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9/29/2010

भगवान श्रीराम और कृष्ण ने जन्म से नहीं कर्म से भगवत्स्वरूप प्राप्त किया-हिन्दी लेख (bhagwan shir ram and shri krishna-hindi article)

अगर रावण ने भगवान राम की भार्या श्रीसीता का अपहरण न किया होता तो क्या दोनों के बीच युद्ध होता? कुछ लोग इस बात की ना हामी भरें पर जिन्होंने बाल्मीकि रामायण को पढ़ा है वह इस बात को मानते हैं कि राम रावण का युद्ध तो उसी दिन तय हो गया था जब ऋषि विश्वमित्र की यज्ञ की रक्षा के लिये भगवान श्री राम ने मारीचि और सुबाहु से युद्ध किया। सुबाहु इसमें मारा गया और मारीचि तीर खाकर उड़ता हुआ दूर जाकर गिरा था और बाद के मृग का वेश बनाकर उसने रावण की सीता हरण प्रसंग में सहायता की थी।
भारतीय दर्शन के पात्रों पर लिखने वाले एक उपन्यासकार कैकयी को चतुर राजनेता और भद्र महिला बताया है। शायद यह बात सच भी हो क्योंकि मारीचि और सुबाहु से युद्ध के बाद शायद कैकयी ने यह अनुभव किया था कि अब रावण कभी भी अयोध्या पर हमला कर सकता है। दूसरा रावण उस समय एक आतंक था और कैकयी ने अनुभव किया श्रीराम ही उसका वध करें इसलिये उसे उनको बनवास भेजने की योजना बनाई। ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि मंथरा की मति देवताओं ने ही भ्रमित करवाई थी क्योंकि श्रीराम उस समय के महान धनुर्धर थे और रावण को ही मार सकते थे। ऐसे में श्रीराम का वहां रहना ठीक नहीं है यह सोचकर ही कैकयी ने उनको बनवाय दिया-ऐसा उपन्यासकार का मानना है। दूसरा यह भी कि रावण के हमले से अयोध्या की रक्षा करने के प्रयास में पराक्रमी श्री राम का कौशल प्रभावित हो सकता यह संभावना भी थी। फिर जब उनके हाथ से रावण का वध संभव है कि तो क्यों न उनको वही भेज दिया जाये। संभवत कैकयी को यह अनुमान नहीं रहा होगा कि श्रीसीता का वह अपहरण करेगा मगर उस समय की राजनीिितक हालत ऐसे थे कि रणनीतिकार रावण के पतन के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। वैसे भी रावण ने श्रीराम को अपने यहां लाकर उनको मारने की योजना के तहत ही सीता जी का अपहरण किया था।
वन प्रवास के दौरान जब श्रीराम अगस्त्य ऋषि के यहां गये तो वहां इं्रद पहले से ही विराजमान थे और उनको आता देखकर तुरंत चले गयंे। दरअसल वह राम रावण के संभावित युद्ध के बारे में बातीचत करने आये थे। ऋषि अगस्तय ने वहां श्रीराम को अलौकिक हथियार दिये जो बाद में रावण के युद्ध के समय काम आये। कहा जाता है कि वानरों की उत्पति भी भगवान श्री राम की सहायतार्थ देवताओं की कृपा से हुई थी। इस तरह राम के विवाह से लेकर रावण वध तक अदृश्य राजनीतिक श्ािक्तयां भगवान श्रीराम का संचालन करती रहीं। वह सब जानते थे पर अपना धर्म समझकर आगे बढ़ते रहे।
आज जब हम देश के राजनीतिक स्थिति को देखते हैं तो केवल दृश्यव्य चरित्रों को देखते हैं और अदृश्यव्य ताकतों पर नज़र नहीं जाती। ऐसे में हमारे आराध्य भगवान श्री राम और श्रीकृष्ण के जीवन को व्यापक ढंग से देखने वाले इस बात को समझ पाते हैं कि किस तरह रामायण और श्रीगीता के अध्यात्म पक्ष को अनदेखा किया जाता है जो कि हमारे धर्म का सबसे मज़बूत पक्ष है।
