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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

6/26/2009

नारियों के प्रति बढ़ते अपराध कन्या भ्रुण हत्याओं का परिणाम-आलेख

देश में प्रतिदिन ही महिलाओं के प्रति किये गये अपराध समाचारों की सुर्खियां बन रहे हैं। हालत यह हो गयी है कि एक दिन में पांच पांच समाचार आते हैं और जब अपराधी पकड़े जाते हैं तो यह याद रखना कठिन हो जाता है कि आखिर वह किस घटना के लिये पकड़े गये हैं। इस पर तमाम तरह के आलेख और रिपोर्ताज पढ़ने और सुनने के बाद यह नहीं लगता कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग इसे कन्या भ्रुण हत्याओं से जोड़कर देख पा रहा हो।
जो नियमित रूप से समाचार पत्र पत्रिकायें पढ़ते हैं उनको अच्छी तरह याद होगा जब आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व कन्याओं की भ्रुण हत्या का दौर शुरु हुआ था तब सामाजिक विशेषज्ञों ने स्पष्टतः आज के दृश्य की कल्पना कर बता दी थी। एक लंबे समय तक यह दौर चला फिर इसके लिये कानून भी बना पर सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि कन्याओं की भ्रुण हत्याओं का दौर बंद हुआ। हालत यह है कि एक समय तक पहली संतान के रूप में कन्या होना भी ठीक मानने वाले इस समाज में अब ऐसे भी लोग हैं जो पहली संतान के रूप में भी बेटा चाहते हैं और जरूरत पड़े तो कन्या भ्रुण हत्या करा देते हैं। ऐसी जानकारियां समाचार पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर आती रहती हैं।

महिलाओं पर तेजाब फैंकने या उनके साथ जोर जबरदस्ती की घटनाओं पर विश्लेषण करने वाले अल्पज्ञानी बुद्धिजीवी हर घटना में अपराधी और पीड़िता की स्थितियों के आंकलन में लग जाते हैं। कुछ इसे गिरती कानूनी व्यवस्था ं तो कुछ इसे पहनावे और लड़कियों की आजादी को मानते हैं। इधर इंटरनेट पर ऐसी बहसें देखने को मिलती हैं जिससे लगता है कि वाद और नारों की राह पर चले लेखक और बुद्धिजीवी अपने चिंतन से कम अपने गुरुओं की सोच पर अधिक चलते हैं।
एक कहता है कि
1.लड़कियां उकसावे वाले कपड़े पहनती हैं।
2.वह एक नहीं अनेक लड़के मित्र बनाती हैं जिससे आपस में कभी न कभी तनाव बनता है।
3.माता पिता अपनी व्यस्तताओं के चलते लड़कियों की निगाहबानी नहीं कर पाते जिससे वह अपने युवावस्था के कारण ऐसी गलतियां कर बैठती हैं जो अततः उनके लिये घातक होती है।

दूसरा कहता है कि
1.समाज अभी भी असभ्य है उसका लड़की के प्रति नजरिया नहीं बदला।
2.जैसे जैसे धन की प्रचुरता बढ़ रही है लड़कियों के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं।
3. कानून व्यवस्था की स्थिति खराब है और अपराधियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही नहीं हो रही। पुरुष समुदाय इसके लिये पूरी तरह से जिम्मेदार है।

