समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

2/25/2010

अपने को अनमोल रत्न बताते-हिन्दी व्यंग्य शायरियां (anmol ratna-hindi comic poem)

वादों का व्यापार
दिल बहलाने के लिये किया जाता है,
मतलब निकल जाये तो
फिर निभाने कौन आता है।
-----------
विषयों को भूल जाना
उनके सोचने का तरीका है।
अपनी कहते रहते हैं
सुनने का नहीं उनको सलीका है।
-----------
बहसों को दौर चले
जाम टकराते हुए।
अपनी अपनी सभी ने कही
मुंह खुले पर कान बंद रहे,
इसलिये सब अनुसने रहे,
जब तक रहे महफिल में
लगता था जंग हो जायेगी,
पहले से तयशुदा बहस
परस्पर वार करायेगी,
पर बाहर निकले दोस्तों की तरह
बाहें एक दूसरे को पकड़ाते हुए।
-----------
कोई खरीदता तो
वह भी सस्ते में बिक जाते,
नहीं खरीदा किसी ने कौड़ी में भी
इसलिये अब अपने को अनमोल रत्न बताते।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

2/20/2010

बहुत सारी खुशियां भी हैं इस जहां में -व्यंग्य चिंतन

अगर आप हमसे पूछें कि सबसे अधिक किस विषय पर लिखना पढ़ना बोझिल लगता है तो वह है अपने देवी देवताओं फूहड़ चित्र बनाने या उन पर हास्य प्रस्तुति करने वालों का विरोध का विषय ऐसा है जिस पर कुछ कहना बोझिल बना देता है। अगर कहीं ऐसा देख लेते हैंे तो निर्लिप्त भाव से देखकर मुख फेर लेते हैं। इसका कारण यह नहीं कि अपनी अभिव्यक्ति देने में कोई भय होता है बल्कि ऐसा लगता है कि एकदम निरर्थक काम कर रहे हैं। उनके कृत्य पर खुशी तो हो नहीं सकती, चिढ़ आती नहीं पर अगर केवल अभिव्यक्ति देनी है इसलिये उस पर लिखें तो ऐसा लगता है कि अपने को कृ़ित्रम रूप से चिढ़ाकर उसका ही लक्ष्य पूरा कर रहे हैं जिसमें हमें मिलना कुछ नहीं है। ऐसे में जब दूसरे लोग उनकी बात पर चिढ़कर अभिव्यक्त होते हैं तो लगता है कि वह ऐसे अप्राकृत्तिक लोगों का आसान शिकार बन रहे हैं-अपने कृत्यों से प्रचार पाना ही उन लोगों का लक्ष्य होता है भले ही उनको गालियां मिलती हों। उनका मानना तो यह होता है कि ‘बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ!’
भले ही कुछ लोग इससे सहमत न हों पर जब हम विचलित नहीं हो रहे तो दूसरों की ऐसी प्रवृत्ति पर कटाक्ष करने का अवसर इसलिये ही मिल पाता है। अभी दो प्रसंग हमारे सामने ऐसे आये जिनका संबंध भारतीय धर्मों या विचारधारा से नहीं है। वैसे यहां हम स्पष्ट कर दें कि हमारी आस्था श्रीमद्भागवत् गीता और योग साधना के इर्दगिर्द ही सिमट गयी है और इस देश का आम आदमी चाहे किसी भी धार्मिक विचाराधारा से जुड़ा हो हम भेद नहीं करते। हमारा मानना है कि हर धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्रीय समूहों का आम इंसान अपने जीवन की तकलीफों से जूझ रहा है इसलिये वह ऐसे विवादों को नहीं देखना चाहता जो प्रायोजित कर उसके सामने प्रस्तुत किये जाते हैं। मतलब हम आम लेखक अपने आम पाठकों से ही मुखातिब हैं और उन्हें यह लेख पढ़ते हुए अपनी विचारधारायें ताक पर रख देना चाहिये क्योकि यह लिखने वाला भी एक आम आदमी है।
चीन की एक कंपनी ने किसी के इष्ट का चिन्ह चप्पल के नीचे छाप दिया। अब उसको लेकर प्रदर्शन प्रायोजित किये जा रहे हैं। उधर किसी पत्रिका में किसी के इष्ट को मुख में बोतल डालते हुए दिखाया गया है। उस पर भी हल्ला मच रहा है। इन गैर भारतीय धर्मो के मध्यस्थ-जी हां, हर धर्म में सर्वशक्तिमान और आम इंसान के बीच इस धरती पर पैदा हुआ ही इंसान मार्गदर्शक बनकर विचरता है जो तय करता है कि कैसे धर्म की रक्षा हो-भारत में पैदा हुए धर्मों पर अविकासवादी चरित्र, असहिष्णु, क्रूर तथा अतार्किक होने का आरोप लगाते हैं। हम उनके जवाब में अपनी सहिष्णुता, तार्किकता, विकासमुखी चरित्र या उदारता की सफाई देने नहीं जा रहे बल्कि पूछ रहे हैं कि महाशयों जरा बताओ तो सही कि अगर किसी ने चप्पल के नीचे या किसी पत्रिका में ऐसा चित्र छाप दिया तो तुम उसे देख ही क्यों रहे हो? और देख रहे हो तो हमारी तरह मुंह क्यों नहीं फेरे लेते।
ऐसा एक बार नहीं अनेक बार हुआ है कि भारतीय देवी देवताओं का मजाक उड़ाया गया पर हमने कभी भी उस इतना शोर नहीं मचाया। इतना ही नहीं सर्वशक्तिमान के स्वरूपों को पेंट या जींस पहनाकर की गयी प्रस्तुति का विरोधी करने वाले सहविचारकों को भी विरोध करने पर फटकारा और समझाया कि ‘यह सब चलता है।’
एक ने हमसे कहा था कि‘आप कैसी बात करते हो, किसी दूसरे समाज के इष्ट स्वरूप की कोई ऐसी प्रस्तुति करता तो पता लगता कि वह कैसे शोर मचा रहे हैं।’
हमने जवाब दिया कि ‘याद रखो, उनसे हमारी तुलना नहीं है क्योंकि हमारे देश में ही ब्रह्म ज्ञानी और श्रीगीता सिद्ध पैदा होते हैं। इनमें कई योगी तो इतने विकट हुए हैं कि आज भी पूरा विश्व उनको मानता है।’
सर्वशक्तिमान का मूल स्वरूप निराकार और अनंत है। जिसके हृदय प्रदेश में विराज गये तो वह हर स्वरूप में उसका दर्शन कर लेता है, भले ही वह धोते पहने दिखें या जींस! कहने का तात्पर्य यह है कि भक्ति की चरम सीमा तक केवल भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी ही पहुंच पाते हैं-यही कारण है कि भारत के सर्वशक्तिमान के स्वरूपों का कोई भद्दा प्रदर्शन प्रस्तुत करता है तो उस पर बुद्धिजीवियों का ही एक वर्ग बोलता है पर संत और साधु समाज उसे अनदेखा कर जाते हैं।