हम थोड़ा श्रीकृष्ण जी के चरित्र का भी अवलोकन करें। मथुरा के कारावास में जन्म और वृंदावन में पलने वाले श्रीकृष्ण जी के जीवन का सवौच्च आकर्षक रूप महाभारत में दिखाई देता है जहां उन्होंने कुशल सारथी की तरह अपने मित्र अर्जुन के साथ ही उनके रथ का भी संचालन किया। भगवान श्रीराम की तरह स्वयं उन्होंने युद्ध नहीं किया बल्कि सारथि बनकर पूरे युद्ध को निर्णायक स्थिति में फंसाया। हम महाभारत का अध्ययन करें तो इस बात का पता लगता है कि अनेक तत्कालीन बुद्धिमान लोगों को यह लगने लगा था कि अंततः कौरवों तथा पांडवों में कभी न कभी युद्ध जरूर होगा। भगवान श्रीकृष्ण इस बात को जानते थे इसलिये कभी दोनों के बीच वैमनस्य कम करने का प्रयास न कर पांडवों की सहायता की । दरअसल कुछ लोग मानते हैं कि महाभारत युद्ध की की नींव कौरवों और पांडवों में जन्म के कारण पड़ी है पर यह सच नहीं है। महाभारत की नींव तो द्रोपदी के विवाह के समय ही पड़ गयी थी जब अपने स्वयंवर में द्रोपदी ने सूतपुत्र कर्ण का वरण करने से इंकार किया था फिर विवाह बाद कुंती के वचन की खातिर उसे पांच भाईयों की पत्नी बनना पड़ा। द्रोपदी श्रीकृष्ण की भक्त थी और वे शायद इसे कभी स्वीकार नहीं कर पाये कि एक क्षत्राणी मां है तो उसका वचन धर्म की प्रतीक बन गया और दूसरी पत्नी है तो उसे वस्तु मानकर उस पर वह वचन धर्म की तरह थोपा गया। मां के रूप में कुंती पूज्यनीय है तो क्या द्रोपदी पत्नी के रूप में तिरस्काणीय है? जब भगवान श्रीकृष्ण युद्ध से पहले बातचीत करने दुर्योधन के महल में जा रहे थे तब द्रोपदी ने उनसे यही आग्रह किया कि किसी भी तरह यह युद्ध होना चाहिए।
श्रीकृष्ण उस समय मुस्कराये थे। अधर्म और धर्म के बीच की लकीर का वह अंतर जानते थे और वह धर्म की स्थापना के लिये अवतरित हुए थे। उनके लिये पांडवों और कौरव दोनों ही निर्मित मात्र थे जिनके बीच यह युद्ध अनिवार्य था। वह न कौरवों के शत्रु थे न पांडवों के मित्र! वह केवल धर्म के मित्र थे और भक्तों के आश्रय दाता थे। अपनी भक्त द्रोपदी के अपमान का बदला लेने में उनके धर्म स्थापना का मूल छिपा हुआ था। जिसे उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता का संदेश स्थापित कर प्राप्त किया।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण जी का चरित्र जनमानस में हमेशा ही प्रभावी रहा है शायद इसी कारण ही संवेदनाओं के आधार पर काम करने वाले उनके नाम की आड़ अवश्य लेते हैं। ऐसा करते हुए वह केवल आस्था की बातें करते हैं पर ज्ञान पक्ष को भुला देते है-सच तो यह है कि ऐसा वह जानबुझकर करते हैं क्योंकि ज्ञानी आदमी को बहलाया नहीं जा सकता। उसके ज्ञान चक्षु हमेशा खुले रहते हैं और वह सभी में परमात्मा का स्वरूप देखता है पर संवदेनशीलता का दोहन करने वाले सीमित जगहों पर आस्था का स्वरूप स्थापित करते हैं। पहले तो पेशेवर संतों की बात