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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

5/31/2009

कपड़े और किताब का पिंजर-आलेख

उनके चेहरे पर बटन की तरह टंगी आंखें कपड़े और किताबों के पिंजर से बाहर झांकती दिखती है। ऐसा लगता है कि चिड़ियाघर के पिंजड़े में कोई इंसानी बुत ऐसे ही सजाये गये हैं जिनके आगे कपड़े के एक ही रंग और किसी किताब की लिखी लाईने लोहे के दरवाजे की तरह ऐसे ही लगी हों जैसे पिंजड़े के बाहर लगी होती हैं जहां से वह कभी निकल ही नहीं सकते। बस उससे बाहर झांकते हैं कि कोई पर्यटक आये तो वह उनकी तरफ देखे और वह अपनी अदाओं से उसे प्रभावित करें।
दुनियां में हर मनुष्य एक ही तरह से पैदा होता है पर जीवन यापन का सबका अपना अलग तरीका होता है। देखा जाये तो जीवन एक शब्द है जिसमें विविध रंगों, स्वादों और विचारों की धारा बहती है। यह धारा उसके मन रूपी हिमालय से बहती है जो इंसान को बहाती हुई ले जाती है। अधिकतर इंसान इस धारा में बहते हुए जाते हैं और उनकी कोई अपनी कामना नहीं होती। मगर कुछ लोग ऐसे हैं जो इस मानव रूपी मन की धारा के उद्गम स्थल पर बैठकर उसका बहाव अपनी ओर करना चाहते हैं ताकि उसका स्वामी मनुष्य बहकर उनकी तरफ आये ताकि वह उस पर शासन कर सकें। तय बात है कि एक इंसान वह है जो अपनी एकलधारा में आजादी से बहता हुआ चलता है और एक दूसरा है जो चाहता है कि अनेक इंसान उसकी तरफ बहकर आयें ताकि वह शासक या विद्वान कहला सके।
सर्वशक्तिमान के अनेक रूप और रंग हैं पर उसके किसी एक रूप और रंग को पकड़ कर ऐसे लोग वह पिंजड़ा बना लेते हैं जिसमें वह दूसरों को फंसाने के लिये घूमते हैं। उनको लगता है कि वह आदमी को अपने रंग और किताब के पिंजड़े में कैद कर लेंगे पर सच यह है कि वह स्वयं भी उसकी कैद में रहते हैं।
सर्वशक्तिमान के कितने रंग और रूप हैं कोई नहीं जानता पर फिर भी ऐसे लोगों ने अभी तक दस बीस की कल्पना को प्रसिद्ध तो कर ही दिया है। लाल, पीला, नीला, सफेद, काला, हरा, पीला और पता नहीं कितने रंग हैं। हरे रंग मेें भी बहुत सारे रंग हैं पर अक्ल और ताकत की ख्वाहिश रखने वाले कोई एक रंग सर्वशक्तिमान की पहचान बताते हैं। सभी की किताबेें हैं जिसमें हर शब्द और लकीर सर्वशक्तिमान के मूंह से निकली प्रचारित की जाती है। अपने तयशुदा रंग के कपड़े रोज पहनते हैं और वह किताब अपने हाथ में पकड़ कर उसे पढ़ते हुए दुसरों को सुनाते हैं। राजा हो या प्रजा उनके दरवाजे पर आकर सलाम ठोकते है। राजा इसलिये आता है क्योंकि प्रजा वहां आती है और उसे निंयत्रित करने के लिये ऐसे सिद्ध, पीर, फकीर, साधु, संत-इसके अलावा कोई दूसरा शब्द जो सर्वशक्तिमान से किसी की करीबी दिखाता हो-बहुत काम आते हैं। प्रजा इसलिये इनके पिंजर में आती है क्योंकि राजा आता है और पता नहीं कब उससे काम पड़ जाये और यह पिंजर में बंद अजूबा उसमें सहायक बने।
यह अजूबे कभी अपने पिंजर ने बाहर नहीं आते। जिस रंग के कपड़े पहन लिये तो फिर दूसरा नहीं पहन सकते। जिस किताब को पकड़ लिया उसकी लकीर में ही हर नजीर ढूंढते और फिर बताते हैं। वह किताब अपने लिये नहीं दूसरे को मार्ग बताने के लिये पढ़ते हैं। खुद पिंजडे में बंद हैं पर दूसरे को मार्ग बताते हैं। दाढ़ी बढ़ा ली। कुछ मनोविशेषज्ञ कहते हैं कि बढ़ी दाढ़ी वैसे भी दूसरे पर प्रभाव छोड़ती है-अर्थात आप ज्ञानी या दानी न भी हों तो उसके होने का अहसास सभी को होता है। वह दाढ़ी नहीं बनाते क्योंकि उनकी छबि इससे खराब होती है। इस दुनियां में एक भय उन पर शासन करता है कि राजा और प्रजा कहीं उनसे विरक्त न हो जायें।

