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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

10/02/2013

महात्मा गांधी निष्काम कर्म का प्रमाण थे-गांधी जयंती पर विशेष हिन्दी लेख(mahatma gadthi nishkam karma ka praman the-special hindi article on gandhi birthdayi,gandhi jayanti par vishesh hindi lekh)



                        महात्मा गांधी को युग पुरुष कहा जाता है। हम यहंा बता दें कि महात्मा गांधी जैसा चरित्र विश्व में कभी कभार ही देखने को मिलता है। जिस तरह उन्होंने अंग्रेजों से अपमानित होने पर उनके विरुद्ध पहले दक्षिण अफ्रीका और फिर भारत में आंदोलन छेड़कर अपना हिसाब चुकाया वह अनुकरणीय है।  हम अगर उनके जीवन को कमतर कहेंगे तो यकीनन यह मानसिक कुंठा के अलावा कुछ नहीं हो सकता।  कोई व्यक्ति किस तरह शून्य से शिखर तक पहुंच सकता है इसका प्रमाण महात्मा गांधी से बेहतर आधुनिक युग में कोई दूसरा हो ही नहीं सकता।  आधुनिक लोकतांत्रिक युग में राज्य के विरुद्ध सत्याग्रह तथा अहिंसक आंदोलन जैसी प्रेरणा उन्होंने जो दी है उसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।  इसके बावजूद महात्मा गांधी जी का नाम  भारत में प्राचीन महापुरुषों की तरह प्रतिष्ठित नहीं हो पाया। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में अध्यात्मिक विषय में दक्षता होने पर ही लोग किसी को अपना हार्दिक महापुरुष मानते हैं।  स्थिति यह है कि महात्मा गांधी को राजनीतिक संत कहकर प्रथम राजनेता की तरह सम्मान दिया जाता है। यह देखकर हैरानी होती है कि पूरे देश के हर समाज को आंदोलित करने वाले महान व्यक्तित्व के स्वामी होने के बावजूद संत तुलसीदास, कबीरदास, रहीम तथा सूर जैसी छवि भारतीय जनमानस में नहीं बन पायी। इसका कारण उनके आंदोलन से केाई अध्यात्मिक संदेश नहीं मिलता।
                        महात्मा गांधी त्याग की मूर्ति थे। कहा जाता है कि त्यागी हमेशा ही भोगी से बड़ा होता है इसके बावजूद भारतीय अध्यात्मिक दृष्टि से उनकी सक्रियता को रेखांकित नहीं किया गया।  इन कारणों की खोज करें तब इस बात का आभास होता है कि भारतीय जनमानस त्रिगुणमयी माया से संचालित इस धरती पर राजसी प्रवृत्ति में लिप्त रहते हुए राजसी कर्म करता है पर उसके हृदय में स्थाई छवि सात्विक और योग साधना से इन तीनों गुणों को लांघ जाने वाले सिद्ध की ही बनती है। भारत का स्वाधीनता आंदोलन शुद्ध रूप से एक राजसी कार्य था।  एक राज्य व्यवस्था से दूसरी की तरफ जाना इस मायने में ही स्वतंत्रता थी कि दूसरी व्यवस्था अपने ही देश के लोगों के हाथ में थी।  यह व्यवस्था भी महात्मा गांधी के अनुयायियों को मिली।  उससे भी बड़ी बात यह कि व्यवस्था का रूप वही था पर प्रबंधकों के चेहरे बदल गये थे।  उसमें कोई ऐसा मूल बदलाव नहीं आया जिससे प्रजा अनुभव कर सके। कालांतर में तो यह भी हुआ  कि महात्मा गांधी के के गैर राजनीति अनुयायी ही यह कहते रहे कि अभी तो पूर्ण आजादी मिलना शेष हैै। आधुनिक युग में उनके सबके प्रसिद्ध अनुयायी अन्ना हजारे ने यहां तक कह दिया कि देश में वह दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन चलाना चाहते हैं।  उन्होंने अपने आंदोलन के दौरान भारी जनसमर्थन जुटाया। यह अलग बात है कि अब उनका आंदोलन तथा उनका नाम प्रचार माध्यमों में अब ज्यादा नहीं लिया जाता पर इतना तय है कि उनके बहाने महात्मा गांधी पर चर्चा अवश्य होती है। 
                        दरअसल महात्मा गांधी ने भारत का सवौच्च कार्यपालिका का मुख्य पद लेने से इंकार कर दिया था। उन्होंने प्रधानमंत्री बनना स्वीकार नहीं किया। इसे त्याग मान गया। लोगों का अपना अपना दृष्टिकोण है कुछ लोग इसे त्याग मानते हैं तो कुछ लोग जिम्मेदारी से दूर हटना मानते हैं।  एक बात तय रही है कि महात्मा गांधी  पूर्ण रूप से एक अध्यात्मिक व्यक्तित्व के स्वामी थे पर वह राजसी कर्म में अपना नाम प्रतिष्ठित कर रहे थे।  लोगों को अपने साथ वह कोई सत्संग करने के लिये नहीं जोड़ते थे बल्कि उनका मुख्य अपना राजसी लक्ष्य पूरा करना था।  वह प्रधानमंत्री पद पर बैठकर एक श्रेष्ठ राजसी पुरुष की भूमिका निभाते तो उनका नाम सम्राट चंद्रगुप्त, अशोक और विक्रमादित्य की श्रेणी में आ सकता था।  संभव है भारतीय अध्यात्मिक विषय में भी उन्हें एक श्रेष्ठ राजसी पुरुष का दर्जा मिलता।  दूसरी बात यह कि वह जिस राम राज्य की कल्पना का प्रचार करते थे उसके लिये भी उनको राज्य पद पर प्रतिष्ठित होना आवश्यक था।  जिन भगवान श्रीराम के वह भक्त थे उन्होंने भी 14 वर्ष के वनवास के दौरान जहां अपने महान योद्धा होने का प्रमाण देने के बाद एक श्रेष्ठ राजा के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वहन किया था।  इसी तरह उनके अनेक भक्त उनसे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान एक श्रेष्ठ योद्धा के रूप के प्रतिष्ठित होने के बाद राजपद पर स्थापित होकर एक श्रेष्ठ राजपुरुष की तरह दिखने की अपेक्षा भी कर रहे थे।

कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि
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कृतं त्रेतायुगं चौप द्वापरं कलिरेव च।
राज्ञोवृत्तानि सर्वाणि राजा के हि युगमुच्यते।
     हिन्दी में भावार्थ-किसी राज्य में राजा जिस तरह प्रजा के लिये व्यवस्था तथा चेष्टा करता है वही युग कहलाती है।  एक तरह से राजा के कार्य तथा उसकी अवधि  ही सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होती है। एक तरह से राजा का कार्यकाल ही युग होता है।
कलिः प्रसुप्तो भवति सः जाग्रद्द्वपरं युगम।
कर्मस्यभ्युद्यतस्वेत्ता विचरेस्तु कृतं युगम्।।
                 हिन्दी में भावार्थ-राजा के निरुद्यम होने पर कलियुग, जाग्रत रहने पर द्वापर, कर्म में तत्पर रहने पर त्रेता तथा यज्ञानुष्ठान में रत होने पर सतयुग की अनुभूति होती है।

                        महात्मा गांधी ने प्रधानमंत्री पद नहीं लिया इसके पीछे उनका सोच चाहे जो भी हो पर उससे देश में गलत संदेश चला गया।  लोगों को यह लगता है कि राज्य प्रमुख होना एक सौभाग्य की बात है और उसे त्यागना गौरवपूर्ण बात  है। इसे स्वीकार करना कठिन है। सच बात तो यह है कि इस संसार के समस्त विषयों का अनुष्ठान  राजसी प्रवृत्ति के कर्म उसी के अनुरूप भाव होने पर संपन्न होते हैं।  अध्यात्मिक विषयों के संयोग  मनुष्य के अंतर्मन की शुद्धता करते हैं पर सांसरिक विषयों के कार्यों में व्यवहारिकता का होना आवश्यक है। मनुष्य को छल नहीं करना चाहिये मगर यह भी सच है कि  निजी सीमाओं तक इसे माना जा सकता है जबकि सार्वजनिक   राजसी कर्म करते हुए यह शर्त हमेशा नहीं रखी जा सकती। दूसरी बात यह कि राज्य पद होने पर भोग के साधन सुलभ होते हैं पर अनेक सार्वजनिक दायित्व भी पूरे करने पड़ते हैं।  उसमें विशेष योग्यता, बुद्धि तथा शिक्षा होना आवश्यक है।  किसी राज्य पद को स्वीकार न करना त्याग माना जा सकता है पर उसके साथ जो जुड़े दायित्व हैं उनसे परे हटना इस श्रेणी में नहीं आता।
                        महात्मा गांधी तत्कालीन भारतीय जनमानस में सर्वाधिक लोकप्रिय थे इसलिये उनके राजकीय पद न स्वीकारने को भले ही त्याग माना गया पर कालांतर में इस पर कुछ लोगों ने आपत्तियां भी की।  मनुष्य समाज में राजा का होना आवश्यक है वरना वह पशुओं की तरह व्यवहार करने लगता है।  इतिहास में देखा गया है कि जहां राजा पर संकट आया वहां की प्रजा को भारी परेशान हुई।  इसलिये राजपद का महत्वपूर्ण ही माना जाता है।  इतना ही नहीं अनेक बार तो ऐसा लगता है कि किसी ने राजपद पर बैठकर ही साहस का काम किया है क्योंकि का जाता है कि जिनके सिर पर मुकुट होता है उनके ही कटने का डर रहता है।  कहने का अभिप्रय यह है कि राजपद को हमेशा ही भोग का प्रतीक नहीं माना जा सकता।  महात्मा गांधी क राजपद स्वीकार न करने पर एक तरह से यही संदेश निकलता है कि राजपद पर बैठना भोग प्रकृति को दर्शाता है।
                        महात्मा गांधी का जीवन अनोखा है। सच बात तो यह है कि हजारों वर्षों तक ऐसा महान व्यक्तित्व देखने को नहीं मिलेगा पर उनके नाम पर कोई युग नहीं बन सकता। युग तो केवल उन लोगों का बनता है जो अध्यात्मिक विषयों में सिद्धि प्राप्त करते हैं-जैसे संत कबीर, तुलसीदास, रैदास, रहीम और सूरदास-या फिर जो राजसी कर्म में अपनी श्रेष्ठता दिखाते हैं-जैसे सम्राट चंद्रगुप्त, अशोक और विक्रमादित्य-महात्मा गांधी एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व के स्वामी थे पर उनका नाम इसी कारण प्राचीन काल के एतिहासिक पुरुषों के श्रेणी तक नहीं पहुंच पाया।   बहरहाल उनके जन्म दिन पर उनको हम भावभीनी श्रद्धांजलि देते हैं। उनके बारे में हमें यह कहते हुए जरा भी हिचक नहीं है कि वह निष्काम कर्म का एक बहुत बड़े प्रमाण हैं।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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1 टिप्पणी:

India Darpan ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


हैल्थ इज वैल्थ
पर पधारेँ।

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