बंद करने के लिये! पहला तो यह कि ‘तुम साबित करो कि नहीं होते हैं।’
दूसरा जवाब यह है कि ‘तुम एक बार जाकर नहाकर देखो, तुम्हें अपने पाप वहां गिरते दिखेंगे।’
एक मजे की बात यह है कि अनेक ऐसे बुद्धिमान लोग हैं जो भक्तों का मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि ‘तुम्हें तो सारा ज्ञान है फिर माया के चक्कर में क्यों पड़ते हो? यह तो हम जैसे सांसरिक लोगों का काम है।


इसका एक ही जवाब है कि ‘अगर यह देह है तो माया का घेरा तो रहेगा ही। अंतर इतना है कि माया तुम्हारे सिर पर शासन करती है और हम उस पर। तुमने पैसा कमाया तो फूल जाते हो पर हम समझते हैं कि वह तो दैहिक जरूरत पूरी करने के लिये आया है और फिर हाथ से चला जायेगा।’
कहने का अभिप्राय है कि देश का हर आदमी मूर्ख नहीं है। लाखों लोग जो मकर संक्रांति और सूर्यग्रहण पर नदियों में नहाते हैं वह हृदय में शुचिता का भाव लिये होते हैं। हिन्दू धर्म में अनेक कर्मकांड और पर्व मनुष्य में शुचिता का भाव पैदा करने के लिये होते हैं। एक बात दूसरी भी कि अपने यहां यज्ञ और हवन आदि होते हैं। अगर हम ध्यान से देखें तो हमारे अधिकतर त्यौहार मौसम के बदलाव का संकेत देते हैं। मकर संक्रांति के बाद सूर्य नारायण उत्तरायण होते हैं। इसका मतलब यह है कि अब गर्मी प्रारंभ होने वाली है। वैसे हमारे यहां यज्ञ हवन सर्दी में ही होते हैं। इसका कारण यह है कि अग्नि के कारण वैसे ही देह को राहत मिलती है दूसरे मंत्रोच्चार से मन की शुद्धि होती है। अब कहने वाले कहते रहें कि यह अंधविश्वास है।
मकर संक्रांति के अवसर पर तिल की वस्तुओं को सेवन किया जाता है जो सर्दी के मौसम में गर्मी पैदा करने वाली होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि हिन्दू धर्म के समस्त त्यौहारों के अवसर सेवन की जाने वाली वस्तुऐं शाकाहारी होती हैं।
कुंभ के दौरान, सूर्यग्रहण और चंद्रगहण के अवसर पर नदियों के किनारे लगने वाले मेले अंधविश्वास का नहीं बल्कि सामुदायिक भावना विकसित करने वाले हैं। अब तो हमारे पास आधुनिक प्रचार साधन हैं पर जब यह नहीं थे तब इन्ही मेलों से धार्मिक, अध्यात्मिक तथा सामाजिक संदेश इधर से उधर प्रेषित होते होंगे। देश में जो संगठित समाज रहें हैं उनमें एकता का भाव पैदा करने में ऐसे ही सामूहिक कार्यक्रमों का बहुत महत्व रहा है।