कभी दृष्टा बनकर सर्वशक्तिमान के किसी भी रूप के दरबार में पहुंच जाओ और महसूस करो कि चिड़ियाघर में आ गये हो। देखो वहां पर एक ही रंग के कपड़े और किताब के पिंजर में बंद उस अजूबे को जो तुम्हें सर्वशक्तिमान का मार्ग बताता है। दुनियां बनाने वाले ने अनेक रंग बनाये हैं और उसके बंदों ने ढेर सारी किताबें लिखी हैं पर एक ही रंग और किताब की लकीरों के पिंजर में बंद वह अजूबे वहां से भी राजा और प्रजा के बीच दलाली करते नजर आते हैं। अगर तुम आजाद होकर सोचोगे तभी उनका पिंजर दिखाई देगा नहीं तो उनके हाथ में बंद उससे भी छोटे पिंजर में तुम अपने को फंसा देखोगे वैसे ही जैसे पिंजड़े में बंद शेर के पास जाकर कोई आदमी अपना हाथ उसके मूंह में दे बैठता है और फिर..........जो होता है वह तो सर्वशक्तिमान की मर्जी होती है।
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5/29/2009

प्रचार का मुकाबला प्रचार से ही संभव-आलेख

समाज को सुधारने की प्रयास हो या संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का सवाल हमेशा ही विवादास्पद रहा है। इस संबंध में अनेक संगठन सक्रिय हैं और उनके आंदोलन आये दिन चर्चा में आते हैं। इन संगठनों के आंदोलन और अभियान उसके पदाधिकारियेां की नीयत के अनुसार ही होते हैं। कुछ का उद्देश्य केवल यह होता है कि समाज सुधारने के प्रयास के साथ संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का प्रयास इसलिये ही किया जाये ताकि उसके प्रचार से संगठन का प्रचार बना रहे और बदले में धन और सम्मान दोनों ही मिलता रहे। कुछ संगठनों के पदाधिकारी वाकई ईमानदार होते हैं उनके अभियान और आंदोलन को सीमित शक्ति के कारण भले ही प्रचार अधिक न मिले पर वह बुद्धिमान और जागरुक लोगों को प्रभावित करते हैं।
ईमानदारी से चल रहे संगठनों के अभियानों और आंदोलनों के प्रति लोगों की सहानुभूति हृदय में होने के बावजूद मुखरित नहीं होती जबकि सतही नारों के साथ चलने वाले आंदोलनों और अभियानों को प्रचार खूब मिलता है क्योंकि प्रचार माध्यम उनको अपने लिये भावनात्मक रूप से ग्राहकों को जोड़े रखने का एक बहुत सस्ता साधन मानते हैं। ऐसे कथित अभियान और आंदोलन उन बृहद उद्देश्यों को पूर्ति के लिये चलते हैं जिनका दीर्घावधि में भी पूरा होने की संभावना भी नहीं रहती पर उसके प्रचार संगठन और पदाधिकारियों के प्रचारात्मक लाभ मिलता है जिससे उनको कालांतर में आर्थिक और सामाजिक उपलब्धि प्राप्त हो जाती है।

