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7/26/2011

नयी सनसनी-‘लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (naye sansani-hindi hasya vyangya)

          प्रचारक महाराज ने अपने सचिव से कहा-‘यह बताओ, इस बार अपने प्रचार तंत्र से आय कम होने का कारण क्या है? इधर हमारे विज्ञापन दाता तो उधर हमारे आका दोनों ही हमसे नाराज चल रहे हैं। उनका कहना है कि इधर हमारे प्रचार युद्ध में मजा नहीं आ रहा है। अपने प्रचारतंत्र का स्तर बनाये रखने के लिये प्रयास करना जरूरी है। तुम अपने अधीनस्थ सभी लोगों को जाकर सचेत करो।’
          सचिव ने कहा-‘सर, हम क्या करें? हमारे तंत्र की पूरी कोशिश है कि आम आदमी हमारी पकड़ से बाहर नहीं जाये। अखबार, टीवी चैनल और रेडियो पर नित नित नये मनोरंजन कार्यक्रम कभी प्रेम तो कभी द्वंद्व से सजाकर लगातार प्रस्तुत करते हैं। लेाग अपना सारा समय हमारे प्रचार तंत्र में गुजारते हैं या फिर हमारे उद्घोषकों की सुझायी गयी जगहों में गुजारते हैं। होटल, मॉल और बारों के अपने पास खूब विज्ञापन भी मिलते है। कम से कम एक बात तय है कि आज की युवा या बुढ़ाई गयी पीढ़ी हमारी पकड़ से बाहर नहीं है।’’
         प्रचारक महाराज नाराज हो गये और बोले-‘पूरा समाज हमारी पकड़ में है यह तो पता है। उसकी मुक्ति का मार्ग कोई नहीं है यह भी हम जानते हैं पर मुश्किल यह है कि हमारे दाता और आका अगर प्रसन्न नहीं है तो वह हमारे लिये बहुत बुरा है। उनको भी तो एक आम आदमी के रूप में मनोंरजन, सनसनी और कामेडी का मसाला चाहिए। यह सबसे बड़ी बात है। हम समाज सेवकों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और बाहुबलियों का गुणगान करते हैं उससे तो वह खुश हो जाते हैं पर वह मनोरंजन के नये ढंग भी देखना चाहते हैं। उनके लिये प्रकाशनों और प्रसारणों में प्रेम और द्वंद्व के नये नये कार्यक्रम इस तरह सजाओं कि खास आदमी भी हमारे जाल में वैसे ही फंसा रहे जैसे कि आम आदमी।
           सचिव बोला-‘अब हम कर भी क्या सकते हैं। क्रिकेट, फिल्म, हास्य और रुदन वाले टीवी धारावाहिकों में रोज नवीनता लाते हैं। कभी क्रिक्रेटर को भी रैम्प पर नचवाते हैं तो आदमियों को नारी वेश में सजाकर कॉमेडी भी करवाते हैं। नारीपात्रों से सैक्सी चुटकुले भी सुनाते हैं। कभी यस बॉस जैसे घरेलू कार्यक्रमों में बदनाम लोग भी सजाते हैं तो कभी नकली अदालतें भी चलवाते हैं।’’
            प्रचारक महाराज बोले-‘यह सब बकवास है। दरअसल ऐसे मुद्दे लाओ जिससे समाज में सामूहिक सनसनी फैले। लोग बहस में तर्क कम दें चीखके और चिल्लायें ज्यादा! ऐसा लगे कि जैसे झंगड़ा हो रहा है। लोगों को दूसरों का झगड़ा देखना पसंद है।
          सचिव बोला-‘वह तो आतंकवाद के मुद्दे पर हमेशा ही करते हैं। कभी किसी रेलदुर्घटना या जहरीली शराब पीने की घटना के समाचार सनसनी फैलाते हैं तो हम उन पर संवदेनशील बहस भी चलवाते हैं। लोग ऐसे लाते हैं कि जो तर्क कम दें बल्कि चीखें और चिल्लायें ज्यादा, साथ ही नारों को समाज सुधार का मंत्र बताने लगें।’’
         प्रचारक महाराज बोले-‘नहीं, तुम समझे नहीं! नये नये प्रकार के झगड़े ले आओ। स्त्री पुरुष अमीर गरीब, पूंजपति मजदूर और शोषक और शोषित वर्ग की जंग में मजा नहीं आता। यह सब पुराना पड़ गया है।
सचिव बोला-‘‘अब झगड़े तो इसी प्रकार के ही हो सकते हैं। यह तो संभव नहीं है कि किसान और क्लर्क के बीच में युद्ध कराया जाये।
         प्रचारक महाराज एक उछल गये और बोले-‘वाह, क्या आईडिया दिया है। कितना आकर्षण है इन शब्दों मे, जिसे तुम किसान क्लर्क युद्ध कह रहे हों। हां, करवाओं यह युंद्ध। अपने दाता और आका दोनों ही खुश होंगे क्योंकि इसमें दोनों का कुछ नहीं बिगड़ेगा। हमारे दाता और आका दोनेां ही खुश होंगे। जनता की खुश होगी। नया विषय और नया शीर्षक होगा ‘किसान क्लर्क युद्ध’!’
        सचिव ने पूछा-‘मगर क्लर्क कोई हैसियत नहीं रखते। फाइलों पर फैसला तो बड़े लेाग ही लेते हैं। यही बड़े तो हमारी फाइलों से भी दो चार होते हैं। फाईल और धरती के बीच टेबल भी होती है इसलिये क्लर्क और किसान युद्ध नहीं हो सकता।
        प्रचारक महाराज एकदम उत्तेजित स्वर में बोले-‘अब तुम खामोश हो जाओ। यहां से जाकर अपने सलाहकार फिक्सर साहब को भेजो। वही अंग्रेज मेरी बात समझेगा। अरे, तुम कुछ विचार नहीं कर सकते। देखो शहरों में अनेक ज्रगह किसानों की जमीन लेकर कॉलोनियां बसाई गयी हैं। इन कालोनियों में बड़े लोग भी रहते पर उनमें क्लर्क यानि मध्यम वर्ग अधिक रहता है। जाओ किसानों में असंतोष फैलाओ फिर क्लर्क भी आंदोलन करेेंगे। दोनो के विवाद पर बहस होगी। इस तरह नयी सनसनी बनेगी। नये मुद्दे पर बहस होगी। अपने विज्ञापन खूब चलेंगे। इससे दाता भी खुश होंगे और आका भी मजे में रहेंगे।
           सचिव बोला-‘मगर इस पर पैसा खर्च होगा।’
         प्रचारक महाराज बोले-‘मूर्ख कहीं के, पैसे खर्च होंगे तो होने दो। आयेंगे भी तो हमारे पास ही न। अरे, हमसे जमीन और पैसा लेकर कौन कहां जा सकता है! घूम फिरकर आना अपने पास ही है। जितना उनके पास जायेगा उतना खर्च तो आना ही है। कमाने पर भी पैसा खर्च होता है। अगर, हम ऐसा न करें तो सनसनी और मनोरंजन की वैसी सामग्री कहां से आयेगी जो विज्ञापनों के बीच में डाली जा सके। अब तुम जाओ और फिक्सर को बुलाओ।’’
सचिव चला गया और उधर से फिक्सर साहब आ रहा था।
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वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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7/16/2011

