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11/23/2010

ईमानदारी पर हास्य कविता सुने और सुनायें-हिन्दी हास्य कविता (imandari par hasya kavita-hini comic poem)

आया फंदेबाज दनदनाता
और बोला
‘‘दीपक बापू,
लाया हूं तुम्हारे ब्लाग हिट होने का नुस्खा,
नहीं होना मेरी बात पर गुस्सा,
तुम अब बेईमानों के दुष्कर्म पर
लिखा करो जोरदार हास्य कविता,
जला दो भ्रष्टाचार की चिता,
एक दिन तुम बहुत बड़े
साहित्यकार बन जाओगे,
तब मेरी सलाह के गुण गाओगे,
आजकल सभी जगह भ्रष्टाचार की
चर्चा है,
कई लोगों के घर में आमदनी से
अधिक बहुत ज्यादा खर्चा है,
तुम बेईमानी पर लिख कर प्रसिद्ध हो जाओ।’’

सुनकर पहले सोच में पड़े दीपक बापू
फिर बोले-
‘‘कमबख्त जमाने के साथ चलना चाहिए,
न कि वह चले आगे आप पीछे आईये,
पहले कहा जाता था यथा राजा तथा प्रजा
आधुनिक लोकतंत्र में यह उलट है
यथा प्रजा तथा राजा,
आम इंसानों को पसंद आता
वही शख्स
जिसके सिर पर ताज है,
नहीं देखना चाहता कोई भी
छिपा जो इसके पीछे राज है,
भ्रष्टाचार ने इतना कमजोर कर दिया है समाज,
बेईमानी ताकत बन गयी है आज,
बेदाग आदमी भला
क्या अपनी जिंदगी बनायेंगे,
अपने बच्चों की शादी को तरस जायेंगे,
चरित्र पर दाग बन गये हैं
कमीज में सोने की बटन की वजह,
बेदाग की जिंदगी में रह जाती है कलह,
नहीं रहा अब वह समय
जब ईमानदार से लोग सीखने जाते हैं,
आजकल बेईमान ही गुरु हो जाते हैं,
सच बात तो यह है कि
भूल जाओ बेईमानी और भ्रष्टाचार पर
कविता लिखने की बात,
पुरानी मान्यताऐं हैं एक तरह से अंधेरी रात,
आओ,
ईमानदारी और सज्जनों पर
हास्य कविता सुने और सुनायें,
उनका जीभरकर मजाक उड़ायें,
भ्रष्टाचार ज़माने के खून में आ गया है,
शिष्टाचार की तरह छा गया है,
इसलिये ईमानदारी का मज़ाक हम उड़ायेंगे,
तब अधिक लोग हमसे जुड़ जायेंगे,
भ्रष्टाचारी और दुष्ट
पा रहे सभी जगह सम्मान,
नैतिकता पर उपदेश देकर
दिखाते सभी जगह अपनी शान,
बेदाग तो अपने घर में अजनबी हो जाते हैं,
दागदार सभी जगह चैन से सो पाते हैं,
हम से कह दी
भ्रष्टाचार और बेईमान पर हास्य कविता लिखने की बात,
कहीं अन्यत्र मत कहना
वरना कोई भी मारेगा जोर से लात,
ईमानदारी पर कटाक्ष कर
सभी जगह सम्मान पाओगे,
बेईमानों और गद्दारों पर छींटाकशी की
तो डंडे खाओगे,
हमारी बात अच्छी तरह समझ जाओ,
ऐसा न हो कि फिर पछताओ,
भीड़ में भी मूर्ख सिद्ध हो जाओगे।’’
.........................