मुख्य बात यह है कि ऐसे संगठन दीवारों पर लिखने और सड़क पर नारे लगाने के अलावा कोई काम नहीं करते। उनके प्रायोजक भी इसकी आवश्यकता नहीं समझते क्योंकि उनके लिये यह संगठन केवल अपनी सुरक्षा और सहायता के लिये होते हैं और उनको समझाईश देना उनके लिये संभव नहीं है। अगर इस देश में समाज सुधार के साथ संस्कार और संस्कृति के लिये किसी के मन में ईमानदारी होती तो वह उन स्त्रोतों पर जरूर अपनी पकड़ कायम करते जहां से आदमी का मन प्रभावित होता है।
भाररीय समाज में इस समय फिल्म, समाचार पत्र और टीवी चैनलों का बहुत बड़ा प्रभाव है। भारतीय समाज की नब्ज पर पकड़ रखने वाले इस बात को जानते हैं। लार्ड मैकाले ने जिस तरह वर्तमान भारतीय शिक्षा पद्धति का निर्माण कर हमेशा के लिये यहां की मानसिकता का गुलाम बना दिया वही काम इन माध्यमों से जाने अनजाने हो रहा है इस बात को कितने लोगों ने समझा है?
पहले हिंदी फिल्मों की बात करें। कहते हैं कि उनमें काला पैसा लगता है जिनमें अपराध जगत से भी आता है। इन फिल्मों में एक नायक होता है जो अकेले ही खलनायक के गिरोह का सफाया करता है पर इससे पहले खलनायक अपने साथ लड़ने वाले अनेक भले लोगों के परिवार का नाश कर चुका है। यह संदेश होता है एक सामान्य आदमी के लिये वह किसी अपराधी से टकराने का साहस न करे और किसी नायक का इंतजार करे जो समाज का उद्धार करने आये। कहीं भीड़ किसी खलनायक का सफाया करे यह दिखाने का साहस कोई निर्माता या निर्देशक नहीं करता। वैसे तो फिल्म वाले यही कहते हैं कि हम तो जो समाज में जो होता है वही दिखाते हैं पर आपने देखा होगा कि अनेक ऐसे किस्से हाल ही में हुए हैं जिसमें भीड़ ने चोर या बलात्कारी को मार डाला पर किसी फिल्मकार ने उसे कलमबद्ध करने का साहस नहीं दिखाया। संस्कारों और संस्कृति के नाम पर फिल्म और टीवी चैनलों पर अंधविश्वास और रूढ़वादितायें दिखायी जाती हैं ताकि लोगों की भारतीय धर्मों के प्रति नकारात्मक सोच स्थापित हो। यह कोई प्रयास आज का नहीं बल्कि बरसों से चल रहा है। इसके पीछे जो आर्थिक और वैचारिक शक्तियां कभी उनका मुकाबला करने का प्रयास नहीं किया गया। हां, कुछ फिल्मों और टीवी चैनलों के कार्यक्रमों का विरोध हुआ पर यह कोई तरीका नहीं है। सच बात तो यह है कि किसी का विरोध करने की बजाय अपनी बात सकारात्मक ढंग से सामने वाले के दुष्प्रचार पर पानी फेरना चाहिये।

एक ढर्रे के तहत टीवी चैनलों और फिल्मों में कहानियां लिखी जाती हैं। यह कहानी हिंदी भाषा में होती है पर उसको लिखने वाला भी हिंदी और उसके संस्कारों को कितना जानता है यह भी देखने वाली बात है। मुख्य बात यह है कि इस तरह के कार्यक्रमों के पीछे जो आर्थिक शक्ति होती है उसके अदृश्य निर्देशों को ध्यान में रखा जाता है और न भी निर्देश मिलें तो भी उसका ध्यान तो रखा ही जाता है कि वह किस समुदाय, भाषा, जाति या क्षेत्र से संबंधित है। विरोध कर प्रचार पाने वाले संगठन और उनके प्रायोजक-जो कि कोई कम आर्थिक शक्ति नहीं होते-स्वयं क्यों नहीं फिल्मों और टीवी चैनलों के द्वारा उनकी कोशिशों पर फेरते? इसके लिये उनको अपने संगठन में बौद्धिक लोगों को शामिल करना पड़ेगा फिर उनकी सहायता लेने के लिये उनको धन और सम्मान भी देना पड़ेगा। मुश्किल यही आती है कि हिंदी के लेखक को एक लिपिक समझ लिया है और उसे सम्मान या धन देने में सभी शक्तिशाली लोग अपनी हेठी समझते हैं। यकीन करें इस लेखक के दिमाग में कई ऐसी कहानियां हैं जिन पर फिल्में अगर एक घंटे की भी बने तो हाहाकार मचा दे।

इस समाज में कई ऐसी कहानियां बिखरी पड़ी हैं जो प्रचार माध्यमों में सामाजिक एकता, समरसता और सभी धर्मों के प्रति आदर दिखाने के कथित प्रयास की धज्जियां उड़ा सकती है। प्यार और विवाह के दायरों तक सिमटे हिंदी मनोरंजन संसार को घर गृहस्थी में सामाजिक, धार्मिक और अन्य बंधन तोड़ने से जो दुष्परिणाम होते हैं उसका आभास तक नहीं हैं। आर्थिक, सामाजिक और दैहिक शोषण के घृणित रूपों को जानते हुए भी फिल्म और टीवी चैनल उससे मूंह फेरे लेते हैं। कटु यथार्थों पर मनोरंजक ढंग से लिखा जा सकता है पर सवाल यह है कि लेखकों को प्रोत्साहन देने वाला कौन है? जो कथित रूप से समाज, संस्कार और संस्कृति के लिये अभियान चलाते हैं उनका मुख्य उद्देश्य अपना प्रचार पाना है और उसमें वह किसी की भागीदारी स्वीकार नहीं करते।
टीवी चैनलों पर अध्यात्मिक चैनल भी धर्म के नाम पर मनोरंजन बेच रहे हैं। सच बात तो यह है कि धार्मिक कथायें और और सत्संग अध्यात्मिक शांति से अधिक मन की शांति और मनोरंजन के लिये किये जा रहे हैं। बहुत लोगों को यह जानकर निराशा होगी कि इनसे इस समाज, संस्कृति और संस्कारों के बचने के आसार नहीं है क्योंकि जिन स्त्रोतों से प्रसारित संदेश वाकई प्रभावी हैं वहां इस देश की संस्कृति, संस्कार और सामाजिक मूल्यों के विपरीत सामग्री प्रस्तुत की जा रही है। उनका विरोध करने से कुछ नहीं होने वाला। इसके दो कारण है-एक तो नकारात्मक प्रतिकार कोई प्रभाव नहीं डालता और उससे अगर हिंसा होती है तो बदनामी का कारण बनती है, दूसरा यह कि स्त्रोतों की संख्या इतनी है कि एक एक को पकड़ना संभव ही नहीं है। दाल ही पूरी काली है इसलिये दूसरी दाल ही लेना बेहतर होगा।