आतंकवाद का अर्थशास्त्र जानना आवश्यक-हिन्दी लेख (what economics of terrism or atankvad ka arthshastra-hindi article or lekh)

           मुंबई बम विस्फोटों पर कोई नया लिखना चाहे भी तो नहीं लिख सकता। हालांकि किसी हादसे में हताहतों के प्रति सहानुभूति जताने की प्रथा है पर लगता है कि वह भी अब अधिक नज़र नहीं आती। एसा लगता है कि हमारे देश हादसों की संख्या अब देश में मनाये जाने वाले पर्वों के बराबर हो गयी है। देखा जाये तो शायद हमारा देश विश्व का इकलौता देश है जिसमें इतने सारे पर्व मनाये जाते हैं कि हर हादसे के बाद कोई न कोई पर्व आता है और लोग अपना तनाव भुला देते हैं।
      13 जुलाई को मुंबई में बमविस्फोटों में हताहत लोगों की संख्या और उससे दो दिन पहले फतेहपुर में कालका एक्सप्रेस की दुर्घटना में हताहत लोगों की संख्या कहीं बहुत अधिक थी। इस दुर्घटना से पूरा देश अचंभित था। इस दुर्घटना की जांच पूरी नहीं हो पायी थी कि मुंबई में विस्फोट हो गये। दोनों हादसों में कोई अधिक अंतर नहीं था इसलिये ही शायद देश में वैसी सहानुभूति की लहर मुंबई हादसे पर नहीं दिखी। आखिर आंसुओं की भी सीमा है। आंसु सूख जाते हैं तो आंखें पथराने लगती हैं। फिर हादसे दर हादसे झेलते हुए इंसान निरंतर रोने के साथ आंसु इतने सुखा देता है कि फिर वह दर्द मिलने पर भी हंसने लगता है। मतलब वह दिमागी संतुलन खो देता है। मगर देश एक इंसान नहीं है बल्कि इंसानों से भरा पड़ा है। इसलिये सामूहिक प्रतिक्रियाओं से वहां के लोगों की भावना का समझा जा सकता है। तय बात है कि लोगों ने मान लिया है कि यह सब चलता रहेगा। हम इसे संवेदनहीनता की स्थिति नहीं मान सकते पर पिटने की आदत को स्वीकार कर लेना तो माना ही जा सकता है। आम आदमी ने मान लिया है कि वह तभी तक सुरक्षित है जब तक भगवान चाहता है।
मुंबई बमविस्फोटों की जांच जारी है। अब सवाल आता है कि आखिर इनका लक्ष्य क्या हो सकता? जहां तक हमारी मान्यता है कि आतंकवाद को किसी जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र से जोड़ना अपने आपको धोखा देना है। दरअसल ऐसा लगता है कि यह किन्हीं छद्म सफेदपोशो के समूहों के अपराधों कोे संरक्षण देने वाला व्यवसाय बन गया है।
         आतंकवाद को अपराध से अलग कोई नया पाप मानना तो अपराध शास्त्र से मुंह मोड़ना है। अपराध शास्त्र कहता है कि अपराध या हत्या जड़, जोरु और ज़मीन के लिये होता है। मतलब कि कोई भी अपराधी बिना लाभ के लिये कोई  काम नहीं करता। कुछ लोगों ने सवाल भी किया है कि आखिर आतंकवादी हमले मुंबई पर ही क्यों होते हैं? लोग यह प्रतिप्रश्न भी कर सकते हैं कि मोमबत्तियां भी मुंबई के हादसे वाली जंगहों पर ही क्यों जलती हैं अन्यत्र शहरों में ऐसा क्यों नहीं होता जहां आतंकवादियों ने हमले किये हैं?