हो सकता है कि ये सभी लेखक और बुद्धिजीवी सही हों पर वह इन घटनाओं के दृश्यव्य रूप पर ही अपना ध्यान केंद्रित करने से समस्या का हल नहीं हो सकता।
25 वर्ष पूर्व ही सामाजिक विशेषज्ञों ने कहा था कि जिस दहेज समस्या से पीड़ित होकर समाज कन्या भ्रुण हत्याओं के दौर को स्वीकार कर रहा है वह तो हल नहीं होगी बल्कि इससे उनके प्रति जो अपराध होंगे वह अधिक भयानक होंगे।
उनका कहना था कि
1.अभी लड़कियां पर्याप्त मात्रा में हैं इसलिये लड़के इधर उधर नजरें मारकर काम चलाते हैं। एक नहीं तो दूसरी नहंीं तो तीसरी। कहने का तात्पर्य यह है कि उनके संपर्क में अधिक लड़कियां आती हैं और वह उनको देखते हैं इसलिये उनमें आक्रामकता नहीं आती। जब यह संख्या कम हो जायेगी तक एक लड़की पर अनेक लड़कों की नजर होगी। इससे आकर्षण में तीव्रता आयेगी और ऐसे में अगर लड़की की तरफ से उनको निराशा हाथ लगती है तो वह उस पर आक्रमण करेंगे।
2.रास्ते पर अनेक लड़कियों को होने से भी लड़के व्यस्त रहते हैं पर जब उनकी संख्या सीमित होगी तो वह चलते फिरते आक्रमण करेंगे।
3.दहेज प्रथा बिल्कुल हल नहीं होगी। उल्टे लड़कियां कम होने से उनके माता पिता अधिक अच्छा वर चाहेंगे। भारत में धन के असमान वितरण से वैसे ही समस्यायें बढ़ रही है। इधर जो अच्छे वर और घर होंगे वह अधिक दहेज की मांग करेंगे। इससे उल्टे इससे बेमेल विवाहों को प्रोत्साहन मिलेगा क्योंकि जिसके पास अधिक धन होगा वह अधिक धन और सुंदर लड़की की मांग करेगा इससे लड़कों की आयु बढ़ेगी और ऐसे में उनको छोटी आयु की लड़कियां भी ब्याह करने को मिल जायेंगी।

सामाजिक विशेषज्ञों की चेतावनी के लिये शब्द कुछ भी रहे हों पर उनका आशय यही था कि कम लड़कियां होने से एक ऐसा संकट आयेगा जिससे बचना कोई आसान काम नहीं होगा। हम यहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को ध्यान में रखते हुए एक बार अपने को दृष्टा और अपनी देह को पंच तत्वों से बनी एक वस्तु मान लें। अर्थात हम मान लें कि स्त्री पुरुष देह भी एक वस्तु हैं-नारीवादी लेखक इस बात तो ध्यान दें यहां यह बात आत्मा को दृष्टा मानकर कही जा रही है-तो भी मांग पूर्ति का नियम लागू होता है। पुरुष अधिक होंगे तो उनकी कम और स्त्री संख्या में कम है तो उसकी मांग अधिक होगी। आप अपने देश में जलस्त्रोतों पर पानी के लिये और सड़कों पर वाहन टकराने पर होने वाले हिंसक संघषों पर ध्यान दें तो पानी कम नहीं है बल्कि मांग बढ़ गयी है पर आपूर्ति उस ढंग से नहीं हो पाती। उसी तरह सड़कों पर वाहन अधिक हो गये हैं पर वह चौडी नहीं हुई उसी तरह आपको लगेगा कि स्त्री पुरुषों की संख्या में अनुपातिक अंतर ही इस संकट के लिये जिम्मेदार हैं। परिवार नियोजन रखना अच्छी बात है पर बच्चे की भ्रुण हत्या एक ऐसा अपराध है जिसका परिणाम तत्काल नहीं पता लगता पर आज समाज जिन हालतों में गुजर रहा है उससे हम समझ सकते हैं कि आखिर वह इस हालत में क्यों आया?
जब हर मनुष्य के दृष्टा होने की बात की है तो एक घटना याद आ रही है-नारीवादियों को शायद यह बुरी लगे पर वह इस लेखक के साथ वैचारिक धरातल पर खड़े हों तो सहमत होंगे। खासतौर से नारीवादी लेखिकाओं से अपेक्षा तो है कि वह इस घटना में आयु और उसकी प्रासंगिकता पर विचार करेंगी।
उस दिन एक सड़क पर यह लेखक अपने रात को नौ बजे स्कूटर पर आ रहा था कि एक जगह गड्ढा आ गया। वह बड़ा था और उससे दूर हटकर निकलने के लिये लेखक को रुकना पड़ा। सड़क पर कोई खास भीड़ नहीं थी। एक आदमी उसी गडढे के पास से गुजर रहा था। उसने इस लेखक से कहा-‘अच्छा हुआ यह गडढ़ा आपको दिख गया वरना इसमें कई गिर चुके हैं।’
यह लेखक जवाब में केवल हंस पड़ा। उसी समय दो लड़कियां वहां से गाड़ी पर निकली। तब वह सज्जन फिर बोले-‘पता नहीं आजकल माता पिता कैसे हैं। आप बताईये क्या इस तरह रात को लड़कियों को बाहर जाने की इजाजत दी जानी चाहिये? अरे, करोड़ो रुपये आदमी संभाल कर रखता है पर देखिये उससे कही अधिक कीमती इस तरह बिटियायें बाहर घूमने के लिये छोड़ देता है।’
लेखक ने पूछा-‘आप उनको जानते हैं?’
उन सज्जन ने कहा-‘नहीं! जिस तरह आजकल की घटनायें हो रही हैं उनको देखते हुए यह बात कह रहा हूं। अरे भई, आप ही बताईये जवान लड़कियों की रक्षा का उपाय उनके घरवालों को नहीं करना चाहिये?’
यह सही है कि युवा विवाहिताओं के प्रति भी अपराध होते हैं पर अविवाहित युवतियों के प्रति अपराध हमेशा ही भारी संकट का कारण बनता है।
आप अगर लेखक हैं तो सड़क पर खड़े होकर बहस नहीं कर सकते। कन्या भ्रुण हत्याओं के बारे में विशेषज्ञों की चेतावनी को अनदेखा करते हुए यह समाज जिस तरह आगे बढ़ता गया यह घटनायें उनका परिणाम है। इन घटनाओं की कोई भी वजह हो सकती है पर यह उसका नहीं बल्कि बरसों पहले चले इस रिवाज-हां, समाज में एक तरह से कन्या भ्रुण हत्या रिवाज ही बन गया है-का ही परिणाम है।
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6/21/2009