जाकी रही भावना जैसी! गुण ही गुणों बरतते हैं। शेर चिंघाडता है, कुत्ता भौंकता है और गाय रंभाती है क्योंकि यह उनके गुण है। हंसना और मुस्कराना इंसान को कुदरत का तोहफा है जिसका उसे इस्तेमाल करना चाहिये। भौंकने का जवाब भौंकने से देने का अर्थ है कि अपने ही ज्ञान को विस्मृत करना। हमारे यहां हर स्वरूप में भगवान के दर्शन में एक निरंकार का भाव होता है।
एक चित्रकार ने भारतीय देवी देवताओं के भद्दे चित्र बनाये। लोगों ने उसका विरोध कर उसे विश्व प्रसिद्ध बना दिया। अज्ञानता वश हम विरोध कर दूसरों का विश्व प्रसिद्ध बनाते जायें इससे अच्छा है कि मुंह फेरकर उनकी हवा निकाल दें। उस चित्रकार के कृत्य हमने भी विचार किया तब यह अनुभूति हुई कि उसका क्या दोष? जैसे संस्कार मिले वैसा ही तो वह चलेगा। बुढ़ापे में एक युवा फिल्म अभिनेत्री से आशिकी के चर्चे मशहुर करा रहा था? दरअसल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से वह बहुत दूर था। जब भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से जुड़े समाज में पैदा हुए लोग ही भूल जाते हैं तो वह तो पैदा ही दूसरे समाज में हुआ था। उसका उसे यह लाभ मिला कि वह आजकल विदेश में ऐश कर रहा है क्योंकि उसे यह कहने का अवसर मिल गया है कि मुझे वहां खतरा है।’
कहने का तात्पर्य यह है कि हम विरोध कर दूसरे को लोकप्रिय बना रहे हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उपेक्षासन का वर्णन है। यह पढ़ा तो अब हमने पर चल इस पर बरसों से रहे हैं। दूसरे समाजों के लिये तो यह नारा है कि ‘और भी गम हैं इस जमाने में’, पर हमारा नारा तो यह है कि ‘बहुत सारी खुशियां भी हैं इस जहां में’। देखने के लिये इतनी खूबसूरत चेहरे हैं। यहां कोई पर्दा प्रथा नहीं है। हम लोग सभी देवताओं की पूजा करते हैं और उसका नतीजा यह है कि वन, जल, तथा खनिज संपदा में दुनियां की कोई ऐसा वस्तु नहंी है जो यहां नहीं पायी जाती। विश्व विशेषज्ञों का कहना है कि ‘भूजल स्तर’ सबसे अधिक भारत में ही है। जहां जल देवता की कृपा है वहीं वायु देवता और अग्नि देवता-जल में आक्सीजन और हाईड्रोजन होता है-का भी वास रहता है। इतनी हरियाली है कि मेहनत कर पैसा कमाओ तो स्वर्ग का आनंद यहीं ले लो उसके लिये जूझने की जरूरत नहीं है। लेदेकर संस्कारों की बात आती है और भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में योग साधना तथा मंत्रोच्चार के साथ एसी सिद्धि प्रदान करने की सुविधा प्रदान करता है कि दैहिक और मानसिक अनुभूतियां इतनी सहज हो जाती हैं कि उससे किसी भी अपने अनुकूल किसी अच्छी वस्तु, पसंदीदा आदमी, या प्रसन्न करने वाली घटना से संयोग पर परम आनंद की चीजें प्राप्त हो जाती हैं। बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो तथा बुरा मत कहो की तर्ज पर हमारे यहां लोग आसानी से चलते हैं न कि हर जरा सी बात पर झंडे और डंडे लेकर शोर मचाने निकलते हैं कि ‘हाय हमारा धर्म खतरे में है।’
आखिरी बात यह है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की महिमा ऐसी है कि यहां के आदमी बाहर जाकर भी इसे साथ ले जाते हैं और यहां रहने वाले दूसरे समाजों के आम लोग भी स्वतः उसमें समाहित होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की यह खूबी है कि कुछ बाहर स्थापित विचारों को भले ही मानते हों पर उनमें संस्कार तो इसी जमीन से पैदा होते हैं। यही कारण है कि आम आदमी सभी समूहों के करीब करीब ऐक जैसे हैं पर उनको अलग दिखाकर द्वंद्व रस पिलाया जाये ताकि उनके जज़्बातों का दोहन हो सके इसलिये ही ऐसे शोर मचावाया जाता है। ऐसे लोगों का प्रयास यही रहता है कि आम आदमी एक वैचारिक धरातल पर न खड़ा हो इसलिये उनमें वैमनस्य के बीच रोपित किये जायें।
दरअसल प्रचार माध्यम आम आदमी के दुःख सुख तथा समस्याओं को दबाने के लिये ऐसे प्रायोजित कार्यक्रमों के जाल में फंस जाते हैं और इससे शोर का ही विस्तार होता है शांति का नहीं-जैसा कि वह दावा करते हैं।
इस लेखक का यह लेख उस गैरभारतीय धर्मी ब्लागर को समर्पित है जिसने अपने इष्ट पर कार्टून बनाने के विरोध में अपने समाज के ठेकेदारों द्वारा आयोजित प्रदर्शन पर व्यंग्य जैसी सामग्री लिखी थी। उसने बताया था कि किस तरह लोग उस प्रदर्शन में शामिल हुए थे कि उनको पता ही नहीं था कि माजरा क्या है? अनेक बार एक पत्रिका पर ब्लाग देखकर भी मन नहीं हुआ था पर उसके लेख ने ऐसा प्रेरित किया कि फिर लिखने निकल पड़े-क्योंकि पता लगा कि यह स्वतंत्र और मौलिक अभिव्यक्ति का एक श्रेष्ठ मार्ग है। अक्सर उसे ढूंढने का प्रयास करते हैं। संभावना देखकर अनेक ब्लाग लेखकों के तीन वर्ष पुराने पाठों तक पहुंच जाते हैं, पर अभी तक पता नहीं लगा पाये।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