करें जो भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की बाललीलाओं के आसपास ही अपनी बात रखते हें। इससे महिलाओं का कोमल मन बहुत प्रसन्न हो जाता है और वह अपने बाल बच्चों में भी ऐसे ही स्वरूप की कामना करती हैं तो पुरुष भी तन्मय हो जाते हैं। धनुर्धर । श्री राम और सारथी श्रीकृष्ण के जन्म तथा बाललीलाओं में तल्लीन रहने वालों को उनके संघर्ष तथा उपलब्धियों में रुचि अधिक नहीं दिखती।
अब तो भक्तों का ध्यान लीलाओं से अधिक जन्म स्थानों पर केंद्रित किया जा रहा है। अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि और मथुरा में श्रीकृष्ण का जन्मस्थान विवादों के घेरे में है। बरसों तक नहीं सुना था पर अब बरसों से सुन भी रहे हैं। सच क्या है पता नहीं? कभी कभी तो लगता है देश की धार्मिक आस्थाओं के दोहन के लिये यह सब हो रहा है तो कभी लगता है कि वाकई कोई बात होगी। ऐसे में हम जैसे आम भक्त और लेखक अपनी कोई भूमिका नहीं देख पाते खासतौर से जब जब श्रीमद्भागवत गीता की तरफ ध्यान जाता है। श्रीगीता में जन्म से अधिक निष्काम कर्म को मान्यता दी गयी है। भगवान श्रीराम ने रावण के युद्ध के समय केवल उसे मारने का ही लक्ष्य किया था तब वह इतना एकाग्र थे कि वहां पर अपने प्रिय भ्राता भरत को भी मदद के लिये याद नहीं किया। लक्ष्मण ने भी अपनी तरह आक्रामक रहने वाले शत्रुध्न को को एक आवाज तक नहीं दीं। इससे भी यह लगता है कि दोनों भाई यह समझ गये थे कि अयोध्या पर संकट न आये इसलिये ही रावण वध के प्रसंग में उनको लिप्त होना ही है। उसी तरह भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता संदेश मेें अपने श्रीमुख से किसी का नाम तक नहीं लिया। उस श्री राधा का भी नहीं जिसके साथ उनका नाम प्रेम प्रतीक में रूप में लिया जाता है। उस सुदामा का भी स्मरण नहीं किया जिनके साथ उनकी मित्रता सर्वोपरि मानी जाती है। पिता वासुदेव और देवकी के लिये भी एक शब्द नहीं कहा। स्पष्टतः वह इस संसार के रहस्य को उद्घाटित करते रहे जो बनता बिगड़ता रहता है और जहां जन्म स्थान तथा दैहिक संबंध परिवर्तित होते रहते हैं। अपने जन्मस्थानों या शहर से भी कोई सद्भाव भी दोनों ने नहीं दिखाया। सच तो यह है कि भगवान श्रीराम के लिये पूरा संसार ही अयोध्या तो श्रीकृष्ण के लिये यह द्वारका रहा। इस चर्चा को मतलब किसी विवाद पर निष्कर्ष देना नहीं है बल्कि यह एक सत्संग चर्चा है। लोग विवादों को उठायें उनको कोई रोक नहीं सकता। वह लोग अज्ञानी हैं या आस्था से उनका कोई लेना देना नहीं है यह कहना भी अहंकार की श्रेणी में आता है। अलबत्ता एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में अपने जैसे लोगों के लिये कुछ लिखने का मन हुआ तो लिख दिया। आखिर यह कैसे संभव है कि जब सारे देश में चर्चा चल रही है उस पर लिखा न जाये। एक बात याद रखने वाली है कि भगवान श्रीराम और कृष्ण अपने जन्म की वजह से नहीं कर्म की वज़ह से भगवत्स्वरूप प्राप्त कर सके यह नहीं भूलना चाहिए।
जय श्रीराम जय श्रीकृष्ण