अगर इन संगठनों और उनके प्रायोजकों के मन में सामाजिक मूल्यों के साथ संस्कृति और संस्कारों को बचाना है तो उन्हें फिल्मों, टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में अपनी पैठ बनाना चाहिये या फिर अपने स्त्रोत निर्माण कर उनसे अपने संदेशात्मक कार्यक्रम और कहानियां प्रसारित करना चाहिए। दीवारों पर नारे लिखकर या सड़कों पर नारे लगाने या कहीं धार्मिक कार्यक्रमों की सहायता से कुछ लोगों को प्रभावित किया जा सकता है पर अगर समूह को अपना लक्ष्य करना हो तो फिर इन बड़े और प्रभावी स्त्रोतों का निर्माण करें या वहां अपनी पैठ बनायें। जहां तक कुछ निष्कामी लोगों के प्रयासों का सवाल है तो वह करते ही रहते हैं और सच बात तो यह है कि जो सामाजिक मूल्य, संस्कृति और संस्कार बचे हैं वह उन्हीं की बदौलत बचे हैं बड़े संगठनों के आंदोलनों और अभियानों का प्रयास कोई अधिक प्रभावी नहीं दिखा चाहे भले ही प्रचार माध्यम ऐसा दिखाते या बताते हों। इस विषय पर शेष फिर कभी।
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5/19/2009

चाहे कितना भी कहो, हिंसा किसी समस्या का हल नहीं है-आलेख

चाहे कोई कितने भी हिंसा के पक्ष में तर्क ले पर सच यही है कि उससे कोई भी लक्ष्य नहीं प्राप्त किया जा सकता। इस धरती पर सामाजिक, अर्थिक और व्यक्तिगत आधार पर लोगों में अंतर रहेगा इसे केाई मिटा नहीं सकता। मनुष्यों में चार प्रकार हैं-योगी, सात्विक,राजस और तामस-और जब तक यह धरती रहेगी यह चारों रहेंगे। सात्विक, राजस और तामस प्रकार के बारे में हम जानते हैं-इन तीनों से परे योगी होते हैं और उनकी संख्या नगण्य है।
विश्व भर में अनेक हिंसक आंदोलन हुए हैं कुछ प्रतिहिंसा की आग में जले या फिर नाकामी ने उन्हें आगे बढ़ने नहीं दिया। जिन हिंसक आंदोलनों ने तात्कालिक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त भी किये तो वह समाज के लिये कोई संदेश नहीं दे सके। यह अलग बात है कि लोग उनके तोतले संदेशों का जबरदस्ती प्रचार करते हैं। श्रीलंका में पृथक तमिल ईलम आंदोलन का प्रमुख प्रभाकरण श्रीलंका की सेना के हाथों आखिर मारा गया। वैसे आम भारतीय को उससे अधिक सरोकार नहीं है पर उसका प्रचार यहां हो रहा है इसलिये उस पर विचार करना जरूरी है।

उसके जीवन चरित्र से सीखने लायक किसी के पास कुछ नहीं है क्योंकि उसका रास्ता इस दुनियां को कहीं नहीं ले जाता सिवाय निरर्थक हिंसा के जो लोगों की मानसिकता और भूगोल को संकीर्ण दायरों में बांधती है। उसने भाषा के आधार पर अपना हिंसक आंदोलन चलाया। यह केवल एक दिखावा भर लगता था वैसे ही जैसे धर्म, जाति, और क्षेत्र के नाम पर चले आंदोलन होते हैं। बात यह है कि मनुष्य में समाज के रूप में रहना एक आदत है और वह धर्म जाति,भाषा,धर्म और क्षेत्र के नाम पर समूह बनाने का अभ्यस्त है। कुछ शक्तिशाली लोग मनुष्य की इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाने के लिये ऐसे समूहों के शीर्षकों लेकर अपने आंदोलन चलाते हैं ताकि एक समूह उनक साथ बना रहे। उनका लक्ष्य अपने स्वार्थ होते हैं पर जिस समूह के वह हितैषी होने का वह दावा करते हैं उसमें कुछ लोग उनक समर्थक हो जाते हैं। अगर ऐसे लोग हिंसक हुए और अपने समाज को सम्मान दिलाने के लिये हिंसा करते हैं तो भी उस समूह के लोग यह सोचकर चुप्पी साध लेेते हैं कि वह कम से कम अपने समाज की हानि तो नहीं कर रहे। दूसरे समाज की कर रहे हैं तो वही जाने-कहीं कहीं वह दूसरे समाज के प्रति उनके मन में घृणा भाव भी होता है।