2/17/2010

विश्व में भारत से संदेश अध्यात्मिक ज्ञान से ही फैल सकता है, किसी फिल्म से नहीं-हिन्दी लेख (hindi film aur adhyatmik gyan-hindi article)


एक टीवी एंकर को एक बहुचर्चित अभिनेता की फिल्म इतनी अच्छी लगी कि उसे वह पूरे विश्व में संदेश भेजती हुई दिखाई दे रही है-उसने अपने अंतर्जाल पर निज पत्रक में यहां तक लिख दिया कि ऐसी फिल्म भारत में ही बन सकती थी और यह भी कि हमारा देश फिर पूरे विश्व में अच्छा संदेश भेजने में सफल रहा है। यह एंकर जिस चैनल से संबंधित है उसने पिछले दिनों उस अभिनेता और उसकी फिल्म के प्रचार में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी थी। विशुद्ध रूप से वह व्यवसायिक प्रचार था और एंकर कहीं न कहीं तहेदिल से अपने कार्य में जुटा था।
जब कोई आदमी व्यवसाय करता है तो रोटी के प्रति उसका समर्पण उसे उसके प्रति पूरी तरह ईमानदार बना देता हैं-यहां तक कि उसके कृत्रिम विचार भी उससे प्रभावित होकर मौलिक स्वरूप धारण कर लेते हैं। जब वह एंकर बड़ी शिद्दत से उस अभिनेता को महानायक और फिल्म को अद्वितीय करने के व्यवसायिक प्रयास में लगा रहा होगा तब मस्तिष्क में स्थापित विचार इतनी गहराई तक उतर गया कि वह उससे निकल ही नहीं सकता था। हम यहां उसके व्यवसाय या विचार व्यक्त करने की शैली पर आपत्ति नहीं कर रहे बल्कि यह बात कह रहे हैं कि कोई भी फिल्म, किताब या व्यक्ति भारत का तब तक संदेशवाहक नहीं हो सकता जब उसके मस्तक पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का तिलक नहीं लगा हो। भारत की पहचान आधुनिक गीत नहीं बल्कि लोकगीत ही होते हैं। आज भी विश्व में भारत की पहचान राम, कृष्ण, शिव, गांधी और यहां के सहृदय नागरिकों का सहज भाव है। भारत के संदेश वाहक बाबा रामदेव तो हो सकते हैं क्योंकि उनके द्वारा योगशिक्षा को व्यवसायिक रूप देकर विश्व में लोकप्रिय बनाया परंतु एक सामयिक फिल्म और उसका अभिनेता कतई नहीं हो सकता। बाबा रामदेव भारत की प्रमाणिक योग पद्धति का प्रचार कर रहे हैं जो कभी प्राचीन नहीं हो सकती जबकि किसी फिल्म की आयु इतनी बड़ी नहीं हो सकती।
उस एंकर ने जो विचार व्यक्त किये उसमें कोई आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है। जिस तरह हम लोग कार्यालय या दुकान से घर आकर भी तत्काल वहां में उपजे भावों से मुक्त नहीं हो पाते वही उनके साथ भी हुआ होगा। वह उस फिल्म को हिट बताने के लिये निरंतर व्यवसायिक प्रचार में जुटे रहे। उनको अपने नायक को महानायक बताने के लिये कुछ भटके लोग खलनायक के रूप में मिल गये। फिल्म तीन दिन तक सफलता से चली तो उनकी वजह से! वरना तो वह पहने ही दिन अच्छी शुरुआत के लिये तरस जाती-कम से कम इस फिल्म को देखकर आने वाले अन्य अंतर्जाल लेखकों के शब्द पढ़कर तो ऐसा ही लगता है। वैसे तीन बाद उस फिल्म का प्रचार भी अब प्रभावी नहीं लग रहा।
दूसरी बात यह कि हम प्रचार माध्यमों को दोष क्यों दें? उनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये येनकेन प्रकरेण कार्यक्रम के साथ पैसे भी बनाने हैं और यह लक्ष्य उनको क्रिकेट, फिल्म तथा अन्य प्रदर्शन आधारित व्यवसायों से बहुत आसानी से प्राप्त हो जाता है। जो लोग उनकी आलोचना करते हैं उनको व्यवसाय के स्वभाव को भी समझना चाहिये। सवाल यह है कि इस तरह के प्रचार से लोग प्रभावित हुए कि नहीं! जो आलोचना कर रहे हैं वह देखने गये कि नहीं! साथ ही यह भी सोचना चाहिए कि इतने सारे लोग अपना पैसा खर्च करने गये जिसकी फिल्म निर्माताओं, वितरकों, माल मालिकों तथा उनसे प्रश्रय पाने वाले प्रचार माध्यमों को जरूरत होती है। अगर आप कह रहे हैें कि उन्होंने लोगों को भ्रमित किया तो इसका उत्तर है कि आप जान जागरण के लिये अहिंसक प्रयास क्यों नहीं करते। इसकेे विपरीत फिल्म का कथित रूप से प्रदर्शन या तोड़फोड़ के द्वारा नकली विरोध कर उसका प्रचार करने वालों का समर्थन करते हैं! नतीजा यह होता है कि कुछ लोग ही फिल्म देखने जाते हैं तो वह भी नायक का दर्जा पाने के लिये प्रचार माध्यमों में विजय का प्रतीक उंगलियों को वी की आकृत्ति में प्रस्तुत करते नजर आते हैं।
इस लेखक ने न फिल्म देखी न देखने का इरादा है। अलबत्ता कहानी पढ़ी। उसके नायक जैसा कोई पात्र इस धरती पर सचमुच अगर है तो वाकई एक भावुक व्यक्ति होने के नाते इस लेखक को उससे सहानुभूति होगी । अल्लहड़, मस्तमौला तथा दूसरे के दुःख दर्द में सहानुभूति जताने वालों को यहां मनोरोगी माना जाता है। अगर कहानी वैसी है तो ठीक है। जहां तक फिल्म का सवाल है उस पर इतना बावेला बचना ठीक नहंी था। जिन लोगों को लगता है कि वह फिल्म गलत है उन्हें चाहिये कि वह प्रतिवाद स्वरूप फिल्म बनाने के लिये दूसरों को प्रेरणा दें या खुद बनायें। अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाना ठीक नहीं है। तर्क से वही लोग घबड़ाते हैं जिनके पास ज्ञान नहीं और जिनके पास ज्ञान है वह किसी के अपशब्द से भी विचलित नहीं होते। किसी के अभिव्यक्त विचार से अगर आप असहमत हैं तो उस पर अपनी अभिव्यक्ति इस तरह मजबूत ढंग से रखें कि सामने वाले के हाथ से तोते उड़ जायें। जब दूसरे के विचार पर हाय हाय और हो हो करते हैं तो वह इस बात का प्रमाण है कि विचार रहित विकारवान पुरुष हैं। आखिरी बात यह कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से ही कोई संदेश निकलकर विश्व में फैल सकता ह न कि किसी फिल्म से।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

