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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

3/30/2010

आज हनुमान जयंती-सेवा भाव से भी श्रेष्ठता प्राप्त होती है (today hanuman jayanti-vishesh hindi lekh)

आज पूरे भारत में हिन्दुओं के प्रिय इष्ट श्री हनुमान जी की जयंती मनाई जा रही है। महर्षि बाल्मीकि जी द्वारा लिखा ‘रामायण’ हो या श्री तुलसीदास जी द्वारा लिखी गयी ‘रामचरित मानस’, किसी भी रामकथा में श्री हनुमान जी को भगवान श्रीराम के तुल्य ही नायक की तरह मान्यता प्राप्त है। भगवान श्रीराम के चरित्र की व्याख्या करने वाले ग्रंथ उनके नाम पर होने के बावजूद उनको अपने समय के एकल नायक के रूप में स्थापित नहीं करते क्योंकि उनकी सेवा का व्रत लेने वाले हनुमान जी अपने स्वामी के समकक्ष ही खड़े दिखते हैं।
बुद्धि और शक्ति के समन्वय का प्रतीक श्रीहनुमान जी मर्यादा के विषय में भी अपने स्वामी भगवान श्रीराम के समान थे। लंका दहन के बाद उन्होंने जब श्रीसीता जी को पुनः दर्शन किये तो उनसे अपनी पीठ पर चढ़कर श्रीराम के यहां चलने का आग्रह किया। देवी सीता ने अस्वीकार कर दिया। श्रीहनुमान जी जानते थे कि वह एक प्रतिव्रता स्त्री हैं और उनके आग्रह को स्वीकार नहंी करेंगी। दरअसल वह भी श्रीसीता जी की तरह यही चाहते थे कि भगवान श्रीराम अपने पराक्रम से रावण को परास्त कर श्रीराम को साथ ले जावें। उन्होंने यह आग्रह औपचारिकता वश कर अपनी मर्यादा का ही परिचय दिया था। हालांकि वह मन ही मन चाहते थे कि श्रीसीता उनका यह आग्रह अस्वीकार कर दें।
भगवान श्रीराम से मैत्री कर अपने ही भाई का वध कर राज्य प्राप्त करने वाले श्रीमान् सुग्रीव जब अपने सुख सुविधाओं के भोग में इतने भूल गये कि उन्हें भगवान श्रीराम के कर्तव्य का स्मरण ही नहीं रहा, तब श्रीहनुमान अनेक बार उनको संकेतों में अपनी बात कहते रहे। इसके बावजूद भी उन्होंने सेवक होने की मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। उनका ही यह प्रभाव था कि लक्ष्मण के श्रीराम के आदेश पर कुपित होने पर किष्किंधा आने से पहले ही श्रीसुग्रीव ने अपनी सेना को एकत्रित होने का आदेश दे दिया था। जब श्रीलक्ष्मण किष्किंधा पहुंचे तब श्रीहनुमान जी ने सुग्रीव की सफाई देते हुए उनको यही तर्क देकर शांत किया था। इससे पता लगता है कि श्रीहनुमान जी न केवल दूरदृष्टा थे बल्कि राजनीतिक विशारद भी थे।
भारतीय जनमानस में उनको नायकत्व की छबि प्राप्त होने का एक दूसरा कारण भी है कि उसमें वर्णित अधिकतर पात्र राजशाही पृष्ठभूमि के हैं पर श्रीहनुमान आम परिवार के थे। बाकी सभी लोगों ने कहीं न कहीं राजशाही का उपयेाग किया पर श्रीहनुमान जी सदैव सेवक बनकर डटे रहे। उनकी सेवा की इतनी बड़ी शक्ति थी कि उनके स्वामी पहले सुग्रीव और बाद में भगवान श्रीराम उनको समकक्ष दर्जा देते थे। भगवान हनुमान की यह सेवा कोई व्यक्तिपूजा का प्रतीक नहीं थी क्योंकि वह धर्म स्थापना के लिये तत्पर अपने स्वामियों की सहायता कर रहे थे। उनकी यह सेवा निष्काम थी क्योंकि उन्होंने कभी इसका लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया। जब सुग्रीव को बालि ने घर से निकाला तब श्रीहनुमान जी भी उनके साथ हो लिये। दरअसल वह सुग्रीव का नहीं बल्कि न्याय का पक्ष ले रहे थे। उसी तरह भगवान श्रीराम के लिये उन्होंने रावण सेना का संहार कर रावण द्वारा श्रीसीता के हरण का बदला ले रहे थे। उनका यह श्रम नारी अनाचार के प्रतिकार के रूप में किया गया था। कहने का अभिप्राय यह है कि श्रीहनुमान ‘सत्य, न्याय और चरित्र’ की स्थापना के लिये अवतरित हुए। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि उन्होंने धर्म स्थापना के लिये अपना पूरा जीवन लगा दिया। यही कारण है कि उनको राम कथा में लक्ष्मण से भी अधिक सम्मानीय माना गया। श्रीलक्ष्मण तो भाई होने के कारण श्रीराम के साथ थे पर हनुमान जी तो कोई पारिवारिक संबंध न होते हुए भी इस धरती पर धर्म स्थापना के लिये उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे। धर्म स्थापना के लिये सामुदायिक अभियान आवश्यक हैं यही उनके चरित्र से संदेश मिलता है।
हनुमान जयंती पर उनका स्मरण करते हुए यह चर्चा करना अच्छा लगता है। खासतौर से जब शारीरिक श्रम की महत्ता कम होती जा रही है और सेवा भाव को निम्न कोटि का माना जाने लगा है तब लोगों को यह बताना आवश्यक है कि इस संसार का संचालन उपभोग प्रवृत्ति के लोगोें की वजह से नहीं बल्कि निष्काम भाव से परिश्रम और सेवा करने वालों के कारण ही सहजता से हो रहा है। इस अवसर पर श्रीहनुमान को नमन करते हुए अपने ब्लाग लेखक मित्रों, पाठकों तथा देशवासियों को बधाई।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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3/25/2010