भारत के दक्षिणी भाग के लोग बौद्धिक और सांस्कारिक दृष्टि से अत्यंत श्रेष्ठ हैं इस तथ्य का कोई विरोध नहीं कर सकता। कला,संगीत,फिल्म,नृत्य,विज्ञान,खेल तथा तकनीकी क्षेत्र में इन्हीं दक्षिणी भागों का योगदान बहुमूल्य है। तय बात है कि वहां के लोग पूरे देश की बौद्धिक शक्ति का प्रतीक हैं। इनमें भी तमिल भाषियों की संख्या अधिक है और उसी के अनुरूप उनका योगदान भी है।

प्रभाकरण श्रीलंका का था पर वहां रह रहे तमिल भाषियों के सम्मान की लड़ाई में उसे भारत के तमिल भाषियों का भावनात्मक समर्थन चाहिये था। उसे शुरुआती दौर में सफलता भी मिली पर भारत के स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की हत्या के बाद वह पूरी तरह से खत्म हो गया। यह उसके लिये आत्मघाती साबित हुआ। इसके बावजूद उसने परवाह नहीं की क्योंकि तब तक वह अपनी ताकत पश्चिमी देशों में मौजूद संपर्क सूत्रों के सहारे बढ़ा चुका था। श्रीलंका के तमिल भाषियों का सम्मान तो उसके लिये नारा भर था। उसने अपने ही देश के अनेक तमिल नेताओं की हत्या कर यह साबित भी किया। उसने विश्व में जिसे आत्मधाती हमलावर बनने का जो तरीका निकाला वह पूरे विश्व के लिये खतरनाक साबित हुआ। अमेरिका पर के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमला होने के बाद वह पश्चिम के लिये चिंता का विषय बन गया। कोई प्रमाण तो नहीं मिला पर कुछ विशेषज्ञ उसमें प्रभाकरण के लिट्टे संगठन का सहयोग या मार्गदर्शन ढूंढते रहे।

कुछ अल्प बुद्धिमान उसमें शोषितों का मसीहा भी ढूंढ रहे हैं। उनका क्या कहने? गरीब, बेरोजगार, पीड़ित और शोषित महिला पुरुषों को वह आत्मघाती बनाता था। इन अल्प बुद्धिजीवियों से पूछा जाना चाहिये कि क्या प्रभाकरण ने इन गरीब,बेरोजगार, पीड़ितों और शोषितों के लिये स्वर्ग में क्या सम्मान और भोजन का बंदोबस्त कर रखा था। आम भारतीय लोग प्रचार माध्यमों की वजह से उसका नाम जानते थे पर वह कभी चर्चा का विषय नहीं बन पाया-उसकी मौत भी चर्चा का महत्वपूर्ण विषय नहीं बनीं। जब भारत में जाति, धर्म,भाषा और भाषाओं के विषय पर कभी बहस चली तो उसका नाम आया। उसके आंदोलन में धर्म का पुट देखने का प्रयास भी किया गया।
कुल मिलाकर उसके नाम से भ्रम फैलाने का पूरा प्रयास किया गया। अभी उसकी मौत पर भी ऐसा भ्रामक प्रचार हो रहा है कि उसके मरने से पूरे विश्व का उसका भाषाई समाज दुःखी है। ऐसा कहने वालों का शायद तमिल भाषियों से अधिक नहीं है इसलिये अनुमान से सभी कह रहे हैं। सच बात तो यह है कि भारत के प्रति जघन्य अपराध के बाद तमिल भाषियों में उसके लिये कोई सहानुभूति नहीं रही थी।