2/14/2010

‘सहज योग’ से दूर भागता है आधुनिक बाजार-हिन्दी लेख (modern bazar and sahajyog-hindi satire)

उन वरिष्ठ ब्लोगर महोदय ने अपनी टिप्पणी में उस ब्लाग का लिंक रखकर अपने सतर्क निगाहों का परिचय देकर अच्छा किया पर यह लेखक उस पाठ को पहले ही पढ़ चुका था और फिर आगे दो बार यह देखने के लिये भी जाना ही था कि उस पर टिप्पणियां कैसी हैं? हां, यहां अंतर्जाल पर कई बार पाठों पर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां भी पढ़ने को मिल जाती हैं जिनका आगे उस विषय पर मार्गदर्शन प्राप्त होता है। वैसे यह पाठ लेखक नहीं पढ़ता तो भी यह सब लिखने वाला था जो लिख रहा है। वह यह कि आधुनिक बाजार मनुष्य में असहजता का भाव पैदा अधिक से अधिक कमाना चाहता है और उसके लिये उसने बकायदा ऐसा प्रचारतंत्र बना रखा है जो चिल्ला चिल्लाकर उसे वस्तुऐं खरीदने के लिये प्रेरित करता है, फिल्म देखने के लिये घर से निकालता है और क्रिकेट मैच में अपने महानायको के प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिये दौड़ लगवाता है। इस बाजार का असली शत्रु है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का वह ‘सहज योग’ का भाव-चारों वेदों के सारतत्व के साथ इसका श्रीमद्भागवत में बहुत सरलता से उल्लेख किया गया है-यह बात समझने की है और उसके लिये हर इंसान को अपने विवेक का उपयोग करना पड़ता है। केवल बुद्धि से काम नहंी चल पाता जो केवल शब्दों के अर्थ तक ही सीमित रहती है-उसका भाव समझने के लिये मनुष्य को अपने अंदर संकल्प और धैर्य धारण करना पड़ता है तभी उसके विवेक चक्षु खुलते हैं।
दरअसल भारतीय योग और अध्यात्म पर अनुकूल और प्रतिकूल लिखने वाले बहुत हैं पर उसे पढ़ता कौन कितना है यह समझ में नहीं आता। समर्थकों ने भी कुछ अच्छे विचार दिमाग में रख लिये हैं और वही उसे नारे बनाकर प्रस्तुत करते हैं। आलोचकों की स्थिति तो बदतर और दयनीय है जिनके पास पूरे भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से दो तीन श्लोक या दोहे हैं-जिनको समाज अब स्वयं ही अप्रसांगिक मानता है-जिनको नारे की तरह रटकर सुनाते हैं। समर्थक तो फिर भी प्रशंसा के पात्र हैं कि वह पढ़ते तो रहते हैं पर आलोचक पढ़ी पढ़ाई बातों की विवेचनाओं को ही अपना आधार बनाकर चलते हैं। जिन किताबों की चर्चा करते हैं उनको पढ़ना तो दूर वह देखना तक पसंद नहीं करते, पर विचार व्यक्त करने में नहीं चूकते।
उन वरिष्ठ ब्लोगर महोदय द्वारा सुझाये गये ब्लाग का पाठ यकीनन एक विद्वान द्वारा ही लिखा गया था। उनका अपना दृष्टिकोण हो सकता है मगर उसमें असहमति की भारी गुंजायश छोड़ी गयी। योग को रोग बताते हुए लिखे गये उस पाठ में महर्षि विवेकानंद पर भी प्रतिकूल लिखा गया। उस पाठ में योग के बारे में लिखी गयी बातों ने इस बात के लिये बाध्य किया कि पतंजलि येाग दर्शन की किताबों को पलट कर देखा जाये। कहीं भी रसायनों के मिश्रण से औषधि बनाने की बात सामने नहीं आयी। कैवल्यपाद-4 में एक श्लोक मिला
जन्मोषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः।।9।।
इसका हिन्दी में भावार्थ है कि ‘जन्म, ओषधि मंत्र, तप, और समाधि, इस तरह पांच तरह की सिद्धियां होती हैं।
जब पतंजलि साहित्य खोलें तो कुछ न कुछ ऐसा मिल ही जाता है जो दिलचस्प होता ही है। दरअसल हमने आज एक पाठ अन्य भी पढ़ा था जिसमें कथित वैलंटाईन ऋषि और हमारे महर्षि मनु के बीच तुलनात्मक अध्ययन भारतीय जाति व्यवस्था पर आक्षेप किये गये। तय बात है कि मनु को जन्म पर आधारित व्यवस्था का निर्माता माना जाता है पर पतंजलि योग दर्शन में यह दिलचस्प श्लोक मिला जो कि इस बात का प्रमाण है कि हमारी जाति व्यवस्था का आधार कर्म और व्यवहार रहा है।
जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्।
इसका हिन्दी भावार्थ यह है कि ‘एक जाति से दूसरी जाति में जाने का रूप प्रकृति पूर्ण होने से होता है। महर्षि विश्वामित्र ने तप से ही ब्रह्म्णत्व प्राप्त किया था। दरअसल ब्राह्म्णत्व का अर्थ है समाज का आपने ज्ञान से श्रेष्ठता प्रमाणित कर समाज मार्ग दर्शन करना और यह कार्य तो कोई भी कर सकता है।
इसका आशय यह है कि अगर कोई मनुष्य योग साधना, मंत्र और तप से चाहे तो अपनी प्रकृतियां पूर्ण कर उच्च और प्रतिष्ठित पद पर स्थापित हो सकता है और जन्म के आधार पर ही सभी कुछ होना जरूरी नहीं है। यह अलग बात है कि लोग जन्म और ओषधियों के सहारे भी श्रेष्ठता हासिल कुछ लोग प्राप्त कर लेते हैं। जन्म का सभी जानते है पर ओषधियों की बात आयी तो आपने देखा होगा कि अनेक खेल प्रतियोगिताओं में उनके सेवन से अनेक लोग स्वर्ण पदक प्राप्त करते हैं-यह अलग बात है कि इनमें कुछ प्रतिबंधित होती हैं कुछ नहीं।