विकास और कदाचार-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (devlopment and corruption-hindi satire poem)

रबड़ के चार पहियों पर सजी कार
विकास का प्रतीक हो गयी है,
चलते हुए उगलती है धुआं
इंसान बन गया मैंढक
ढूंढता है जैसे अपने रहने के लिये कुआं,
ताजी हवा में सांस लेती जिंदगी
अब अतीत हो गयी है।
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उन्होंने पूछा था अपने दोस्त से
खुशियां दिलाने वाली जगह का पता
उसने शराबखाने का रास्ता दिखाया,
चलते रहे मदहोश होकर उसी रास्ते
संभाला तब उन्होने होश
जब अस्पताल जाकर
बीमारों में अपना नाम लिखाया।
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हमने उनसे पूछा कदाचार के बारे में
उन्होंने जमाने भर के कसूर बताये,
भरी थी जेब उनकी भी हरे नोटों से
जो उन्होंने ‘ईमादारी की कमाई‘ जताये।
मान ली उनकी बात तब तक के लिये
जब तक उनके ‘चेहरे’
रंगे हाथ कदाचार करते पकड़े नज़र नहीं आये।
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3/15/2010

इंसानी रिश्ते-हिन्दी शायरियां (insani rishtey-hindi sahyriyan)

दूसरों के दाग देखने की आदत
कुछ इस तरह हो गयी है कि
अपने कसूर दिखाई नहीं देते।
किसी के घावों को देखकर
खुश होने का रिवाज बन गया है
लोग अपनी जिंदगी के
स्याहा धब्बे इसी तरह छिपा लेते।
--------
कौन कहता है कि
जिंदगी के रिश्ते
ऊपर से तय होकर आते हैं।
सच तो यह है कि
इस धरती पर सारे इंसानी रिश्ते
हालातों से मोलभाव कर
तय किये जाते हैं।

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3/11/2010

पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों पर दंड का मामला-आलेख (punishment to pakistani cricket player-hindi article)