भारतीय तमिलों की श्रीलंका के तमिलों से सहानुभूति होना स्वाभाविक है पर वह इतनी नहीं है कि वह अपने देश को उसकी वजह से किसी संकट मे फंसता देखना चाहें।
इस लेखक के एक तमिल मित्र ने बताया था कि श्रीलंका में तमिल बहुत बड़े भूभाग में रहते हैं। उसका शायद चैथाई हिस्सा ही शायद रहा होगा जिस पर प्रभाकरण प्रभाव रखता था। झगड़ा केवल वहीं चल रहा था जहां प्रभाकरण रह रहा था। यह जरूरी नहीं कि श्रीलंका में रहने वाला तमिल प्रभाकरण से सहमत हो तब यह कैसे कहा जा सकता है कि विश्व में सारे तमिल भाषी उससे हमदर्दी रखते थे। विश्व में अनेक स्थानों पर समाजों के बीच संघर्ष नयी बात नहीं हैं और श्रीलंका में सिंहली- तमिल विवाद भी ऐसा ही है।
प्रभाकरण दिखाने के तौर पर तमिल भाषियों के लिये आंदोलन कर रहा था पर हथियारों, मादक द्रव्यों तथा अन्य अपराधिक गतिविधियों में उसका हाथ होने का संदेह प्रचार माध्यमों में व्यक्त किया जाता रहा है जहां से उसको धन प्राप्त होता था। उसने न तो कभी सैन्य प्रशिक्षण लिया न किसी युद्ध में भाग लिया। हां अपने समाज के गरीब और मजबूर लोगों को लालच के सहारे वह उनको आत्मघाती हमलावर बनने के लिये प्रेरित करता था। वह सैन्य वेशभूषा में रहता था पर इसका मतलब यह नहीं था कि वह कोई योद्धा था। एक तरह से वह हिंसा का सौदागर था जो अपने को सैनिक वेशभूषा में प्रस्तुत कर लोगों की सहानुभूति जताने का प्रयास करा रहा था।
मुख्य बात यह है कि विश्व भर के तमिलों की उसके साथ सहानुभूति होने का प्रचार एक मूर्खतपूर्ण प्रयास है। इस बारे में गैर तमिल भाषी अपने विचार न व्यक्त करें तो ही अच्छा। ऐसे में तमिल बुद्धिजीवियों के विचार ही सबसे अधिक प्रमाणिक माने जा सकते हैं वह भी उनके जो अपने समाज की गतिविधियेां के अधिक निकट हों।

सबसे अधिक तकलीफ यहां के बुद्धिजीवियों को देखकर होती है जो इसमें शामिल हो जाते हैं। आप यह बात कैसे किस पर थोप सकते हैं कि कोई युद्ध में मारे गये या चुनाव में हारे नेता के प्रति उसका पूरा समाज सहानुभूति रखता है। क्या आप अंतर्यामी है? क्या आप यह मानते हैं कि आम इंसान को कोई दूसरा काम नहीं है सिवाय उसके समाजों और समूहों के विख्यात या कुख्यात लोगों पर दृष्टि लगाये बैठने के?ं
सुनने में आया है कि श्रीलंका के सिंहली वहां के तमिलों के साथ प्रभाकरण की मौत के बाद विजेता की तरह व्यवहार कर रहे हैं। यह श्रीलंका के लिये भविष्य के लिये घातक है। यहां श्रीलंका के सभी नागरिकों को यह ध्यान रखना चाहिये कि अपने देश के एक भी आदमी को तकलीफ में रखकर वह खुश नहीं रह सकते। संभव है कि श्रीलंका में मौजूद कुछ तत्व अपने लोगों से अपनी नाकामियां छिपाने के लिये वहां सिंहली लोगों में अपने समाज के श्रेष्ठ और विजेता होने का प्रचार कर रहे हों। यह समाज श्रेष्ठता का बोध क्षणिक और भ्रामक है। हर व्यक्ति को अपनी रोजी रोटी और जीवन यापन के लिये अकेले संघर्ष करना है। सिंहली भी इससे बच नहीं पायेंगे उन्हें कम से कम श्रीलंका में रह रहे तमिलों से ऐसा व्यवहार करने से बचना चाहिये।