याद रखिये हमारे देश में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनका जन्म कथित उच्च जातियों में नहंी हुआ पर अपने कर्म के आधार पर उन्होंने ऐसी प्रतिष्ठा प्राप्त की पूरा समाज आज उनको याद करता है। असली बात यह है कि योग साधना एक प्राकृतिक क्रिया है। योगासनों की तुलना सुबह सैर करने या जिम जाने से करना अपने अज्ञान का प्रमाण है। जहां तक लाभ होने वाली बात है तो इस लेखक के इस पाठ का हर शब्द उसी योगसाधना के शिखर से प्रवाहित है। अगर इनका प्रभाव कम है तो उसके पीछे इस लेखक के संकल्प की कमी हो सकती है पर अगर वह अधिक प्रभावी है तो उसका पूरा श्रेय योगसाधना को जाना चाहिये। यह अलग बात है कि अगर आर्थिक रूप से ही लाभ को तोला जाना है तो यकीनन उसके लिये इस लेखक का अकुशल प्रबंधन जिम्मेदार है जो ब्लाग लिखने से एक पैसा नहीं मिलता पर जिस तरह भारतीय अध्यात्म का संदेश फैल रहा है वह योग साधना का ही परिणाम है। यह पाठ आत्म प्रचार के लिये नहीं लिखा बल्कि यह बताने के लिये लिखा है कि जब सात वर्ष पूर्व इस लेखक ने योग साधना प्रारंभ की थी तब उसके जीवन का यह दूसरा दौर था यानि कम से इस लेखक को तो योग साधना का लाभ मिला है-किसी को नहीं मिला इस बात का तो खंडन हो ही गया।
अब करें बाजार और उसके प्रचारतंत्र की बात! यह वही बात है कि अगर वरिष्ठ ब्लोगर महोदय ने वह लिंक नहीं देते तो भी यह लिखा ही जाना था। विदेशियों को क्या देश के ही बड़े बड़े धनाढ्यों को यह नहीं सुहाता।
पहले यह लेखक भी संगठित प्रचार माध्यमों और अंतर्जाल लेखकों के प्रभाव में आकर बाबाओं की अर्जित संपत्तियों पर अपनी नाखुशी लिखता था पर अब जैसे जैसे नवधनाढ्य लोगों की पोल सामने आ रही है-इसका श्रेय भी आधुनिक प्रचारतंत्र को ही है जो बाजार का रक्षक है पर समय पास करने के लिये उसे ऐसी पोल लानी पड़ती है-वैसे लगता है कि बाबा भला क्या बुरा कर रहे हैं? उनका कमाया पैसा रहता तो समाज के बीच में ही है। वह कोई ठगी या भ्रष्टाचार तो नहीं करते! युवक युवतियों को आधुनिकता के नाम अनैतिक संबंधों के लिये प्रेरित तो नहीं करते। केवल शादी के नाम पर अंतर्जातीय विवाहों पर खुश होने वाले विद्वान इस बात पर चिंतन नहीं करते कि उसके बाद घर भी चलाना पड़ता है जिसकी समझ युवक युवतियों को होना चाहिये। साथ ही यह भी परिवार चलाने के लिये समाज की जरूरत होती है इसे भुलाना सच्चाई से मुंह फेरना है। भारतीय संत इस बात को समझते हैं इसलिये ही निरंतर आध्यात्मिक ज्योति जगाते रहते हैं।
पिछले अनेक अवसरों पर आसाराम बापू, बाबा रामदेव तथा सुधांशु महाराज पर अनेक आक्षेप किये जाते रहे। यह लेखक इन तीनों में किसी का शिष्य नहीं है पर उसे हैरानी हुई जब आसाराम बापू पर तो तंत्र मंत्र का आरोप लगा दिया-इतनी समझ उन लोगों में नहीं है कि आसाराम बापू उस समाज में पैदा हुए जो अध्यात्म के प्रति समर्पित है पर तंत्रमंत्र की बात से कोसों दूर रहता है। यह सही है कि अनेक लोग धर्म के नाम पर ढोंग कर रहे हैं पर इतनी ऊंचाई बिना तप, अध्ययन और ज्ञान के नहीं मिलती।
योग साधना का अभ्यास जितना करेंगे उतनी ही सिद्धियां आयेंगी और उससे आप स्वयं क्या आपके आसपास के लोगों पर भी उसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा-मुख्य बात यह है कि आपकी नीयत कैसी है, यह आपको देखना होगा।
दरअसल बाजार और उसका प्रचारतंत्र परेशान है। वह वैलेंटाईन को बेचना चाहता है क्योंकि नवाधनाढ्यों के पास नयी चीजें खरीदने का शौक उसी से ही बढ़ता है और आधुनिक बाजार उसका निर्माता है। महाशिवरात्रि पर कोई ऐसी चीज नहीं बिकती जिसका विज्ञापन मिलता हो। यही हालत क्रिसमस और नववर्ष पर भी होती है क्योंकि गुड़ी पड़वा और मकर सक्रांति तो परंपरागत बाजार का व्यापार है जिसे विज्ञापन करने की आवश्यकता नहीं होती।
दरअसल बाबा रामदेव, आसाराम बापू या सुधांशु महाराज के कार्यक्रमों में एक बहुत बड़ा जनसमुदाय होता है और आधुनिक बाजार के स्वामी और प्रचार प्रबंधक यह देखकर परेशान हो जाते हैं कि उनके बिना यह सब कैसे हो रहा है? दूसरा वहां से अपने लिये ग्राहक ढूंढना चाहते हैं। उनका गुस्सा तब अधिक बढ़ जाता है जब वहां युवक युवतियों का भी समूह देखते हैं क्योंकि उनको लगता है कि यह तो उनको दोहन स्त्रोत हैं, भला वहां क्यों जा रहे हैं।
अनेक संकीर्ण मानसिकता के बुद्धिजीवी उनके प्रवचन कार्यक्रमों में दलित, पिछडे, और अगड़े का भेदभाव छोड़कर जाते हुए लोगों को सहन नहीं कर पाते। उनको लगता है कि इससे तो उनका प्रभाव खत्म हो रहा है। उससे ज्यादा गुस्सा उनको तब आता है जब गैर हिन्दू भी उनसे जुड़ते हैं। उनकी चिंतायें स्वाभाविक हैं और उनको रोकने का हमारा लक्ष्य भी नहीं है। ऋषि प्रसाद, अखंड ज्योति और कल्याण पत्रिकाओं को बिकना अगर बंद हो जाये तो हिन्दी का आधुनिक प्रकाशन अधिक अमीर हो जायेगा। जब देश की हालतें देखते हैं तो अन्य बुद्धिजीवियों की तरह हम भी चिंतित होते हैं पर जब इन संतों और उनके भक्तों की उपस्थिति देखते हैं तो दिल को संतोष भी होता है पर दूसरे असंतुष्ट होकर उनको भी निशाना बनाते हैं। शेष फिर कभी।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