अब रहा अंधविश्वास का सवाल! इनको अंधविश्वास कहने वाले इनसे मुंह क्यों नहीं फेरते? वह समाज में क्या चेतना ला रहे हैं? कतई नहीं! उनके पास कलम, माईक और कैमरा है इसलिये चाहे जो मन में बकवास है वह कर लें क्योंकि उनका अज्ञान और कमाई का लोभ कोई नहीं दूर सकता। कम से कम श्रीमद्भागवत गीता के संदेश से सराबोर यह समाज तो बिल्कुल नहीं है जो धर्म के नाम पर मिलने वाले आनंददायी अवसर पर समूह के रूप में एकत्रित होता है ऐसी बकवास की परवाह किये बिना। दूसरे यह भी कि श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों को अपना ज्ञान सुनाने का आदेश दिया है। ऐसे में आलोचना करते हुए चीखने वाले चीखते रहें कि यह अंधविश्वास है।’
कहने का तात्पर्य यह है धर्म को लेकर बहस करने वाले बहुत हैं। इसके अलावा हिन्दुओं पर अंधविश्वासी होने को लेकर तो चाहे जो बकवास करने लगता है। मुश्किल यही है कि उनका प्रतिकार करने वाले श्रीगीता का ज्ञान नहीं रखते। हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यहां के लोगों के खून में श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान ऐसा रचाबसा है कि वह किसी की परवाह न कर अपने कार्यक्रम में लगे रहते हैं। कम से कम मौत का गम इस तरह नहीं मनाते कि हर बरस मोमबती जलाकर उन पत्थरों पर जलायें जिनसे मुर्दानगी का भाव मन में आता है। हिन्दू पत्थरों के भगवान को पूजते हैं पर याद रहे उसमें जीवंतता की अनुभूति होती है। मृत्यु सभी की होनी है पर उसका शोक इतना लंबा नहीं खींचा जाता है। जीवन लंबा होता है उसके लिये जरूरी है कि आदमी के अंदर जिंदा दिली हो। पत्थरों में भगवान मानकर उसे पूजो तो जानो कि कैसे अपने अंदर सुखानुभूति होती है। नदी में धार्मिक नहाकर देखो तो जानो मन में कैसे आनंद आता है-ऐसी पिकनिक भी क्या मनाना जिसकी थकावट अगले दिन तक बनी रहे। मकर संक्रांति के पावन पर्व पर मन में जो चिंतन आया वह व्यक्त कर दिया क्योंकि कुछ परेशानियों की वजह से वह लिख नहीं पाया। वैसे भी हमारा मानना है कि हर काम समय पर सर्वशक्तिमान की कृपा से ही होता है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/13/2010