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9/22/2010

राष्ट्रमंडल खेल तमाशे की तरह लगते हैं-हिन्दी लेख (commanwelth game in newdelhi-hindi article)

दिल्ली में होने वाले कॉमनवैल्थ तमाम कारणों से चर्चा में है। जिस तरह वहां निर्माण कार्य हुआ है और तैयारी चल रही है उससे विदेशों से आये प्रतिनिधिमंडल संतुष्ट नहीं है तो भारत में अनेक खेल विशेषज्ञ तमाम तरह के सवाल उठा रहे हैं। बहरहाल हम यहां कॉमनवैल्थ खेलों के महत्व की ही चर्चा करेंगे जिसको बढ़ाचढ़ा कर बताया जा रहा है।
देश में खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों की कमी नहीं है। दुनियां के प्रसिद्ध खेलों के -फुटबाल, क्रिकेट, शतरंज, टेनिस, टेबल टेनिस, बैटमिंटन तथा हॉकी-प्रशंसकों की यहां भरमार है। इसके अलावा भी कम लोकप्रिय खेलों में भी दिलचस्पी है। इसके बावजूद यह वास्तविकता है कि बहुत कम खेल प्रेमी हैं जिनकी दिलचस्पी राष्ट्रमंडल खेलों में होगी। दिल्ली में खेल होंगे इसलिये भारत के प्रचार माध्यम-टीवी चैनल, रेडियो तथा अखबार-इसका प्रचार खूब करेंगे पर यकीनन दर्शकों की दिलचस्पी उनमें कम ही होगी। भारत में अगर विज्ञापन और प्रायोजक कंपनियों को ध्यान रखने की बजाय आम दर्शक और पाठक को देखकर कार्यक्रमों का प्रसारण तथा समाचार का प्रकाशन हो तो संभव है कि कोई माध्यम इनको प्रसारित करने का जोखिम नहीं उठायेगा। लोगों के पास मनोरंजन के साधन अधिक हैं पर उनकी रुचियां सीमित हैं इसलिये ही क्रिकेट जैसे खेल को देखते हैं पर उनकी संख्या बहुत कम है। सच तो यह है कि क्रिकेट अब जिंदा ही विज्ञापन तथा कंपनियों की वजह से है।
इसके अलावा हम भारतीयों की आदत है कि कोई भी द्वंद्व तो देखने में रुचि तो रखते हैं पर महारथियों का स्तर भी देखना नहीं भूलते। इसलिये खेल की दुनियां में महारथ रखने वाले अमेरिका, चीन, सोवियत संघ, जापान तथा जर्मनी जैसे राष्ट्रों की अनुपस्थिति इन खेलों का महत्व स्वाभाविक रूप से कम कर देती है। दूसरी बात यह भी है कि राष्ट्रवादी खेल प्रेमियों के लिये कॉमनवैल्थ खेलों का आयोजन करता तो दूर की बात इनमें शामिल होना भी अंग्रेजों की गुलामी ढोने जैसा है क्योंकि इसमें केवल वही देश शामिल होते हैं जो कभी ब्रिटेन के गुलाम रहे हैं। जो लोग इन खेलों के आयोजन से विश्व में भारतीय की छबि अच्छी होने के दावे कर रहे हैं उन्हें यह बात याद रखना चाहिए कि गुलाम की कभी छबि अच्छी नहीं होती। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय क्रिकेट खेल इसमें शामिल नहीं है। राष्ट्रमंडल खेलों में भारत अच्छे पदक जीतेगा पर इससे भारतीय खेलप्रेमी ओलंपिक में अपने देश की स्थिति को भुला नहीं सकते जहां एक स्वर्ण पदक जीतने के बाद दूसरा नसीब नहीं हुआ और कांस्य या रजत पदक के टोटे पड़ गये। दूसरी बात यह है कि जो राष्ट्रमंडल के आयोजन से देश में खेल तथा खिलाड़ियों के विकास की बात कर रहे हैं वह यह भी बता दें कि पिछले आयोजन के बाद कितना विकास हुआ? उल्टे पाकिस्तानी ने हॉकी में इतनी बुरी शिकस्त दी कि उसकी कड़वी यादें भुलाने में भी समय लगा। कॉमनवैल्थ के दौरान ही अगर कोई बीसीसीआई की टीम कहीं क्रिकेट मैच खेलती हो तो फिर शायद प्रचार माध्यम भी इसे महत्व न दें।
जहां तक खेलों के विकास की बात है तो वह पैसे खर्च कर नहीं  आता। देश का इतना पैसा इन खेलों पर खर्च हो रहा है पर इससे उनमें विकास होगा यह सोचना भी बेकार है क्योंकि इधर अपने देश के ही खिलाड़ी धनाभाव की शिकायत कर रहे हैं। खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाये बगैर कभी खेलों का विकास नहीं हो सकता। यह सही है कि पैसा सब कुछ नहीं होता पर वह आदमी में आत्मविश्वास का पैदा करने वाला एक बहुत बड़ा तत्व है।
कहने का मतलब यह है कि इन खेलों का आयोजन भारत में हो या बाहर भारतीय खेल प्रेमियों की इनमें दिलचस्पी कम ही है। इसलिये यह आशा करना ही व्यर्थ है कि इससे खेलों का विकास होगा या खिलाड़ियों का मनोबल ऊंचा उठेगा। यह पता नहीं बाकी देशों में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों की क्या स्थिति रहती है पर अपने देश के खेल प्रेमी इसमें यही सोचकर शामिल होंगे कि बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। कहने का मतलब यह कि उनमें परायेपन का ऐसा बोध रहेगा। इस बात को वही आदमी समझ सकता है जो स्वयं खिलाड़ी हो या खेल प्रेमी हो। उनके लिये यह आयोजन गुलामी के तमाश से अधिक कुछ नहीं है
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9/13/2010

हिन्दी भाषा का महत्व-हिन्दी दिवस पर हास्य कविताएँ (hindi bhasha ka mahatva-hindi diwas par hasya kavita)

हिन्दी दिवस पर
उन्होंने हिन्दी का महत्व बताया,
अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त होने का
अपना संकल्प अंग्रेजी में जताया।
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हिन्दी दिवस पर
अपनी मातृभाषा की उनको
बहुत याद आई,
इसलिये ही
‘हिन्दी इज वैरी गुड’ भाषा के
नारे के साथ दी बार बार दुहाई।
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शिक्षक ने पूछा छात्रों से
‘बताओ अंग्रेजी बड़ी भाषा है या हिन्दी
जब हम लिखने और बोलने की
दृष्टि से तोलते हैं।’
एक छात्र ने जवाब दिया कि
‘वी हैव आल्वेज स्पीकिंग इन हिन्दी
यह हम सच बोलते हैं।’
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9/08/2010

शब्दलेख पत्रिका ब्लाग ने पार की एक लाख पाठक संख्या पार-हिन्दी संपादकीय (A Hindi blog shabdlekh patrika)

इस इस लेखक के ब्लाग शब्दलेख पत्रिका  ने भी आज एक लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार कर ली। गूगल पेज रैकिंग में चार अंक प्राप्त तथा एक लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार करने वाला इस लेखक का यह पांचवां ब्लाग है। यह संख्या कोई अधिक मायने रखती क्योंकि हिन्दी भाषियों की संख्या को देखते हुए लगभग तीन वर्ष में इतनी संख्या पार करना कोई अधिक महत्व का नहीं है। न ही इस संख्या को देखते हुए ऐसा कहा जा सकता है कि हिन्दी ने अंतर्जाल पर कोई कीर्तिमान बनाया है पर अगर कोई स्वतंत्र, मौलिक तथा शौकिया लेखक है तो उसके लिये यह एक छोटी उपलब्धि मानी जा सकती है। इस लेखक के अनेक ब्लाग हैं पर इससे पूर्व के चार ब्लाग बहुत पहले ही इस संख्या को पार कर चुके हैं पर कोई ऐसा ब्लाग नहीं है जो अभी एक दिन में हजार की संख्या पार कर चुका है अलबत्ता सभी ब्लाग पर मिलाकर 2500 से तीन हजार तक पाठक/पाठ पठन संख्या पार हो जाती है।
प्रारंभ में इस ब्लाग को अन्य ब्लाग से अधिक बढ़त मिली थी पर बाद में अपने ही साथी ब्लाग की वजह से इसे पिछड़ना भी पड़ा। इसकी वजह यह थी कि इस लेखक ने वर्डप्रेस की बजाय ब्लाग स्पॉट के ब्लाग पर ही अधिक ध्यान दिया जबकि वास्तविकता यह है कि वर्डप्रेस के ब्लाग ही अधिक चल रहे हैं। कभी कभी लगता है कि वर्डप्रेस के ब्लाग पर लिखा जाये पर मुश्किल यह है कि ब्लाग स्पॉट के ब्लाग कुछ अधिक आकर्षक हैं दूसरे उन पर अपने पाठ रखने में अधिक कठिनाई नहीं होती इसलिये उन पर पाठ रखना अधिक सुविधाजनक लगता है। चूंकि यह लेखक शौकिया है और यहां लिखने से कोई धन नहीं मिलता इसलिये अंतर्जाल पर निरंतर लिखने के लिये मनोबल बनाये रखना कठिन होता है। दूसरी बात यह है कि पाठक संख्या में घनात्मक वृद्धि अधिक प्रेरणा नहीं देती। इसके लिये जरूरी है कि गुणात्मक वृद्धि होना। एक बात निश्चित है कि देश में ढेर सारे इंटरनेट कनेक्शन हैं पर उनमें हिन्दी के प्रति सद्भाव अधिक नहीं दिखता है। संभव है कि अभी इंटरनेट पर अच्छे लिखने को नहीं मिलता हो।
दूसरी बात यह है कि दृश्यव्य, श्रव्य तथा प्रकाशन माध्यम अपनी तयशुदा नीति के तहत ब्लाग लेखकों के यहां से विषय लेते हैं पर उनके नाम का उल्लेख करने की बजाय उनके रचनाकार अपना नाम करते हैं।
दूसरी बात यह कि अंतर्जाल पर फिल्मी अभिनेता, अभिनेत्रियां, खिलाड़ी तथा अन्य प्रसिद्ध हस्तियों के ब्लाग है और उनका प्रचार इस तरह होता है जैसे कि लिखना अब केवल बड़े लोगों का काम रह गया है।
एक सुपर स्टार के घर के बाहर से मैट्रो ट्रेन निकलने वाली है। निकलने वाली क्या, अभी तो चंद विशेषज्ञ उनके घर के सामने थोड़ा बहुत निरीक्षण करते दिखे। अभी योजना बनेगी। पता नहीं कितने बरस में पटरी बिछेगी। उस सुपर स्टार की आयु पैंसठ से ऊपर है और संभव है कि पटरियां बिछने में बीस साल और लग जायें। संभव है सुपर स्टार कहीं अन्यत्र मकान बना लें। कहने का अभिप्राय है कि अभी जंगल में मोर नाचने वाला नहीं पर उन्होंने अपनी निजी जिंदगी में दखल पर अपने ब्लाग पर लिख दिया। सारे प्रचार माध्यमों ने उस पर चिल्लपों मचाई। तत्काल उन सुपर स्टार ने ट्विटर पर अपना स्पष्टीकरण दिया कि ‘हम मैट्रों के विरोधी नहीं है। मैं तो केवल अपनी बात ऐसे ही रख रहा था।’
वह ट्विटर भी प्रचार माध्यामों में चर्चित हुआ। इससे संदेश यही जाता है कि इंटरनेट केवल बड़े लोगों का भौंपू है। ऐसे में आम लेखक के लिये अपनी पहचान का संकट बन जाता है। वह चाहे कितना भी लिखे पर उससे पहले यह पूछा जाता है कि ‘तुम हो क्या?’
