तुझे देखने के लिए
आकाश की ओर ताक रहा हूँ
तू मेरे बदन को छू ले
पसीने से भीगा बदन लिए
तेरे सानिध्य की चाह में
सूरज की आग में जलता हुआ
चल रहा हूँ इस राह में
ओ वर्षा ऋतू तू जल्दी आजा
इस झुलसा देने वाली गर्मी से
मुझे निजात दिला जा
तेरे अमृत के इन्तजार में
गर्म हवाओं से लड़ते-लड़ते
मैं ख़ाक हो रहा हूँ
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आकाश से बरसती आग
गमीं से कांपती धरती
लू के झोंकों से कांपते पेड
ऐसा लगता है
नरक इसी को कहते हैं
इन्तजार है बादलों का
नरक इसी को कहते हैं
इन्तजार है बादलों का
आते हैं
लगता है अमृत लाए हैं
बिन बरसे हवा में चलते जाते हैं
लगता है दिल जलाने आये हैं
पसीने से नहाये
पानी की बूँद-बूँद को तरसे लोग
आकाश से अमृत बरसने के
इन्तजार में अपनी आशा टिकाये हैं
घडी घूम रही है
घडी घूम रही है
घूम रहा आकाश
और यह धरती
बरसेगा जब पानी
फैलेगी चहुँ और हरियाली
चारों और पक्षियों का कलरव गूंजेगा
मैदानों में हरी दूब लहराएगी
पेड-पौधे मुस्करायेंगे
तब हम कहेंगे
स्वर्ग इसीको कहते हैं
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