ऐसे पर नहीं दे सकता-लघुकथा

उसकी पुकार पर सर्वशक्तिमान प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो वह बोला
‘सर्वशक्तिमान आप तो सब जानते है। आप हमारी मनोकामना पूरी करो इसलिये आपको मानते हैं। मैं ऊंचा उठना चाहता हूं । जमीन पर कीड़ों की तरह बरसों से रैंगते हुए बोर हो गया हूं। मुझे दायें बायें ऊपर नीचे बंगला, गाड़ी, दौलत और शौहरत के पर लगा दो ताकि आकाश में उड़ सकूं। यह जीना भी क्या जीना है?’
सर्वशक्तिमान ने मुस्कराते हुए कहा-‘मैंने तो इस तरह के पर बनाये ही नहीं जिनका नाम बंगला,गाड़ी,दौलत और शौहरत हो। लगता है कि तुम इंसानों ने ही बनाये हैं इसलिये ऐसे पंख तो तुम इस धरती पर ही ढूंढो। जहां तक मेरी जानकारी है ऐसे पर नहीं बल्कि बोझ है जिनके पास होते हैं वह इंसान उनके बचाने की सोचकर और जिनके पास नहीं होते वह उसके ख्वाबों का बोझ ढोता हुआ जमीन पर वैसे ही रैंगता है जैसे कीड़े। जो जीव आकाश में उड़ते हैं वह कभी ऐसी कामना भी नहीं करते। उड़ने के लिये आजादी जरूरी है पर तुम तो बोझ मांग रहे हो और वह मैं तुम्हें नहीं दे सकता।’
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6/12/2009

हिंदी भाषा का प्रसार स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा-आलेख

भीषण गर्मी के कारण पिछले कई दिनों से लिखने का मन नहीं हो रहा था। आज एक ब्लाग पर श्री बालसुब्रण्यम का पाठ पढ़ते हुए कुछ लिखने का मन हो उठा। उन्होंने अपने पाठ में हिंदी के विश्वभाषा बनने का प्रसंग उठाया था। उन्होंने अपने पाठ में बताया कि एक ईरानी छात्रा ने उनको हिंदी में ईमेल भेजकर उनसे हिंदी के व्याकरण के बारे में कुछ जानना चाहा था। उस ईरानी लड़की ने अंतर्जाल पर ही श्री बालसुब्रण्यम का पता ढूंढा था। श्री बालसुब्रण्यम के अनुसार वह स्वयं एक अनुवादक भी हैं। उन्होंने अपने व्यय पर ही एक किताब उस लड़की को भेज दी। उसका परिणाम भी अच्छा निकला। श्री बालसुब्रण्यम के उस पाठ पर कुछ टिप्पणियों भी थी जो इस का प्रमाण दे रही थी कि हिंदी अब एक विश्व भाषा बनने की तरफ अग्रसर है।