2/10/2010

अपना अपना दृष्टिकोण-व्यंग्य आलेख (apna apna drishtikon-hindi satire article)

आस्ट्रेलिया के एक पुलिस अधिकारी ने भारतीयों को हमले से बचने के लिये गरीब दिखने की सलाह क्या दी, उस पर भारत के बुद्धिजीवी समुदाय में  बावेला मच गया है।  कोई इस सलाह को लेकर  उसकी नाकामी पर बरस रहा है तो कोई उसे बेवकूफ बता रहा है।  अपनी समझ में उसने एक बहुत गज़ब का विचार व्यक्त किया है। दरअसल यह कोई उसका विचार नहीं बल्कि यह तो पुराना ही दर्शन है। अगर अपनी रक्षा करनी है तो उसके लिये सबसे पहला उपाय स्वयं को ही करना है पर विकासवादियों की संगत में सभी प्रकार के बुद्धिजीवियों की सोच केवल अब इसी बात पर रहती है कि ‘आदमी चाहे कैसे भी चले,, उसे रास्ता या अदायें बदलने की सलाह देना उसकी आजादी का उल्लंघन है क्योंकि हर आदमी को सुरक्षा देना राज्य का काम है।’
इस प्रवृत्ति ने लोगों को अपंग बना दिया है और न तो कोई अपनी रक्षा के लिये शारीरिक कला में रुचि लेता है और न ही इस बात का प्रयास करता है कि उसकी संपत्ति भले ही कितनी भी क्यों न हो, पर उसका प्रदर्शन न करें ताकि अभावों से ग्रसित आसपास के लोगों के समुदाय में कुंठा का भाव न आये-यही भाव अंततः धनपति समाज के प्रति कभी निराशा के रूप में अभिव्यक्त होता है तो कभी क्रोध से उपजी हिंसा के रूप  मे।
मगर नहीं! भारत में बहुत कम लोग हैं जिनको ऐसी सलाह का मतलब समझ में आयेगा। वैसे उस आस्ट्रेलियाई पुलिस अधिकारी के अज्ञान पर तरस भी आ रहा है। वह किसी अफ्रीकी देश के लोगों को कहता तो समझ में आ सकता था मगर भारतीयों को ऐसी सलाह उसने यह विचार किये बिना ही दी है कि यहां के लोग पैसा कमाते ही इसलिये है कि उसका प्रदर्शन कर दूसरों के मुकाबले अपने आपको श्रेष्ठ साबित करें।  एक आदमी को जिंदा रहने के लिये क्या चाहिये! पेट भर रोटी, पूरा तन ढंकने के लिये कपड़े-यहां फैशन से कम कपड़ा पहनने वालों की बात नहीं हो रही’-और सिर ढंकने के लिये छत।  देश में हजारों मजदूर परिवार हैं जो  ईंटों के कच्चे घर बनाकर रहते हैं।  उनकी बीवियां सुबह उठकर खाना बनाती हैं, बच्चे पालती हैं और फिर पति के साथ ईंटें और रेत ढोने का भी का करती हैं  फिर भी  वह उनके चेहरा पर संतुष्टि के भाव रहते  हैं।  यही कारण है कि भारत का ऐसा मजदूर वर्ग  बाजार और प्रचार के लक्ष्य के दायरे से बाहर का समाज है।  अपने यहां एक अभिनेता सभी संतुष्टों को असंतुष्ट होने का संदेश एक विज्ञापन में देता है।  ‘डोंट बी संतुष्ट’ का नारा लगाने वाले  अभिनेता के उस विज्ञापन का लक्ष्य तो केवल वह लोग हैं जिनका पैसे के मामलें में हाजमा खराब है।  यही कारण है कि उसके संदेश का आशय यही है कि आदमी को कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिये, बल्कि असंतुष्ट होकर खरीददारी करना चाहिए।
हमारे देश के टीवी चैनल, फिल्में और रेडियो ऐसे असंतोष फैलाने वाले संदेशवाहक की छबि बनाने में जुटे हैं। सभी जानते हैं कि इस तरह के  का प्रभाव हमारे देश के लोगों के दिमाग पर होता है-टीवी, फिल्म और रेडियो के प्रभाव सभी जानते हैं।
लोग बाहर जा इसलिये ही रहे हैं कि उनमें असंतोष है।  हालत यह है कि बाहर जाने के लिये लोग पैसा खर्च कर रहे हैं। यह राशि इतनी अधिक होती है कि अनेक माध्यम और गरीब लोग यह सोचते हैं कि इतना पैसा होने पर वह स्वयं विदेश जाने की तो सोचते ही नहीं।
ऐसे धनाढ्य लोग इतना पैसा देश में रखकर क्या करेंगे? फिर इधर कर वसूलने वालों की नज़रे भी लगी रहती हैं। इसलिये कोई पैसा बाहर भेज रहा है तो कोई खुद ही जा रहा है। कहीं पैसे को अपने पीछे कोई छिपा रहा है तो कोई पैसे के पीछे छिप रहा है। 
देश में आदमी दिखाता है कि ‘देखो फारेन जा रहा हूं।’  उधर आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अमेरिका में भी वह अपनी दौलत दिखाता है यह प्रदर्शित करने के लिये कि उसे वहां के लोग ऐरा गैरा भारतीय न समझें।  हमारे देश के एक माननीय व्यक्ति ने बस इतना कहा कि ‘भारत के छात्र ऐसे विषयों के लिये बाहर जाते ही क्यों है, जो यहां भी उपलब्ध हैं। जैसे बच्चों की हजामत बनाना या बीमारों की सेवा करना।’
उस पर भी बावेला मच गया।  मतलब समझाओ नहीं!  हमारे पास इतना पैसा है उसका प्रदर्शन न करें तो फिर फायदा क्या, पता नहीं वह कैसे (?) तो कमाया है? यहां खर्च नहीं कर सकते क्योंकि टैक्स बचाने से अधिक यह बताने की चिंता है कि वह आया कहां से?’ बाहर जाने पर   ऐसी समस्या नहीं आती है पर वहां भी उसका दिखावा न करें तो इतना पैसा हमने या हमारे पिताजी ने  कमाया किसलिए?
इस मामले में हमारे बुजुर्गों ने जो सिखाया सादगी और चालाकी का पाठ  याद आता है।   यह लेखक  अपने ताउजी के साथ दूसरे शहर जा रहे था।  उनके पास बड़ी रकम थी-आज वह अधिक नहीं दिखती पर उस समय कोई कम नहीं  थी। उन्होंने लेखक को बताया कि उनका पैसा एक पुराने थैले में है जिसमें खाने का सामान रखा है जिसका उपयोग वह बस में ही करेंगे।
अटैची उन्होंने अपने हाथ में पकड़कर  रखी पर थैला टांग दिया।  कभी कभी वह थैले से  सामान निकालते और फिर उसे वहीं टांग देते।  ऐसे दिखा रहे थे की जैसे उनको थैले की परवाह ही नहीं है
अनेक बार हम बस से दोनों साथ उतरे और वह इतनी  बेपरवाही से चल रहे थे कि किसी को अंदाज ही नहीं हो सकता था कि उनके उस पुराने मैले थैले में खाने के सामान के नीचे एक बहुत बड़ी रकम है।   उनसे सीख मिली तो अब हम भी जब बाहर जाते हैं तो अपना कीमती सामान कभी अटैची में न रखकर खाने के सामान के साथ पुराने थैले में रख देते हैं, पर्स तो करीब करीब खाली ही रखते हैं।  कहीं पर्स खोलते हैं तो पांच दस रुपये कागजों से ऐसे निकालते हैं कि जैसे बड़े बुरे दिन से गुजर रहे हैं।
अपना अपना विचार है। हर आदमी इस पर चले या नहीं। आस्ट्रेलिया के उस पुलिस अधिकारी ने सलाह अपने किसी अन्य दृष्टिकोण से दी होगी पर उस पर हमारा भी अपना  एक दृष्टिकोण है? साथ ही यह भी जानते हैं कि अपने देश में बहुत कम लोगों को  इस दृष्टिकोण से संतुष्ट कर पायेंगे? हर शहर में नारियों के गले से मंगलसूत्र या सोने का हार खींच लेने की घटनायें होती हैं पर इससे क्या फर्क पड़ता है! एक गया तो दूसरा आ जाता है।  अनेक बार प्रशासन अपने इशारे अखबार में छपवाता है कि त्यौहार का अवसर है इसलिये थोड़ा ध्यान रखें!’ मगर सुनता कौन है? अपना अपना दृष्टिकोण है
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