भारत के बुद्धिजीवियों से कभी कभी निराशा हाथ लगती है जब वह इस प्रकार की घटनाओं में जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के आधार पर बने समूहों में प्रतिद्वंद्वता का भाव स्थापित करने का प्रयास करने लगते हैं। यह आलेख प्रारंभ तो गांधी जी के अहिंसा सिद्धांत पर लिखने के लिये किया गया था जो आधुनिक समय में किसी भी प्रकार की सफलता का मूल मंत्र है पर प्रभाकरण को लेकर हो रहे प्रचार के कारण उस पर लिखना जरूरी लगा। आर्थिक, सामाजिक राजनीतिक आंदोलनों के लिये गांधीजी के अहिंसा सिद्धांत के अलावा कोई बढ़िया अस्त्र शस्त्र हो सकता है इस पर यकीन करना
कठिन है। हिंसा से किसी व्यक्ति को नष्ट किया जा सकता है और प्रतिहिंसा में स्वयं भी नष्ट होने का खतरा भी है पर अहिंसा के मंत्र में वह शक्ति है जो प्रतिकूल व्यक्ति या स्थिति को भी अपने अनुकूल बना ले और अपने लिये दैहिक खतरा भी नगण्य ही रहता है। इस पर इस रविवार को इसी ब्लाग पत्रिका पर लिखने का प्रयास किया जायेगा। हां, इतना जरूर है कि राजनीतिक, सामाजिक, और आर्थिक शिखर पर बैठे लोगों के अच्छे और बुरे कामों से उसके जाति,भाषा,धर्म, और क्षेत्रों के आधार पर बने समूहों के आम व्यक्तियों पर जबरन नहीं थोपा जाना चाहिये। इस विषय पर भी इसी ब्लाग पत्रिका पर लिखने का प्रयास जारी रहेगा।
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5/08/2009

आखिर उनका लक्ष्य क्या है-चिंत्तन

अनेक लेखक और कवि हैं जिनके शब्दों में ओज है पर कोई नयी खोज नहीं है। वह दुनियां भर के भूखों, गरीबों, और पीड़ितों को संगठित होकर अभियान करने का संदेश देते हैं पर कितने भूखे, गरीब, और पीड़ित अपनी याचनायें लेकर उनके पास पहुंचे हैं यह नहीं बताते। वह रचनाकार अपनी रचनाओं में तलवार, बंदूक और बारूद की बात करते हैं। कहीं वह सीधे तो कहीं अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति को हिंसा के लिये प्रेरित करते नजर आते हैं। आश्चर्य की बात है कि वह अशांति में सुख की कल्पना कैसे कर लेते हैं। असंतोष में विकास का विचार कैसे उनके दिमाग में आता है?
आखिर उनका ध्येय क्या है? कहते हैं कि हमें विश्व से गरीबी, भूख, और पीड़ायें मिटानी हैं। कैसे? बस अभियान छेड़ना है। सर्वशक्तिमान को वह मानते नहीं क्यांेकि उनको लगता है कि वह अस्तित्वहीन है। वह भूख को कही भगवान तो कहीं शैतान मानते हैं। बस! इस दुनियां से गरीबी और भूख मिटानी है। जहां उनका दम चलता है वहां हथियार चलाने की बात करने से गुरेज नहीं और जहां नहीं है वहां अपने शब्दों को ही हथियार की तरह चलाते हैं। आखिर उनका लक्ष्य क्या है? वह किसे खुश देखना चाहते हैं।
उनसे सवाल करो कि ‘क्या तुम खुश हो?
जवाब होगा-‘नहीं! हम तो क्रांतिकारी हैं और वह कभी न तो सुखी होता है न चाहता है।’
बहस शुरु करो तो गरीबी, शोषण, और भेदभाव का इतिहास सुनायेंगे। आप उनसे पूछिये-‘यह कहां नहीं है?’
वह इधर उधर उंगली उठाकर बतायेंगे कि ‘वहां नहीं है। बस! यही है इसलिये हम अपने अभियान चला रहे हैं।’
आप सवाल करें कि ‘पर समाज तो शांति से चल रहा है। कोई कम पैसा कमा रहा है कोई अधिक! कोई मजदूर है तो कोई पूंजीपति। सभी लोग अपने स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं। सच तो यह है कि गरीब फिर भी आराम की नींद सो लेता है पर अमीर को तो वह भी नसीब नहीं! गरीब पैदल चलकर अपना स्वास्थ्य बनाये रखता है पर अमीर तो वाहनों में चलते हुए जल्दी ही बीमारी को प्राप्त होता है।’
इस पर वह कहेंगे-‘तुम्हें नहीं मालुम गरीबी क्या होती है? हमने देखी नहीं है। तुम गांवों में नहीं गये। तुम उस प्रदेश में नहीं गये। सब जगह अन्याय है। इस अन्याय को मिटाना है। शोषितों और पीड़ितों को एकजुट करना है।’
मतलब यह कि समाज में सभी को एक करने का दावा। उनकी बातों पर तालियां बजाने वाले कौन लोग हैं? जिनको लगता है कि बस इस अभियान से वह स्वयं अमीर हो जायेंगे। कम से कम ऐसा नहीं होगा तो अमीर सड़क पर आ जायेंगे।
जंगों और अभियानों में अपने नारों और वाद को अस्त्र शस्त्र बनाकर वह भीड़ जुटाते हैं। तय बात है कि इस दुनियां में गरीब अधिक ही रहने है और जब उनको अपने काम से फुरसत होती है तब उनको ऐसे ख्वाब दिखाने वाले बहुत अच्छ लगते हैं। उनके लिखे और बोले शब्द उनको यह तसल्ली देते हैं कि बस वह अमीर हो जायेंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमीर उनकी पंक्ति में आ जायेंगेे।