आतंक का भूत-हिन्दी व्यंग (atank ka bhoot-hindi vyanga)

एक विशेषज्ञ का मानना है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी हमले में बिन लादेन बहुत पहले ही मारा जा चुका है पर अमेरिका के रणनीतिकार युद्ध जारी रखने के लिये उसका भूत बनाये रखना चाहते हैं ताकि वहां की खनिज, कृषि और तेल संपदा पर कब्जा बना रहे। ऐसा लगता है कि अमेरिकन लोग भले ही भूत प्रेत को न मानते हों पर एशियाई देशों से उनकी मान्यता को लेकर उसका उपयोग करना सीख गये हैं। इसलिये वह रोज नयी भभूत बनाकर लादेनी भूत को निपटाने का काम करते हैं।
याद आता है जब बचपन में कई सिद्ध लोगों के पास जाते थे तब वह भूतों को भगाने के लिये भभूत दिया करते थे कि अगर जो शायद उनके यहां के यज्ञों की राख वगैरह हुआ करती थी। अब तो लगता है कि जैसे अगर किसी को बाबा बनना है तो उसे भूतों की सवारी तो करनी पड़ेगी। अपने देश के इतिहास में बहुत सारे बाबा हुए हैं। उनके नाम से चमत्कारों का प्रचार ऐसा चला कि उनके नाम पर अभी भी धंधे चल रहे हैं।
उस विशेषज्ञ की बात पर विश्वास करने के बहुत सारे कारण है। उस युद्ध के बाद फिर कभी लादेन का वीडियो नहीं आया। कुछ समय तक उसके घनिष्ट सहयोगी अल जवाहरी का वीडियो आता रहा पर फिर वह भी बंद हो गया। हालांकि विशेषज्ञ का कहना है कि लादेन बीमार भी हो सकता है पर जो हालात लगते हैं उससे तो यह लगता है कि उनका पहला ही दावा अधिक सही है कि लादेन अब केवल एक भूत का नाम है।
किसी को सिद्ध बनना या बनाना है तो वह पहले भूतों की पहचान करे। अमेरिका ने बिन लादेन नाम का एक भूत बना लिया है। दरअसल कभी कभी तो यह लगता है कि कहीं लादेन वाकई भूत तो नहीं था जिसे इंसानी शक्ल के रूप में प्रस्तुत किया गया। एक बात याद रखें अमेरिका पूरे विश्व में हथियारों का सौदागर है। वह उनका निर्माण कर फिर प्रदर्शन कर उनको बेचता है। जिस तरह कोई वाशिंग, मशीन तथा टीवी जैसी चीजें पहले चलाकर दिखाने के बाद बेची जाती हैं तो हथियारेां के लिये भी तो यही करना पड़ेगा तभी तो वह बिकेंगे। आरोप लगाने वाले तो यह भी कहते हैं कि अमेरिका दुनियां भर में युद्ध थोपता ही इसलिये है कि उसे अपने हथियारों का प्रदर्शन करना है ताकि अन्य देश उससे प्रभावित होकर अपने देश की गरीब जनता का पैसा देकर उसका खजाना भरे। आजकल आपने सुना होगा एक ‘ड्रोन’ नाम का एक हवाई जहाज है जो स्वयं ही निशाने चुनता है। उसे चलाने के लिये उसमें पायलट का होना जरूरी नहीं है। अनेक बार ऐसी खबरे आती हैं कि ‘ड्रोन’ ने लादेन के शक में अमुक वह भी जगह ‘अचूक बमबारी’ की। इससे पहले अफगानिस्तान युद्ध में भी अमेरिका के अनेक हथियारों तथा विमानों का प्रचार हुआ था।
हमारे देश में भूतों पर खूब यकीन किया जाता है। इसी कारण बाबाओं का खूब धंधा चलता है। एक आदमी ने बड़े मजे की बात कही थी। उससे उसके मित्र ने पूछा कि ‘एक बात बताओ कि तुम भूत वगैरह की बात करते हो? तुम्हें पता है कि पश्चिमी राष्ट्र हमसे अधिक प्रगति कर गये हैं वहां तो ऐसी बातों पर कोई यकीन नहीं करता। क्या वहां लोग मरते नहीं है? देखों हम लोग ऐसी फालतू बातों पर यकीन करते हैं इसलिये पिछड़ हुऐ हैं जबकि जो भूतों पर यकीन नहीं करते वह मजे कर रहे हैं। ’
उस आदमी ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि ‘वहां तो सभी कुछ आदमी को मिल जाता है। बंगला, गाड़ी, पैसा मिलने के साथ अन्य जरूरतें पूरी हो जाती है। वहां मरने वाले आदमी की कोई कोई ख्वाहिश नहीं रह जाती। यहां गरीबी के कारण लोग अनेक इच्छायें मन में दबाकर मर जाते हैं इसलिये उनको भूत की यौनि मिलती है। यही सोचकर यकीन करना पड़ता है।’

अमेरिका ने सारे झगड़े एशिया में ही किये हैं। उसका सबसे बड़ा शत्रु क्यूबा का फिदेल कास्त्रो उसके पास में ही रहता है पर कभी उस पर हमला नहीं किया। वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान में उसके हमले चर्चित रहे हैं जो कि एशिया में ही है। एशिया में ही लोग भूत बनते हैं और इसलिये वह अपने ही लोग यहां भेजकर उनका भूत यहां रचता है।