         इस तरह की बेकार बहसों से इतर हम ऐसी बातों पर विचार करें जिससे सत्य सामने आये। मुंबई को भारत की आर्थिक राजधानी कहा जाता है। तय बात है कि देश के सर्वाधिक संपन्न लोग वहीं रहते हैं। इसके अलावा फिल्मी, टीवी धारावाहिक तथा अन्य महत्वपूर्ण मनोरंजन के केंद्रीय स्थल वहीं हैं जो सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की तरह हैं। इधर टीवी चैनलों और अखबारों ने इशारे से बताया है कि आतंकवादी संगठनों को पैसा मिलना कम हो गया है। ऐसा लगता है कि जांच एजेंसियां या अन्य महत्वपूर्ण लोग इस बात को रेखांकित कर सकते हैं कि कहीं यह मुंबई के साथ ही देश के अन्य अमीरों में भय पैदा करने के लिये तो यह विस्फोट नहीं किये गये। अक्सर पाकिस्तान में रहने वाले कुछ अपराधियों की इस तरह की वारदातों में शामिल होने की बात कही जाती है। इन्हीं अपराधियों के साथ भारत में सक्रिय कुछ सफेदपोशों के व्यवसायिक संबंध होने की बात भी कही जाती है। भारतीय अपराधियों के बारे में कहा जाता है कि वह आतंकवाद के प्रायोजक हैं तब यकीनन यह पैसा हमारे देश से ही जाता होगा। इधर देश में बहुत समय तक शांति रही है तो सकता है कि अपराधियों के गिरोहों की कमाई कम हो गयी हो और उन्होंने अमीरों को डराने के लिये मुंबई के महत्वपूर्ण व्यवसायिक क्षेत्रों में यह विस्फोट किये हों।
      सभी जानते हैं कि इस तरह के विस्फोटों से कोई समस्या हल नहीं होती। इनको कराने वाले पैसा खर्च करते हैं और यकीनन वह कहीं न कहीं से उससे अधिक उसकी वसूली करते हैं। यह पैसा केवल अमीर ही दे सकते हैं। अफसोस इस बात का है कि मरता सभी जगह आम आदमी है। यह सही है कि देश के सभी खास और अमीर आदमियों की संख्या कम होती है इसलिये सभी को सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जा सकती है जबकि आम आदमियों की तो उससे कई लाख गुना भीड़ है तब यह संभव नहीं हो सकता कि सभी को सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध करायी जाये! उसी तरह देश के महत्वपूर्ण स्थानों की चौकसी की जा सकती है पर हर सड़क या गली पर निगरानी नहीं की जा सकती! बहसों और चर्चाओं में भले ही पेशेवर बहसकर्ता कुछ भी कहें पर इसके पीछे पैसे की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका नहीं मानते। वह ऐसे अपराधों का जाति, भाषा, वर्ग और धन के आधार पर उनका विभाजन करते हैं। अपराधियों में भेद करते है। कुछ न मिले तो पड़ौसी देश पर आरोप मढ़कर खामोश हो जाते हैं। शायद ही यह कोई कहता हो कि देश के कथित बढ़ते विकास के साथ ही आतंकवाद भी बढ़ रहा है। इसके पीछे के अर्थतंत्र की पूरी भूमिका देखना आवश्यक है। हमारे जैसे ब्लाग लेखकों के स्त्रोत तो एकदम सीमित होते हैं इसलिये अखबार तथा टीवी के आधार पर लिखते हैं पर जिनके काम करने का दायरा व्यापक है ऐसे बुद्धिजीवी इस पर खोज करें तो उन्हें यकीनन नयी बातें पता चलेंगी तब आतंकवाद का अर्थशास्त्र समझ मे आयेगा।
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7/08/2011