2/04/2010

इश्क की भाषा-हिन्दी व्यंग्य कविता (ishq ki bhasha-hindi comic poem)

आशिक लिखता था अंग्रेजी में प्रेमपत्र

प्रेमिका भी देती थी उसी में जवाब।

इश्क ने दोनों को कर दिया था विनम्र

नहीं झाड़ते थे एक दूसरे पर रुआब।

एक दिन अखबार में पढ़ी

माशुका ने ‘भाषा के झगड़े’ की खबर,

खिंच गया दिमाग ऐसे, जैसे कि रबर,

उसने आशिक के सामने

मातृभाषा का मामला उठाया,

दोनों ने उसे अलग अलग पाया,

वाद विवाद हुआ  जमकर,

दोनों अपनी ही मातृभाषा को

इश्क की भाषा बताने लगे तनकर,

पहले मारे एक दूसरे को ताने,

फिर लगे डराने

बात यहां तक पहुंची कि

दोनों एक दूसरे से इतना चिढ़े गये कि

आशिक के लिये माशुका

और माशुका के लिये आशिक बन गया

बीते समय का एक बुरा ख्वाब।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

2/01/2010

तीन श्वान शिशु-आलेख (three child of dog-hindi article)

उसे कई बार समझा चुका था कि ‘ घर से बाहर आते जाते समय मेरे स्कूटर से दूर रहे, वरना कुचला जायेगा।’

आज सुबह भी उससे कहा-‘मान जा प्यारे,  मुझे डर लगता है कि कहीं आगे पीछे करते हुए मेरे स्कूटर के पहिये के नीचे न आ जाये। भाग यहां से।’

कई बार श्रीमती जी उसे हटातीं तो कई बार मैं उसके हटने के इंतजार में खड़ा रहता, मगर यह सावधानी इस मायने ही काम आयी कि उस श्वान शिशु की मृत्यु हमारे स्कूटर से नहीं हुई। आज शाम को घर पहुंचा तो अकेला भूरे रंग का जीवित शिशु घर के अंदर दरवाजे पर पड़ा था। उसे अनेक बार हट हट किया पर वह लापरहवा दिखा। इससे पहले उससे कुछ कहता श्रीमती जी ने बताया कि ‘इसके साथ वाला पिल्ला घर के सामने से ही गुजर रही एक स्कूल बस के नीचे आ गया।

सुबह का मंजर याद आया जब वह मासूम हमारी झिड़की सुनकर स्कूटर से दूर हट कर रास्ता दे रहा था।

उस अकेले भूरे जीवित शिशु को देखा। उसकी माता भी बाहर सो रही थी।  पता नहीं दरवाजे पर पहुंचते ही उन दोनों के अनमने पन का अहसास कैसे हो गया।’ घर के दरवाजे के अंदर बैठा भूरा शिशु बड़ी मुश्किल से दूर हटा जबकि पहले तेजी से हटता था।

जीवन की अपनी धारा है।  लोग सोचते हैं कि जीवन केवल मनुष्य के लिये ही है जबकि पशु, पक्षी तथा अन्य जीव जंतु भी इसे जीते हैं।

हमारे पोर्च में लगा लोहे का दरवाजा किसी भी पशु के लिये दुर्लंघ्य हैं।  उसमें लगी लोहे की एक छड़ का निचला हिस्से का जोड़ टूट गया है। कई दिनों से  की सोची पर इतने छोटे काम के लिये मशीन लाने वाला नहीं मिल पाया है।  यह काम करने पर जोर इसलिये भी नहीं दिया क्योंकि उससे कुछ खास समस्या नहीं रही।

जब सर्दियों का जोर तेजी से प्रारंभ हुआ तब एक रात दरवाजा बजने की आवाज सुनकर हम पति पत्नी बाहर निकले।  दरवाजे पर सो रही मादा श्वान के अलावा कोई  दिखाई नहीं दिया।  तब पोर्च में ही रखे तख्त और दरवाजे के बीच  में खाली पड़े  कोने पर नजर पड़ी तो वहां से तीन श्वान शिशु एक दूसरे पर पड़े हुए  कातर भाव से हमारी तरफ देख रहे थे।

सर्दी बहुत तेज थी।  उनका जन्म संभवत दस से बीस दिन के बीच का रहा होगा-शायद पच्चीस दिन भी।  ठंड से कांपते हुए उन श्वान शिशुओं ने जीवन की तलाश दरवाजे की सींखचों के बीच किया होगा जो टूटी हुई छड़ ने उनको प्रदान किया।