एक टिप्पणीकार ने एक विदेशी विद्वान का यह कथन भी उद्धृत किया कि भारतीयों ने अपने को रामायण और महाभारत की रचनाऐं कर बचाया है। श्रीबालसुब्रण्यम अपने पाठों में अक्सर अच्छी बातें लिखते हैं और जिनसे प्रेरित होकर लिखने का मन करता है।
अगर हम अंग्रेजी और हिंदी पर कोई संक्षिप्त टिप्पणी करना चाहें तो बस यही कहा जा सकता है कि अंग्रेजी आधुनिक विज्ञान की भाषा है इसलिये उसका प्रचार प्रसार बहुत हुआ पर उसके अविष्कारों से ऊब चुके लोगों को अपने मन की शांति के लिये जिस अभौतिक अविष्कार की आवश्यकता है वह केवल अध्यात्मिक ज्ञान से ही प्राप्त हो सकता है जिसकी भाषा हिंदी है इसलिये इसका प्रसार बढ़ेगा और इसमें अंतर्जाल भी सहायक होगा।
अंतर्जाल पर इस लेखक द्वारा लिखना प्रारंभ करना संयोग था। सच बात तो यह है कि अपने ब्लाग व्यंग्य, कहानियां और कवितायें लिखने के लिये प्रारंभ किया। इससे पूर्व इस लेखक ने कुछ पत्रिकाओं में प्राचीन गं्रथों और महापुरुषों पर संदेशों की वर्तमान संदर्भों की सार्थकता दिखाते हुए कुछ चिंतन लिखे। वह मित्रों और पाठकों ने बहुत पंसद किया और कुछ तो यह कहते थे कि तुम तो केवल इसी विषय पर लिखा करो। बहरहाल जब अंतर्जाल पर लिखना प्रारंभ किया तो अध्यात्मिक विषयों पर लिखने का मन में ऐसे ही विचार आया। तब उनको छदम नाम ‘शब्दलेख सारथी’ से लिखना शुरु किया। इसका मुख्य उद्देश्य यही था कि लोग केवल चिंतन लिखने का आग्रह न करें। अध्यात्मिक विषयों पर लिखने से प्रसिद्धि होती है पर सबसे बड़ी मुश्किल यह होती है कि तब आपसे सिद्ध होने का प्रमाणपत्र भी मांगा जाता है और यकीनन यह लेखक को कोई सिद्ध नहीं है। इसलिये छद्म नाम से लिखकर अपने मन की इच्छा को संतोष प्रदान करने के अलावा कोई ध्येय नहीं था। वह ब्लाग ब्लागस्पाट था और ऐसा लगा रहा था कि कोई ब्लाग वर्डप्रेस पर भी होना चाहिए तब अपने यथार्थ नाम से बने ब्लाग पर लिखना शुरू किया क्योंकि शैली एक जैसी थी इसलिये ही शब्दलेख सारथी पर भी असली नाम लिख दिया। बहरहाल यह अजीब अनुभव हुआ कि संत कबीर, रहीम, तुलसी, श्रीगीता, योग साधना, चाणक्य, विदुर, मनुस्मृति, तथा कौटिल्य का अर्थशास्त्र जैसे विषयों पर लिखने का मतलब यह होता है कि पाठ पठन और पाठकों के आवागमन की चिंता से मुक्त होना। पहले तो सारे ब्लाग पर ही अध्यात्म विषयों पर लिखा फिर तीन ब्लाग निश्चित कर दिये मगर आम पाठकों तक यह बात नहीं पहुंची और वह कुछ ऐसे ब्लाग पर टिप्पणियों में यह बात कह जाते हैं कि कबीर, रहीम तथा अन्य अध्यात्मिक विषयों पर और भी लिखें।