वह श्रम न करने वाले पूंजीपति को गिराने का ख्वाब दिखाते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था का जमकर विरोध करने वाले ऐसे लेखक और कवि जिस व्यवस्था का ख्वाब दिखाते हैं उसमें भी उच्च शिखर पर बैठा कोई व्यक्ति स्वयं काम नहीं करता। प्रबंधक, निरीक्षक तथा अन्य पद जिनमें व्यक्ति नेतृत्व करता है और नेतृत्व को स्वयं काम नहीं करना चाहिये-उनकी व्यवस्थाओं की व्याख्या और उसका प्रचलन तो यही बताता है।
वह नकारात्मक सोच रखते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान से परे ऐसे कवि और लेखक लोगों मेें मौजूद अधिक धन और सम्मान पाने की लालच का लाभ उठाकर उन्हें प्रेरित करते हैं कि वह समाज में उथल पुथल पैदा करें। इस उथल पुथल में वह पहले अपना मनोरंजन करते हैं और अवसर आ जाये तो मार्गदर्शक की उपाधि भी पाकर अपने को धन्य समझते हैं। ऐसे अनेक कवि और लेखक हुए और होंगे पर वह समाजों को बदलने का उनका दावा हमेशा खोखला रहने वाला है। वह सर्वशक्तिमान को नहीं मानते पर यह समस्या नहीं है। समस्या यह है कि इस विश्व में परिवर्तन स्वाभाविक रूप से आते हैं। दूसरा यह है कि आदमी के संस्कार और आस्थायें बचपन में ही स्थापित हो जाती हैं और उनमें परिवर्तन नहीं आता पर आदमी परिवर्तनों के साथ आगे बढ़ता जाता है। जहां आज रेगिस्तान है वहां कभी हरियाली थी। जहां हरियाली है वहां कभी रेगिस्तान था। वह स्वतः बना। मनुष्य पर अपने क्षेत्र की जलवायु, खाद्याान्न तथा साथ रहने वाले लोगों का प्रभाव रहता ही है। इस प्रभाव को कोई रोक नहीं सकता। गुण ही गुणों बरतते हैं-श्रीगीता में बताये गये इस ज्ञान विज्ञान को को कोई बदल नहीं सकता। मनुष्य बदल सकता है जब उसकी हालत बदले। हालत तभी बदल सकते हैं जब मनुष्य बदल जायें। समाज में उथल पुथल होते देखने वाले कवि और लेखक उसका कौनसा सिरा पकड़ना चाहते हैं? यह वह स्वयं नहीं जानते।


उनको भ्रमित देखकर हैरानी होती है। धरती पर परिवर्तन आते रहेंगे। अमरत्व किसी को नहीं मिला पर वह इस तरह बात करते हैं कि जैसे किसी को अमरत्व देने वाले हैं। ऐसे लोग सर्वशक्तिमान को चुनौती देते लगते हैं पर यह उनकी नास्तिकता का नहीं खीज का परिणाम लगती है कि उसके किसी स्वरूप की आराधना लोग करते हैं। दरअसल वह चाहते हैं कि उनकी आराधना हो। वह स्वयं अपने से बड़े विचारकों की आराधना करते हैं और उनकी किताबों को साथ ऐसे रखते हए कहते हैं कि ‘यह पवित्र है’। दुनियां भर की धार्मिक पुस्तकों में अपनी अपने विचाराकों की पुस्तकों को शामिल करना चाहते हैं। कैसे? जिस तरह सभी धर्मों की पुस्तक के ज्ञानी समाज में सम्मान पाते हैं वैसे ही वह भी चाहते हैं। वह सभी धर्मों का विरोध करते हैं पर अपने वाद और नारों को ही धर्म कहते हुए भी नहीं थकते। लोगों के ‘कल्याण का धर्म’। आखिर वह अपने उस धर्म की स्थापना क्यों करना चाहते हैं। जब उनको अपना लोक और परलोक नहीं सुधारना तो फिर इस चक्कर में क्यों पड़ते हैं? जब पाप और पुण्य से परे हैं तो फिर क्यों अच्छे काम करते हैं? ऐसे ढेर सारे प्रश्न लोगों के मन में तब आते हैं जब ऐसे लेखकों और कवियों की समाज में उथल पुथल करने के लिये प्रेरित करने वाली रचनायें आती हैं? मगर यह केवल प्रश्न उन्हीं लोगों के मन में आते हैं जो न केवल उनसे सहमत होते हैं बल्कि वह उनके विचारों को अव्यवहारिक भी मानते हैं।
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