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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

10/14/2007

फुर्सत का सामान

जब पास थे तो ऐसा लगता कि
बस अपने ही हैं
और कभी अलग नहीं होंगे
जब दूर चले गए तो ऐसा लगता है कि
कोई हवा का झोंका था तो
जो हमारे पास से गुजर गया
हम उसे गलतफहमी में
अपना समझते होंगे

वादों के तूफानों में कई बार
उन्होने हमें उडाया होगा
अपने लिए सामानों का समंदर
हमसे लेकर जुटाया होगा
हम तो समझते थे दिल का रिश्ता
क्या पता था कि वह दिल के नहीं
हमारी चीजों के कद्रदान होंगे
हमें कितने सपने दिखाते थे
ख़्वाबों के अंबार जुटाते थे
क्या पता था वह हमें
फुर्सत का सामान समझते होंगे
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1 टिप्पणी:

Mired Mirage ने कहा…

:)बहुत अच्छा लिखा है । शायद ऐसा भी होता होगा ।
घुघूती बासूती

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