हमारा एक प्रिय श्वान चार वर्ष पहले सिधार गया था।  उसके बाद हमने किसी श्वान को न पालने का फैसला किया। मगर यह जीवन है इसमें फैसले बदलते रहते हैं।  हमने तय किया कि इनमें से किसी को पालेंगे नहीं पर पूरी सर्दी भर इनको यहां आने से रोकेंगे भी नहीं।  हमने एक पुरानी चादर ली और उस कोने में डाल दी ताकि शिशु उस परसो सकें-एक बात याद रखें श्वान को ऊपर से सर्दी नहीं लगती बल्कि पेट पर ही लगती है क्योंकि वह बाल नहीं होते।  

श्वान शिशुओं ने सुबह पोर्च को गंदा कर दिया, गुस्सा आया पर फिर भी सर्दियों में उनको आसरा देने का फैसला बदला नहीं।  तीनों शिशुओं में एक भूरा था दो अन्य के शरीर पर भूरे पर की कहीं धारियां थी पर थे काले रंग के। बच्चे इतनी आयु के थे कि वह मां के दूध पीने के साथ ही ठोस पदार्थ भी ले रहे थे। उनको हम ही नहीं हमारे पड़ौसी भी कुछ न कुछ खाने को देते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि मोहल्ले की साझा जिम्मेदारी बन गयी थी तीनों की सेवा। दिन में वह बाहर मां के साथ घूमते और रात के उसी रास्ते से अंदर आते और जाते।  शाम को  हमारे वापस आने पर अंदर स्कूटर दाखिल होने  पर परेशानी आती फिर भी उनको बाहर नहीं निकालते। तीसरे दिन एक काला श्वान शिशु घिसटता हुआ आया। उसकी कमर पर किसी ने प्रहार किया था।  तब  पास रहने वाले एक ही डाक्टर से गोलियां लेकर उसे दूध में पिलायी तब वह ठीक हुआ।  हालांकि भूरा शिशु उसे पीने नहीं दे रहा था। इसलिये उसे भगाने के लिये भी प्रयास करना पड़ा।

चौथे दिन छत पर योग साधना करने के पश्चात् हमने पास ही खाली पड़े प्लाट पर झांका तो मादा श्वान अपने उसी शिशु के साथ सो रही थी। श्रीमतीजी ने गौर से देखा और कहा -‘ऐसा लग रहा है कि यह काला वाला मर गया।’

हमने कहा-‘नहीं, हो सकता है कि सो रहा हो।’

शाम को पता लगा कि मादा श्वान शिशु उसी काले शिशु का शव खा रही थी। मोहल्ले के लोगों ने उससे छुड़ाकर किसी मजदूर से कहकर उसे दूर फिंकवा दिया।  हमने श्रीमती जी से कहा-‘यकीनन वह बच्चा खा नहीं रही होगी बल्कि उसे जगाने का प्रयास कर रही होगी। श्वान को काम करने के लिये बस मुंह ही तो है। हो सकता है कि मादा श्वान को लगता हो कि इस तरह नौंचने यह जाग जायेगा। वह बिचारी क्या जाने कि यह मर गया है?’



पंद्रह दिन हो गये।  इधर सर्दी भी कम हो गयी। चादर हमने दरवाजे के बाहर  ही डाल दी। फिर भी जीवित दोनों शिशु अंदर आते जाते रहे।  काला शिशु हमेशा ही भूरे से कमजोर रहा।  अब तो ऐसा लगता था कि जैसे कि दोनों की उम्र में भी अंतर हो।  अनेक बार  पपड़ी या अन्य चीज काले शिशु के मुंह से भूरे रंग वाला छीन लेता था।  काले वाले को कुछ देकर उसके खिलाने के लिये भूरे वाले को भगाने का प्रयास भी करना पड़ता था।

पोर्च के बाद वाले दरवाजे कभी खुले होते तो कमरे में सबसे अधिक काला शिशु ही आता था।  एक बार तो वह कंप्यूटर कक्ष तक आ गया था। आज स्कूटर निकालने के लिये दरवाजा खोला और थोड़ी देर अंदर आया तो वह घुस आया। उसे चिल्लाकर भगाया।  उसका भागना याद आता है



शाम को वह भूरा शिशु ही शेष रह गया।  दरअसल काले शिशु जीवन जीना तो चाहते थे पर किसी से छीनकर नहीं जबकि यह भूरा शिशु आक्रामक है।

जब काले शिशु की मौत हुई तो आसपास की महिलाओं को भारी तकलीफ हुई क्योंकि यही जीव का स्वभाव है कि जो उसके पास रहता है उसके प्रति मन में मोह आ ही जाता है।  पास पड़ौस के लोगों ने उसे भी कहीं दूर फिंकवाने का इंतजाम किया। साथ के कपड़ा और नमक भी उसे दफनाने के लिये दिया गया।  हमेशा ही आक्रामक रहने वाला भूरा शिशु कुछ उदास दिख रहा है। वह शायद लंबा जीवन जियेगा। संभवतः तीन  शिशु कुदरत ने इसलिये ही  साथ भेजे क्योंकि सर्दी में एक दूसरे के सहारे वह जी सकें।  भूरा शिशु हमेशा ही दोनों अन्य शिशुओं के ऊपर सोता था। दोनों काले शिशुओं में भूरे की अपेक्षा  आक्रामकता का नितांत अभाव दिखता था।  ऐसा लगता था कि वह काले शिशु केवल भूरे के जीवन का मार्ग प्रशस्त करने के लिये ही आये हैं। अब भूरे शिशु को शायद गर्मी के आवश्यकता नहीं रही और कुदरत ने उसे भेजा गया सामान वापस ले लिया। 

हमने उसे पालने का फैसला नहीं किया पर कौन जानता है कि आगे क्या होगा। उस भूरे शिशु की आंखों में उदासी का भाव देखकर सोचता हूं कि अब उसे किस पर डाटूंगा क्योकि वह खाने के लिये अकेला बचा है और अपनी मां को दी गयी चीज उससे छीनता नहीं है।  दोनों दरवाजा खोलने पर हमारी तरफ देखते हैं तब लगता है कि उनकी आंखों में  उसी काले शिशू के बाहर होने की आशा झांक रही है। उनको लगता है कि वह अंदर कहीं घुस गया है और निकलेगा जैसे कि पहले डांटने पर हमेशा ही भाग कर निकलता था।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

लोकप्रिय पत्रिकायें

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर