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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

2/22/2009

मौलिक तथा स्वतंत्र लेखन के प्रोत्साहन के प्रयास जरूरी-आलेख

जब सामाजिक विषयों पर कुछ लिखा जाता है और वह व्यंजना विद्या में है तो अच्छा लगता है। सामाजिक विषयों में व्यापकता होती है इसलिये उस पर हर तरह से लिखा और पढ़ा जाता है पर कठिनाई यह है कि हिंदी ब्लाग जगत को लेकर अनेक बार ऐसी बातें आती हैं जो यह सोचने को मजबूर करती हैं कि आखिर संगठिन होकर हिंदी ब्लाग जगत क्यों नहीं चल पा रहा है? इस समय हिंदी ब्लाग जगत में कई ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो चार सालों से लिख रहे हैं पर उनका नाम क्यों नहीं लोगों की जुबान पर चल रहा है? सच बात तो यह है कि हिंदी ब्लाग जगत का नियमित लेखन चालीस से अधिक लोगों के आसपास ही सिमटा लगता है।

एक समाचार के अनुसार भारत में सामाजिक विषयों में अब यौन संबंधी सामग्री के मुकाबले बढ़ी रही है। दरअसल इंटरनेट का भविष्य ही सामजिक विषयों पर टिका हआ है। यौन सामग्री से लोग बहुत जल्दी उकता जाते हैं।

अखबार में अनेक बार ब्लाग के बारे में पढ़ता हैं। यह चर्चा हिंदी के बारे में नहीं लगती बल्कि ‘ब्लाग’ शब्द तक सिमटी रहती है। जब ज्वलंत विषयों पर ब्लाग की चर्चा होती है तो अक्सर अंग्रेजी ब्लोग का नाम दिया जाता है पर हिंदी ब्लाग को एक भीड़ की तरह दिखाया जाता है। जिन हिंदी ब्लाग की चर्चा प्रचार माध्यमों में हुई है वह पक्षपातपूर्ण हुई है इसलिये दूर से हिंदी ब्लाग जगत देखने वाले इसे संदेह की दृष्टि से देखते हैं। इस हिंदी ब्लाग जगत में सम सामयिक विषयों पर अनूठा लिखा गया पर उसे देखा कितने लोगों ने-इसका अनुमान सक्रिय ब्लाग लेखक कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि जो लोग चाहते हैं कि हिंदी में अधिक से अधिक ब्लाग लिखें जायें और इसके लिये वह अपनी तरफ से शौकिया या पेशेवर प्रयास करते हुए केवल अपने चेहरे और नाम ही आगे रखना चाहते हैं-अधिक हुआ तो अपने ही किसी आदमी का नाम बता देते हैं।
भारत के लोगों में चाहे जितना तकनीकी ज्ञान,धन,तथा सामाजिक हैसियत हो पर उनका प्रबंध कौशल एक खराब हैं-यह सच सभी जानते हैं। इस प्रबंध कौशल के खराब होने का कारण यह है कि जो उच्च स्तर पर इस काम के लिये हैं वह हाथ से काम करने वाले को महत्वहीन समझते है। फिर उनकी एक आदत है कि वह उस आदमी का नाम नहीं लेना चाहते जिसने स्वयं नहीं कमाया हुआ हो। खिलाड़ी,अभिनेता,पत्रकार,और उच्च पदस्थ लोगों के साथ प्रतिष्ठत नामों का उपयोग करना चाहते हैं। ऐसे में भाग्य से कोई आम आदमी ही प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंच सकता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि स्वयं अपने हाथ से मौलिक लिखने वाले लेखकों को यहां एक तरह से प्रयोक्ता की तरह समझा जा रहा है शायद यही कारण है कि कोई उनके नाम तक नहीं लेता।

मैंने कुछ वेबसाईट संचालकों तथा प्रचार प्रमुखों के बयान समाचार पत्रों में देखे हैं। वह हिंदी में ब्लाग बढ़ाने के अभियान में लगे होेने का दावा करते हैं और साथ ही उम्मीदें भी जगाते हैं। समाचार पत्रों में उनको अपना नाम देखकर शायद उनको प्रसन्नता होती है। इसमें कोई बुराई नहीं है पर क्या उनकी नजर में कोई ऐसा ब्लाग लेखक नहीं है जिसका नाम लेकर वह कह सकें कि ‘देखो अमुक अमुक ब्लाग लेखक हैं जो हिंदी में बहुत अच्छा लिख रहे हैं।’ वह ऐसा नहीं कहेंगे कि क्योंकि अगर उन्होंने दस या पंद्रह नाम लिये तो लोगों की जुबान पर चढ़ जायेंगे तब उनको अधिक पाठक मिलना तय है।

अभी हाल ही में पब और चड्डी विवाद में अंग्रेजी वेबसाईट का नाम दिया पर हिंदी वालों को एक भीड़ की तरह निपटा दिया। क्या यह खौफ नहीं था कि अगर नाम लिखा तो वह हिट पा लेंगे। अपनी वेबसाईटों के संचालक अपने ब्लाग का प्रचार खूब करते हैं पर उनके साथ पाठकों का कितना वर्ग जुड़ता है वह जानते हैं। जो हिंदी ब्लाग जगत में सक्रिय हैं वह जानते हैं कि कुछ ब्लाग अगर लोगों की नजर में पड़ जायें तो उसे पाठक अधिक मिलेंगे और उसका लाभ अंततः हिंदी ब्लाग जगत को ही मिलेगा। मगर उनका नाम सार्वजनिक रूप से लेने से कतराना प्रबंध कौशल का अभाव ही कहा जा सकता है।

कुछ लोग कहते हैं कि प्रसिद्ध सितारों और अन्य लोगों को लिखने के लिये प्रयोजित किया जा रहा है-पता नहीं यह सच है कि नहीं-पर इससे हिंदी ब्लाग जगत को कोई लाभ नहीं होने वाला है। अगर एक आम ब्लाग लेखक को प्रायोजित न करें तो उनके ब्लाग का ही थोड़ा प्रचार कर लिया जाये तो कौनसी बड़ी बात हो जाती। वैसे हम सामान्य प्रयोक्ता ही हैं और इंटरनेट कनेक्शन का भुगतान प्रतिमाह करते हैं और प्रसिद्ध होकर कहीं उससे कटवा न लें शायद यही एक भय रहता होगा। एक बात सत्य है कि भारत में ब्लाग का भविष्य हिंदी से ही जुड़ा है और जिस तरह ब्लाग के पाठों की संख्या बढ़ रही है वह संतोषप्रद नहीं है। हिंदी ब्लाग जगत को स्वतंत्र और मौलिक लिखने वाले ब्लाग लेखकों की सख्त जरूरत है पर इस भौतिकवादी युग में उनकों बिना किसी प्रश्रय के लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता। जहां तक पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीयों की सामाजिक विषयों में कम रुचि का सवाल है तो उसका सीधा जवाब है कि भारत में हिंदी में सामाजिक विषयों में मौलिक तथा स्वतंत्र लेखकों के लिये कोई प्रश्रय नहीं है। अंग्रेजी में तो पाठकों की सीधे पहुंच होती है इसलिये उसके ब्लाग लेखकों को पाठक मिलना कोई कठिन काम नहीं है पर हिंदी की हालत यह है कि अभी ब्लाग लेखक फोरमों में अपने ही मित्रों से ही पाठक जुटाते हैं।
अभी उस दिनं एक वेबसाईट के संचालक का बयान अखबार में पढ़ने को मिला। मध्यप्रदेश में हिंदी के पाठक मिलने की उम्मीद उसने जताई थी पर उसने इस प्रदेश के किसी एक लेखक का नाम नहीं लिया जो लिख रहा है।
तब बड़ा आश्चर्य हुआ। हिंदी के लिये पाठक जुटाने की बात करने वाला वह शख्स क्या नहीं जानता कि हिंदी में मध्य प्रदेश से लिखने वाले कितने हैं और साथ में प्रसिद्ध भी हैं। ले देकर वहीं बात आ जाती है। कहते हैं कि हिंदी लेखन जगत में नहीं सभी जगह एक दूसरे को प्रोत्साहन देने की बजाय लोग टांग घसीटी में अधिक लगते हैं। अंतर्जाल पर सक्रिय प्रबंधक भी इस भाव से मुक्त नहीं हो पाये हैं। यह कोई शिकायत नहीं है। जिसकी मर्जी है वैसा करे फिर यहां ब्रह्मा होने का दावा भी तो कोई नहीं कर सकता। हां, एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि वह गलतफहमियों में न रहें। यहां वही ब्लाग लेखक डटकर लिखेंगे जिनको पाठक चाहेंगे। यह कोई अखबार नहीं है कि सुबह हाकर डालकर चला आयेगा तो पाठक वही पढ़ेंगे जो संपादक ने छापा हैं। वैसे भी अखबार खोलने में कम मेहनत होती है और खर्चा कम आता है। ब्लाग का मतलब है कि इंटरनेट पर एक बहुत बड़ी रकम खर्च करना। ऐसे में पाठक चाहेंगे बाहर से अलग कोई विषय या अनूठी सामग्री। जब तक आम पाठक को यहां के हिंदी ब्लाग जगत से परिचय नहीं कराया जायेगा तब तक इसके शीघ्र उत्थान की बात तो भूल ही जाईये। अनेक प्रतिष्ठित ब्लाग लेखक भी मानते हैं कि चार पांच वर्ष तक हिंदी ब्लाग जगत में कोई अधिक सुधार नहीं होने वाला। जिन लोगों ने हिंदी ब्लाग जगत का प्रबंध अपने हाथ में-शौकिया या पेशेवर रूप से-अपने हाथ में लिया है उन्हेें यह समझना चाहिये कि इसमें उन्नति और स्थिरता केवल स्वतंत्र और मौलिक ब्लाग लेखकों के हाथों से ही संभव है। अगर वह सोच रहे है कि बड़े और प्रसिद्ध नामों से प्रभावित लोग हिंदी ब्लाग जगत पर सक्रिय हो जायेंगे तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता पर आम पाठक के मन में स्थाई रुझान केवल आम लेखक के प्रसिद्ध होने पर होगा। वरना तो स्थिति दो वर्ष से तो मैं ही देख रहा हूं। अभी तक वही ब्लाग लेखक हम लोगों में लोकप्रिय हैं जो दो वर्ष पहले थे। जहां तक भारत में सामाजिक विषयों में यौन विषय से अधिक रुझान होने की बात है अभी ठीक नहीं लगती। अगर सामाजिक विषयों में लोगों के रुझान बढ़ाने की बात है तो फिर ब्लाग लेखकों से ही उम्मीद की जा सकती है पर उसे बनाये रखने का प्रयास कौन कर रहा है? शायद कोई नहीं। अगर इसी तरह चलता रहा तो दस वर्ष तक भी कोई सुधार नहीं होने वाला।
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2/17/2009

भगवान के नाम पर माया का खेल-आलेख

सांई बाबा के नाम पर रायल्टी वसूलने की बात सुनकर मैं बिल्कुल नहीं चौंका क्योंकि अभी और भी चौंकाने वाली खबरें आऐंगी क्योंकि जैसे-जैसे लोगों की बुद्धि पर माया का आक्रमण होगा सत्य के निकट भारतीय अध्यात्म उनको याद आयेगा उसके लिए अपना धीरज बनाये रखना जरूरी है। मैं प्रतिदिन अंर्तजाल पर चाणक्य, विदुर, कबीर, रहीम और मनु के संदेश रखते समय एकदम निर्लिप्त भाव में रहता हूं ताकि जो लिख रहा हूं उसे समझ भी सकूं और धारण भी कर सकूं। सच माना जाये तो योगसाधना के बाद मेरा वह सर्वश्रेष्ठ समय होता है उसके बाद माया की रहा चला जाता हूं पर फिर भी वह समय मेरे साथ होता है और मेरा आगे का रास्ता प्रशस्त करता है।

मुझे अपने अध्यात्म में बचपन से ही लगाव रहा है पर कर्मकांडों और ढोंग पर एक फीसदी भी वास्ता रखने की इच्छा नहीं रखता। सांई बाबा के मंदिर पर हर गुरूवार को जाता हूं और मेरा तो एक ही काम है। चाहे जहां भी जाऊं ध्यान लगाकर बैठ जाता हूं। सांईबाबा के मंदिर में हजारों भक्त आते और जाते हैं और सब अपने विश्वास के साथ माथा टेक कर चले जाते हैं। सांई बाबा के बचपन में कई फोटो देखे थे तो उनके गुफा या आश्रम के बाहर एक पत्थर पर बैठे हुए दिखाए जाते थे। मतलब उनके आसपास कोई अन्य आकर्षक भवन या इमारत नहीं होती थी। आज सांईबाबा के मंदिर देखकर जब उन फोटो को याद करता हूं तो भ्रमित हो जाता हूं। फिर सोचता हूं कि मुझे इससे क्या लेना देना। सांई बाबा की भक्ति और मंदिर अलग-अलग विषय हैं और मंदिरों में जो नाटक देखता हूं तो हंसता हूं और सोचता हूं कि क्या कभी उन संतजी ने सोचा होगा कि उनके नाम पर लोग हास्य नाटक भी करेंगे। अपनी कारें और मोटर सायकलें वहां पुजवाने ले आते हैं। वहां के सेवक भी उस लोह लंगर की चीज की पूजा कर उसको सांईबाबा का आशीर्वाद दिलवाते हैं। इसका कारण यह भी है कि सांईबाबा को चमत्कारी संत माना जाता है और लोगों की इसी कारण उनमें आस्था भी है।

अधिक तो मैं नहीं जानता पर मुझे याद है कि मुझे शराब पीने की लत थी और एक दिन पत्नी की जिद पर उनके मंदिर गया तो उसके बाद शुरू हुआ विपत्ति को दौर। पत्नी की मां का स्वास्थ्य खराब था वह कोटा चलीं गयीं और इधर मैं उच्च रक्तचाप का शिकार हुआ। अपनी जिंदगी के उस बुरे दौर में मैं हनुमान जी के मंदिर भी एक साथी को ढूंढकर ले गया। आखिर मैं स्वयं भी कोटा गया क्योंकि यहां अकेले रहना कठिन लग रहा था। वहां सासुजी का देहांत हो गया।

उसके बाद लौटे तो फिर हर गुरूवार को मंदिर जाने लगे। इधर मेरी मानसिक स्थिति भी खराब होती जा रही थी। ऐसे में पांच वर्ष पूर्व (तब तक बाबा रामदेव की प्रसिद्धि इतनी नहीं थी)एक दिन भारतीय योग संस्थान का शिविर कालोनी में लगा। संयोगवश उसकी शूरूआत मैंने गुरूवार को ही की थी।

यह मेरे जीवन की दूसरी पारी है। जिन दिनों शराब पीता था तब भी मैं भगवान श्री विष्णु, श्री राम, श्री कृष्ण, श्री शिवजी, श्रीहनुमान और श्रीसांईबाबा के के मंदिर जाता रहा और बाल्मीकि रामायण का भी पाठ करता । योगसाधना शुरू करने के बाद श्रीगीता का दोबारा अध्ययन शुरू किया और देखते देखते अंतर्जाल पर लिखने भी आ गया। मतलब यह कि ओंकार के साथ निरंकार की ही आराधना करता हूं। अपना यह जिक्र मैंने इसलिये किया कि इसमें एक संक्षिप्त कहानी भी है जिसे लोग पढ़ लें तो क्या बुराई है।

असल बात तो मैं यह कहना चाहता हूं कि भारतीय अध्यात्म का मूल रहस्य श्रीगीता में है और इस समय पूरे विश्व में अध्यात्म के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है। ‘अध्यात्म’ यानि जो वह जीवात्मा जो हमारा संचालन करता है। उससे जुडे विषय को ही अध्यात्मिक कहा जाता है। कई लोग सहमत हों या नहीं पर यह एक कटु सत्य है कि हमारे प्राचीन मनीषियों ने आध्यात्म का रहस्य पूरी तरह जानकर लोगों के सामने प्रस्तुत किया और कहीं अन्य इसकी मिसाल नहीं है। भारत की ‘अध्यात्मिकता’ सत्य के निकट नहीं बल्कि स्वयं सत्य है। यह अलग बात है कि विदेशियों की क्या कहें देश के ही कई कथित साधु संतों ने इसकी व्याख्या अपने को पुजवाने के लिये की । दुनियों में श्रीगीता अकेली ऐसी पुस्तक है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान है और उसमें जो सत्य है उससे अलग कुछ नहीं है। लोग उल्टे हो जायें या सीधे चाहे खालीपीली नारे लगाते रहें, तलवारे चलाये या त्रिशूल, पत्थर उड़ाये या फूल पर सत्य के निकट नही जा सकते। अगर सत्य के निकट कोई ले जा सकता है तो बस श्रीगीता और भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथ। अपने देश के लोग कहीं पत्थरमार होली खेलते हैं तो कहीं फूल चढ़ाते हैं तो कही पशु की बलि देने जाते है कही कही तो शराब चढ़ाने की भी परंपरा है। श्रीगीता को स्वय पढ़ने और अपने बच्चों को पढ़ाने से डरते है कहीं मन में सन्यास का ख्याल न आ जाये जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने तो सांख्ययोग (सन्यास) को लगभग खारिज ही कर दिया है। हां उसे पढ़ने से निर्लिप्त भाव आता है और ढेर सारी माया देखकर भी आप प्रसन्न नहीं होते और यही सोचकर आदमी घबड़ाता है कि इतनी सारी माया का आनंद नही लिया तो क्या जीवन जिया। अभी मैंने श्रीगीता पर लिखना शुरू नहीं किया है और जब उसके श्लोकों की वर्तमान संदर्भ में व्याख्या करूंगा तो वह अत्यंत दिल्चस्प होगी। यकीन करिये वह ऐसी नहीं होगी जैसी आपने अभी तक सुनी। आजकल मैं हर बात हंसता हूं क्योंकि लोगों को ढोंग और पाखंड मुझे साफ दिखाई देते है। कहता इसलिये नहीं कि भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि भक्त के अलावा इस श्रीगीता का ज्ञान किसी को न दें।

मंदिरों मे भगवान का नाम लेने जरूर लोग जाते हैं पर मन में तो माया का ही रूप धारण किये जाते हैं। मन में भगवान है तो माया भी वहीं है उसी तरह मंदिर में भी है वहां भी आपके मन के अनुसार ही सब है। अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये लोग वहां जाते हैं तो कुछ लोग दर्शन करने चले जाते हैं तो कुछ लोग ऐसे ही चले जाते है। खेलती माया है और आदमी को गलतफहमी यह कि मै खेल रहा हूं । काम कर रही इंद्रियां पर मनुष्य अपने आप को कर्ता समझता है।

असल बात बहुत छोटी है। सांईबाबा संत थे और एक तरह से फक्कड़ थे। उनका रहनसहन और जीवन स्तर एकदम सामान्य था पर उनका नाम लेलेकर लोगों ने अपने घर भर लिये और अब अगर यह रायल्टी का मामला है तो भी है तो माया का ही मामला। कई जगह उनके मंदिर है और मैं अगर किसी दूसरे शहर में गुरूवार को होता हूं तो भी उनके मंदिर का पता कर वहां जरूर जाता हूं। मंदिरों में तो बचपन से जाने की आदत है पर मैं केवल इसलिये भगवान की भक्ति करता हूं कि मेरी बुद्धि स्थिर रहे और किसी पाप से बचूं। फिर तो सारे काम अपने आप होते है। कई मंदिरों पर संपत्ति के विवाद होते हैं और तो और वहां के सेवकों के कत्ल तक हो जाते हैं। यह सब माया का खेल है। अब अगर यह मामला बढ़ता है तो बहुत सारे विवाद होंगे। कुछ इधर बोलेंगे तो कुछ उधर। हम दृष्टा बनकर देखेंगे। वैसे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान सोने की खदान है और कुछ लोग इसको बदनाम करने के लिये भी ऐसे मामले उठा सकते हैं जिससे यह धर्म और बदनाम हो कि देखो इस धर्म को मानने वाले कैसे हैं? जानते हैं क्यों? अध्यात्म और धर्म अलग-अलग विषय है और जिस तरह विश्व में लोग माया से त्रस्त हो रहे हैं वह इसी ज्ञान की तरफ या कहंे कि श्रीगीता के ज्ञान की तरफ बढ़ेंगे। उनको रोकना मुश्किल होगा। इसीलिये उनके मन में भारतीय लोगों की छबि खराब की जाये तो लोग समझें कि देखो अगर इनका ज्ञान इस सत्य के निकट है तो फिर यह ऐसे क्यों हैं?
मैं महापुरुषों के संदेश भी अपने विवेक से पढ़कर लिखता हूंे ताकि कल को कोई यह न कहे कि हमारे विचार चुरा रहा है। यकीन करिय एक दिन ऐसा भी आने वाला है जब लोग कहेंगे कि हमारा इन महापुरुषों के संदशों पर भी अधिकार है क्योंकि हमने ही उनको छापा है। यह गनीमत ही रही कि गीताप्रेस वालों ने भारत के समस्त ग्रंथों को हिंदी में छाप दिया नहीं तो शायद इनके अनुवाद पर भी झगड़े चलते और हर कोई अपनी रायल्टी का दावा करता। जिस तरह यह मायावी विवाद खड़े किये जा रहे हैं उसके वह आशय मै नहीं लेता जो लोग समझते हैं। मेरा मानना है कि ऐसे विवाद केवल भारत के आध्यात्मिक ज्ञान को बदनाम करने के लिये किये जाते है। मुख्य बात यह है कि इसके लिये प्रेरित कौन करता है? यह देखना चाहिए। पत्रकारिता के मेरे गुरू जिनको मैं अपना जीवन का गुरू मानता हूं ने मुझसे कहा था कि तस्वीर तो लोग दिखाते और देखते हैं पर तुम पीछे देखने की करना जो लोग छिपाते हैं। देखना है कि यह विवाद आखिर किस रूप में आगे बढ़ता है क्योंकि श्री सत्य सांई बाबा विश्व में असंख्य लोगों के विश्व के केंद्र में है और जिस तरह यह मामला चल रहा है लोगों को उनसे विरक्त करने के प्रयासों के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता।

2/15/2009

पाकिस्तान का यह 62 वर्ष पुराना सच है-आलेख

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी का कहना है कि पाकिस्तान तालिबान के विरुद्ध अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। एक बहुत बड़े भूभाग पर उसने कब्जा कर लिया और वहां उनकी नहीं चलती। यह एक कड़वा सच है पर एक प्रश्न है कि जिस भूभाग की वह बात कर रहे हैं उस पर वैसे भी पाकिस्तान का शासन तो हमेशा नाममात्र का रहा है। हां, यह अलग बात है कि पाकिस्तान के हुक्मरानों ने अपने स्वार्थ की खातिर वहां के लोगों को उन स्थानों पर फैलने की आजादी नहीं दी जहां वह नहीं पहुंचे थे। अपने सभ्य समाज पर नियंत्रण के लिये उन्हें वह उग्रपंथी बहुत पसंद आये पर वही अब उनके जीजान का संकट बन गये हैं। वैसे भी पाकिस्तान का सभ्य समाज भी कम गलतफहमियों में नहीं रहा। आजादी के बाद से वह संपूर्ण भारत पर कब्जा करने का ख्वाब सजाये उन्हीं कट्टरपंथी जमातों को पालता रहा जो आज उनको संकट का कारण दिखाई दे रही हैं। जब तक सेना का शासन रहता है यह उग्रपंथी खामोशी से अपना काम करते हैं जैसे ही लोकतांत्रिक शासन आता है वैसे ही उनकी आक्रामकता बढ़ जाती है क्योंकि उनको गैरहिंसक शासन पसंद नहीं आता।

भारतीय बुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों का सोच कभी लाहौर से आगे गया ही नहीं। समय समय पर अनेक बुद्धिजीवियों और लेखकों के पाकिस्तान दौरे हुए-या यह कहना चाहिये कि लाहौर के दौरे ही हुए-वहां उन्होंने पाकिस्तान के बौद्धिक लोगांें से चर्चा की और यहां आकर सीमित दायरे में अपने विचार व्यक्त कर दिये। वह उस गहराई तक पहुंचे ही नहीं जहां उग्रपंथ हमेशा बैठा ही रहा। तालिबान और अलकायदा की उपस्थिति से पाकिस्तान के सीमाप्रांत और ब्लूचिस्तान में उग्रपंथ नहीं फैला बल्कि वहां मौजूद तत्वों का इन संगठनों ने फायदा उठाया। हां, उन्होंने इतना जरूर किया कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मौजूद सुविधाओं का उपयोग करने के लिये वहां अपना ठिकाना बनाया और उग्रपंथ वहां तक ले आये। बहुत कम लोग इस बात की चर्चा करते हैं कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लोग अपने देश के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। अपने उपेक्षा के कारण उनमें भारी असंतोष है और कुछ भारतीय सैन्य विशेषज्ञ कहते हैं कि वह तो एक रसगुल्ले की तरह चाहे जब पाकिस्तान से अलग कर दो।

असल बात यह है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में एक बहुत बड़े इलाके के लोगों में स्वाभाविक रूप से आक्रामकता है और अशिक्षा,गरीबी और पिछड़ापन उन्हें विकसित नहीं होने देता। पाकिस्तान की स्वात घाटी-जिसे उसका स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है-अब उग्रपंथियेां के हाथ में चली गयी है पर पाकिस्तान के हाथ में थी ही कब? अब वहां जिस तरह के स्वर सुनाई दे रहे हैं उससे पाकिस्तान का प्रबुद्ध समझ रहा है यह लगता नहीं है और वह अब भी भारत विरोध पर कायम है।

वहां के लोगों के बारे में भारत के बहुत कम लोग जानते हैं सिवाय इसके कि वहां के निवासी आक्रामक हैं-यदाकदा कुछ विद्वान इस बात की चर्चा जरूर करते हैं। हमारे देश में जो बुजुर्ग आजाद के समय वहां से पलायन कर यहां आये हैं वह अनेक प्रकार की कहानियां सुनाते हैं और उससे तो यही लगता है कि यह आतंकवाद वहां बहुत पहले से ही था। इस लेखक की एक ऐसे बुजुर्ग से चर्चा हुई जो वहां से 12 वर्ष की आयु में ही यहां आये थे और उनके जेहन में वहां की कुछ यादें बसी थीं-वह अपने पिता के साथ काबुल और कंधार तक घूम कर आये थे। जब अमेरिका ने पाकिस्तान पर हमला किया तब वह टीवी पर यह खबर देख कर हंसे थे और कहा था-‘वह चाहे कितना भी ताकतवर है पर उसे विजय नहीं मिलेगी। वह लोग मारता रहेगा पर दूसरे पैदा होते रहेंगे। अंग्रेजों ने लाख कोशिश कर ली पर वह डूरंड लाईन पार नहीं कर पाये तो अमेरिका भी वहां कामयाब नहीं हो पायेगा।’

वहां कबीलाई सरदारों का शासन है। बाकी लोग उनके गुलाम की तरह होते हैं। उनके परिश्रम और शक्ति के सहारे सरदार खूब धन संचय करते हैं और फिर अवसर मिल जाये तो दूसरों से हफ्ता या चंदा भी वसूल करते हैं। जब अफगानिस्तान में नार्दन अलायंस की सेना प्रवेश हुई थी तब पता लगा कि अनेक तालिबानी सरदारों ने पैसा लेकर पाला बदला था और वह उनके साथ हो गये थे। एक बार सत्ता बदली तो फिर वह अपने पुराने ढर्रे पर लौट गये। अगर पाकिस्तान को वहां अपना नियंत्रण स्थापित करना था तो उसे आधुनिक शिक्षा प्रणाली का वहां प्रचार करना था पर पाकिस्तान के स्वार्थी हुक्मरानों ने भारत विरोध के मुद्दे के सहारे ही अपना शासन चलना उचित समझा और बाकी अन्य प्रांतों को वह भूल गये। प्रबुद्ध वर्ग ने भी यही सोचा कि कबीलाई लोगों की आक्रमकता से वह युद्धों में विश्वविजेता बन जायेंगे।
मगर यह संकट गहरा है या फिर उसे बना दिया गया है। पाकिस्तान की सेना अभी इन आतंकवादियों से लड़ रही है पर जरदारी साहब स्वयं मान रहे हैं कि उग्रपंथियों के खिलाफ वह उतनी ही शक्तिशाली नहीं है। फिर इसका हल क्या है? अमेरिका बमबारी करता है तो पाकिस्तान उसका विरोध भी करता है और भारत से मदद लेने की बात आये तो वहां का प्रबुद्ध वर्ग हायतौबा मचा देता है जबकि संकट अब उसकी तरफ ही आने वाला है। मतलब यह है कि वहां का प्रबुद्ध वर्ग उग्रपंथ की चपेट में आने को तैयार है पर भारत से मित्रता उसे स्वीकार्य नहीं है। भारत में जाकर उनके लेखक,बुद्धिजीवी,गायक,अभिनेता,अभिनेत्रियां और अन्य कलाकार जाकर कमायें पर फिर भी मित्रता न बने यह उनका ध्येय है। भारत से मित्रता होते ही उनकी रचनात्मकता के आधार समाप्त हो जायेंगे। पाकिस्तान की शैक्षणिक पुस्तकोंं में भारत और हिंदू धर्म का विरोध पढ़ाया जाता है। भारत को वणिक देश मानते हुए वह कायर तो कहते हैं पर धन और व्यापार की ताकत को स्वीकार न कर वह शतुरमुर्ग की भूमिका अदा करना चाहते हैं।

प्रसंगवश कुछ लोग देश में कभी महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसक वारदातों पर इतने उत्तेजित होकर तालिबानी संस्कृति आने की चर्चा करते हैं। वह घोर अज्ञानी है वह जानते ही नहीं जिस तालिबानी संस्कृति की बात कह रहे हैं वह तो केवल नाम भर है पाकिस्तान और अफगानिस्तान में वह सदियों से है। भारत में कम से कम एक प्रबुद्ध वर्ग तो है जो कभी भी इन हिंसंक वारदातों पर पीडि़तों के साथ खड़ा होने का साहस करता है पर पाकिस्तान में यह संभव नहीं है। भारत में जिस तरह दहेज एक्ट का प्रयोग निर्दोष पुरुषों के विरुद्ध होने की शिकायतेंं हो रही हैं वैसे ही पाकिस्तान में महिलाओं के विरुद्ध वैश्यावृत्ति कानून के दुरुपयोग की बात कही जाती है।

पाकिस्तान में पंजाबी लाबी हमेशा ही हावी रही है। जरदारी सिंध के हैं और वह जानते हैं कि देश की सामाजिक स्थिति क्या है? इसके बावजूद वह दिखावे के लिये अखंड पाकिस्तान के लिये जूझ रहे हैं जिसका कभी अस्तित्व रहा ही नहीं। सबसे बड़ी बात यह है कि अपने प्रांत के प्रति उनके न्याय की जो अपेक्षा की जा रही है वह भारत से मित्रता के बिना संभव ही नहीं है। पाकिस्तान का सिंध प्रांत विदेशी और कबाइली आतंकियों का गढ़ बन गया है और वहां सिंध प्रांत के लोग उनको पसंद कम ही करते हैं मगर सेना, प्रशासन और अन्य राजनीतिक संस्थाओं में वहां के लोगों का प्रभाव बहुत कम है। वहां की पंजाबी लाबी अपने प्रांत को तो आतंक से मुक्त रखना चाहती है पर उनको इस बात की परवाह नहीं कि अन्य प्रांतों में क्या होगा? अखबारों जब पाकिस्तान के बारे में समाचार आते हैं तो कई तरह की विचित्रता दिखती है। कभी पाकिस्तान क्या कहता है कभी क्या? लाहौर तक ही सोचने वाले लोग केवल पाकिस्तान देखते हैं पर जो इससे आगे की जानकारी का ध्यान रखते हैं वह अच्छी तरह से समझते हैं कि यह सब वहां सक्रिय लाबियों के आपसी द्वंद्व का परिणाम है।
ऐसे में पाकिस्तान के प्रबुद्ध वर्ग को यह बात समझ लेना चाहिये कि वह आपसी द्वंद्व में उलझने और भारत से बैर रखने की नीति त्याग कर इस बात की फिक्र करें कि एक आसन्न संकट उनके सामने आने वाला है जिसमें उनकी आवाज ही बंद कर दी जायेगी। अभी तक उनको अपनी सरकारों से जो सुरक्षा मिलती आ रही थी वह कभी भी तालिबान के हाथ में जा सकती है। 62 साल से बना हुआ सच अब उनके राष्ट्रपति ने कहा इससे बाहर के लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता-उनके कबाइली लोग युद्धों में पाकिस्तान को युद्धों में विश्वविजेता नहीं बना सकतें इस बात को सभी समझ गये हैं-पर पाकिस्तान के प्रबुद्ध वर्ग को यह बात ध्यान रखना चाहिये कि इस बार यह आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है कि पाकिस्तान के एक बहुत बड़े इलाके में वहां का संविधान नहीं चलता।
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1.दीपक भारतदीप का चिंतन
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3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
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2/01/2009

दूसरे के तय वैचारिक नक्शे पर चर्चा घर सजाते हैं-आलेख

बिना धन के कहीं भी आतंकवाद का अभियान चल ही नहीं सकता और वह केवल धनाढ़यों से ही आता है। आतंकवाद एक व्यापार की तरह संचालित है और इसका कहीं न कहीं किसी को आर्थिक लाभ होता है। आतंकवाद को अपराधी शास्त्र से अलग रखकर बहस करने वाले जालबूझकर ऐसा करते हैं क्योंकि तब उनको जाति,भाषा,वर्ण,क्षेत्र और संस्कारों की अलग अलग व्याख्या करते हैं और अगर वह ऐसा नहीं करेंगे फिर एकता का औपचारिक संदेश देने का अवसर नहीं मिलेगा और वह आम आदमी के मन में अपनी रचात्मकता की छबि नहीं बना पायेंगें

कोई भी अपराध केवल तीन कारणों से होता है-जड़,जोरू और जमीन। आधुनिक विद्वानों ने आतंकवाद को अपराध से अलग अपनी सुविधा के लिये मान लिया है क्योंकि इससे उनको बहसें करने में सुविधा होती है। एक तरह से वह अपराध की श्रेणियां बना रहे हैं-सामान्य और विशेष। जिसमें जाति,भाषा,धर्म या मानवीय संवेदनाओंं से संबंधित विषय जोड़कर बहस नहीं की जा सकती है वह सामान्य अपराध है। जिसमें मानवीय संवेदनाओं से जुड़े विषय पर बहस हो सकती है वह विशेष अपराध की श्रेणी में आतेे हैं। देश के विद्वनों, लेखकों और पत्रकारों में इतना बड़ा भ्रम हैं यह जानकार अब आश्चर्र्य नहीं होता क्योंकि आजकल प्रचार माध्यम इतने सशक्त और गतिशील हो गये हैं कि उनके साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क निरंतर बना रहता है। निरंतर देखते हुए यह अनुभव होने लगा कि प्रचार माध्यमों का लक्ष्य केवल समाचार देना या परिचर्चा करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि हर पल अपने अस्तित्व का अहसास कराना भी है।
हत्या,चोरी,मारपीट डकैती या हिंसा जैसे अपराघ भले ही जघन्य हों अगर मानवीय संवदेनाओं से जुड़े विषय-जाति,धर्म,भाषा,वर्ण,लिंग या क्षेत्र से-जुड़े नहीं हैं तो प्रचार माध्यमों के लिये वह समाचार और चर्चा का विषय नहीं हैं। अगर सामान्य मारपीट का मामला भी हो और समूह में बंटे मानवीय संवदेनाओं से जुड़े होने के कारण सामूहिक रूप से प्रचारित किया जा सकता है तो उसे प्रचार माध्यमों में अति सक्रिय लोग हाथोंहाथ उठा लेते हैं। चिल्ला चिल्लाकर दर्शकों और पाठकों की संवदेनाओं को उबारने लगते हैं। उनकी इस चाल में कितने लोग आते हैं यह अलग विषय है पर सामान्य लोग इस बात को समझ गये हैं कि यह भी एक व्यवसायिक खेल है।

यह प्रचार माध्यमों की व्यवसायिक मजबूरियां हैं। उनको भी दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि मानवीय संवेदनाओं को दोहन करने के लिये ऐसे प्रयास सदियों से हो रहे हैं। यही कारण है कि अध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण भारतीय ज्ञान की अनदेखी तो वह लोग भी करते हैं जो उसे मानते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान की जगह धर्म के रूप में सार्वजनिक कर्मकांडों के महत्व का प्रतिपादन बाजार नेे ही किया है। कहीं यह कर्मकांड शक्ति के रूप में एक समूह अपने साथ रखने के लिये बनाये गये लगते हैं। मुख्य बात यह है कि हमें ऐसे जाल में नहीं फंसना और इसलिये इस बात को समझ लेना चाहिये कि अपराध तो अपराध होता है। हां, दूसरे को हानि पहुंचाने की मात्रा को लेकर उसका पैमाना तय किया जा सकता है पर उसके साथ कोई अन्य विषय जोड़ना बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं है। जैसे चोरी, और मारपीट की घटना डकैती या हत्या जैसी गंभीर नहीं हो सकती पर डकैती या हत्या को किसी धर्म, भाषा,जाति और लिंग से जोड़ने के अर्थ यह है कि हमारी दिलचस्पी अपराध से घृणा में कम उस पर बहस मेें अधिक है।
बाजार और प्रचार का खेल है उसे रोकने की बात करना भी ठीक नहीं है मगर आम आदमी को यह संदेश देना जरूर आवश्यक लगता है कि वह किसी भी प्रकार के अपराध में जातीय,भाषा,धर्म,वर्ण,लिंग और क्षेत्रीय संवेदनाएं न जोड़े-अपराध चाहे उनके प्रति हो या दूसरे के प्रति उसके प्रति घृणा का भाव रखें पर अपराधी की जाति,भाषा,धर्म,वर्ण,लिंग और क्षेत्रीय आधार को अपने हृदय और मस्तिष्क में नहीं रखें।

एक बात हैरान करने वाली है वह यह कि यह विद्वान लोग विदेश से देश में आये आतंकियों के जघन्य हमले और देश के ही कुछ कट्टरपंथी लोगों द्वारा गयी किसी एक स्थान पर सामान्य मारपीट की घटना में को एक समान धरातल पर रखते हुए उसमें जिस तरह बहस कर रहे हैं उससे नहीं लगता कि वह गंभीर है भले ही अपने कार्यक्रम की प्रस्तुति या आलेख लिखते समय वह ऐसा प्रदर्शित करते हों। इस बात पर दुःख कम हंसी अधिक आती है। मुख्य बात की तरफ कहीं कोई नहीं आता कि आखिर इसके भौतिक लाभ किसको और कैसे हैं-यानि जड़ जोरु और जमीन की दृष्टि से कौन लाभान्वित है। बजाय इसके वह मानवीय संवेदनाओं से विषय लेकर उस पर बहस करते हैं।

आतंकवाद विश्व में इसलिये फैल रहा है कि कहीं न कहीं विश्व मेें उनको राज्य के रूप में सामरिक और नैतिक समर्थन मिल जाता है। कहीं राज्य खुलकर सामरिक समर्थन दे रहे हैं तो कही उनके अपराधों से मूंह फेरकर उनको समर्थन दिया जा रहा है। एक होकर आतंकवाद से लड़ने की बात तो केवल दिखावा है। जिस तरह अपने देश में बंटा हुआ समाज है वैसे ही विश्व में भी है। हमारे यहां सक्रिय आतंकवादी पाकिस्तान और बंग्लादेश से पनाह और सहायता पाते हैं और विश्व के बाकी देश इस मामले में खामोश हो जाते हैं। वह तो अपने यहां फैले आतंकवाद को ही वास्तविक आतंकवाद मानते हैंं। वैसे ऐसी बहसें तो वहां भी होती हैं कि कौनसा धर्म आतंकवादी है और कौनसा नहीं या किसी धर्म के मानने वाले सभी आतंकवादी नहीं होते। यह सब बातें कहने की आवश्यकता नहीं हैं पर लोगों को व्यस्त रखने के लिये कही जातीं हैं। इससे प्रचार माध्यमों को अपने यहां कार्यक्रम बनाने और उससे अपना प्रचार पाने का अवसर मिलता है। आतंकवाद से लाभ का मुख्य मुद्दा परिचर्चाओं से गायब हो जाता है और वहां यहां तो आतंकवादी संगठनों की पैतरेबाजी की चर्चा होती है या फिर धार्मिक,जाति,भाषा, और लिंग के आधार बढि़या और लोगों को अच्छे लगने वाले विचारों की। आतंकवादियों के आर्थिक स्त्रोतों और उनसे जुड़ी बड़ी हस्तियों से ध्यान हटाने का यह भी एक प्रयास होता है क्योंकि वह प्रचार माध्यमों के लिये अन्य कारणों से बिकने वाले चेहरे भी होते हैं।

प्रसंगवश अमेरिका के नये राष्ट्रपति को भी यहां के प्रचार माध्यमों ने अपना लाड़ला बना दिया जैसे कि वह हमारे देश का आतंकवाद भी मिटा डालेंगे। भारत से अमेरिका की मित्रता स्वाभाविक कारणों से है और वहां के किसी भी राष्ट्रपति से यह आशा करना कि वह उसके लिये कुछ करेंगे निरर्थक बात है। यहां यह भी याद रखने लायक है कि ओबामा ने भारत के अंतरिक्ष में चंद्रयान भेजने पर चिंता जताई थी। शायद उनको मालुम हो गया होगा कि वहां से जो फिल्में उसने भेजीं हैं वह इस विश्व को पहली बार मिली हैं और अभी तक अमेरिकी वैज्ञानिक भी उसे प्राप्त नहीं कर सके थे। बहरहाल आतंकवादियों की पैंतरे बाजी पर चर्चा करते हुए विद्वान बुद्धिजीवी और लेखक जिस तरह मानवीय संवेदनाओं से जुड़े विषय पैंतरे के रूप में आजमाते हैं वह इस बात को दर्शाता है कि वह भी अपने आर्थिक लाभ और छबि में निरंतरता बनाये रखने के लिये एक प्रयास होता है। वह बनी बनायी लकीर पर चलना चाहते हैं और उनके पास अपना कोई मौलिक और नया चिंतन नहीं है। वह दूसरे के द्वारा तय किये गये वैचारिक नक्शे पर ही अपने चर्चा घर सजाते हैं।
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