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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11/20/2010

बिग बॉस और राखी के इंसाफ के अंश प्रसारण की भी क्या छूट मिल गयी है-हिन्दी लेख (big boss aur rakhi ke insaf ke prasaran ki chhoot-hindi lekh

यह कहना मुश्किल यह है कि सरकारी आदेश किस तरह का था। जिन लोगों को सरकारी आदेश पढ़कर उसका मतलब समझ में आता है उनके लिये यह आवश्यक है कि उसकी प्रति उनके पास हो। संभव है कि वह इंटरनेट पर उपलब्ध हो पर ढूंढना कठिन काम है मगर इतना तय है कि सरकारी आदेश और उनके लागू होने की एक निश्चित पक्रिया है और उसे केवल जानकार ही समझ पाते हैं।
हम बात कर रहे हैं भारत के सूचना प्रसारण मंत्रालय के उस आदेश की जिसमेें राखी के इंसाफ और बिग बॉस के प्रसारण समय का नियमन कर उसे रात्रि 11 बजे से सुबह 5 बजे के बीच तय किया गया था। बिग बॉस प्रसारित करने वाले चैनल ने अपनेक कार्यक्रम का समय ने सूचना न मिलने की बात कहकर नहीं बदला और अगले दिन इस निर्णय के विरुद्ध न्यायालय से स्थगनादेश ले लिया। जबकि राखी का इंसाफ धारावाहिक के बारे में यह पता नहीं कि उसका प्रसारण कब हो रहा है?
हमें न तो बिग बॉस से आपत्ति न राखी के इंसाफ पर! न समय पर न सामग्री पर! हमारा प्रश्न दूसरा ही है। दरअसल सरकारी आदेश-जिसकी जानकारी टीवी चैनलों से मिली थी पर देखा नहीं गया है-में यह कहा गया कि यह दोनों कार्यक्रम रात्रि 11 बजे से सुबह पांच बजे के बीच प्रसारित किये जायें साथ ही इनके अंश भी ऐसे ही प्रसारित हों। जैसे ही बिग बॉस और राखी सावंत के इंसाफ के समय नियमन की बात आई वैसे ही सारे समाचार चैनलों ने उसे मान लिया और दोनों कार्यक्रमों को अंश प्रसारित करने की बजाय कुछ शालीन फोटो देना शुरु कर दिये। सोमवार को जब प्रसारणकर्ता स्थागनादेश ले आया तो उसने अपना समय नहंी बदला मगर क्या इसे अंश प्रसारित करने वालों को भी छूट मिल गयी? क्या अंश प्रसारित करने वालों ने अलग से कोई स्थागनादेश लिया या बिग बॉस कार्यक्रम के प्रसारणकर्ता चैनल ने भी उनके लिये छूट ले ली थी? यह प्रश्न हमारे दिमाग में घुमड़ रहे। खासतौर से तब जब राखी के इंसाफ कार्यक्रम के अंश अब नहीं दिख रहे।
अगर टीवी समाचार चैनलों और समाचार पत्रों के समाचार देखें तो यह आदेश तीन स्तरीय रहा होगा? एक तो बिग बॉस पर समय नियंत्रण, दूसरा राखी के इंसाफ का पर समय नियंत्रण और तीसरा दोनों कार्यक्रमों के अंश प्रसारण पर समय नियंत्रण?
राखी का इंसाफ कार्यक्रम के लिये ऐसी कोई खबर नहीं है कि उन्होंने कोई ऐसा स्थागनादेश लिया हो पर बिग बॉस के प्रसारण और उसके अंश देखकर यह ख्याल तो आया कि क्या समाचारों के नाम पर मनोरंजन थोपने वाले चैनलों को भी क्या छूट मिल गयी? अपने घालमेल में मशगूल प्रचार माध्यमों के कार्यकर्ता न तो इस पर कोई टिप्पणी कर रहे हैं न असलियत पर कोई प्रकाश डाल रहा है।
सरकारी आदेश और उन पर अदालत की कार्यवाही अनेक प्रकार के तकनीकी नियमों के पालन के संदर्भ में होने के साथ ही स्पष्ट होती है। । दोनों में हर संदर्भ में हर बात स्पष्ट रूप से कही जाती है। ऐसे में सरकारी आदेश और अदालत के स्थागनादेश की पूर्ण जानकारी लोगों को इन्हीं प्रचार माध्यमों के माध्यम से देना चाहिए पर यह दायित्व किसी ने नहीं पूरा किया। अगर बिग बॉस का प्रसारणकर्ता स्थगनादेश ले आया है और वह केवल उसी के संदर्भ में है तो अंश का प्रसारण करने वाले समाचार चैनल भी मुक्त हो गये? यकीनन यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है? ऐसे में न्यायविद ही प्रकाश डाल सकते हैं।
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11/17/2010

मांसाहार और अध्यात्मिक भ्रष्टाचार-हिन्दी लेख (mansahar aur adhyamik bhrashtachar-hindi lekh)

कुछ विद्वान मांसाहार को सही साबित करने के लिये कुछ अधिक ही अध्यात्मिक ज्ञान का बखान करते हुए विज्ञान का भी हवाला देते हैं, तब हंसी आती है। वैसे यह पश्चिमी विज्ञान की मान्यता नहीं है कि पेड़ पौद्यों में भी जीवन होता है बल्कि भारतीय अध्यात्म दर्शन भी इस बात की पुष्टि करता है कि वनस्पतियों में भी जीवन का स्पंदन होता है। ऐसे में मांसाहारी विद्वान दावा करते हैं कि जब सब्जी या अन्य शाकाहार पदार्थों के उत्पादन, जड़ से प्रथकीकरण तथा सेवन करने पर भी अन्य जीव की हत्या होती है ऐसे में पशु या पक्षियों को मारकर खाने को ही मांसाहार मानते हुए उसे पाप कैसे माना जाये?
मज़े की बात है कि शाकाहार समर्थक भी कोई वज़नदार तर्क नहीं रखते क्योंकि इसके लिये जरूरी है कि भारतीय अध्यात्म के दो महत्वपूर्ण तत्वों योग विज्ञान तथा ज्ञान के साथ विज्ञान से परिपूर्ण श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का अध्ययन किया गया हो। सब्जियों और पशु पक्षियों के सेवन मेें शाकाहार और मांसाहार का भेद जानने के लिये श्री मद्भागवत में वर्णित ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’ का सूत्र बहुत सहायक होता है।
जब मनुष्य और पशु पक्षियों की बात करते हैं तो उनकी सभी पांचों इंद्रियों के गुणों की सक्रियता समान दृष्टिगोचर होती है। आंख देखती है, कान सुनते हैं, मुख भोज्य पदार्थ ग्रहण करता है, देह स्पर्श करती है तथा नाक सांस लेती है और यह सभी जगह दृश्यव्य है। सभी जीव अपने अपने दैहिक अंगों से पेट भरने के लिये भोजन जुटाने की चेष्टा करते हैं जबकि वनस्पतियां चेष्टा रहित है न होकर स्थिर रहती हैं। उनको पानी तथा खाद के लिये दूसरे जीवों पर निर्भर रहना पड़ता है। जहां तक जीवात्मा का प्रश्न है तो हम उनमें उन्हीं गुणों की उपस्थिति समझें जो देह की प्रदर्शित इंदियों के साथ हमारे सामने दृष्टिगोचर होती है। अतः जड़े से प्रथक होते समय उनको न पीड़ा का अनुभव होता है न वह आर्तनाद करती हैं। इसलिये उनका भोजना सात्विक माना गया है।
किसी भी जीव की आत्मा अगर शरीर से अलग हो जाये तो उसकी स्थिति केवल इतनी रह जाती है कि उसको केवल अस्तित्व का अहसास भर होता है पर उसमें बाकी गुण भी नहीं रह जाते। हां, यह सभी गुण भी उसमें रह सकते हैं अगर व्यक्ति ने जीवन भर योग साधना की हो और उसे तत्वज्ञान हो। अंतिम समय में देहधारी देव जिस तरह का भाव लेता है वही आत्मा में जाता है। इसका आशय यह है कि जिस जीव की देह में जितनी इंद्रियां सक्रिय है उनके गुण ही उसके अंदर विद्यमान हैं। जब हम पशु पक्षियों की बात करते हैं तो देखना, सुनना, बोलना तथा अनुभव करना मनुष्यों की तरह हैं जबकि वनस्पतियों में यह इंद्रियां सक्रिय नहीं होती हैं। अतः सब्जी काटे जाते समय न तो आर्दनाद करती है न देखती है और उसे आभास होता है जबकि पशु पक्षी कटते समय आर्दनाद करते हैं। उनका यह आर्तनाद तथा शाप उनके मांस में भी शामिल हो जाता है जोकि खाने वाले के लिये कष्टकारक होता है। दूसरी बात यह कि सब्जी या वनस्पतियों को काटा न भी जाये तो वह स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं जबकि पशु पक्षी न काटे जाने पर अपनी आयु पूरी करते हैं। इसलिये मांसा का सेवन तामस प्रवृत्ति का माना गया है।
अगर आप किसी सामान्य मनुष्य से कहें कि पेड से सब्जी काटकर कर दे तो वह काट देगा पर आप किसी से कहें कि तोता मारकर दे तो वह ऐसा करने के बारे में सोचेगा। वजह यह कि वनस्पति आंखों से नहीं देख रही न बोल रही है पर तोता देखने, सुनने के साथ ही समझ भी रहा है। अगर कोई उसे मारेगा तो उसकी वेदना और शिकारी के लिऐ शाप का भाव उसके मन में आयेगा तो अंततः खाने वाले पर भी उसका प्रभाव होगा क्योंकि जीव की संवेदनायें वायु में विचरती हैं और अंततः शाप और आशीर्वाद का प्रभाव होता है। मरता हुआ पशु पक्षी जब अपने बैरी को देखकर आर्तनाद करता है तो उसकी आत्मा घृणा का भाव लेकर जाता है जो उसे मारने तथा खाने वाले के लिये कष्ट पैदा करने के लिये प्रेरित करती है। वनस्पतियों के साथ ऐसा नहीं है।
दूसरी बात मांस मनुष्य पचा सकता है यह बात मांसाहारी बड़े दावे के साथ कहते हैं। इन महानुभावों को यह बात कौन बताये कि भारत ही नहीं पूरे विश्व में मधुमेह, उच्चरक्तचाप, कब्जी, गैसीय विकार से ग्रसित लोगों की संख्या आधी आबादी से अधिक है। अगर आधुनिक प्रचार माध्यमों के सर्वेक्षणों पर यकीन किया जाये तो पूरे विश्व समुदाय में दैहिक बीमारियों से ग्रसित लोगों की संख्या इतनी अधिक है और अपने आसपास स्वस्थ लोगों को देखकर भी यह यकीन नहीं होता कि वह वाकई प्रसन्न हैं। आज के समय में मांसाहारी ही क्या शाकाहारी भोजन पचा पाना भी अनेक लोगों के लिये मुश्किल है ऐसे में मांस के सेवन के दावे मज़ाक लगते हैं।
भारतीय अध्यात्मिक विज्ञान के जानकारों को ही यह पता है कि योगासन से शाकाहारी भोजन पचाया जा सकता है पर मांसाहार से तो शरीर में विकारों का पहाड़ बन जाता है। योगियों को तो यह देखते ही पता चलता है कि कौन शाकाहारी है और मांसाहारी क्योंकि वह वार्तालाप में ही इसका अनुभव कर लेते हैं। कहते हैं न कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। आदमी का रहन सहन, खान पान तथा संगत उसके व्यवहार पर प्रभाव डालता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का दावा करने वाले कुछ लोग मनुस्मृति और वेदों के उद्धरण देकर मांसाहार को उचित ठहराते हैं। दरअसल जहां सब्जी आदि न मिले वहां मनुष्य को मांस का सेवन करना बुरा नहीं है क्योंकि अपने पेट को भरना उसका पहला धर्म है। उसे जीवित रखना उसका कर्तव्य है। मगर जहां सब्जियां और अन्न उपलब्ध हो वहां मांसाहार करना आत्मिक भ्रष्टाचार से अधिक कुछ नहीं है-खासतौर से उन लोगों के लिये जो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की राह पर चलने का दावा करते हैं। प्रसंगवश भारत की भी बात करें। भगवान की कृपा से यहां हरियाली बड़े पैमाने पर उपलब्ध है। विश्व के भूवैज्ञानिक बताते हैं कि भारत में भूजलस्तर सबसे अधिक है। ऐसे में जब खाने के लिये हरी सब्जियां, दाल तथा अन्य साधन उपलब्ध हैं वहां मांसाहार का समर्थन करना अपने आप में एक बुद्धि विलास करने जैसा ही है। ऐसे जो लोग मनुस्मृति या वेदों के उद्धरण देते हैं वह इस बात को समझें कि श्रीमद्भागवत गीता की स्थापना के बाद भारतीय समाज में उसका स्थान सवौपरि हो गया है और जैसा कि हमारे समाज की आदत है कि वह आगे बढ़ता जाता है और अपने महापुरुषों का अनुसरण करते हुए पुराने विचार त्यागता जाता है।
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11/13/2010

वफा करना मना है-हिन्दी शायरी (vafa karna mana hai-hindi shayari)

बेशकीमती है ईमान
पर कौड़ियों के भाव
तो कभी जिस्मानी जरूरतों के लिये
बाज़ार में कुछ इंसान बेच जाते हैं,
हवस वह चीज है
जिसमें जब फंसते है लोगं,
इबादत के लिये
बदलते हैं जगह
खुद भी बदल जाते हैं।
------------
भरोसा शायद टूटने के लिये बना है,
जिसे देखों गद्दारी से सना है,
हैरानी है गैरों ने वक्त पर निभाया,
अपनों ने दी दगा या मुंह फेर लिया
जैसे वफा करना उनके लिये मना है।
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11/01/2010

लिपस्टिक लव-हिन्दी व्यंग्य (lipstic love-hindi vyangya)

एक तकनीकी शिक्षा महाविद्यालय में एक प्रतियोगिता हुई। हम इसलिये इसे मज़ेदार कह सकते हैं कि देश के हालात देखते हुए दर्दनाक या खतरनाक कहने का मन नहीं करता। जब किसी विषय पर रोते हुए आंसु सूख जायें तो क्या किया जाये? हंस लें! किश्तों में रोते रोते भी आंसु सूख जाते हैं तब जिंदगी नीरस हो जाती है और ऐसे हमारा प्रयास होता है कि हंसी ढूंढे। प्रतियोगिता यह थी कि छात्र अपने सामने छात्राओं को बिठाकर लिपस्टिक लगा रहे थे।
टीवी चैनलों पर यह बकायदा प्रसारित हुआ। इस पर चर्चायें हुईं। इंटरनेट पर भी बहुत कुछ लिखा गया अब हमारे समझ में नहीं आया कि लिखें कि नहीं! क्योंकि यह प्रतियोगिता एकदम बेतुकी लगी। जिस तरह टीवी चैनलों को विज्ञापन के बीच मेें समाचार तथा बहस सामग्री सजाने का अवसर मिला उससे यह प्रतियोगता और पात्र भी प्रायोजित लगे-अखबारी भाषा में कहें कि फिक्ंिसग लगी।
यह प्रतियोगता गलत या सही थी-इस पर निष्कर्ष प्रस्तुत करने का हमारा कोई प्रयोजन नहीं है। यह सारा दृश्य यह कुछ ऐसा ही है जैसे कि पहले बंदर बंदरिया का नाच लगता था। तब भी कोई वन्य जीव सेवी उन पर अपनी आपत्ति नहीं उठाता था तब अब लगभग बंदर हो चुके इंसान की इस हरकत पर क्या कहा जाये? फिर अपना नज़रिया अब घटनाओं के अच्छे बुरे होने से अधिक उसके पीछे प्रायोजक पर जाता है। आधुनिक शिक्षा आदमी को बंदर बना रही है यह इसका प्रमाण है। लोग कह रहे हैं कि इंजीनियरिंग के छात्रों का दिमाग तेज होता है पर हम सवाल पूछते हैं कि क्या बंदर का दिमाग का क्या धीमा होता है? हमारा ही जवाब है कि कदापि नहीं।
बात गणित और साइंस की भी हो गयी है। सभी छात्र छात्रायें इंजीनियरिंग के हैं। दूसरा इसका पहलू यह भी है कि उस महाविद्यालय के सभी छात्र छात्रायें इसमें शामिल हों इसका कोई प्रमाण नहीं मिला। इसका मतलब कुछ समझदारी भी रहे होंगे और आज के आधुनिक बंदर बंदरिया का लिपिस्टक कर्म देख रहे थे।
लेखाकर्म करने वाले लोग जब अपना काम करते हैं तब उनका दिमाग बहुत तेजी से भागता है। आंकड़ों का काम निरंतर करें तो ऐसा लगता है कि दिमाग का बहुत सा कचड़ा साफ हो गया है। इसका कारण यह है कि मनुष्य का मस्तिष्क और मन परिवर्तित राह पर चलकर प्रसन्न होते हैं-योग में इसलिये ध्यान को महत्व दिया जाता है। जब घर के हालातों का साहित्य दुःख दे रहा हो तब लेखाकर्म करने वालों को आंकड़े राहत दिलाते हैं। ऐसे ही एक लेखाकर्मी ने मज़ेदार बात कही थी कि ‘गणित से दिमाग तेज होता है, मगर सोचने की क्षमता कम होती है।’
हमने उससे पूछा कि-‘क्या इसका मतलब यह कि चिंत्तन क्षमता कम होती है।’
उसने कहा-‘हां, विज्ञान और गणित के लोगों की बुद्धि इतनी तीक्ष्ण होती है कि वह हर बात पर तथ्यपूर्ण ढंग से बात कर सकते हैं पर फिर भी अपनी तरफ से सोचने की क्षमता उनमें नहीं होती।’
उसकी बात सही लगी, मगर हर तथ्य ब्रह्म वाक्य नहीं हो सकता। अपवाद सभी जगह होते हैं। अनेक डाक्टर, इंजीनियर तथा लेखाकर्मी अच्छे लेखक भी होते हैं। अलबत्ता उनके विषयों का चयन इस बात को दर्शाता है कि कहीं न कहीं वह अपने शिक्षा से प्रभावित होते हैं। हमारे एक मित्र ने विज्ञान में शिक्षा पाई और लेखकर्म करने लगे पर मगर गज़ब के ग़जलकार हैं।
इंजीनियर के छात्र छात्रायें लिपिस्टक प्रतियोगिता में शामिल हो गये इस पर संस्कृति और संस्कार की बहस बेमानी है क्योंकि हम बढ़ते पाश्चात्य प्रभाव ने हमारे देश का संास्कृतिक बंटवारा कर दिया है। मतलब हमें ऐसी घटनाओं की उपस्थिति स्वीकारनी होगी और रोकर नहीं हंसते हुए। हमारी आधुनिक शिक्षा के तीन विषय हैं-विज्ञान, वाणिज्य तथा कला।
कला के विषय वही लोग लेते हैं जिनको केवल समाज को दिखाने के लिये उपाधि प्राप्त करनी होती है और ऐसे उनकी संख्या कम ही होती हैं। एक समय था जब देश में वाणिज्य शिक्षा का जोर था क्योंकि उस समय बैंकों के राष्ट्रीयकरण नया होने से उसमें रोजगार के अवसर अधिक थे। फिर आया गणित और विज्ञान का ज़माना। चिकित्सा तथा यांत्रिकी के विषय इतने लोकप्रिय हैं कि हर तीसरे घर का बच्चा पी. एम. टी. तथा पी. ई. टी. की तैयारी करता मिलता था। समय बदला अब कंप्यूटर के लिये भी अनेक लोग प्रयास कर रहे हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में छात्र अधिक हैं। जैसा विषय हैं वह उनमें चिंत्तन कर आगे बढ़ने की बजाय तेजी के साथ आगे बढ़ते रहो जैसे सिद्धांत पर उनको चलना होता है। मतलब अपनी आंखें बाहर हमेशा खुली रखो अंदर की बंद रहें तो चलेगा। सोच से पैदल! खाने के लिये फास्ट फूड का प्रचलन बढ़ा है पश्चिमी स्वास्थ्य विशेषज्ञों की इस चेतावनी के बावजूद कि वह खतरनाक हैं।
इस पर प्रचार पाने के लिये लालासित युवक युवतियों में को अच्छे बुरे की पहचान ही नहीं रही। अगर हम ऐसी घटनाओं पर आपत्ति करें तो अभिव्यक्ति की आज़ादी के के ठेकेदारों से आमना सामना हो जाता है। यह ठेकेदार बाज़ार और प्रचार माध्यमों के लिये काम करते हैं।
आखिर शैक्षणिक संस्थानों में ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल मूल स्त्रोत कभी नज़र नहीं आये पर हमें ऐसा लगता है कि तकनीकी शिक्षा एक सोची समझी योजना के तहत यहां दी जाती है। देश के इंजीनियर, चिकित्सक तथा कंप्यूटर विशेषज्ञ यहां से शिक्षा प्राप्त कर पश्चिमी तथा खाड़ी देशों में चले जाते हैं। देश इन पर लाखों रुपये लगाता है पर इससे यहां के लोगों को मिलता क्या है? सीधी बात कहें तो हमारे शैक्षणिक ढांचेे में ऐसे तत्व जुड़े हैं जो कहीं ने कहंी यहां पश्चिम के लिये गुलाम बनाने की दलाली करते हैं।
कुछ सवाल हैं जो दिलचस्प हैं!
1. हिन्दी में अंग्रेजी शब्द जोड़ने की वकालत क्यों की जाती है? इसलिये ही न कि यहां के लोग अंग्रेजी पूरी तरह से सीखकर अच्छी तरह बाहर जाकर गुलामी कर सकें। कहतें हैं कि अंग्रेजी के बिना काम नहीं चल सकता, मगर कहां? भारत में तो चल रहा है, इसका मतलब यह कि लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से यह बताया जाता है कि विदेश जाना है तो अंग्रेजी सीख लो। अनेक लोग सीख भी रहे हैं पर सभी विदेश नहीं जा पाते और जो रह गये उनके नाम बेरोजगारों की सूची में हैं।
2. आखिर इस तरह के घटिया नाटकों की जरूरत क्या है? तकनीकी छात्रों को इस तरह पाश्चात्य संस्कृति में दक्ष बनाया जाता है ताकि बाहर जाकर वहां अपने देश की कुसंस्कृति न फैलायें। आप सुनते ही होंगे कि अभी तक जो भारतीय बाहर गये हैं वह अपनी संस्कृति के साथ गये हैं। इतना ही नहीं कुछ तो वहां अध्यात्मिक रूप से अपनी ज़मीन से जुड़े हैं।
3. इससे छात्रों को लाभ क्या हैं? इससे शैक्षणिक क्षेत्रों में सक्रिय विदेशी भक्त तत्व यह संदेश विदेशों में भेजते हैं कि हम भी आपकी तरह हैं और गुलामों का अपने यहां आना जारी रखो। हम तुम्हारे मुताबिक यहां गुलाम बना रहे हैं।
4. छात्राओं को इससे क्या मिलेगा? यह एक खतरनाक सवाल है। हम यह दोहराते हैं कि हम इस घटना का विरोध नहीं कर रहे पर प्रति सवाल करते हैं कि क्या इससे लड़कियां अपने आपको सस्ता नहंी बना रही। सस्ता से मतलब रुपये में आंकलन करने से नहीं है। क्या छात्रायें यह सोच सकती हैं कि सामाजिक रूप से प्रतिष्ठा के मामले में उन्होंने अपने को हल्का बना लिया है।
यहां युवक युवतियों के दैहिक प्रेम पर प्रश्न नहीं किया जा रहा है बल्कि उसके प्रदर्शन के औचित्य पर सवाल उठाया जा रहा है। पशु पक्षी तथा वन्य जीव सार्वजनिक रूप से प्रेमलीला करते हैं पर उनको सर्वशक्तिमान ने विवेक के साथ और बंद कमरों में रहने लायक नहीं बनाया है। हम यहां प्रगतिशीलों और जनवादियों की तरह हर काम में सरकारी दखल की मांग नहीं करेंगे पर एक सवाल उठायेंगे कि यह तकनीकी छात्र उस पश्चिम के लिये शैक्षणिक मध्यस्थों की मौजूदगी में पाश्तात्य संस्कृति के साथ संपन्न गुलाम के रूप में तैयार हो रहे हैं तब भी वह पूंजीवाद का विरोधी होते हुए भी अभिव्यक्ति आज़ादी के आड़ में उनका समर्थन क्यों करते हैं?
सवाल नारीवादियों से भी है कि क्या उनको लगता है कि नारी ऐसीे घटनाओ से प्रदर्शन योग्य वस्तु या उपभोग्या के रूप में प्रचारित न होकर अपने पैरों से खड़ी हो रही है।  उनको यह भी बता दें कि पश्चिम में अनब्याही माताओं की बढ़ती संख्या से वहां के सामाजिक विशेषज्ञ चिंतित हैं। दूसरा यह भी कि अभी इटली में सार्वजनिक रूप से बिकनी पहनने पर रोक लगाने का प्रस्ताव चल रहा है जो कि पश्चिम का ही मुल्क है। वहां माना जा रहा है कि नारी के प्रति अपराध बढ़ने का यह एक कारण है।
जवाब मिलना मुश्किल है। भारत में गुलामों की फौज बनी रहे इसके लिये अंग्रेज अपने चेले छोड़  गये है, अलग बात है कि कुछ लोग पश्चिम का विरोध का दिखावा करते हैं। प्रायोजित बुद्धिजीवी, शिक्षाविदों तथा लेखन कर्मियों का एक बहुत बड़ा समूह है जिसके पास धन, पद और बाहूबल की ऐसी शक्ति है जिसे वही आम लेखक और विचारक समझ सकते हैं जो स्वतंत्रता का मूल्यांकन अपने ढंग से करते हैं। लिपिस्टक प्रतियोगता और बीयर बारों में वैलंटाईन डे मनाने पर विरोध और समर्थन तो एक प्रायोजित युद्ध लगता है। मूल रूप से इसके परिणामों पर कोई सोचता हो ऐसा लगता है। यह लिपिस्टक लव है जो आज यहां शुरु हुआ है कल दूसरी जगह होगा। परिणाम तो उन लोगों को ही भोगना है जो इस तरह के नाटक करते हैं। अलबत्ता ऊंच नीच होने पर लड़कियों को अधिक परेशानी होती है जिसमें बदनामी का संकट सबसे अधिक है, यह चिंता का विषय सामाजिक विशेषज्ञों के लिये हो सकता है।
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