जहां तक पाठ पठन/पाठकों के आवगमन का प्रश्न है ऐसा कौनसा देश है जहां अध्यात्मिक विषयों वाले ब्लाग नहीं खुलते। उन जगहों पर भी जहां विदेशों में अन्य धर्मों के प्रसिद्ध स्थान हैं। अंगे्रजी टूल पर पढ़ने वाले अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तो इस बात पर यकीन करना कठिन होता है कि उसने यह पढ़ा भी होगा। इस ब्लाग लेखक के ब्लागों पर पाठ पठन/पाठकों का आवागमन का संख्या में आंकलन किया जाये तो वह प्रतिदिन तेरह से सत्रह सौ के बीच होती है। गूगल की रैंकिंग में चार ब्लाग 4 अंकों के साथ सफलता की तरफ बढ़ रहे हैं इनमें दो केवल अध्यात्म विषयों पर केंद्रित हैं और जो दो अन्य भी है तो उनमें भी उनका योगदान समान रूप से दिखता है।
यह पाठ आत्म प्रचार के लिये नहीं है बल्कि अपना अनुभव मित्र ब्लाग लेखकों और पाठकों के साथ इस उद्देश्य से लिखा जा रहा है कि हिंदी को लेकर अपने मन से कुंठायें निकालें। न केवल अपने मन से भाषा कों लेकर बल्कि अपने धर्म और अपने मूल व्यक्तित्व-जिसको हिंदुत्व भी कह सकते हैं वह भी धर्म को लेकर नहीं-पर कोई कुुंठा न पालें। लोभ, लालच और भौतिकता के भ्रम ने हमें भ्रष्ट कर दिया है पर हमारा अध्यात्म ज्ञान जो कि संस्कृत के साथ अब हिंदी में भी उपलब्ध है दुनियां का सबसे श्रेष्ठ और सत्य ज्ञान हैं-कृपया इसे उन कर्मकांडों से न जोड़ें जो स्वर्ग में दिलाने के लिये होते हैं।
सच बात है कि हमारा सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान संस्कृत में हैं जिससे अनेक भाषायें पैदा हुई हैं पर हिंदी उसकी सबसे बड़ी बेटी मानी जाती है और उसमें समस्त ज्ञान-निष्काम भाव वाले हिंदी विद्वानों और धनपतियों की वजह से-हिंदी में उपलब्ध है। वैसे ही कुछ विद्वान कहते हैं कि हिंदी एक नयी भाषा है जो अपने पांव पसारेगी न कि सिमटेगी। भारत में विदेशों को देखकर अपनी हिंदी से अंग्रेजी को श्रेष्ठ मानना एक भ्रम है। इस चक्कर में अनेक लोग न तो हिंदी अच्छी सीख पाते हैं न ही अंग्रेजी। वह अच्छा कमा लेते हैं। उनकी इज्जत भी होती है पर उनका जुबान बंद रखना एक अच्छा विचार माना जाता है क्योंकि जब वह बोलते हैं तो समझ में नहीं आता। उनका चेहरा चमकता रहे इससे बाजार में सौदागर कमाते हैं। वह खेलते या दौड़ते हैं तो पैसा बरसता है पर उनके मूंह से शब्द निकलते ही उनके प्रशसंकों को चेहरा उतर जाता है। कम से कम वह विशुद्ध हिंदी भाषियों के समाज में उठने बैठने लायक नहीं रहते। कहा जाता है इस देश में अंग्रेजी केवल दो प्रतिशत लोग जानते हैं पर इस लेखक को शक है कि इसमें भी दो प्रतिशत लोगों को अंग्रेजी अच्छी आती होगी। अलबत्ता उनके हावभाव और शब्दों से दूसरे को बात समझ में आ जाती होगी इसलिये उनको जवाब मिल जाता है। वैसे भी इस लेखक ने अनेक बार टूलों से हिंदी का अंग्रेजी में अनुवाद कर दूसरों को भेजा है और उसका जवाब वैसा ही आया है जैसी कि अपेक्षा थी और इन टूलों के चलते अब अंग्रेजी में लिख पाने या हिंदी लेखक होने की कुंठा नहीं होती। यह यकीन हो गया है कि हिंदी निश्चित रूप से विश्व की भाषा बनेगी क्योंकि यह अध्यात्म की भाषा है। भारत में इसका क्या स्वरूप होगा कहना कठिन है? इस पर फिर कभी।
साभार
हिंदी सचमुच विश्व भाषा बन चुकी है
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