पैसे का खेल हो या पैसे से खेल हो, दोनों स्थितियों उसके उतार चढ़ाव को समझना कठिन हो जाता है क्योंकि कहीं न कहीं बाजार प्रबंधन उसे प्रभावित अवश्य करता है। हम यहां बात क्रिकेट की कह रहे हैं जो अब खेल बल्कि एक सीधे प्रसारित फिल्म की तरह हो गया है जिसमें खिलाड़ी के अभिनय को खेलना भी कहा जा सकता है। इस चर्चा का संदर्भ यह है कि पाकिस्तान के सात खिलाड़ियों को दंडित कर दिया गया है।
बात ज्यादा पुरानी नहीं है। भारत में आयोजित एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में-जिसमें विभिन्न देशों के खिलाड़ियों को नीलामी में खरीदकर अंतर्राष्ट्रीय होने का भ्रम पैदा किया जाता है-पाकिस्तान के खिलाड़ियों को नहीं खरीदा गया। उस समय पाकिस्तान के प्रचार माध्यमों से अधिक भारतीय प्रचार माध्यमों में अधिक गम जताया गया। अनेक लोगों ने तो यहां तक कहा कि दोनों देशों के बीच मित्रता स्थापित करने वालों के प्रयासों को इससे धक्का लगेगा-जहां धन की महिमा है जिसकी वजह से बुद्धिजीवियों  लोगों की राजनीतिक सोच भी कुंद हो जाती है।
भारतीय फिल्मों एक अभिनेता ने-उसके भी भारतीय फिल्म उद्योग में नंबर होने का भ्रम अक्सर पैदा किया जाता है-तो यहां तक सवाल पूछा था कि आखिर बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता जीतने वाले पाकिस्तान के किसी खिलाड़ी को इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये क्यों नहीं खरीदा गया?
दिलचस्प बात यह कि यह अभिनेता स्वयं एक ऐसे ही क्लब स्तरीय टीम का स्वामी है जो इस प्रतियोगिता में भाग लेती है। उसका प्रश्न पूछना एकदम हास्यास्पद तो था ही इस बात को भी प्रमाणित करता है कि धन से खेले जाने वाले इस खेल में वह एक टीम का नाम का ही स्वामी है और उसकी डोर तो बाजार के अदृश्य प्रबंधकों के हाथ में है। बहरहाल अब तो सवाल उन लोगों से भी किया जा सकता है जो बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता विजेता का हवाला देकर पाकिस्तान के खिलाड़ियों को न बुलाने की आलोचना कर रहे थे या निराशा में सिर पटक रहे थे। कोई देश के समाजसेवकों पर तो कोई पूंजीपतियों पर बरस रहा था।
पाकिस्तान ने एक ही झटके में सात खिलाड़ियों को दंडित किया है। इनमें दो पर तो हमेशा के लिये ही अतंराष्ट्रीय प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। आधिकारिक रूप से टीम के आस्ट्रेलिया में कथित खराब प्रदर्शन को जिम्मेदार बताया गया है। कुछ अखबारों ने तो यहां तक लिखा है कि इन पर मैच फिक्सिंग का भी आरोप है-इस पर संदेह इसलिये भी होता है क्योंकि आजीवन प्रतिबंध लगाने के पीछे कोई बड़ा कारण होता है। यदि खराब प्रदर्शन ही जिम्मेदार था तो टीम से सभी को हटाया जा सकता है दंड की क्या जरूरत है? दुनियां में हजारों खिलाड़ी खेलते हैं और टीमें किसी को रखती हैं तो किसी को हटाती हैं। दंड की बात तो वहां आती है जहां खेल में अपराध का अहसास हो।
जिस टीम और खिलाड़ियों ने पाकिस्तान को विश्व विजेता बनाया उनको एक दौरे में खराब प्रदर्शन पर इतनी बड़ी सजा मिली तब खराबा प्रदर्शन की बात पर पर कौन यकीन कर सकता है?
फिर पाकिस्तान की विश्व विजेता छबि के कारण उसके खिलाड़ियों को भारत में क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल न करने की आलोचना करने वाले अब क्या कहेंगे? उस समय उन्होंने जो हमदर्दी दिखाई गयी थी क्या अब वह जारी रख सकते हैं यह कहकर कि उनको टीम से क्यों निकाला गया? फिर भारतीय धनपतियों पर संदेह करने का कारण क्या था क्योंकि उस समय पाकिस्तान की टीम आस्ट्रयेलिया में दौरे पर थी और उसका प्रदर्शन अत्यंत खराब और विवादास्पद चल रहा था तब भला उसके खिलाड़ियों को कैसे वह बुलाते? क्योंकि उनका खेल खराब चल ही रहा था साथ ही वह तमाम तरह के विवाद भी खड़े कर रहे थे तब भला कोई भारतीय धनपति कैसे जोखिम उठाता?
वैसे अगर कोई बुद्धिमान पाकिस्तान पर बरसे तो उसका विरोध नहीं करना चाहिये। कम से कम इस खेल में हमारा मानना है कि दोनों देशों की मित्रता असंदिग्ध (!) है। अगर कुछ पीड़ित पाकिस्तान खिलाड़ियों के समर्थन में कोई प्रचार अभियान छेड़े तो भी मान्य है। मामला खेल का है जिसमें पैसा भी शामिल है और मनोरंजन भी! हैरान की बात तो यह है कि जिन खिलाड़ियों के भारत न आने पर यहीं के कुछ बुद्धिजीवी, नेता तथा समाजसेवक विलाप कर रहे थे-कुछ शरमा भी रहे थे-उनको टीम से हटाने में पाकिस्तान क्रिकेट अधिकारियों को जरा भी शर्म नहीं आयी। कितनी विचित्र बात है कि क्रिकेट के मामले में भी उन्होंने भारत के कुछ कथित बुद्धिजीवियों से अपनी दोस्ती नहीं निभाई जिसका आसरा अक्सर किया जाता है।
एक मजे की बात यह है कि पाकिस्तान के आस्ट्रेलिया दौरे पर खराब प्रदर्शन की जांच करने वाली वहां की एक संसदीय समिति की सिफारिश पर ऐसा किया गया है। जाहिर तौर उसमें वहां के राजनीतिज्ञ होंगे। ऐसे में वहां के भी उन राजनीतिज्ञों की प्रतिक्रिया भी देखने लायक होगी जो अपने कथित विश्व विजेताओं-अजी काहे के विश्व विजेता, दुनियां में आठ देश भी इस खेल को नहीं ख्ेालते-को भारत में बुलाने पर गर्म गर्म बयान दे रहे थे। अब उनको भी क्या शर्म आयेगी?
हमारा मानना है कि क्रिकेट कितना भी लोकप्रिय हो पर उसमें पैसे का भी  खेल  बहुत है। जहां पैसा है वहां प्रत्यक्ष ताकतें अप्रत्यक्ष रूप से तो अप्रत्यक्ष ताकतें प्रत्यक्ष रूप से अपना प्रभाव दिखाती हैं और यही इन खिलाड़ियों के दंड की वजह बना। वजह जो बतायी जा रही है उस पर यकीन करना ही पड़ेगा क्योंकि हम जैसे आम लोगों के लिये पर्दे के पीछे झांकना तो दूर वहां तक पहुंचना भी कठिन है। जो खास लोग पर्दे के पीछे झांकने की ताकत रखते हैं वह सच छिपाने में भी माहिर होते हैं इसलिये वह कभी सामने नहीं आयेगा! टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपी खबरों के आधार पर तो अनुमान ही लगाये जा सकते हैं।
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3/01/2010