किसी आम लेखक की निजी जिंदगी उतनी ही उतार चढ़ाव भरी होती है जितनी कि अन्य आम लोगों की। मगर वह फिर भी लिखता है पर अपनी व्यथा को भी तभी कागज पर लाता है जब वह समग्र समाज की लगती है वरना वह उससे जूझते हुए भी उसका उल्लेख नहीं करता। लेखक कभी बड़ा या छोटा नहीं होता मगर अब उसमें खास और आम का अंतर दिखाई देता है और यह सब ब्लाग पर भी दिखाई देता है।
आखिरी बात यह है कि जो वास्तव में लेखक है वह अपने निज अस्तित्व से विचलित नहीं होता और न पहचान के लिये तरसता है क्योंकि समाज की चेतना जहां विलुप्त हो गयी है वहां समस्या पाठक बढ़ाने की नहीं है बल्कि जो हैं उनसे ही निरंतर संवाद बनाये रखना है। जब लेखक लिखता है तब वह अध्यात्म के अधिक निकट होता है और ऐसे में समाज से जुड़ा उसका निज अस्तित्व गौण हो जाता है और अंदर तक पहुंचने वाला लेखन तभी संभव हो पाता है। इस अवसर पर मित्र ब्लाग लेखकों और पाठकों का आभार।
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9/02/2010

इश्क पर हास्य कविता-हिन्दी काव्य प्रस्तुति (ishq par hasya kavita-hindi comic poem)

पुरानी प्रेमिका मिली अपने
पुराने प्रेमी कवि से बहुत दिनों बाद
और बोली,
‘कहो क्या हाल हैं,
तुम्हारी कविताओं की कैसी चाल है,
सुना है तुम मेरी याद में
विरह गीत लिखते थे,
तुम पर सड़े टमाटर और फिंकते थे,
अच्छा हुआ तुमसे शादी नहीं की
वरना पछताती,
कितना बुरा होता जब बेस्वादी चटनी से
बुरे आमलेट ही जीवन बिताती,
तुम भी दुःखी दिखते हो
क्या बात है,
पिचक गये तुम्हारे दोनों गाल हैं,
मेरी याद में विरह गीत लिखते तुम्हारा
इतना बुरा क्यों हाल है।’
सुनकर कवि बोला
‘तुमसे विरह होना अच्छा ही रहा था,
उस पर मेरा हर शेर हर मंच पर बहा था,
मगर अब समय बदल गया है,
कन्या भ्रुण हत्याओं ने कर दिया संकट खड़ा,
लड़कियों की हो गयी कमी
हर नवयुवक इश्क की तलाश में परेशन है बड़ा,
जिनकी जेब भरी हुई है
वह कई जगह साथ एक जगह जुगाड़ लगाते हैं,
जिनके पास नहीं है खर्च करने को
वह केवल आहें भर कर रह जाते हैं,
विरह गीतों का भी हाल बुरा है,
हर कोई सफल कवि हास्य से जुड़ा है,
इश्क हो गयी है बाज़ार में बिकने की चीज,
पैसा है तो करने में लगता है लज़ीज,
एक से विरह हो जाने से कौन रोता है,
दौलत पर इश्क यूं ही फिदा होता है,
दिल से नहीं होते इश्क कि टूटने पर कोई हैरान हो,
कल दूसरे से टांका भिड़ जाता है
फिर क्यों कोई विरह गीत सुनने के लिये परेशान हो,
जिन्होंने बस आहें भरी हैं
उनको भी इश्क पर हास्य कविता
सुनने में मजा आता है,
आशिक माशुकाओं का खिल्ली उड़ाने में
उनका दिल खिल जाता है,
कन्या भ्रुण हत्याओं ने कर दिया कचड़ा समाज का,
इश्क पर फिल्में बने या गीत लिखे जा रहे ज्यादा
मगर तरस रहा इसके लिये आम लड़का आज का,
तुम्हारे विरह का दर्द तो अभी अंदर है
मगर उस पर छाया अब हास्य रस का जाल है।
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