असल में नकल-हिन्दी हास्य कविता (asal mein nakal-hindi hasya kavita or comic poem)

चेला पहुचा समाज सेवक के पास और बोला
‘‘महाराज,
गरीबों की सेवा,
स्त्रियों का उद्धार,
और असहायों की सहायता
जैसे जैसे काम करते
अपना भी मन भर आया
ऐसे में दिमाग में नया आईडिया भी आया।
आज एक खबर छपी है जिसने कन्या पक्ष ने
वर के माता पिता को दहेज में
नकली सोने के आभूषण के साथ
नकली नोटों का पुलिंदा थमाया,
ऐसे में मेरे अंदर दहेज पहचान केंद्र की
स्थापना कर लोगों की मदद करने का
ख्याल आया।
कमीशन लेंगे जोरदार
हम तो बटोरेंगे माल
दहेज देने और लेने वाले पर रहेगा
असल नकल का दारोमदार,
इस रंग बदलती दुनियां में
यह अच्छा समय आया
पड़ गयी है संस्कार और संस्कृति पर
संकट की छाया,
नकली नोट और सोने की पहचान में
हम करेंगे वरपक्ष की मदद,
अपना धंधा भी चलेगा
आपका भी धर्मरक्षके रूप में लोहा मनेगा,
चेलों को भी पहुंच जायेगी रसद,
संस्कार और धर्म की रक्षा करने का
इसी तरह एक नया अवसर आया।’’

सुनकर बोले
‘कमबख्त
यह कैसा विचार तेरे मन में आया,
तुझे शायद मेरे धंधों का ज्ञान नहीं है,
हमारी असल के पीछे नकल है
इसका तुझे भान नहीं है,
हमारे अपने लोग
घी, दूध, सोना और तेल
नकली बेचकर ही अपना काम चला रहे हैं,
इतने महान हैं कि
अपने घर में नकली तेल से चिराग जला रहे हैं,
मैं तो आंखें बंद कर करता हूं समाज सेवा,
चेले डाल जाते हैं अपनी सुरक्षा क लिये मेरे घर मेवा,
ऐसे में दहेज पहचान केद्र की स्थापना करना
अपने लोगों के लिये
संकट की बन सकती है वजह,
समाज में फिर बची कहां है असल के लिये जगह,
छा रही है सभी जगह नकल
शादी में कहां से आयेगी असल,
हमें तो बाहर असल और नैतिकता की बात करनी है,
अलबत्ता तिजोरी अपनी नकल से ही भरनी है,
इसलिये भूल जा अपना विचार,
हम क्यों करें समाज का उद्धार
असल में नकल करने वालों को ही सहारा देकर
हमने सम्मानीय स्थान पाया।’’
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7/03/2011

नए जमाने के शेर-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ(naye zamane ke sher-hindi vyangya kavitaen)

लापता हो गये हाड़मांस के असली शेर,
कुछ बीते इतिहास में दर्ज थे
कुछ आज भी कागजों में दिख रहे हैं।
नए जमाने में
पैसे, पद और प्रतिष्ठा के शिखर पर
बैठे इंसान ही कागज पर
अपने नाम में शेर लिख रहे हैं।
---------------
सुना है उनका शेर जैसा है जिगर
पर नहीं जिंदा रह सकते
वह कागज़ के नोट खाये बगैर।
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कंधे पर बंदूक लटकाए
वह घूम रहे हैं
कहते हुए अपने को शेर,
दुश्मन बनाए हैं जमाने में
काँपते हैं हर पल
कब कौन कर देगा कब ढेर।
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