अपना अपना दाव-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (apna apna daav-hindi satire poem)

अंधों की तरह रेवड़ियां बांटने का
चलन अब आंख वालों में भी हो गया है।
कहीं पुजते दौलतमंद
कहीं सजते ऊंचे ओहदे वाले
कहीं जमते बाजुओं में दम वाले
तो कहीं उनके चाटुकार चमकते हैं
लोगों के हैं अपने अपने दाव
उजले नकाब पहनने पर हैं आमदा
क्योंकि चरित्र सभी का खो गया है।
--------
सम्मान बेचने वाले ने
एक कवि से कहा
‘कुछ जेब ढीली करो तो
हमसे सम्मान पाओ।
आजकल सब बिकता है बाजार में
शब्दों से खाली वाह वाह मिलती है,
कविता कागज पर लिखकर
पैसा खर्च करने की बजाय
हमारी जेब में पहुंचाओ।
कुछ अपना कुछ हमारा सम्मान बढ़ाओ।’
कवि ने कहा
‘पैसा होता तो कवितायें क्यों लिखता,
अभाव न होते तो कवि कैसे दिखता,
सम्मान खरीदने की ताकत होती
तो कवितायें भी खरीद कर लाता,
सम्मान के लिये सजाता,
फिर तुम जैसे तुच्छ प्राणी की
शरण क्यों कर लेता,
किसी बड़े आदमी पर चढ़ाता दाम
जो बड़ा ही सम्मान देता।
तुम सम्मान के छोटे सौदागर हो
अपने सम्मान को बड़ा न बताओ।
गली मोहल्ले के कवियों पर
अपना दाव लगाने से अच्छा है
अपना प्रस्ताव कविता के बाजार में
कवियों जैसे दिखने वालों को समझाओ।

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