वैसे इसमें कोई संदेह नहीं है कि भूत रचकर अपनी ताकत दिखाने की तकनीकी उसने भारत या एशिया से ही सीखा होगा। सीधी सी बात है कि ऊनी सामान बेचने वाला सर्दी का, धर्म बेचने वाला अधर्म का, शराब बेचने वाला गमों का और ऋण देने वाले पैसा देकर फिर उसे बेदर्दी से वसूलने से पहले जरूरतों का भूत नहीं खड़ा करेगा तो फिर उसका काम कैसे चलेगा? अमेरिका ने लादेन नाम के भूत से अरबों डालरों की कमाई की होगी। लादेन के मरने का मतलब है कि उसे युद्ध छोड़ना पड़ेगा। युद्ध छोड़ा तो प्रयोग कैसे करेगा? ऐसे में उसके द्वारा निर्मित हथियार और विमान कोई नहीं खरीदेगा।
जिस तरह लोग प्रायोजित भूत खड़ा करते हैं उससे तो यह लगता है कि सचमुच में लादेन रहा भी होगा कि नहीं। ऐसा तो नहीं कभी इस नाम का कोई आदमी अमेरिका में रहता हो और फिर मर गया हो। फिर अमेरिकनों ने किसी दूसरे आदमी की प्लास्टिक सर्जरी कर उसका चेहरा बना कर अफगानिस्तान भेज दिया हो। उस मरे आदमी की पारिवारिक पृष्ठभूमि का इस्तेमाल किया गया हो क्योंकि एक बार अफगानिस्तान आने के बाद वह कभी घर नहीं गया और न ही परिवार वालों से मिला। उसके बारे में अनेक कहानियां आती रहीं पर उनको प्रमाणित किसी ने नहीं किया। इस तरह फिल्मों में अनेक बार देखने को भी मिला है कि नायक का चेहरा लगाकर खलनायक उसे बदनाम करता है। ऐसा ही लादेन नाम के भूत से भी हुआ हो। जिस आदमी ने चेहरा लगाया होगा। भूत के रूप में लादेन को स्थापित करने का काम खत्म होने के बाद वह लौट गया हो। इस तरह के प्रयोजन में पश्चिमी देशों को महारत हासिल है।
हम अभी तक जो सुनते, देखते और पढ़ते हैं उनका आधार तो टीवी, फिल्म और समाचार पत्र ही हैं। कोई कहेगा कि भला यह कैसे संभव है कि भूत को इतना लंबा जीवन मिल जाये? दरअसल आदमी को न मिलता हो पर भूत को कई सदियों तक जिंदा रखा जा सकता है। जिंदा आदमी की इतनी कीमत नहीं है जितना भूत की। हमारे देश में इतने सारे भूत बनाकर रखे गये हैं कि उनके नाम पर खूब व्यापार चलता है। कोई समाज वाद के नाम से चिढ़ता है तो कोई पूंजीवाद के नाम से। किसी को चीन सताता है तो किसी को पाकिस्तान! अमीर के सामने गरीब के हमले का और गरीब के सामने अमीर के शोषण का भूत खड़ा करने में अपने यहां बहुत लोग माहिर हैं। सबसे बड़ा भूत तो अमेरिका का नाम है। उसके सम्राज्यवाद से लड़ने के लिये लोग अपने देश में भी सक्रिय हैं जो बताते हैं कि उसका भूत अब यहां भी आ सकता है। जब वह साठ सालों तक ऐसे भूत को जिंदा रख सकते हैं तो फिर यह तो नयी तकनीकी और तीक्ष्ण चालें चलने वाला अमेरिका है। चाहे जितने भूत खड़ा कर ले उसके नाम पर भभूत यानि हथियार और विमान बेचता जायेगा। बाकी लोग तो छोड़िये उसके ही लोग ऐसे भूतों पर सवाल उठाने लगे हैं। वैसे भारतीय प्रचार माध्यम भी लादेन नाम का भूत बेचकर अपने समय और पृष्ठों के लिये सामग्री भरते रहे हैं।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/07/2010

सिक्कों के पहाड़-हिन्दी शायरी (sikkon ke pahad-hindi shayri)

सिक्कों के पहाड़ पर ही

उम्मीदों की बस्ती बसी दिखती है,

पर वह तो धातु से बने हैं

जिनकी ताकत कितनी भी हो

सच पर खरे नहीं उतरते

बैठे हैं वहां तंगदिल लोग

अपने घर बसाकर

जिनकी कलम वहां रखी हर पाई

बस, अपने ही खाते में लिखती है।

----------

नाव के तारणहार खुद नहीं

उस पर चढ़े हैं,

क्योंकि दिल उनके छोटे

नीयत में ख्याल खोटे

पर उनके चरण बड़े हैं।

उड़ने के लिये उन्होंने

विमान जुटा लिये हैं

गरीब की कमाई के सिक्के

अमीर बनाने में लुटा दिये हैं

नदिया में डूब जाये नाव तो

हमदर्दी बेचने के लिये भी वह खड़े हैं

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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